सोमवार, 25 दिसंबर 2017

रोटी और बेटी को बचाने की भी चुनौती थी लालू के कुशासन-काल में!

देवघर कोषागार से 89.4 लाख की अवैध निकासी मामले में,बिहार के पुर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा शनिवार को चारा घोटाले मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद,लालू के शासन काल की बात हो रही हैं।मैंने भी लालू के शासन काल को जानने के लिए कई लेखों को पढ़ा।लेखों को पढ़ने के बाद करीब-करीब तस्वीर साफ़ हो गई किस हाल में था मेरा बिहार।कारवां पत्रिका की 2010 की एक लेख हाथ लगी,जिसका शीर्षक है 'The Great Leap Forward?लेख अंग्रेजी में है जिसका हिन्दी रुपान्तरण पेश कर रहा हूं।लेख की बात बताने से पहले,ये बता देना चाहता हूं  कि उन लोगों के ये लेख ज़रुर पढ़ना चाहिए,जिनको ये पता है कि लालू के शासन-काल में भ्रष्टाचार,बेरोज़गारी,असुरक्षा,रंगदारी,डकैती,बलात्कार,धोखाधड़ी, किडनैपिंग,घोटाला,नेताओं के संंरक्षण में पल रहे अपराधियों के कारण अपने चरम सीमा पर थी,के बावज़ूद भी लालू के शासन-काल को एक उपलब्धि के रुप में बताते हैं।कुछ लोग लालू की खुबियां ये कहते हुए बघारते हैं कि,लालू ने सर्वणों द्वारा दलितों पर होने वाले अत्याचार बंद करवा दिया था।ये कहते वक़्त भूल जाते हैं कि लालू के शासन-काल में बिहार को जातीय हिंसा की फैक्ट्री कही जाती थी।वो इसलिए की लालू काल में दलित,सर्वणों पर अत्याचार करते थें, जिसकी वज़ह से हिंसा होती थी।मतलब ऐसा कहा जा सकता है कि बदले की कार्रवाई के लिए लालू की सरकार थी।अपनी राजनीतिक निष्ठा की वज़ह से बदले की कार्रवाई को उपलब्धि बताने वालों को ये सोचना चाहिए कि एक नागरिक के रूप में समाज में भाईचारा को समाप्त करने में योगदान क्यों कर रहा है। ऐसे दल,नेता और उनके समर्थकों से दूरी बनानी चाहिए,जो बदले की कार्रवाई को उपलब्धि मानते हैं।किसी भी सरकार में हिंसा का होना,उस सरकार के अनियंत्रित और कमज़ोर शासन का प्रतीक होता है।किसी भी दल के समर्थक को ये समझना चाहिए वो पहले एक देश का नागरिक है,जिसकी ज़िम्मेदारी है कि समाज में भाईचारा कायम करें।हर बात को सियासत की नज़रिए से देखकर क्या समाज  का भला हो सकता है?मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बिहार पुलिस की वेबसाइट के मुताबिक,साल 2000 से 2005 के बीच 18189 हत्याएं हुईं।इन आंकड़ें को ध्यान में रखकर कोई भी अंदाज़ा लगा सकता है कि 15 सालों में कितनी हत्याएं हुईं होंगी। हैरानी की बात यह है कि सिर्फ़ घोषित अपराधी ही मर्डर नहीं किया करते बल्कि सांसदों-विधायकों के इशारों पर भी हत्याएं होती थीं।शाम ढलने के बाद लोग लालटेन इसलिए नहीं जलाते थें कि क्या पता कब और किधर से बदमाश-डकैत आकर लूट लेंगे या हत्या कर देंगे।लोग जानते थें कि पुलिस तब आएगी जब हत्या या डकैती हो जाएगी।रोटी और बेटी को बचाने की चुनौती थी।
अब बात करते हैं पत्रिका में छपी लेख के बारे में।कहानी बिहार के उस ज़िले की है,जिसको कभी गांधी ने 'अहिंसा की धरती' कहा था,लालू के शासन-काल में उसको 'किडनैपिंग कैपिटल अॉफ़ बिहार' के नाम से जाना जाता था।चम्पारण की तरफ़ यात्रा करते वक़्त डरावनी चेतावनी सामने आती थी।चेतावनी ये होती थी कि घात लगाकर बैठे कुख्यात डाकुओं के द्वारा अापको 6 इंच छोटा किया जा सकता है।यदि डाकुओं से बच गए तो जेबकतरों द्वारा सबकुछ लूटा जा सकता है।1965 और 1971 भारत-पाक युद्ध के चम्पारण के योद्धा बद्री पाण्डेय ने कहा कि जब 1990 में लालू यादव पुर्ण बहुमत से चुनकर आए तो उस वक़्त मैं राजपूताना राइफल्स में था।बीमार माता-पिता की सुरक्षा के लिए मुझे समय से पुर्व नौकरी छोड़कर अपने गांव सिसवा बसंतपुर आना पड़ा।क्योंकि बदमाश उन लोगों को परेशान करते थें।गांव लौटकर मैंने टास्कफ़ोर्स के तर्ज़ पर 'शहीदी जत्था' का गठन किया।जत्थे के सदस्यों ने अपनी ज़िन्दगी  की कुर्बानी तक देकर 'बेटी और रोटी' की सुरक्षा करने की शपथ ली।अन्त में 324 पंचायतों में ग्राम सुरक्षा दल और विलेज डिफ़ेंस कमिटी बनाया।पंचायतवासियों को ख़ुद पर भरोसा रखने और हथियारों का प्रशिक्षण  दिया गया।1990 के दशक में पंचायतवासियों  के साहसिक और खूनी संघर्ष के बाद,सत्तन यादव,भांगर यादव और रामपाल यादव जैसे कुख्यात अपराधी शर्म से अपनी मुंछ मुड़वा लिए या तो आतंक को त्याग दिये।ग्राम सुरक्षा दल के अस्त्रों से डाकु डर गये थे।बहुत सारे डाकुओं ने हथियार छोड़कर नेपाल सीमा के पर स्थित स्पेशल टास्क फ़ोर्स के सामने  अात्म समर्पण कर दिया था।
बद्री पाण्डेय की कोशिश ये बताती है कि यदि समाज एकजुट होकर किसी भी बुराई के ख़िलाफ़ लड़ता है,तो उस बुराई को ख़त्म किया जा सकता है।ऐसी ही एकजुटता आज की ज़रुरत है समाजिक बुराईयों और भ्रष्टाचार को समाप्त करने करने के लिए।वरना नेता और उनके समर्थक अपने सियासी  फ़ायदे के लिए हमें एक-दूसरे से जाति-धर्म के नाम पर बाटते रहेंगे







मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

वो बुनियादी बातें जो कांग्रेस को भाजपा से सीखनी चाहिए।

ऐसा पहली बार है जब देश के 29 राज्यों में से 19 राज्यों में कोई एक पार्टी सरकार चला रही है।दो राज्य हिमाचल प्रदेश और गुजरात में जीत के बाद 19 राज्यों में भाजपा सरकार चला रही है।इससे पहले आज से 24 साल पहले कांग्रेस की 18 राज्यों में सरकार थी।साढे़ तीन साल पहले भाजपा की स्थिती ऐसी थी कि मात्र पांच राज्यों में मुख्यमंत्री,एक राज्य में गठबंधन की सरकार लेकिन अब 14 राज्यों में बीजेपी के मुख्यमंत्री,पांच राज्यों में गठबंधन की सरकार है।आख़िर कैसे?इस बात पर तमाम राजनीतिक दलों और राजनीतिशास्त्र के शोधार्थियों को शोध करना चाहिए।इंदिरा गांधी के समय 23 राज्य थें,अब 29 राज्य है।साल 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद चुनाव-दर-चुनाव कांग्रेस के हाथ से 10 राज्य निकलता चला गया।भाजपा को लगातार मिलती जीत कोई रहस्य तो है नही।कहीं-ना-कहीं बीजेपी के नेता और कार्यकर्ता अपने संगठन को मज़बूत करने के लिए ज़मीनी स्तर पर कड़ी मेहनत तो करते ही है।बीजेपी के चुनाव प्रचार अभियान के तरीके को यदि गौर से देखा जाए तो पता चलता है कि बाकि दलों की अपेक्षा बीजेपी ज़्यादा आक्रामक दिखती है।ऐसा प्रतीत होता है बीजेपी के लिए हरेक चुनाव किसी अंतिम मौके की तरह होता है।कार्यकर्ता से लेकर तमाम केन्द्रीय मंत्रियों के साथ,अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्री समेत राज्यमंत्री भी चुनाव प्रचार करते है।ताज़ा उदाहरण गुजरात है।जितनी सिद्दत से एक दल के रूप में भाजपा के नेता चुनाव के वक़्त ज़मीनी स्तर पर काम करते हैं,उतनी ही सिद्दत से उसके सहयोगी संगठनों के लोग स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर काम करते हैं,जो भाजपा को ज़मीनी स्तर से मज़बूती प्रदान करता है।इसी ज़मीनी स्तर की मज़बूती की कमी कांग्रेस में हमेशा दिखाई देती है।हर चुनाव में राजनीति के जानकार इस बात की तरफ़ इशारा करते तो करते हीं हैं, लेकिन पता नही कांग्रेस को नेता,सहयोगी संगठनों और कार्यरता के बीच एकजुटता वाला मॉडल क्यूं पसंद नहीं आता है।
अब उन बुनियादी बातों के बारे में बात करते हैं,जो हर राजनीतिक दल से भाजपा को अलग और सशक्त बनाती है।जो कांग्रेस में नहीं दिखती है।
-जब से अमित शाह पार्टी अध्यक्ष बने है।वो मतदाता सूची के हर एक पन्ने में से एक पन्ना प्रमुख को चुनते हैं।पन्ना प्रमुख की ज़िम्मेदारी होती है कि उनकी सूची में जितने मतदाता होते हैं उनको केन्द्र सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं को समझाकर अपने पाले में लाना।इस पद्धति का जनक अमित शाह को माना जाता है।
-ग्रामीण और शहरी इलाकों के हर वर्ग के लोगों में भाजपा की मज़बूत पकड़ का होना।
-प्रचार के दौरान बीजेपी का 'वन मैन आर्मी' ना होकर सामूहिक रूप से मेहनत करना।
-क्षेत्रीय भाषा बोलने वाले लोकप्रिय नेताओं का होना भाजपा की मज़बूती का एक सबसे बड़ा कारण है।जिसकी कमी कांग्रेस में गुजरात चुनाव में भी दिखी।प्रधानमंत्री से लेकर तमाम स्थानीय नेताओं ने गुजराती में लोगों को संबोधित किया।
एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए विपक्ष का मज़बूत होना बहुत ज़रूरी होता है।और विपक्ष तब ही मज़बूत हो सकता है,जब दल के किसी एक नेता के भरोसे या उसके कार्यकर्ता उस दल के प्रमुख नेता के भरोसे काम नहीं करेंगे।ये बात बीजेपी में दिखती है,शायद इसी वज़ह से सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की सबसे बड़ी सियासी पार्टी है।

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

जानिए, पद्मावती विवाद के लिए कैसे दोनों पक्ष ज़िम्मेदार हैं!

‘इतिहास में कोई पद्मावती थी भी या नही?’ का पता तमाम विवाद और आरोपों के बाद भी पता नही चल पाया।इतिहास को ग़लत बताते हुए फ़िल्म ‘पद्मावती’ से वास्तविक ‘पद्मावती’ के होने की बात को बताने का जो हिंसक तरीका अपनाया गया था,एक लोकतांत्रिक समाज के लिए बेहद ख़तरनाक है।वैश्विक शान्ति के दूत महात्मा गांधी अपनी धरती हिन्दुस्तान,जहां से दुनियाभर में शान्ति पहुंचाने में अपनी ज़िन्दगी खपा दी।उन्हीं की धरती पर विवादित फ़िल्म को लेकर किसी के सिर कलम करने,तो किसी के नाक काटने तक की धमकी,आगजनी और किसी भी तरह की हिंसा का होना एक गंभीर और सोचनीय सवाल है,जिसपे व्यक्तिगत और सामाजिक रुप से सोचा जाना चाहिए।गांधी जी के कथन “अहिंसा सबसे बड़ा कर्तव्य है।यदि हम इसका पालन नही कर सकते हैं तो हमे इसकी भावना को अवश्य समझना चाहिए और जहां तक सम्भव हो हिंसा से दूर रहकर मानवता का पालन करना चाहिए।” को उग्र मत के सिद्धान्त को मानने वाले उन तमाम संगठनो और इंसानो के लिए,गली-मुहल्ले के चप्पे-चप्पे पर बड़े-बड़े अक्षरों में छपवा कर चिपका देना चाहिए।इस नेक स्व और परसंबंध कार्य की ज़िम्मेदारी समाज के हर व्यक्ति को निभाना चाहिए।
संजय लीला भंसाली की विवादित फ़िल्म पद्मावती ने पहली बार पद्मावती के काल्पनिक और वास्तविक चरित्र को लेकर साहित्यकारों और इतिहासकारों को सीरियस चुनौती पेश की। राजस्थान के राजपुताने के इतिहास पर काम करने वाली इरा चंद ओझा ने बीबीसी से बातचीत में साफ़-साफ़ कहा है कि ये चरित्र पुरी तरह काल्पनिक है।हिन्दी साहित्य के विद्वान रामचन्द्र शुक्ल ने भी इसे काल्पनिक चरित्र माना है।पद्मावती के काल्पनिक चरित्र होने की पुष्टि इस बात से भी होती है कि फ़िल्म पद्मावती, महाकाव्य ‘पद्मावत’ पर आधारित है जिसकी रचना 16वीं शताब्दी की है,जबकि अलाउद्दीन ख़िलजी का काल 14वीं शताब्दी की शुरुआत से शुरु होता है।इसलिए इस बात की संभावना ज़्यादा है कि महाकाव्य ‘पद्मावत’ के सूफ़ी कथाकार मलिक मुहम्मद जायसी ने कहानी को आगे बढ़ाने के लिए कल्पना का सहारा लिया हो।अलाउद्दीन के काल में जो रचनाएं लिखी गईं,उनमें तो पद्मावती नाम का कोई चरित्र भी नही है।
जनवरी में शुरु हुए इस विवाद को अबतक दोनों पक्षों की एक के बाद एक ग़लत कदम ने आग में घी का काम किया।करणी सेना और उनके समर्थकों ने देश के अलग-अलग हिस्सों में जो उपद्रव मचाया,वो सरकारों की सियासी मज़बूरियां और नाकामियों का ही प्रमाण है।हंगामेबाज़ो को ये समझना होगा कि उनके कृत्यों से समाज में बुरा प्रभाव पड़ता है।किसी भी विवाद को सुलझाने का एक मात्र तरीका संवाद ही है।समाज के हर व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है कि किसी भी विवाद में हिंसा को बढ़ावा ना दें।फ़िल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली,उनके समर्थन में सिर्फ़ अभिव्यक्ति की आज़ादी एवं रचनात्मकता स्वतंत्रता की बात करने वाले और राजपूत समाज को भला-बुरा कहने वाले ये भूल गये कि बिना प्रतिबंध वाला कोई भी व्यक्ति और समाज अव्यवस्था के रसातल की ओर चला जाएगा। भंसाली और करणी सेना जैसों के समर्थन में खड़े लोगों, ख़ासकर पत्रकारों के साथ मुख्यत: तीन समस्या होती है।पहला-वो एकपक्षीय हो जाते हैं,दूसरा- अपनी विचारधारा के अनुसार हीं चीजों को पढ़ते हैं और तीसरा- स्वतंत्रता के बारे में सिर्फ़ इतना ही जानतें हैं कि ‘हम’ यानि कर्ता जो भी कर रहा है वो सही है। ऐसे लोगों के लिए मैं एक जानकारी दे रहा हूं। उदारवाद के इतिहास के सबसे प्रभावशाली दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल का एक 'हानि सिद्धान्त' है।इस सिद्धांत को बताने से पहले ये बता दें रहा हूं मिल के अनुसार प्रतिबंध तभी लगाए जा सकते हैं जब किसी को पहुंचने वाली हानि अत्यंत गंभीर हो। सामान्य नुकसान के लिए कानूनी शक्ति के स्थान पर मात्र सामाजिक स्तर पर अमान्य करार देने की राय देते है।मिल ने अपने सिद्धांत में स्वसंबंद्ध और परसंबंद्ध कार्यों में अन्तर स्पस्ट किया है।स्वसंबंद्ध कार्य वे हैं जिनके बारे में यह कहा जा सकता है कि मेरा कार्य आपको किसी प्रकार से प्रभावित नहीं करता है तो इससे आपका कोई लेना देना नहीं हैं। परसंबंद्ध कार्य वे हैं जिनके बारे में यह कहा जा सकता है कि कर्ता के किसी गतिविधियों अथवा क्रियाकलापों से किसी को हानि पहुंचती है तो किसी-न-किसी बाहरी सत्ता का कर्त्तव्य है कि उन हानिकारक कार्यों से सुरक्षा प्रदान करें। स्वतंत्रता से संबंधित विषयों में राज्य किसी भी व्यक्ति को ऐसे क्रियाकलाप अथवा गतिविधियां करने से रोक सकता है जो किसी अन्य के लिए हानिकारक हो।अब आप परसंबंद्ध से फ़िल्म पद्मावती के विवाद के कारणों को जोड़ कर देखिए,पता चल जाएगा कि भंसाली ने कैसे समाज के एक जनमानस ठेस पहुंचाया है।
अब यहां पर फ़िल्म पद्मावती को लेकर भंसाली की एक के बाद की गई कुछ ग़लतियों के बारे में बताता हूं,जो विवाद का मुख्य कारण है-
-फ़िल्म को लेकर जब शुरू से ही विवाद है तो ट्रेलर में क्यों नहीं लिखा की फ़िल्म काल्पनिक है?
-करणी सेना और राजपूत सभा के अनुसार जब भंसाली ने राजपूत संगठनों से वादा किया था कि जब भी फिल्म -रिलीज होगी उससे पहले राजपूत संगठनों को यह फिल्म दिखाई जाएगी। उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया?
-फ़िल्म को लेकर जब पहली बार विवाद हुआ,तब से लेकर अबतक भंसाली ने विवाद को सुलझाने के लिए दूसरे पक्षों से बात क्यों नहीं की।यदि दूसरे पक्ष ने बात करने से इंकार किया तो लोगों को क्यों नहीं बताया?
-फ़िल्म को आख़िर भंसाली ने किस उद्देश्य से केन्द्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड को दिखाने से पहले कुछ चुनिंदा पत्रकारों को दिखाया?
-भंसाली जब संसदीय समिति के सामने ये कह रहें हैं कि फ़िल्म पद्मावती एक काल्पनिक है,तो किरदारों का नाम ऐतिहासिक क्यों रखा है?


शनिवार, 9 दिसंबर 2017

गुजरात के किसानों का ऋण कैसे होगा माफ़?

भारत एक कृषि प्रधान देश है, ये हम सब जानते है लेकिन अब हमें इस बात को भी स्वीकार कर लेना चाहिए कि भारतीय किसान, सियासत का एक मात्र ज़रिया भर बन गये है। वो इसलिए कि किसानों की बेहतरी की बात चुनाव के वक़्त सारे राजनीतिक दल करते हैं। चुनाव प्रचार में नेतावाणी में कर्ज़माफ़ी से किसानों की समस्याओं का समाधान हो जाएगा ही किसानों की असल समस्या है। किसानो को ये समझना होगा कि उनकी समस्या के लिए प्रचार के वक़्त ये नेता लोग जो कर्ज़माफ़ी करने की बात करते है, वो दरअसल इस बात की ओर इशारा होता है कि यदि हम चुन के आएंगे तो भी आपकी मूल समस्या की ओर हम ध्यान नही देंगे। कुछ ऐसा ही गुजरात चुनाव में भी हो रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान सीएम विजय रुपाणी ने किसानो को तीन लाख रुपये तक का ब्याज़ मुक्त कर्ज़ देने की घोषणा की है, तो वहीं राहुल गांधी ने कहा है कि यदि गुजरात में हमारी सरकार बनी तो हम किसानों का कर्ज़ 10 के दिन भीतर माफ़ करेंगे।
साल 2014 के लोकसभा चुनाव के समय गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान में देश के प्रधानमंत्री ने कहा था कि केन्द्र में यदि भाजपा की सरकार बनेगी तो किसानों की फ़सल के दाम दफ़्तर में बैठकर नही, बल्कि किसान की मेहनत-मज़दूरी पर 50% ज़्यादा पैसे मिलें इस तरह से तय किये जायेंगे। लेकिन तब से लेकर आज तक दिन-प्रतिदिन किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है।
यदि हम गुजरात में सीएस रुपाणी और राहुल के बयानों के सन्दर्भ में किसानों के बारे में बात करें तो,मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 25 लाख़ किसान हैं,जो हर साल कर्ज़ लेते हैं।नेशनल सैम्पल सर्वे,भारत सरकार के 2014 रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात में 49 लाख़ किसान है,जिनकी एक महीने की आय प्रति परिवार सिर्फ़ 7926 रुपये है।आय के आधार गुजरात के किसानों का स्थान 12 वां है।आईचौक.इन पर रुपाणी के वादे को लेकर एक लेख छपी है,जिसमें अर्थशास्त्री हेमंत शाह ने कहा है कि सरकार के ज़रिये ये एक चक्रव्यूह रचा जा रहा है,जिसके ज़रिए किसान और शहर में रहने वाले मध्यम वर्ग को एक-दूसरे के सामने खड़ा किया जा रहा है।मध्यम वर्ग के लोगों को लगता है कि यहां सबकुछ किसानों के लिये ही किया जा रहा है।लेकिन हकीकत ये है कि किसान सबसे ज़्यादा परेशान हैं।3 लाख तक के जिस लोन पर सरकार बिना ब्याज़ के कर्ज़ देने की बात कर रही है,उसे ही देंखे तो किसान को ये लोन 7 प्रतिशत के ब्याज़ दर पर सब्सिडी दी जाती थी।इसमें से 4 प्रतिशत ब्याज़ के पैसे केन्द्र सरकार देती थी और राज्य सरकार 2 प्रतिशत ब्याज़ देती थी।किसानों को सिर्फ़ 1% ब्याज़ देना होता पड़ता था।हालांकि अब किसान को एक प्रतिशत ब्याज़ भी नही देना होगा।ये प्रतिशत ब्याज़ सरकार भरेगी।सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस ब्याज़ को भरने की वज़ह से सरकार पर 700 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ आएगा।
अब राहुल गांधी के वादे की बात करें तो, राहुल ने कहा है कि हम किसानों का कर्ज़ 10 दिन के भीतर किसानों का कर्ज़ माफ़ करेंगे।इससे पहले राहुल गांधी ने यूपी सरकार द्वारा किसानों के कर्ज़माफ़ी के फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा कि वो खुश हैं कि बीजेपी ऐसा करने पर मज़बूर हुई।किसानों को राहत देने के लिए केन्द्र सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास करना चाहिए।राज्यों के नाम पर किसानों के साथ भेदभाव करना ठीक नहीं है।
इन सब के इतर केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यूपी सरकार के ऋण माफ़ी के फ़ैसले के वक़्त ही स्पस्ट कर दिया था कि किसानों का कर्ज़ माफ़ करना केन्द्र सरकार के बस की नहीं है।आगे उन्होंने कहा था कि ऐसा सम्भव नही है कि केन्द्र सरकार एक राज्य का कर्ज़ माफ़ कर दे और बाकी राज्यों का नही।राज्य सरकार यदि ऐसा करती है तो इसका ख़र्च भी उसे ही उठाना होगा।ऐसे में सवाल ये बनता है कि राहुल के कर्ज़ माफ़ी का ऐलान कैसे कर दिया है?
किसानों की समस्याओं में एक समस्या ये भी है कि उनके जो रहनुमा हैं,जिसकी ज़िम्मेदारी है कि वो बेहतरी के लिए सरकार से मांग करे,मगर अफ़सोस कि वो किसी ना किसी राजनीतिक दल का झण्डा थामें हुए हैं।



सोमवार, 27 नवंबर 2017

प्यू रिसर्च सेंटर का सर्वे बीजेपी के लिए संजीवनी,लेकिन कई सवाल भी।

                      
उम्मीद है 15 नवम्बर 2017 को आई प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे के उस बिन्दु को आपने ज़रूर सुना होगा, जिसमें ये बताया गया है कि भारतीय राजनीति में पीएम मोदी लोकप्रियता के शीर्ष पर बरक़रार है।पिछले साल के मुकाबले नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में 7% फ़ीसदी का इज़ाफा हुआ है।इस साल 88% लोगों ने माना है कि नरेंद्र मोदी अच्छे नेता है, जबकि साल 2016 में 81% फ़ीसदी लोगों का मानना था।सर्वे में ये बात भी सामने आई है कि कांग्रेस उपाअध्यझ राहुल गांधी की लोकप्रियता में 5% की गिरावट दर्ज़ की गई है।पिछले साल 62% लोगों में राहुल गांधी की लोकप्रियता थी,जबकि इस साल घटकर 58% हो गया है।वहीं इस सर्वे में कांग्रेस अध्यझ सोनिया गांधी और दिल्ली के सीएम अरविन्द केजरीवाल की लोकप्रियता का भी ज़िक्र है।लेकिन मीडिया में इन दोनों की ज़िक्र ना मात्र की है।सोनिया गांधी की लोकप्रियता का प्रतिशत 57 और केजरीवाल की लोकप्रियता का प्रतिशत 39 है। जिस वक़्त सर्वे आई थी उस वक़्त की ख़बरों और डिबेट शो को आप उठाकर देखेगें तो पाएंगे कि लोकप्रियता के मसले पर ज़्यादातर मीडिया ख़ासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी तक हीं सीमित रह गई,जबकि सर्वे में सरकार की तमाम कमियां भी सामने आई है।आख़िर क्यों?सिर्फ़ इसलिए की गुजरात में चुनाव होने हैं?हमारे देश की सियासत में सर्वे को लेकर एक अजीब सी अवधारणा है।सर्वे अन्तर्राष्ट्रीय भी हो तो,विपक्षी दलों और उनके समर्थकों को लगता है कि सरकार ने मैनेज कर लिया है।प्यू सर्वे पर सब के अपने-अपने तर्क हैं।विपक्षी दलों ने सर्वे के प्रकाशित होने के समय पर ही सवाल खड़ा कर दिया है।ये बात भी सही है कि विपक्ष सर्वे में लोकप्रियता के मसले पर ही उलझी रह गई,जबकि विपक्षियों के पास मौका था,सर्वे में आई तमाम कमियों से सरकार को घेरने का।बीजेपी सूत्रों का कहना है कि गुजरात विधानसभा चुनाव से ऐन पहले आई इस रिपोर्ट से ज़रूर पार्टी को फ़ायदा होगा,क्योंकि यह रिपोर्ट बीजेपी की किसी समर्थित एजेंसी या किसी भारतीय सरकारी एजेंसी ने तैयार नहीं की बल्कि यह अमेरिका की प्रतिष्ठित एजेंसी ने तैयार की है। इस एजेंसी पर सवाल नहीं उठाए जा सकते,क्योंकि इससे पहले विश्व के कई देशों में वह रिसर्च करके रिपोर्ट तैयार कर चुकी है।।विपक्ष चाहे कुछ भी कहे,लेकिन बीजेपी इस सर्वे  का पूरा फ़ायदा उठाना चाहती है।बीजेपी कैबिनेट की बैठक में इस रिपोर्ट के महत्वपूर्ण अंश मंत्रियों को बांटे गए थें, वहीं खुद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने भी ट्विटर पर इस रिपोर्ट को साझा करते हुए कहा था कि 'मोदी जी की लोकप्रियता धर्म,जाति,क्षेत्र और सीमा से ऊपर है।वे हिन्दुस्तान के जन-मन में हैं।प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट इसी तथ्य को प्रमाणित करती है।'अमेरिकी थिंक टैंक 'प्यू रिसर्च सेंटर' ने सर्वे में भारत के करीब 130 करोड़ लोगों में से मात्र 2,464 लोगों को शामिल किया था।गणितज्ञ होता तो यह बता देता कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रित देश भारत की कुल आबादी के कितने प्रतिशत लोगों को सर्वे में शामिल किया था।यह सर्वे 21 फ़रवरी  से 10 मार्च 2017 तक चला था।प्यू रिसर्च सेंटर का ये सर्वे पीएम मोदी के नोटबंदी के ऐलान के साढ़े तीन महीने बाद और जीएसटी लागू होने के करीब चार महीने पहले हुआ था।लोगों को नोटबंदी से होने वाले फ़ायदे या नुकसान का सही-सही अनुमान लगा पाना मुश्किल था।उस वक़्त ज़्यादातर लोग नोटबंदी को मोदी सरकार का क्रान्तिकारी क़दम मानकर उनका समर्थन कर रहे थे।बाद में लोगों को नोटबन्दी से काफ़ी दिक्कतें भी उठानी पड़ी थी।इसके अलावा सर्वे में लागू हुए जीएसटी पर छोटे कारोबारियों की राय को भी शामिल नही किया गया है। ऐसे में सवाल ये तो बनता ही है कि सर्वे को हाल में प्रकाशित करने का क्या मतलब है?आजकल सरकार के बारे में सुनने और सुनाने वाले दोनों को सकारात्मक बातें ही पसंद आ रही है।इसलिए मीडिया द्वारा जनता को सर्वे की ज़्यादातर सकारात्मक बातें ही बताई गई,ख़ासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा।सर्वे में भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर काफी सकारात्मक संदेश दिया गया है।प्यू के मुताबिक,जनता की तरफ़ से मोदी का सकारात्मक आकलन करना भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर बढ़ती संतुष्टि से प्रेरित है।30 सितम्बर 2017 को इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल विकली मैगजीन में 'बदहाल अर्थव्यवस्था' नाम से एक लेख छपी है।इस लेख के कुछ बिन्दुओं को जानना इसलिए ज़रुरी है कि सर्वे में हर दस में से आठ लोगों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पहले से बेहतर बताया है।लेख में लिखा है:--सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी 2014-15 की पहली तिमाही में 7.5 फीसदी थी।2017-18 की पहली तिमाही में यह 5.7 फीसदी पर पहुंच गई।आईआईपी 2014-15 में फ़ीसदी थी।2015-16 में 3.3 फ़ीसदी पर पहुंचने के बाद 2016-17 में यह थोड़ा सुधरकर 4.6 फीसदी पर पहुंचा।निवेश घट रहा है,घरेलू बचत की दर घट रही है।कुल बचत में घरेलू बचत की हिस्सेदारी 70 फ़ीसदी से घटकर 60 फीसदी हो गई है।-निर्यात घट रहा है।हालिया तिमाही में निर्यात 14 साल के न्यूनतम स्तर पर है।मांग घट रही है।रोज़गार के आंकड़े भी ठीक नहीं हैं।2004-05 से 2011-12 के बीच सालाना एक फ़ीसदी की दर से नए रोज़गार पैदा हो रहे थे।2012-13 के बाद इसमें कमी आ रही है।ख़ास तौर पर असंगठित क्षेत्र में निर्माण,सूचना प्रौद्योगिकी और बीपीओ लोगों को रोजगार दे रहे थे,लेकिन पिछले तीन साल से इनकी हालत ख़राब है।विनिर्माण में भी रोज़गार नहीं पैदा हो रहे।सर्वे का एक नतीज़ा कांग्रेस के लिए दिक्कत तलब हो सकता है।सर्वे में 81% लोगों का मानना है कि मोदी वास्तव में गरीबों की मदद कर रहें हैं।अगर यह बात वास्तव में सही है तो इसका मतलब है कि कांग्रेस उपाध्यझ के मोदी के ख़िलाफ़ आरोपों पर कोई गौर नही कर रहा है।राहुल गांधी मोदी सरकार पर लगातार 4-5 कारोबारीयों पर फ़ायदा पहुचाने का आरोप लगाते रहते हैं।सर्वे में कुछ बातें ऐसी भी है जो वाकई चिन्ता का विषय है,वाकई गंभीरता से सोचना चाहिए।-देश के 73%युवाओं को मानना है कि बेरोज़गारी देश के लिए एक गंभीर समस्या है।संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 और 2018 के बीच भारत में बेरोज़गारी में मामूली इजाफ़ा हो सकता है और रोज़गार सृजन में बाधा आने के संकेत हैं।-सर्वे की ऐसी बात जो सबसे ज़्यादा हैरान कर रही है वो ये है कि भारत में 53% प्रतिशत लोग मिलिट्री रुल का समर्थन करते हैं।क्या तब भी इतने ही लोग मिलिट्री रुल का समर्थन करेंगे,जब उनसे पूछा जाएगा कि आप ऐसा शासन पसन्द करेंगे कि रात को दो लोग आयें और कॉलर पकड़ कर बिना कारण बताये थाने में बन्द कर दें,जेल में डाल दे? पूरी दुनिया में सिर्फ़ 4 देश ऐसे हैं जिसके 50% से ज़्यादा लोग मिलिट्री रुल का समर्थन करते हैं।-मात्र 50% लोगों ने माना है कि मोदी सरकार साम्प्रदायिक सौहार्द बनाने में कामयाब है।-हिन्दुस्तान एक लोकतांत्रिक देश है।लेकिन सर्वे में ये बात सामने आई है कि मात्र 8% लोग लोकतंत्र विश्वास रखते हैं।38 देशों के सर्वे में भारत का स्थान 37वां है।वहीं 9% लोग लोकतंत्र के ख़िलाफ़ हैं।-66 फ़ीसदी लोगों ने आईएसआईएस आतंकी संगठन को 'बड़ा ख़तरा' माना है। जबकि 76 फीसदी लोगों ने आतंकवाद को सबसे बड़ी समस्या माना है।जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर 63 फ़ीसदी लोगों का मानना है कि सरकार को वहां पर सैन्य बलों का आर अधिक इस्तेमाल करना चाहिये। जबकि 62 फ़ीसदी लोगों का मानना है कि वहां की वर्तमान स्थिति 'काफ़ी ख़राब' है।प्यू रिसर्च सेंटर के इकोनॉमिक एटीट्यूड्स के वैश्विक निदेशक ब्रूस स्टोक्स ने यहां अमेरिकन सेंटर में संवाददाताओं से बातचीत में कहा, ‘यह पिछले साल की तुलना में नौ फ़ीसदी ज़्यादा है।-सर्वे में बहुत सारे लोगों ने अन्तर्राष्ट्रीय मामलों परअपनी राय जाहिर नही किया है।सर्वे के एक तिहाई से भी ज़्यादा लोगों,ख़ासकर भारत के पुर्वोतर राज्यों के आधे से ज़्यादा लोगों ने विदेशों के बारे में और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नरेन्द्र मोदी भारत के मुख्य खिलाड़ी के रुप में कैसी भूमिका निभा रहें हैं,पर राय जाहिर नही किया है।-बड़ी समस्या के रुप में 74% लोगों ने भ्रष्ट नौकरशाही,72% लोगों ने अमीर-गरीब के बीच की खाई को,71% लोगों ने सामानों के बढ़ते दामों,48% लोगों ने शिक्षा की बदहाली,54-54% लोगों ने वायु प्रदुषण और ख़राब स्वास्थय व्यवस्था को माना है।


बुधवार, 15 नवंबर 2017

"#iwantcleanair" से कुछ ना हो पाएगा!

‘दिल्ली की हवा ज़हरीली हो गई है।दिल्ली गैस चेम्बर बन गया है।सांस लेने का मतलब 50 सिगरेट रोज़ पीना।’जैसी बातें आज़ से हफ़्ता दिन पहले चर्चा का विषय बना हुआ था।अख़बार,टीवी से लेकर लोगों की बीच ये बात आम हो गई थी।लोग चिन्तित नज़र आ रहे थें।कुछ लोग तो दिल्ली छोड़ दूसरे शहर में कुछ दिनों के लिए अप्रवासी बन गए,तो कुछ लोग सुरक्षा के लिए हवा शुद्दिकरण यंत्र और मास्क का इस्तेमाल करने लगे,पर कुछ लोग ऐसे भी थे जो कुछ ना कर पाए।मतलब दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्र की स्थिती,पिछले कुछ सालों की तरह फिर एक बार देश ही नही विदेशों में भी चर्चा का विषय बन गया था।इस दौर में वो सब कुछ हुआ,जो पिछले कई सालों से होता आ रहा है।हवा के ज़हरीली हो जाने पर अचानक से सारी संस्थाए बोलने लगी,कोई आदेश देने लगा,तो कोई आलोचना करने लगा।नया ये हुआ कि दिल्ली सरकार ने पड़ोसी राज्य के किसानों को सबसे ज़्यादा गुनहगार बता दिया,उसमें भी ज़्यादा  गुनहगार पंजाब के किसानों को। दिल्ली के सीएम पंजाब के सीएम से मिलने का वक़्त मांगते रहें,लेकिन अब तक अरविन्द केजरीवाल को सफ़लता नहीं मिली है।इस मौके पर मीडिया ने भी पर्यावरण के प्रति अपनी संवेदनहीनता नही दिखाई,सूचना के नाम पर दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों से ‘राष्ट्रीय समस्या’ के रुप में देशवासियों के बीच पहुंचाता रहा।अफ़सोस की बात की मीडिया के 'हिन्दू-मुसलमान' जैसे राष्ट्रीय समस्या के सामने ‘स्मॉग’ नामक इस पर्यावरणीय समस्या ने डिबेट शो में जगह नही बना पाया।
हर बार की तरह इस बार भी इस समस्या से निपटने के लिए दिल्ली सरकार ने कुछ दिनों के लिए स्कूल बंद कर देना और ऑड-इवन जैसे क़दम उठाये।दिल्ली की हवा अब थोड़ी बेहतर हो गई है,लेकिन एनजीटी और सरकार के बीच कई मुद्दों पर सहमति ना होने के कारण अब तक ऑड-इवन लागू नहीं हो पाया है।अब शायद लागू भी ना हो पाए,क्योंकि मौसम ने अपना मिज़ाज बदल लिया है।मौसम विभाग के अनुसार तापमान और हवा की गति में गिरावट एवं नमी में इजाफ़े की वज़ह से ऐसी समस्या उत्पन्न हो जाती है।पिछले कुछ सालों से इसी समय में जब ऐसी समस्या उत्पन्न होती है तो, समस्या के सभी कारणों पर बात होने लगती है।उसके बाद जब मौसम का मिज़ाज बदल बदल जाता है तो सरकार के साथ जनता भी ऐसे सामुहिक चुप्पी साध लेती है,जैसे स्मॉग नामक कोई समस्या थी ही नहीं। दिल्ली की धुंध का कारण सरकार से लेकर जनता तक को पता है।लेकिन बात यहीं अटक जाती है कि निवारक क़दम किसको उठाना चाहिए?सिर्फ़ सरकार को, सिर्फ़ जनता को या फ़िर दोनों को।आईआईटी कानपुर के अनुसार मलबा-धूल पीएम 2.5 और पीएम -10 प्रदुषण के बड़े वाहक है। दिल्ली में हर दिन 4000 टन धूल-मलबा पैदा होता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में कुल 89 लाख से अधिक पंजीकृत वाहन है। जबकि रात दस बजे के बाद एक लाख से अधिक ट्रक राजधानी में प्रवेश करते हैं।गति कम होने से ज़्यादा धुंआ निकलने से प्रदुषण फ़ैल जाता है।ताज़ा जानकारी के मुताबिक केजरीवाल सरकार ने 'सूचना का अधिकार' के तहत संजीव जैन के सवालों का जवाब देते हुए बताया कि सरकार को ग्रीन टैक्स के नाम पर साल 2015 में 50 करोड़, साल 2016 में 387 करोड़ और जनवरी 2017 से 30 सितंबर 2017 तक 787 करोड़ रूपये प्राप्त हुए हैं।आरटीआई के मुताबिक इन तीन सालों में  प्राप्त धनराशि में से सिर्फ़ 2016 में प्रदूषण को रोकने के लिए मात्र 93 लाख ही ख़र्च किये।मतलब साफ़ है कि केजरीवाल सरकार ने साल 2015 और 2017 में प्रदुषण को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाये।अब दिल्ली की इस बदहाली के लिए केजरीवाल सरकार को दोषी क्यों ना माना जाए? आखिर वो किस आधार पर किसानों को इस समस्या के लिए खलनायक बता रहें हैं?
दिल्ली की हवा जब ज़हरीली हो गई थी,तो दिल्ली के नेटिजन ट्वीटर पर स्वच्छ हवा की बात कर रहें थें।उस वक़्त ट्विटर पर #iwantcleanair ट्रेन्ड कर रहा था। मैंने भी लिखा था "#iwantcleanair लेकिन कैसे? सिर्फ़ सरकार को कोसने से?या फ़िर शुद्ध हवा पाने के लिए ख़ुद भी कुछ करेंगे।"इस ट्रेन्ड के बहुत सारे ट्वीट को मैंने पढ़ा।पढ़ के बड़ा ही अफ़सोस हुआ कि आख़िर आधुनिकता के दौर में दिल्ली वाले ख़ुद को भी इस समस्या के लिए ज़िम्मेदार क्यों नहीं मान रहें हैैं? दिल्ली में 89 लाख़ से अधिक पंजीकृत वाहन किसके हैं?हर दिन 4000 धूल-मलबा कैसे पैदा होता है? खैर,इस समस्या का समाधान कितना हो पाएगा ये आने वाला वक़्त बताएगा। लेकिन लैंसेट के मुताबिक भारत में हर साल प्रदुषण के कारण 25 लाख लोगों की मौत होती है।

सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

गुजरात चुनाव पर मेरी कलम!

'समस्या मुक्त' राज्य गुजरात में विधान सभा के चुनाव का बिगुल बज चुका है। राज्य की 4 करोड़ 33 लाख जनता अपने मत का इस्तेमाल कर अपने-अपने रहनुमाओं को चुनेगी। मतदान दो चरणों में होगा।9 दिसम्बर को होने वाले पहले चरण के मतदान में 89 सीटों पर,तो वहीं 14 दिसम्बर को  दूसरे चरण में 94 सीटों पर मतदान होगा।18 दिसम्बर को आधिकारिक रूप से नवनिर्वाचित रहनुमाओं का ऐलान हो जाएगा।इस बार 102 बूथों पर महिला पोलिंग स्टाफ़ तैनात होंगी। मैंने 'समस्या मुक्त' शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया है, क्योंकि आज़ तक मैं गुजरात नहीं गया। लेकिन जिस तरीके से राष्ट्रीय पटल पर सरकारी रूप से या मीडिया रिपोर्ट्स में गुजरात को पेश किया जाता है।मेरे ही जैसे देशभर के वैसे लोग जो कभी गुजरात नहीं गये,शायद यही समझेंगे की गुजरात एक समस्या मुक्त राज्य है। मैंने कई सारे रिपोर्ट्स पढ़े,सम्भव हो तो आप भी पढ़िए।आप पायेंगे की इस बार का गुजरात में सिर्फ़ जाति आधारित है।
चुनाव का आधिकारिक ऐलान तो 25 अक्टूबर को हुआ। लेकिन इसकी तैयारी में करीब एकाध-डेढ महीने पहले से ही नेता जुट गये थे।।पीएम मोदी और राहुल गांधी का ताबड़तोड़ गुजरात दौरा इस बात का प्रतीक है।चुनाव में हाफ़िज़ सईद,आईएस, आतंकवादी, कश्मीर की आज़ादी की एन्ट्री करा दी गई है।क्योंकि यही गुजरात की समस्या है।आप घबराइए नहीं,हम दुनिया से सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हैं,हमारे यहां चुनाव करने का पैमाना सिर्फ़ 'बोलने में विकास दिखना चाहिए' है।समस्याओं पर बात तक करना गुनाह माना जाता है।गुजरात के सत्ताधारी दल भाजपा के नेताओं द्वारा की जा रही विकास-विकास की शोर सुनाई दे रही है, लेकिन जिसकी ज़िम्मेदारी है समस्याओं को लोगों के बीच लेकर जाने की है,वो(विपक्ष)गायब हैं या तो जातिगत वोटों की गोलबंदी में लगें हैं।क्योंकि उनको जातिगत राजनीति ही करीब 20 साल की सत्ताहीनता को दूर करने का एक मात्र उपाय नज़र आ रहा है।तभी तो कांग्रेस अपनी दम पर नहीं,बल्कि हार्दिक,जिग्नेश और अल्पेश भरोसे चुनाव जितने का खाब देख रही।कभी देश की सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस का हाल ये है कि वो राजनीति में पहली बार कदम रख रहे नेताओं के भरोसे है।आखिर ऐसी परिस्थिति क्यों आई? कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने एक नीति चैनल के डिबेट शो में एंकर के सवाल का जवाब देते हुए कहा कि ये तीनों विकास की राजनीति करते हैं।कांग्रेस प्रवक्ता ऐसे बयान देकर किसको मुर्ख बना रहें थे?क्या हिन्दुस्तान की जनता इस बात को नहीं जानती है कि इन तीनों की आरक्षण पर क्या राय है?आख़िर प्रवक्ता ये बात कहने में क्यों हिचक रहे थे कि ये तीनों जाति की ही राजनीति करते हैं? चुनाव में राजनीति का पैमाना तो 'जाति' ही है। खैर इन तीनों से कांग्रेस को कितना फ़ायदा होगा आने वाला वक़्त बताएगा।
आज कल देश में खुद को मसीहा समझने वाला ज़्यादा लोग पैदा हो रहें हैं।इसके पीछे एकमात्र कारण है, लोगों ने खुद को किसी नेता की सोच के हवाले करना शुरू कर दिया है। मतलब लोगों ने सालों मेहनत कर अर्जित किए गये अपने ज्ञान को नेताओं के पास गिरवी रखना शुरू कर दिया है। गुजरात में हार्दिक पटेल को पाटीदारों का मसीहा माना जाता है। हार्दिक ने अपने उस पटेल समुदाय के लिए आरक्षण की मांग करते हुए सरकारी सम्पत्तियों को नुकसान पहुंचाया जो जहां भी हैं आर्थिक रूप से काफ़ी मज़बूत है।
-22 लाख एनआरआईज़ में 35 % गुजराती हैं जिनमें आधे से ज्यादा पटेल कम्यूनिटी के हैं।
-अमेरिका में मोटल बिजनेस पर एकाधिकार रखने वाले पटेल ही हैं।
-अमेरिकी हाइवे पर बने 70% होटल पटेलों के
ईस्ट अफ्रीका,मिडिल ईस्ट,यूके,आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में पटेलों के बिजनेस एंपायर है।
-अकूत दौलत और बेशुमार जमीनों के स्वामी हैं पटेल समुदाय, खेती और कंस्ट्रक्शन इंड्रस्ट्री और व्यापार पेशे में शामिल हैं।
-राजकोट में फैली 12 हज़ार इंड्रस्ट्रियल यूनिट्स में से 40% पटेलों की है।
-सूरत की 4 हज़ार हीरा कटिंग यूनिट्स में से 70% पटेलों की है।
-मोरबी में स्थित भारत की सबसे बड़ी सेरेमिक इंड्रस्ट्री की 90 % पटेलों की है।
-मौजूदा सरकार में करीब 40 विधायक और 7 मंत्री पटेल समुदाय से हैं।
सुबे में पाटीदारों को किंग मेकर माना जाता है।पाटीदार मतदाता करीब 20 फ़िसदी है जिसका प्रभाव 70 सीटों पर है।
पेशे से वकील और सामाजिक कार्यकर्ता जिग्नेश मेवानी ने 'आजादी कूच आंदोलन' में 20 हजार दलितों को एक साथ मरे जानवर न उठाने और मैला न ढोने की शपथ दिलाई थी।जिग्नेश की अगुवाई वाले दलित आंदोलन ने बहुत ही शांति के साथ सत्ता को करारा झटका दिया है।इस आंदोलन को हर वर्ग का समर्थन मिला था।आंदोलन में दलित मुस्लिम एकता का बेजोड़ नजारा देखा गया था। सूबे में करीब 7 फीसदी दलित मतदाता हैं।
ओबीसी चेहरा बने अल्पेश ठाकोर ने पटेल आरक्षण आंदोलन के विरोध में खड़े हुए थे और गुजरात के ओबीसी के नेता बन गए। अल्पेश ठाकोर गुजरात क्षत्रिय-ठाकोर सेना के अध्यक्ष के साथ-साथ ओबीसी एकता मंच के संयोजक भी हैं। अल्पेश ने अन्य पिछड़ा वर्ग के 146 समुदायों को एकजुट करने का काम किया है।एक रैली के दौरान अल्पेश ने धमकी दी थी कि अगर पटेलों की मांगों के सामने बीजेपी शासित गुजरात सरकार ने घुटने टेके तो सरकार को उखाड़ फेंका जाएगा।
                                       हमने ऊपर गुजरात के नये त्रिमूर्ति के बारे में बताई कि इन्होंने अपनी  पहचान कैसे बनाई है।क्या आपको कहीं नज़र आया कि इन लोगों ने विकास की राजनीति कर अपनी पहचान बनाई है?

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

आपका दीया जलाना,किसी की ज़िन्दगी में उजाला लाएगा!



कल एक रिश्तेदार के यहां जाना हुआ।अपने कमरे से मेट्रो स्टेशन और मेट्रो स्टेशन से रिश्तेदार के घर तक पैदल चला। रास्ते में कई बाज़ारों सेे गुजरते हुए मेरी निगाहें कुम्हारों की दुकान तलाश रही थी।मैं चाइनीज़ बल्ब,झालर वगैरह-वगैरह और कुम्हारों की दुकान का अनुपात जानना चाहता था। मैं कुम्हारों की दुकान इसलिए तलाश रहा था,क्योंकि दीपावली में तो दीया की ही प्रधानता होती है।बड़ी मुश्किल से दो दुकान दिखा। मैं दोनों दुकान पर गया।थोड़ी-थोड़ी देर दोनों दुकान पर सिर्फ़ ये जानने के लिए खड़ा रहा कि शहरों में दीया का स्थान चाइनीज़ बल्बों ने कैसे ले लिया है?दुकान पर मौजूद ग्राहकों की बात सुनकर मैं हैरान रह गया। कुछ देर के लिए मैं गांव में मनाएं दीपावली के समय को याद करने लगा।कुम्हार जिस दिन दीया दे जाता था,उसी दिन से सब भाई-बहन मिल के इस बात की तैयारी करते थें कि इस बार दीया से अपने घर को कैसे सज़ाना है और देर रात तक इस बात का ख़्याल रखते थे कि एक भी दीया बुझने ना पाए।दादी एक बार दीया जलाकर दे देती थीं और देर रात तक हमलोग जागकर दीया को बुझने नहीं देते थे।
मैं रिश्तेदार के यहां देर रात तक छत पर बैठा था। दूर-दूर तक ऊंची-ऊंची इमारतें चाइनीज़ बल्बों की रौशनी से सराबोर थी। ग्राहकों की बात से दीपावली में 'चाइनीज़ बल्ब इन और दीया आउट' होने का कारण पता चला। लोगों का कहना था कि कौन इतनी मेहनत करेगा- पहले एक-एक करके दीया जलाओ और फिर देखते रहो कि बुझे ना।बल्ब ही लटकाना सही रहता है। कोई टेंशन नहीं रहता है।दीया तो सिर्फ़ इसलिए वे रहें हैं कि पूजा में इसकी ज़रूरत होती है।
मैं आप सबसे गुजारिश कर रहा हूं।जैसा कि आप सब जानते ही हैं कि दीया के जलने से अंधियारा दूर होता है। इसलिए मैंने पहली लाइन 'आपका दीया जलाना,किसी के ज़िन्दगी में उजाला लाएगा!' लिखा है।आपके दीया ख़रीदने से मुख्य फ़ायदा ये होगा कि आप 'रचनात्मकता' को ज़िन्दा रखने में सहयोग करेंगे।यदि आपको कभी कुम्हार के दिनचर्या को करीब से देखने का मिला होगा,तो आपके पता ही होगा की कितनी मेहनत वाला काम है। सिर्फ़ कुम्हार का ही नहीं, कुम्हार के परिवार के कई सदस्य, यहां तक की छोटे-छोटे बच्चों के सहयोग से मिलकर दीया और मिट्टी का सामान तैयार होता है।जब आप ये सामान उचित मूल्य देकर ख़रीदेंगे,तभी तो कुम्हारों का भरण-पोषण होगा।उनके बच्चों की उचित परवरिश हो पाएगी।पढ़-लिखकर अलग-अलग रूप में देश की सेवा करेंगे।

शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017

अंतिम विकल्प है 'दिशा'!

पीएम नरेन्द्र मोदी ने बुधवार को 'दिशा' ऐप लॉन्च किया है।क्या आप इस ऐप के बारे में जानते हैं? यदि नहीं जानते हैं तो मैं आपको पीएम मोदी के शब्दों में बता रहा हूं।पीएम ने कहा कि सरकार की इस मोबाइल ऐप की मदद से हर व्यक्ति अपनी बात ऊपर तक पहुंचा सकता है।गुड गवर्नेंस को फ़ायदा मिलेगा। ग्रामीण भारत में चल रही योजनाओं के बारे मे सारी जानकारी मिलेगी।दिशा के माध्यम से जनप्रतिनिधी लोगों के साथ जुड़ जायेंगे।
डिजिटल की ओर अग्रसर इण्डिया में उपरोक्त बातों में से एक को छोड़कर सारी बातें तो ठीक है।वो एक अविश्वसनीय बात है जनप्रतिनिधी लोगों से जुड़ जाएंगे। सोचिए कितने व्यस्त है हमारे प्रतिनिधि कि अब ऐप के माध्यम से संबंध स्थापित किया जा रहा है।क्या आपको लगता है कि ऐप में उपलब्ध ये सुविधा कारगर हो पाएगा?साल 2014 में देश में सत्ता परिवर्तन हुआ।तब से लेकर आज तक सरकार के मुखिया कई बार कह चुके हैं कि सभी सांसद और विधायक अपने-अपने क्षेत्र में हीं रहे। बेवजह सांसद और विधायक राजधानी में ना रहें। ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त लोगों के बीच रहकर समस्याओं का निपटारा करें।क्या आपको अब तक अपने सांसद और विधायक के रवैए में कोई बदलाव नज़र आ रहा है?आपकी समस्याओं को लेकर गंभीर हुए हैं?अपवाद को छोड़कर।सवाल ये है कि जनप्रतिनिधियों का लोगों के साथ,सिर्फ़ ऐप से जुड़ जाने से ही समस्या का समाधान हो जाएगा?वो भी ऐसे वक़्त में जब वोट के लिए नेता सिर्फ़ हिंदू-मुसलमान कर रहें हैं।
लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होता है, लेकिन दुर्भाग्य की बात है हमारे देश में जनप्रतिनिधी ही अपने आप को सर्वोपरि मानने लगा है।इसके कारणों में सर्वश्रेष्ठ कारण है 'अंधभक्त' हो जाना है।पहले एक ख़ास रणनीति के तहत दल या नेता,आपके सही-ग़लत में फ़र्क करने की क्षमता को समाप्त कर देते हैं।वर्षों से अर्जित किए गए आपके ज्ञान को अपना भोंपू बना कर इस्तेमाल कर रहें हैं। साम्प्रदायिक बातों में फंसा कर,आपकी समस्याओं से भटका रहें हैं ताकि आपके पास समस्याओं को लेकर उनसे सवाल ही ना पूछ सके। इसमें सिर्फ़ हमारा(जनता) नुक़सान ही हो रहा है। इसलिए भक्ति छोड़, लोकतंत्र में एक ज़िम्मेदार नागरिक बनिए और अपने प्रतिनिधि से ज़्यादा से ज़्यादा सवाल पुछिए।उसको इस बात का एहसास कराइए कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होता हैं ना कि जनता का प्रतिनिधित्व करने वाला।

शनिवार, 7 अक्टूबर 2017

श्वेत स्वर्ण को नहीं काटना चाहिए था!


आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गुजरात दौरे का दूसरा दिन हैं।पीएम मोदी  आज अपने गृहनगर वडनगर में हैं।वडनगर से करीब 232 किलोमीटर दूर भरुच जिले के एक एग्रीकल्चरल कॉलेज में हैलीपैड बना है।5 अक्टूबर को ‘द इण्डियन एक्सप्रेस’ ने एक ख़बर छापी।ख़बर में बताया कि एग्रीकल्चरल कॉलेज में करीब 40 हेक्टेयर में शोध के लिए उगाये गए कपास में से हैलीपैड के लिए करीब 10 हेक्टेयर कपास के फ़सलों को काटा जा रहा है।छात्र इस फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं। छात्रों का कहना है कि कपास की फसलों के काटे जाने से उन्हें काफी नुकसान होगा और उनके शोध में बाधा आएगी।सुत्रों के मुताबिक 28 किस्म के कपास,शोध के लिए उगाये गये थे।यह दूसरी बार है जब फसलों को काटा जा रहा है।इससे पहले मार्च में भी 'नव कृषि विश्वविद्यालय' (एनएयू) से मान्यता प्राप्त इस एग्रीकल्चरल कॉलेज के परिसर में लगी फसलों को एक हेलीपैड बनाने के लिए काटा गया था।छात्रों ने इस बात की लिखित शिकायत भरुच के कलेक्टर से की है। पहले उन्होंने कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ कांतिलाल पटेल से इस मामले पर बात की थी,लेकिन उन्होंने छात्रों की बातों को अनसुना कर दिया।जब छात्रों के विरोध के बारे में कांतिलाल पटेल से पूछा गया, तो उन्होंने कहा, 'ज़िला कलेक्टर ने हमसे कहा था कि वे हमारे परिसर का इस्तेमाल प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के लिए हेलिपैड बनाने में करना चाहते है। इसलिए हमने अपनी ज़मीन दे दी। मैं इस विषय पर अधिक नहीं बोलना चाहता।'एनएयू के उप-कुलपति डॉ सीजे डोंगरिया का कहना है, 'हमे बताया गया कि 8 अक्टूबर को भरुच में प्रधानमंत्री की एक सार्वजनिक बैठक होगी। हमने उनसे कहा कि खेतों में कपास की फसल लगी है। तो हमें कहा गया कि सुरक्षा कारणों से उन्हें काटना पड़ेगा।
प्रधानमंत्री के दौरे के लिए फ़सलों को काटने के कई उदाहरण मिल जाएंगे। किसान जब फ़सल काटने का विरोध करते हैं तो मुआवज़ा देकर उनका मुंह बंद करा दिया जाता है। छात्रों का काम मुआवज़ा से तो नहीं चलेगा ना?उपरोक्त घटना पर गौर करेंगे तो सब आपको आदेश का पालन करते नज़र आयेंगे।किसी ने छात्रों के मेहनत की परवाह नहीं की। मैंने गुगल पर कपास की खेती के बारे में रिसर्च किया।रिसर्च में पाया कि बुआई के समय लाईन से लाईन की दूरी कम से कम 70सीएम होनी चाहिए और पौधों से पौधों की दूरी 30सीएम होनी चाहिए।एक जगह पर केवल तीन-चार बीज़ को बोना चाहिए।कपास के फ़सल को तैयार होने में कम से 150-160 या ज़्यादा दिन लग जातें हैं।इसकी निराई हर दस में की जाती है।बताइए इतनी मेहनत के बाद छात्रोंं ने फ़सल उगाये थे।और सिर्फ़ सुरक्षा कारणों से उसको काट दिया गया। जबकि प्रधानमंत्री तो कहीं और भी रैली कर सकते है।
भारत में कपास को 'सफ़ेद सोना' भी कहा जाता है। कपास भारत की आदि फ़सल है, जिसकी खेती बहुत ही बड़ी मात्रा में की जाती है। यहाँ आर्यावर्त में ऋग्वैदिक काल से ही इसकी खेती की जाती रही है। भारत में इसका इतिहास काफ़ी पुराना है। हड़प्पा निवासी कपास के उत्पादन में संसार भर में प्रथम माने जाते थे। कपास उनके प्रमुख उत्पादनों में से एक था। भारत से ही 327 ई.प के लगभग यूनान में इस पौधे का प्रचार हुआ। यह भी उल्लेखनीय है कि भारत से ही यह पौधा चीन और विश्व के अन्य देशों को ले जाया गया। व्यापारिक दृष्टिकोण से भारत में मुख्यतः 14 क़िस्मों की कपास पैदा की जाती है। कपास उत्पादन के क्षेत्र में गु़जरात का देश में पहला स्थान है।
17 मार्च 2017 को 'गांव कनेक्शन' वेबसाइट ने  केन्द्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, नागपुर की एक ख़बर छापी।जिसमें संस्थान द्वारा एक नई किस्म विकसित की है,जो मात्र 200 दिन में तैयार हो जाती है और इसमें बीमारियां भी नहीं लगती हैं।''युगांक'' नामक कपास की इस नई किस्म के बार में जानकारी देते हुए केन्द्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, नागपुर के निदेशक डा. केशव राज क्रांति ने बताया '' हमारे संस्थान के वैज्ञानिकों ने 9 साल की मेहनत के बाद कपास की ऐसी वेराइटी को डेवलप किया है जो मात्र 100 दिन में तैयार हो जाएगी।केशव ने बताया कि संस्थान के क्राप इंप्रूवमेंट डिपार्टमेंट के वैज्ञानिक संतोष और धारवाड़ के प्रसिद्ध् कपास वैज्ञानिक एस.एस.पाटिल ने कपास की इस नई किस्म को विकसित करने में लगे थे। इसमें कपास किसानों के साथ नेटवर्क बनाकर काम किया गया। जिसका नतीजा है कि कपास की यह किस्म विकसित हो पाई है।बताइए कितना मेहनत और इंतज़ार वाला काम है,कपास की नई किस्म को तैयार करना।और सिर्फ रैली के फ़सलों को काट दिया गया।

इंटरनेशनल कॉटन एडवाइजरी कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर, टेक्स्टाइल मंत्रालय ने 9 मार्च को प्रेस रिलीज जारी कर बताया कि दुनियाभर में कपास उत्पादन में भारत का स्थान पहला और निर्यात में दूसरा।भारतीय कपास का सबसेे ज़्यादा निर्यात बांग्लादेश, पाकिस्तान, वियतनाम, इंडोनेशिया,टर्की और थाईलैंड इत्यादि है।

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

"Each drop of your tear Sears our heart."


फ़ूट-फ़ूटकर रोती ये तस्वीर ज़ोहरा की है।ज़ोहरा,उनलोगों में से है,जो अब कभी अपने पिता का प्यार नही पा सकेगी।ज़ोहरा के साथ-साथ उनके तीन भाई और एक बहन से हमेशा-हमेशा के लिए पिता का साया छिन गया है।ज़ोहरा के पिता एएसआई अब्दुल रशीद पीर को आतंकवादियों ने उस वक़्त गोली मार दी,जब वो अन्नतनाग स्थित थाना सद्दार के मेहंदी कादल इलाके में अपने ज़िम्मेदारी का निर्वाह कर रहे थें।मीडिया रिपोर्ट्स के मुताब़िक पीर,ज़ाम में फंसी गाड़ियों को निकलवा रहे थें,उसी वक़्त आतंकी ने उनके सीने में गोली मार दी।तमाम कोशिशों के बावजूद डॉक्टर्स उन्हें बचा ना सके।भारत माता के इस सपूत की शहादत से लोग गमगीन है।
ज़ोहरा की विलाप करती हुई,इस ह्रदय विदारक तस्वीर पर सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई है।देशभर से लोग अपने-अपने शब्दों से ज़ोहरा का ढाढस बढ़ा रहें हैं,तो कोई सहानुभूति प्रकट कर रहा है।लेकिन एक सवाल,जो मेरे मन में कौंध रहा है,वो ये कि आख़िर वो लोग और शीर्ष के राष्ट्रीय हिन्दी न्यूज़ चैनल्स,जो दिन-रात देशभक्ति बनाम देशद्रोही पर चीखते हैं।उस चैनल्स के संपादक,एंकर और रिपोर्टर्स, एक ऐसे वक़्त में ख़ामोश क्यूं है,जब ज़ोहरा के इस ह्रदय विदारक तस्वीरों पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई।क्यूं बलात्कारी बाबाओं को ही प्रधानता दिया जा रहा है?क्या जनता सिर्फ़ बलात्कारी बाबा को ही देखना चाहती है?
दक्षिण कश्मीर के डीआईजी ने अपने फ़ेसबुक पर लिखा है-My dear Zohra,your tears have shake many heart.The sacrifice made by your father will always rememberded.you are too young to understand to why this hapende.your father like all of us represent j&k police force-A hallmark of volour and sacrifice.Each drop of your tear Sears our heart.(मीडिया रिपोर्ट के अनुसार)

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

यूपी के स्वास्थ्य मंत्री के नाम मेरा ख़त.......

                                                                                                                                                    
आदरणीय सिद्धार्थनाथ सिंह जी,
नाउम्मीदी के बावजूद भी आपको ये ख़त लिख रहा हूं।बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज एण्ड हॉस्पिटल,गोरखपुर में बच्चों की हुई मौत के करीब-करीब तीन दिन बीत चुके हैं।मुझे मालूम नही की आप बच्चों की मौत से कितने आहत हुए थे,लेेकिन आपके राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को कई माताओं की गोद सुनी हो जाने की बात आम  बात लगी है।मैंने ये ख़त आलोचना या इस्तीफ़ा देने जैसी बातों के लिए नही लिख़ा है।क्योंकि सत्तानशी को आलोचनाओं से फ़र्क नही पड़ता है।और यदि इस्तीफ़े से चीजें बदल जाती तो आपके ही दादाजी (लाल बहादुर शास्त्री जी) नें 1956 में हुए एक रेल हादसे पर इस्तीफ़ा  दे दिया था,लेकिन आज रेलवे की क्या हालात है सबको पता है।बल्कि मैंने ये ख़त एक विशेष गुज़ारिश के लिए लिखा है।घटना के तकरीबन तीन  दिन बीत जाने के बाद सब कुछ सामान्य सा हो गया है। अब आपको टीवी में अपने बुझ चुके चिराग को लेकर फुटकर-फुटकर रोते -बिलखते परिजन नही दिखाई देंगे।गुज़ारिश ये है कि जिस दिन मेरी ये चिट्ठी आप के हाथ लगे,उस दिन किसी एकान्त जगह पर जाकर दो दृश्यों को याद कीजिएगा।पहली दृश्य -जिस दिन आप ने हिन्दुस्तान के सबसे बड़े राज्य के स्वास्थय मंत्री के रुप में शपथ लेते वक़्त जो बात कही थी और दूसरी दृश्य-बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज एण्ड हॉस्पिटल,गोरखपुर में फुटकर-फुटकर रोते -बिलखते उन परिजनों की जिनका चिराग हमेशा-हमेशा के लिए बुझ गया है।उम्मीद है इन दोनों तस्वीरों से ये साफ़ हो जाएगा कि इस घटना से पहले आपने अपने कर्तव्य का पालन कितनी ज़िम्मेदारीपूर्वक निभाया है।
 आज़ हमारा देश आज़ादी की 70वीं सालगिरह के जश्न में डूबा हुआ है। हर हिन्दुस्तानी अपने-अपने तरीके से आज़ादी का जश्न मना रहा है।आज़ आपने उन नन्हें-नन्हें बच्चे-बच्चियों को तो देखा ही होगा जो आज़ादी के इस पावन पर्व में झुमते हुए नज़र आये होंगे,ठीक उसी तरह अपनी जगह उन माता-पिता को रख के सोचिए जिसके बच्चे को,आपलोगों के सामुहिक लापारवाही ने उनकी चिराग को बुझा दिया।17 परिजनों ने तो अपने बच्चे का नामकरण तक नही किया था।हैरानी की बात ये है कि लाल किले के प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने गोरखपुर हादसे का ज़िक्र तो किया,लेकिन चन्द शब्दों में वो भी बिना गोरखपुर का नाम लिए।इसको क्या समझा जाए?
घटना का आज़ चौथा दिन है। बीआरडी अस्पताल में बच्चों की मौत,व्यक्तिगत लापरवाही से हुई कि सामूहिक लापरवाही से,अबतक पता नही चल पाया है।क्या उम्मीद की जा सकती है कि दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई होगी?हत्या से जुड़ी अबतक के सभी घटनाक्रम पर डाले तो,जो मैं समझ पा रहा हूं वो ये है कि आप सब लोग अपने आप को निर्दोष ठहरा रहें है।फ़िर आख़िर इतने बच्चों की जान कैसे चली गई?डीएम,अस्पताल प्रशासन और एक स्वास्थ्य मंत्री के नाते,आपलोगों के बयान में काफ़ी भिन्नता नज़र आ रही है।मौत के कारणों पर डीएम के रिपोर्ट के बावजूद भी अापलोग(सरकार)मानने के लिए तैयार नही है कि बच्चों की जान अॉ़क्सीजन की वज़ह से गई है।जबकि डीएम ने अपने रिपोर्ट में साफ़-साफ़ कहा है कि अॉक्सीजन सप्लाई में बाधा उत्पन्न होने के कारण मौत हुई है।कितने बच्चों की उस दिन मौत हुई,इसका भी अधिकारिक आंकड़ा नही पता चल पाया है।
दुख की घड़ी में विपक्षी नेताओं का गोरखपुर अस्पताल का दौरा करके,अपनी उपलब्धियों को गिनाने वाली बात तो समझ आती है,लेकिन आपका प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ये कहना कि अगस्त में तो मौतें होती रहती है और साल दर साल मौत के आंकड़े को गिनाने वाली बात आज़ तक समझ नही आई।इन बातों से आप क्या साबित करना चाहते थें?क्या इसी के लिए यूपी की जनता ने आपको चुना था?या फ़िर जनता के लिए कहीं इस बात का संकेत तो नही है कि "सिर्फ़ सरकार बदली है व्यवस्था नही?" रही बात सत्तावीहीन नेताओं की तो,कम से कम उनको तो इस दुखद वक़्त में ये सोचना चाहिए था कि यदि वो इतने ही अच्छे होते तो जनता उनको सत्तावीहीन क्यों करती।मीडिया की रिपोर्टिंग और सोशल मीडिया ने मुद्दे को भटका दिया  है।मौत के कारणों की जांच और दोषियों पर कार्रवाई से भटक कर मामला इंसेफेलाइटिस वार्ड के डॉ.कफ़ील और साम्प्रदायिक बना दिया गया है।अब सिर्फ़ डॉ.कफ़ील के बारे में बात हो रही है और रिपोर्ट छप रही है।इससे क्या ये अनुमान किया जाए कि बच्चों की मौत के ज़िम्मेदार सिर्फ़ कफील ही हैं?




शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

कुर्सी पर सिर्फ़ बोलने वाला नही बैठा है!

'राजनीति में नेताओं की सियासी समस्या ही आपकी भी बुनियादी समस्या है,नेताओं की बड़ी-बड़ी बातें आपकी समस्यों का समाधान है',न्यूज़ चैनल के अनुसार।यदि आप न्यूज़ चैनलों को ध्यान से देखेंगे तो उपरोक्त बात आसानी से समझ आ जाएगी। ऐसा नही है कि ये सिर्फ़ हिन्दुस्तान में ही  हो रहा है और वो भी आज़कल हो रहा है।दुुनिया के किसी भी देश में न्यूज़ चैनल्स, उदय के कुछ दिनों बाद से ही पत्रकारिता छोड़ दलों के प्रवक्ता के रुप में काम करने लगें।राजनीतिक दलों और उनके नेताओं की पलपल की जानकारी आप तक पहुंचाने लगे। बीच-बीच में अपनी विश्वसनीयता कायम रखने के लिए कुछ जन समस्याओं को दिखाकर,धीरे-धीरे आपको अपना शिकार बना लिए,जो आज सामने है। टीवी में एक नये प्रारुप का आगमन हुआ,जिसको 'डिबेट शो' के नाम से जाना जाता है।डिबेट शो का आगमन किसी भी मुद्दे पर अलग-अलग जानकारों की राय से एक निष्कर्ष पर पहुुचने के लिए हुआ था,लेकिन ये फॉरमेट भी राजनीति का शिकार हो गया।आज आलम ये है कि किसी भी मुद्दे पर डिबेट हो,किसी भी दल का एक ही प्रवक्ता सभी विषयों पर बोल देगा,समस्या चाहे हिन्दुस्तान के किसी भी कोने का हो।भले ही वो दिल्ली से या फ़िर अपने शहर से कई महीनों से निकला ना हो।अब  डिबेट शो में तो अपशब्दों का भी इस्तेमाल होने लगा है।
एक ऐसे वक्त में जब डिबेट शो राजनीति से ग्रसित हो गया है, कुछ अभी भी डिबेट शो है जहां जनहित की लिए शान्ति से बात होती है।उसी में से एक है एनडीटीवी इण्डिया का 'प्राइम टाइम' शो।प्राइम टाइम के एंकर हैं रविश कुमार।जिनकी कोशिश होती है कि बहस के दौरान मुद्दे के कई पक्षों पर बात हो।गुरुवार को उन्होंने अपने कार्यक्रम में सीवर सफ़ाईकर्मियों की लगातार हो रही मौत के कारणों पर स्टुडियों में बुलाकर  बात की। इस कार्यक्रम की सबसे खास बात ये है कि इसमें सिर्फ़ बोलने वाले  यानि किसी दल के प्रवक्ता नही थे़ं। कार्यक्रम का लिंक भी दे रहा हूूं।
https://www.youtube.com/watch?v=PvQlXa2bOsM

सोमवार, 7 अगस्त 2017

सोशल मीडिया की वज़ह से जनता और सरकार में सीधा संवाद हो रहा है?

"सोशल मीडिया की वज़ह से जनता और सरकार के बीच सीधा संवाद हो रहा है।"ये कहना है मेरे एक मित्र का।मेरे मित्र के इस बयान से कई लोग सहमत भी होंंगे, तो कई लोग मेरी तरह असहमत भी।उनके इस बयान का आधार क्या-क्या हो सकता है,ये जानने की मैंने कोशिश की।मैंने अपने गांव और शहरों में रहने वाले कई साथियों से इस सन्दर्भ में बात कि जो स्मार्टफ़ोन,टैबलेट, डेस्कटॉप या लैपटॉप का इस्तेमाल 2014 के पहले के कई सालों से इस्तेमाल करतें आ रहें हैं। इन तमाम डिवाइस वाले साथियों से इसलिए बात कि,क्योंकि मसला सोशल मीडिया से जुड़ा है।वो भी एक ऐसे वक़्त में जब सोशल मीडिया अफ़वाहों का अड्डा बन गया है।हकीकत से रूबरू होने के लिऐ एक असाधारण कोशिश आपको भी करनी चाहिए।अपने ही सोशल मीडिया को पूरा छान मारिये, ताकि पता चल की हकीकत क्या है।यदि आपका संबंध गांव से है तो ,अपने गांव के 10 लोग(सभी वर्ग के) से सोशल मीडिया के बारे में पूछिए।इसके अलावा मैंने गूगल की भी मदद ली।इस विषय के शोधपरक हिन्दी और इंग्लिश के कई वेबसाइटों को पढ़ा,ताकि कोई तो ऐसी बात पता चले जिससे लगे की सरकार जनता से सीधे संवाद कर रही है।इन तमाम कोशिशों के बावजूद जिस निष्कर्ष पर मैं पहुंचा, उससे लगा कि मैं उनके सोचने के स्तर तक नही पहुंच पाया।उम्मीद करता हूं कि उनसे जब इस मुद्दे पर बात होगी तो जानने की कोशिश करूंगा कि उनके कहने का आधार क्या था।
बहरहाल मैं अपनी असहमति के पक्ष में कुछ शोधपरक आकड़ों को प्रस्तुत कर रहा हूं।तमाम वेबसाइटों को पढ़ने के बाद एक मुख्य बात जो सामने आई वो ये कि सब कुछ 'उम्मीद' पर टिका हुआ है,वो भी साल 2020 तक।लेकिन अभी जो हालात है वो बहुत बद्दतर है।मैंने दो बातों को शोध का आधार बनाया।पहला कितने लोग स्मार्टफ़ोन इस्तेमाल करते हैं और दूसरा कितने लोग इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं।क्योंकि ये दोनों बातें एक दूसरे के पूरक हैं और सोशल मीडिया का वजूद ही इन बातों से है।शोध करते वक़्त मैंने पूरी सावधानी बरती है।फ़िर भी यदि कोई चूक हो गई हो तो पहले से क्षमा।क्योंकि मेरा मकसद सिर्फ़ हकीकत को आपके सामने लाना है,क्योंकि सिर्फ़ बातों से बात नही है।
शोध के किसी भी बिन्दु को पढ़ते वक़्त भारत की जनसंख्या को ध्यान में रखिएगा।2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 1,210,193,422 है।worldometers के अनुसार 6 अगस्त 2017 तक भारत की आबादी 1,343,961,178 है,जिसका 32.8% हिस्सा यानि 439,801,466 लोग शहर में निवास करते हैं।
worldometer एक वेबसाइट है जो दुनियाभर के जनसंख्या की जानकारी देता है।
▶द मोबाइल इकोनॉमी इण्डिया 2016 के अनुसार जून-2016 तक भारत के 27.50 करोड़ लोग स्मार्टफ़ोन इस्तेमाल करते हैं।उम्मीद लगाई जा रही है कि 2020 तक देश के 68% आबादी के पास स्मार्टफ़ोन होगा।वर्तमान में 61.6% लोग मोबाइल यूजर्स हैं।वर्तमान में देश में देश में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या 34 करोड़ 30 लाख है,जो कुल आबादी का 27% है।जहां 2020 तक यह संख्या बढ़कर 60 करोड़ पहुंचने की उम्मीद है।
▶टू बैलेंस मोबाइल एप ने 01 अगस्त 2017 को एक रिपोर्ट में बताया कि पिछले 8 महीने में भारत में मोबाइल डाटा का इस्तेमाल बढ़ा है।इसके बावजूद भी भारत में 56% स्मार्टफ़ोन यूजर्स के पास इंटरनेट की सुविधा नही है।इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में इंटरनेट की कनेक्टिविटी आज़ भी काफ़ी ख़राब है,जिसके चलते यूजर्स इस्तेमाल नही कर पाते है।
▶एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सोशल मीडिया में से सबसे ज़्यादा इस्तेमाल फ़ेसबुक का होता है।इसको इस्तेमाल करने वाले ज़्यादातर 18-24 साल के युवक हैं।इसमें से भी 76% प्रतिशत उपभोक्ता पुरूष हीं हैं।मात्र 24% महिला ही फ़ेसबुक इस्तेमाल करतीं हैं।
दूसरे नम्बर पर ट्विटर आता है।जिसके मात्र 17% उपभोक्ता हैं।
इंस्टाग्राम को इस्तेमाल करने वाले भारत मे 71% पुरूष और मात्र 29% महिलाएं इस्तेमाल करतीं हैं।इसके सबसे ज़्यादा सक्रिय उपभोक्ता दिल्ली और मुंबई में हैं।उपयोगकर्ता में 60% कॉलेज के लड़के-लड़कियां हैं।
इसके अलावा लिंक्डइन, युट्यूब, मैसेन्जर वगैरह है।
                             अब आप ही सोचिए कि जिस देश की पूरी आबादी के पास स्मार्टफ़ोन और इंटरनेट की सुविधा नही है।भाषाई अंतर तो है ही।वहां ये कहना कि 'सोशल मीडिया की वज़ह से जनता और सरकार में सीधा संवाद हो रहा है' कितना न्यायोचित है?मेरे मित्र का यह बयान जनहित में सवाल पूछने वाले पत्रकारों पर कटाक्ष करते हुए आया है।उनका तर्क है कि सवाल पूछने वालों पत्रकारों को सरकार ज़वाब क्यूँ दे,जब सोशल मीडिया के माध्यम से जनता से सीधा संवाद हो ही रहा है।वो ये कहते हुए भुल गयें कि पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है,जिसका काम ही है सवाल पूछना ना कि सरकार की चाटुकारिता करना।

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

नीतीश जी:दाग अब भी लगे हैं!

दिन 26 जुलाई 2017,शाम का वक्त, राष्ट्रीय मीडिया की नज़र बिहार पर।क्योंकि इस शाम से अगली शाम तक भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय लिखा जा रहा था,एक व्यक्ति की साफ़-सुथरी छवि बनाये रखने के लिए।इस अध्याय में कई ऐसी चीजें लिखीं गई,जो अबतक की राजनीति में एक बानगी है।जैसे नीतीश कुमार छठी बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले अबतक के एकमात्र मुख्यमंत्री बने।सबसे अल्प समय तक मुख्यमंत्री ना रहने वाले मुख्यमंत्री बने।अपने पुरानी साथी से हाथ मिलाने जा रहे थे,जिससे साल 2013 में यह कहते हुए नाता तोड़ दिया था कि 'मिट्टी में मिल जाऊंगा, लेकिन दुबारा कभी नाता नही जोड़ूंगा।'इस शाम नीतीश ने उस गठबंधन से नाता तोड़ दिया,जिसकी बुनियाद सांप्रदायिक ताकतों के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए रखी थी।महज़ 20 महीने में उसी सांप्रदायिक ताकत से हाथ मिला लिए,जिससे लड़ने के लिए ख़ुद के सहयोग से एक गठबंधन का निर्माण किया था।इस गठबंधन से अलग होने के बाद उनके कई उपनाम भी अस्तित्व में आए।जैसे-कुर्सी कुमार,पलटूराम,रणछोड़ इत्यादि।
अपने वर्तमान साथी भाजपा से साल 2013 में नाता तोड़ते वक़्त नीतीश कुमार ने कहा था कि ये निर्णय सिद्धांत के आधार पर लिया गया है।भाजपा एक सांप्रदायिक पार्टी है।आइए एक नज़र डालते हैं दोनों साथियों के साल 2013 से लेकर 2015 तक के उन कुछ वचनों पर ताकि आपको तय करने में आसानी हो जाए की राजनीति में नैतिकता का क्या महत्व होता है।नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार चुने जाने पर नीतीश ने कहा था कि भाजपा एक ऐसे उम्मीदवार को चेहरा बना रही है,जिसका नाम सुनते ही देश के करोड़ों अल्पसंख्यकों में भय उत्पन्न हो जाता है।नीतीश ने नरेंद्र मोदी की तुलना हिटलर से की थी।सुशील मोदी ने नीतीश को धोखेबाज़ कहा था।नरेन्द्र मोदी ने नीतीश को अवसरवादी नेता कहा था।
हाल ही में 26 जुलाई को गठबंधन से अलग होते वक़्त साफ़ -सुथरी छवि के जाने जाने वाले नीतीश ने कहा था कि मैंने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई में ये कदम उठाया है और अगले ही दिन भाजपा के सहयोग से सरकार बना लिए।आइए एडीआर के रिपोर्ट की मदद से जानते हैं कि राजद-कांग्रेस के गठबंधन वाले नीतीश मंत्रिमंडल में कितने दागी मंत्री थे और अब भाजपा के सहयोग से बनी मंत्रिमंडल में कितने दागी हैं।एडीआर ने ये रिपोर्ट नेताओं द्वारा चुनाव आयोग में दाखिल किए गए चुनावी हलफनामे के आधार पर तैयार किया है।
एडीआर(एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म) एक संस्था है,जिसको कह सकते हैं कि ये राजनीतिक प्रणाली को दूरूस्त करने के लिए काम करती है।इसकी स्थापना 1999 में आईआईएम, अहमदाबाद के प्रोफेसरों ने मिलकर की है।
रिपोर्ट की शुरुआत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से ही करते हैं।साल1991 में एक मर्डर केस में उन पर हत्या,हत्या की कोशिश, दंगा भड़काने और आर्म्स एक्ट का मामला दर्ज़ है।
                             उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी पर मानहानि, शान्ति भंग करने और आपराधिक साज़िश के केस दर्ज़ है।ऐसे ही नीतीश के वर्तमान मंत्रिमंडल के कई नेताओं पर चोरी, धर्म, जाति,लिंगभेद के आधार पर सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने ,घर में घुस कर चोरी,रंगदारी, धोखाधड़ी, सम्पत्ति, बेईमानी, आपराधिक धमकी और जालसाजी जैसे  मामले दर्ज़ हैं।नीतीश के वर्तमान 29 सदस्यीय मंत्रिमंडल का हाल-
👉मंत्रिमंडल में 22(76%)मंत्रीयों पर आपराधिक मामले में केस दर्ज़ है।जिनमें से 9 पर जघन्य अपराध के आरोप हैं।जबकि पिछली सरकार में 19(68%) मंत्रियों पर आरोप थे।
👉मंत्रिमंडल में 21(76%) करोड़पति,जबकि पिछली सरकार में22(79%)थें।
इस सरकार में सबसे ज़्यादा और सबसे कम सम्पत्ति वाले मंत्री भाजपा के ही हैं।जिनके पास सबसे ज़्यादा सम्पत्ति है,वो हैं लखीसराय से भाजपा विधायक विजय कुमार सिन्हा।इनके पास 15.64 करोड़ की सम्पत्ति है।इनकी चल सम्पत्ति 9,81,72,626 और अचल सम्पत्ति 5,82,38,000 है।
इसी सरकार में सबसे कम सम्पत्ति वाले हैं मंगल पाण्डेय,जो कि भाजपा से एमएलसी हैं।इनके पास अचल सम्पत्ति है 0 और चल सम्पत्ति है 49,93,582।
👉इस मंत्रिमंडल में एक महिला मंत्री है,जबकि पिछली सरकार में दो महिला मंत्री थी।

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

कुदरत और राजनीति की मार झेल रहा है गुजरात।

देश के चार राज्य बारिश और बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित है।उनसे में एक राज्य है गुजरात।इस राज्य के कई ज़िले बारिश और बाढ़ से भयंकर रूप से प्रभावित है।मीडिया रिपोर्ट्स के मुताब़िक बनासकांठा और पाटन ज़िले के गांव ज़्यादा प्रभावित है।केन्द्र और राज्य सरकार के साझा सहयोग से राहत और बचाव कार्य ज़ारी है।SEOC यानि State Emergency operation center के रिपोर्ट के मुताब़िक बाढ़ से अबतक बनासकांठा में 61 और पाटन में सात लोग समेत 218 लोगों प्राकृतिक आपदा की वज़ह से मौत हो गई है।
लगातार हो रही बारिश से उत्पन्न हुई बाढ़ से 4.5 लाख़ लोग प्रभावित है।इसमें से अबतक 39000 लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया गया है।वायुसेना, राष्ट्रीय और राजकीय आपदा मोचन बल के सहयोग से पिछले हफ़्ते 11400 लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया।लगातार हो रही बारिश से बचावकर्मियों को काफ़ी मुश्किलों का सामना कर रहा है।लेकिन मुश्किल हालात के बावजूद अपने कर्तव्य का ईमानदारी से निर्वाह कर रहें हैं।
ऊधर गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी भी बनासकांठा और पाटन ज़िले में डेरा डाले हुए।रूपानी नें बताया की पाटन के 87 छतिग्रस्त सड़कों में से 58 सड़कों का मरम्मत कर दिया गया है और 153 चिकित्सा शिविर लगाये गये हैं।इण्डिया टुडे से बातचीत में रिलीफ़ कमांडर एजे शाह ने कहा कि आपदाग्रस्त इलाकों में राहत एंव बचाव का कार्य अब भी ज़ारी है और उम्मीद है मरने वालों की संख्या में इज़ाफ़ा नही होगा।
आपदा से इतर गुजरात राजनीतिक समस्या से भी जूझ रहा है।8 अगस्त को होने वाले राज्यसभा चुनाव में सिर्फ़ एक व्यक्ति को जिताने के लिए,कांग्रेस ने अपने 42 विधायकों को गुजरात से 1663.7 किमी दूर बैंगलोर के ईगलटोन रिसॉर्ट पहुंचा दिया है।इन 42 विधायकों में वो भी विधायक शामिल हैं,जिनका इलाका जलमग्न है।आपदाग्रस्त इलाके के विधायकों के लिए ये सबसे मुफ़ीद वक़्त था,पीड़ित लोगों की सहायता कर अपने और अपने पार्टी की विश्वसनीयता बहाल करने की।वो भी एक ऐसे वक़्त में जब देश के मात्र 6% आबादी पर कांग्रेस का शासन रह गया है।इन विधायकों को ये भी सोचना चाहिए था कि वो दुबारा वोट आधार पर मांगने जाएंगे?
रिसॉर्ट की वेबसाइट के मुताब़िक एक दिन के खाने और रहने का किराया न्यूनतम 7500 है।मीडिया रिपोर्ट के मुताब़िक इस रिसॉर्ट में एक विधायक ने अपने 12 साल के बेटे के जन्मदिन के अवसर पर 50 किलो का केक मंगवाया,साथ अॉर्केस्टा के साथ कॉकटेल डिनर पार्टी का आयोजन भी आयोजन किया।मगर आठ लोगों ने ही मंदिरापान किया।गुजरात वैसे भी ड्राई स्टेट है।
इन सब के बीच,एक तरफ़ जिस व्यक्ति को राज्यसभा में पहुंचाने के लिए विधायकों को परमानंद की प्राप्ति कराई जा रही है,उस व्यक्ति को ख़ुद बाढ़ प्रभावित इलाकों में जाना पड़ा।सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल(राज्यसभा उम्मीदवार) और अशोक गहलोत ने बनासकांठा इलाके का दौरा किया और पटेल ने अपने दौरे की फ़ोटो ट्वीट करते हुए, राज्य सरकार के राहत एवं बचाव कार्य की आलोचना करते हुए कहा की,इसकी रफ़्तार बहुत ही धीमी है।वहीं दूसरी तरफ़ राज्यभा में गुलाम नबी आज़ाद ने भी इस मुद्दे को उठाया।पटेल और गहलोत के बाद,बाढ़ प्रभावित इलाकों में केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी भी गई।बीजेपी ने कांग्रेसी विधायकों के बैंगलोर जाने को मुद्दा बनाया है।केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके विधायक मौज-मस्ती कर रहे हैं,जबकि भाजपा के विधायक बाढ़ प्रभावित लोगों को राहत मुहैया कराने में व्यस्त हैं।उन्होंने आगे कहा कि गुजरात कांग्रेस के नेता बेंगलुरु में भाजपा पर आरोप लगा रहे हैं।यह उल्टा चोर कोतवाल को डांटे वाली बात हो गई।यदि उनके विधायक ख़ुद उन्हें छोड़कर आकर रहे हैं,तो इसका हमसे कोई लेना देना नही है। 30 जुलाई को कांग्रेस नेता शक्ति सिंह गोहिल ने रिसॉट में अपने सभी विधायकों के साथ प्रेस कॉफ्रेंस कर बताया कि हमारे विधायक यहां मौज-मस्ती करने नही आए हैं,बल्कि लोकतंत्र को बचाने आए हैं।भाजपा उनके विधायकों को धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल का इन्हें ख़रीदने की कोशिश कर रही है। गुजरात में कांग्रेस के कुल 57 विधायक थे, जिनमे से 6 ने पिछले दो दिनों में इस्तीफ़ा दे दिया है।उनमें से 3 ने 28 जुलाई को भाजपा का दामन धाम लिये। 7 अन्य बेंगलुरु में ठहरे विधायकों के समूह में शामिल नही हैं।गोहिल ने उम्मीद जताई की वे अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनेंगे और कांग्रेस के ख़िलाफ़ वोट नही करेंगे। बीजेपी हमारे 22 विधायकों ख़रीदने की कोशिश कर रही है।लेकिन हमारे विधायक एकजुट हैं।कांग्रेस आजकल अपने नेताओं को 'अंतरात्मा की आवाज़' सुनने की बात कर रही है। राष्ट्रपति चुनाव में भी मीरा कुमार ने अंतरात्मा की आवाज़ सुनने की बात कही थी। गोहिल को जब अपने विधायकों पर इतना ही भरोसा है तो विधायकों को बैंगलुरू क्यों पहुंचा दिए?

गुरुवार, 27 जुलाई 2017

.....और वो फ़र्श पर बैठ गए।

आज डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम की दूसरी पुण्य तिथि है।आज ही के दिन साल 2015 में,कलाम साहब हमलोग को छोड़ कर चले गए।भारत माता के इस सपूत का अचानक से हम सब को छोड़ के चला जाना अपूर्णीय छति है।अब जब आज वो हमारे बीच नही होते हुए भी हमारे बीच रहते हैं,सिर्फ़ अपने कर्मों की वज़ह से।ऐसे ही लोगों को देखकर कभी-कभी गर्व भी होता है और डर भी लगता है कि ये ना होते तो कैसा होता हमारा देश।कलाम साहब एक किताब थें,जिसका हर पन्ना आपको बेहतर इंसान बनाता है।वो अपनी प्रेरणादायी लेखन और सुवचन के कारण अब भी हमारे बीच हैं।ऐसा ही कुछ वाक्य मैं आपके साथ साझा कर रहा हूं।
कलाम साहब,जब वो राष्ट्रपति थें तो उनके कार्यकाल के अन्तिम दिनों में उनको रामनाथ गोयनका पुरस्कार कार्यक्रम में बुलाया गया ।पुरस्कार वितरण के बाद इस बात पर बहस होने लगी की 'क्या अच्छी पत्रकारिता बुरा व्यवसाय है?बहस का नतीज़ा आज़ तक तो नही निकला,ना निकलेगा।मंच पर उपस्थित राजदीप सरदेसाई ने कलाम साहब को सलाम और बाय-बाय सर कहा।इसी मंच पर ही उपस्थित बरखा दत्त ने कहा-"राष्ट्रपति जी एन राम आपकी ही बातों का जवाब दे रहें हैं,सुनते जाइए।कलाम साहब लौटते हैं और मंच पर पालथी मार कर बैठ जाते हैं।एन राम और उनके बीच बहस होती है कि विकास कैसे हो?बाद में कलाम ये कहकर चलते बने की इस पर बहस ज़रूर कीजिए,लेकिन ध्यान रखिए कि लोगों को ग़रीबी रेखा से कैसे ऊपर लाया जाए।बात क्या हुई ये महत्वपूर्ण नही है,एक राष्ट्रपति का इस तरह फ़र्श पर बैठ जाना सबको हैरान कर गया।
अब आगे उनकी बातों को शब्दसह लिख रहा हूं।जब कलाम साहब बोलने लगे तो सब लोग चुपचाप उन्हें सुनने लगे।उन्होंने ने एन राम से कहा-
"No,mister Ram.I don't want to take any of ur agenda.you got an agenda,ur meeting ok.but the agenda what I have suggest that,you can calibrate what is the National development?That is the 2 hundred and 20 million people on below poverty line.so how do u bring them up?So that is the agenda.there may be many development going on to agriculture to any subject.but agenda is very clear.2 hundred and 20 million people of below poverty line.how do you live them up?What contribution you make?If u want to economic development of the nation is not a end of it.i have define it.National prosperity is that equal to A+B+C।
A-Gdp that the economic development.
B is 2 hundred 20 million people,how year lifting up. every year reduce the below poverty line and third
C is that,no body talked about,that is value system.value system comes from 200 million house are there.how many houses are joint family?How many of u like joint family ?Lift ur hand.so u promote such type of thing."
ये कलाम साहब का कथन था।अन्त के 5 पंक्ति को दुबारा पढ़िये।उन्होंने वहां उपस्थित लोगों से पूछा कि आप लोगों में से कितने लोग सम्मिलित परिवार में रहना चाहते हैं,हाथ उठाये।हाथ उठाने की औसत को देखकर मैं हैरान हो गया।
                                   तो ऐसे थे हमारे कलाम साहब।

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

दो भीड़-अन्तर बस कृत्य का।

"I don't think it(hate crime) is new in India.it is feudal in nature.Today they shake the conscience.you can't say lynching or hate crime are something new.I think they are over hyped and over reported."
ये कहना है उस मंत्रालय के सचिव का,जिसकी ज़िम्मेदारी देश में सुरक्षा,शान्ति और सौहार्द बनाए रखने की है।राजीव महर्षि का ये बयान मुझे शोध के दरमयान मिली,जो 25 जून 2017 को India today की वेबसाइट पर छपी है।महर्षि के इस बयान से कई लोग सहमत और असहमत हो सकते हैं।मेरी जो असहमती है,जहां तक मैं उनके बयान को समझ पा रहा हूं।लाचारी और बेबसी से भरा ये बयान बता रहा कि भीड़ के द्वारा की गई हत्या से इनको कोई फ़र्क नही पड़ता है।ये बात सही है कि भीड़ के द्वारा किसी की हत्या कर देना कोई नई बात नही है।लेकिन क्या ये कह कर अपनी ज़िम्मेदारी से किनारा करना कैसे उचित है?मीडिया को दोषी ठहराना फ़ैशन हो गया,जो उन्होंने भी किया।उन्होंने कहा कि भीड़ के द्वारा की गई हत्या को मीडिया ज़्यादा प्रचारित और रिपोर्ट कर रही है।महर्षि साहब को ये बात कहने से पहले सोचना चाहिए कि मीडिया क्यों रिपोर्ट कर रही है? क्या ऐसी घटनाएं नही हो रही है?या फ़िर मीडिया की रिपोर्ट से सरकार की छवि ख़राब होने की चिन्ता है?महर्षि साहब,हत्या के कारण कुछ भी हो सकते हैं लेकिन ये कहना कि मीडिया ज़्यादा रिपोर्ट कर रही है,बिल्कुल अनुचित है।आप अपनी ज़िम्मेदारी निभाइए और मीडिया को अपनी ज़िम्मेदारी निभाने दीजिए।हाल ही में इंण्डिया स्पेण्ड ने न्यूज़ रिपोर्ट के आधार पर बताया कि साल 2017 के पहले 6 महीने में गाय को लेकर 20 हमले हुए,जो साल 2016 से 75% ज़्यादा है।यह आंकड़ा अब तक के सबसे ख़राब साल 2010 से भी ज़्यादा है।
भीड़ के अलग-अलग स्वरूप होते हैं।लेकिन जिस भीड़ की अब चर्चा हो रही है वो है हिंसक भीड़।जो कुछ लोग मिलकर शक और अफ़वाह के आधार पर किसी की हत्या करने के लिए तैयार करते हैं।जुनैद और मोहम्मद अयुब पंडित इसका उदाहरण हैं।राजनीति से प्रेरित इन कुछ लोगों की वज़ह से कोई धर्म या जाति बदनाम हो जाता है।मीडिया को भी ऐसी घटनाओं को रिपोर्ट करते वक्त ख़ास सावधानी बरतनी चाहिए, जिससे की किसी को किसी के प्रति नफ़रत पैदा ना हो।मीडिया के गलत रिपोर्टिंग का ताज़ा मामला जुनैद की हत्या है।मुझे जहां तक याद है कि उसके भाई ने घटना के कुछ ही घंटों बाद कह दिया था कि झगड़ा सीट के लिए हुआ था।लेकिन मीडिया संस्थानों नें ज़बरदस्ती बीफ़ का मामला बताकर अपनी टीआरपी बढ़ाई।दर्शकों को ख़ास कर ऐसी ख़बरों की टीआरपी के खेल से बचना चाहिए और मीडिया के शुरुआती रिपोर्ट से कोई धारणा तैयार नही करना चाहिए।सरकारी रिपोर्ट का इन्तजार करना चाहिए।जब भी कोई घटना घटती है,ख़ासकर गाय को लेकर तो विपक्षी दलों के नेता समेत सरकार विरोधी लोग ये कहते हैं कि ये सब केन्द्र सरकार की सह पर हो रहा है।लेकिन मुझे जहां तक याद है,जब से नरेंद्र मोदी पीएम बने हैं,कई बार राज्य सरकारों से कह चुके हैं कि ऐसी घटनाओं पर सख़्त कर्रवाई करें।कानून-व्यवस्था राज्य का मामला होता है।ऐसे में ये राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी होती है कि ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगायें और दोषियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करें,ताकि दुबारा किसी की हिम्मत ना हो।अब सवाल ये है कि पीएम के बार-बार कहने पर भी राज्य सरकारें कार्रवाई क्यों नही करती है?सबसे हैरानी की बात ये है कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी हत्या को लेकर कोई अलग से कानून नही है।
अब मैं शोध के आधार पर कुछ उदाहरण दे रहा हूँ,उन लोगों के लिए जिनके दिमाग़ में ये बात साजिश के तहत भरी जा रही है कि सिर्फ़ हिन्दुओं द्वारा मुसलमानों पर अत्याचार किया जा रहा है-
▶देश की राजधानी दिल्ली के विकासपुरी इलाके में 15 लोगों की भीड़ जिसको नासिर लीड कर रहा था,ने डॉक्टर पंकज नारंग को रॉड और हॉकी स्टिक से,उसके पत्नी-बच्चे के सामने तब तक मारा जब तक नारंग ने दम नही तोड़ दिया।
▶कोयम्बटूर के फ़ारूक जिसकी ईश्वर में कोई आस्था नही था,उसी के बचपन के साथी ने उसकी एक फ़ेसबुक पोस्ट की वज़ह से हत्या कर दी।
▶एक हिन्दू रेल पैसेंजर को मुस्लिम युवकों ने सीट विवाद में पीटकर मार डाला।
▶एक दलित युवक को मुस्लिमों की भीड़ ने इसलिए पीटकर मार डाला,क्योंकि वो एक मुस्लिम लड़की से प्यार करता था।
▶झारखंड में भीड़ ने कुछ हिन्दुओं और मुसलमानों को बच्चा चोरी के शक में पीट-पीटकर मार डाला।
▶हाल ही में दिल्ली में 15-20 युवाओं की भीड़ ने एक रिक्शा चालक को पीट -पीटकर मार डाला क्योंकि उसमें किसी एक को चालक ने एक दिन पहले खुले में पेशाब करने से मना किया था।
                                 उपरोक्त उदाहरण से क्या ये साबित हो रहा है कि सिर्फ़ हिन्दु ही मुसलमानों पर हमला कर रहें हैं?ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं,जो इंटरनेट पर मौजूद है।जिसको किसी धर्म के ख़िलाफ़ धारणा तैयार करने से पहले ज़रूर देखिए।किसी भी तरह के हिंसा का कोई समर्थन नही करता है,चाहे वो गाय को लेकर हो या किसी अन्य कारण से।
                                   एक भीड़ जो हत्या करती है,दूसरी भीड़ जो हत्यारे भीड़ के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती।हत्यारे भीड़ के ख़िलाफ़ 28 जून को #Notinmyname अभियान के तहत देशभर के लोग सड़क पर निकले थे।जिनका कहना था कि सरकार भीड़ द्वारा की जा रही हिंसा के ख़िलाफ़ स़ख्त कार्रवाई करे।इस प्रदर्शन में ऐसा नही था कि किसी एक ख़ास धर्म या जाति के थे।
                                   एक बात जो मुझे बहुत दुखी करती है वो ये है कि जब भी कोई घटना घटती है तो फेंक यूनिवर्सिटी के कुछ लोग सक्रिय हो जाते हैं और हिन्दू-मुसलमान करने लगते हैं।एक दूसरे के प्रति नफ़रत फ़ैलाने वाले मैसेजेस भेजने लगते हैं।ऐसे लोगों से मेरी गुज़ारिश है कि आप ऐसा ना करें।आपने जो पढ़ाई के दरमयान'सर्व धर्म सम्भाव, जियो और जिने दो,हमें एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए,मनुष्य एक सामाजिक प्राणि है'जैसे वाक्यों को राजनीति से प्रेरित होकर क्यों महत्वहीन बना रहे हो?

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

सलीम शेख को मेरा भी सलाम!

दफ़्तर से घर को लौट रहा हूं,मेरे ऊपर उदासी का पहरा है।कुछ लिख़ने का तो मन नही कर रहा है,फ़िर भी लिख़ रहा हूं,वो इस ख़्याल में की आपके साथ अपनी वेदना को साझा कर रहा हूं।
बीती रात तकरीबन 08:30 बजे अमरनाथ यात्रियों पर अन्नतनाग में हुए आतंकी हमले के बारे में तकरीबन हर पहलूओं की ज़ानकारी मिल ही गई होगी।क्योंकि टीवी पर सुबह से ही इस ख़बर के हर एक पहलू पर बात हुई है।बस चालक सलीम शेख की वीरतापूर्ण कर्तव्य निवाह को देखते हुए कई लोग दो समुदायों की सौहार्दता का मिशाल दे रहें हैं,तो कई लोग उनकी वीरता को सलाम कर रहें,लेकिन कुछ लोग इन सब बातों से इनकार कर रहें हैं।इनकार करने वाले तर्क दे रहें हैं कि सलीम ने अपनी जान बचाने के लिए गाड़ी को तेज़ी से भगाई।इन सब बातों से इतर हिन्दुस्तान के लोग सलीम समेत उनके परिवार में और  खुशियां आए,इसकी बात कर रहें हैं। इसी ख़बर से जुड़ी कुछ बातें मैं आपसे साझा कर रहा हूँ,जो इस प्रकार है-
👉अमरनाथ यात्रा को लेकर हमेशा सरकारें कई तरह के सुरक्षा इन्तजामात करती है।जैसे कि सेना के अलावा इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज की भी मदद लेती है।इस बार तो ड्रोन कैमरे से भी निगरानी हो रही थी।फ़िर ये इतना बड़ा हादसा कैसे हो गया?
👉मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक़ आईबी ने कम से कम 50 बार ,जिस गाड़ी पर उसकी सूचना दी गई।और आगे भी आतंकी हमले की आशंका जताई जा रही है।
👉जिस गाड़ी पर हमला हुआ उसके चालक सलीम शेख को वीरता पुरस्कार से नवाज़ने के लिए,गुजरात के सीएम विजय रूपानी केन्द्र सरकार से सिफ़ारिश करने की बात कही।
👉बकौल सलीम,बाबा बर्फ़ानी के दर्शन करने जाते वक़्त कोई तकलीफ़ नही हुई।दर्शन बहुत अच्छे से हुए।लौटते वक्त ऐसा हादसा हो गया।लेकिन बाबा और मालिक ने हिम्मत दी तो निकल गए। हमले से लेकर अस्पताल तक तो मिलट्री वालों ने बहुत सहयोग किया।लेटकर गाड़ी चलाना आसान नही था,लेकिन बाबा की कृपा और  मालिक ने बहुत हिम्मत दिया।पुरस्कार वगैरह की बात तो फ़िलहाल नही कर सकता,क्योंकि मेरे सामने सिर्फ़ अभी वही नज़ारा है।मेरे यात्रियों को मारने वालों को जब सेना मारेगी ना,तब खाना अन्दर जाएगा और दिल को तसल्ली होगी।
👉बकौल सलीम की पत्नी, उनके बेटे के कान की कॉपरेशन हुई है,जिसकी वज़ह से वो सलीम को बार-बार जाने से रोकता रहा।हमलोगों ने भी कई बार रोका ।लेकिन वो(सलीम) ये बात बोले कि 'सवारी लोग ना जाने को बोल रहा है, वो लोग(यात्री) मेरे बिना नही जाएगा।इसलिए मुझे जाना पड़ेगा।' सलीम पिछले 8 साल से उनलोगों को बाबा बर्फ़ानी के दर्शन के लिए ले जाता है।
👉बकौल सलीम की मां,ख़ुदा ने हमें एक साथ बनाया है और एक साथ रहने के लिए बनाया, फ़िर ऐसा क्यों करतें हैं।एक साथ रहो ना मिलजुल कर।
                                 बहरहाल इस हमले को लेकर कई सवाल हैं,जिसका ज़वाब बीतते वक़्त के साथ मिलता रहेगा,तो कुछ सवालों का नही भी मिलेगा।
मेरी पीड़ा ये है कि एक पत्रकार जो अमरनाथ यात्रा की तैयारियों को लेकर कई ख़बरों को लिखता होगा,तमाम तैयारियों के बारे में जैसे श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए फ़लां ज़गह इतने,फ़लां ज़गह इतने जवान तैनात किए गये हैं।फ़लां ज़गह ड्रोन और फ़लां इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज़ से सुरक्षा के कड़े इन्तजामात किए जा रहें हैं।सुरक्षा के इतने इन्तजामात के बारे में सुन-सुनकर एक तरीके वो किसी भी ख़तरे की आशंका से बाहर निकल जाता होगा,और जब वो अचानक इस तरीके की दिल दहलाने वाली घटना के बारे में सुनता होगा,तो उसपे क्या बीतती होगी?

बुधवार, 24 मई 2017

हमले की निन्दा महज औपचारिकता सी लगती है!

कल सुबह जैसे ही दफ़्तर पहुंचा, चैनल में लगे बड़े-बड़े टीवी स्क्रीनों पर,मैनचेस्टर एरीना में हुए आत्मघाती हमले में बेतहाशा इधर-उधर भागते छोटे-2 बच्चे,बड़े-बुजुर्गों की तस्वीरें और आपातकालीन वाहनों की शायरन ने मुझे सकते में डाल दिया।मन ही मन हमले में ज़्यादा क्षति ना हुई हो,को सोचते हुए आगे बढ़ा।बीतते समय के साथ हमले से जुड़ी जानकारियां सामने आने लगी।
टीवी रिपोर्ट के मुताबिक मैनचेस्टर एरीना में एक कनसर्ट में अमेरिकी पॉप सिंगर और धारावाहिक की कलाकार एरीयाना ग्रांडे के कार्यक्रम में हुए 2 आत्मघाती हमले में करीब 22 लोग मारे गये और 59 लोग ज़ख्मी हुए।
हमले को ब्रिटिश पीएम थेरेसा मे ने कायरना हरकत बताते हुए कहा कि गम्भीर ख़तरा बना हुआ है और आतंकवादी हमले की सम्भावना बनी हुई है।
हमले को लेकर हमारे देश के भी पीएम नरेन्द्र मोदी ने ट्वीट कर 'निन्दा और सम्वेदना' वाली रश्म अदा की।वैसे पीएम के इस ट्वीट के बाद,कई लोगों ने पीएम से झारखंड में कथित बच्चा चोरों को पुलिस के सामने पीट-पीटकर मार देने पर सवाल पूछा।
जब से होश सम्भाला हूं,एक ही बात सुनता आ रहा हूं कि आतंकवाद की समस्या से कई देश जूझ रहें हैं।इस समस्या से निपटने के लिए विश्व के शक्तिशाली देशों को एक साथ आने में क्या समस्या है?जिस तरीक़े से अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर एकजुटता की बात करते हैं,वैसे ही आतंकवादीयों को संरक्षण देने वाले देशों को सबक सिखाने में क्यों नही जुट जाते हैं?अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर 'आतंकवाद से निपटने के लिए एक साथ आना होगा' वाली बात औपचारिकता भर रह जाती है और जब भी कही हमला होता है सब ट्वीट के माध्यम से ज़िम्मेदारी निभा देते है।
बीते 21 मई को रियाद में दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने पहले विदेश यात्रा में,पाकिस्तान समेत 40 मुस्लिम देशों के प्रमुख के सामने कहा कि अपनी ज़मीन पर आतंकवाद को बढ़ावा ना दें।हम चाहते हैं कि मुस्लमान भी आपस मिलकर रहें।ट्रम्प का ये बयान उनकी छवि के उलट शान्ति का पैगाम माना चाहिए।

शुक्रवार, 5 मई 2017

भारतीय पत्रकारिता की रैंकिंग अच्छी नही है!

जहां भी स्वेच्छाधारी ताकतवर मॉडल की जीत हुई है,वहां मीडिया की आज़ादी घटी है।ऐसी जगहों पर पब्लिक रेडियो और टीवी स्टेशन प्रोपेगेण्डा के औज़ार बने।
यह कथन रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर संस्थान के महासचिव क्रिसटोफ़र डिलॉयर की है।इस संस्थान के एक रिपोर्ट ने हर साल की भांति इस साल भी विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर भारत समेत दुनिया के कई देशों में पत्रकारिता की गिरती साख के बारे में बताया है।रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर180 देशों की अन्तर्राष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन है,जो सूचना और पत्रकारिता के आज़ादी की वकालत करता है और प्रोत्साहित भी करता है।इसकी स्थापना रॉबर्ड मेनार्ड ने 1985 में की।इसका मुख्यालय पेरिस में है।
1993 से हर साल 3 मई को UNESCO द्वारा विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर अलग देशों में कार्यक्रम आयोजित किया जाता है,जिसमें मीडिया की अच्छाई और बुराइयों पर मंथन होता है।इस बार 1-4 मई को इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित किया गया था।इस बार का थीम- “critical minds for critical times:media’s role in advancing peaceful,just and inclusive societies.”था।भारत में अभी तक एक बार भी आयोजित नही किया गया है।
विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर ने शीर्षक मोदी के राष्ट्रवाद से ख़तरा नाम से एक रिपोर्ट ज़ारी कर कहा हैभारत में प्रेस की स्वतंत्रता को मोदी के राष्ट्रवाद से ख़तरा है और मीडिया डर की वज़ह से ख़बरे नही छाप रही है।भारतीय मीडिया में सेल्फ़ सेंसरशिप बढ़ रही है और पत्रकार कट्टर राष्ट्रवादियों द्वारा चलाये जा रहे अभियानों का शिकार बन रहें हैं।यहां ना उन्हे केवल गालियों का सामना करना पड़ता है,बल्कि शारीरिक हिंसा की धमकियां भी मिलती रहती है।कई बार सरकार के प्रति ज़्यादा आलोचनात्मक रवैया रखने वाले पत्रकारों को चुप कराने के लिए आईपीसी की धारा 124ए का भी इस्तेमाल किया जाता है,जिसके तहत राजद्रोह के लिए उम्रकैद की सज़ा तक दी जाती है।हालांकि अब तक किसी भी पत्रकार को राजद्रोह का दोषी नही ठहराया नही गया है,पर इससे सेल्फ़ सेंसरशिप को तो बढ़ावा मिल रहा है।वहीं सरकार ने विदेश से मिलने वाली फ़ंडिग के नियम कड़े किए हैं,ताकि वैश्विक स्तर पर भारतीय मीडिया को कम से कम प्रभावित किया जा सके।कश्मीर जैसे क्षेत्र जिन्हे प्रशासन संवेदनशील समझता है,वहां की कवरेज करना आज भी मुश्किल है।यहां पत्रकारों की सुरक्षा का कोई इन्तज़ाम नही है।जुलाई 2016 में कश्मीर में शुरु हुए विरोध प्रदर्शन के पहले दिन ही सेना द्वारा यहां इंटरनेट सेवा बन्द कर दी गई।यहां अक्सर इंटरनेट पर लगाम लगाया जाता है ताकि प्रर्दशनकारी आपस में बातचीत ना कर सके।ऐसा इसलिए भी किया जाता है ताकि मीडिया,स्थानीय पत्रकारों और सिटीजन जर्नलिस्ट आदि को रिपोर्ट से रोका जा सके।,स्थानीय मीडिया संस्थानों के लिए काम कर रहे पत्रकार अक्सर सैनिकों के शिकार बनते हैं,जिसके लिए उन्हें केन्द्र सरकार की मौन सहमति मिली रहती है। रिपोर्ट के इन सब बातों से आप कितने सहमत-असहमत हैं आप पर छोड़ते हुए आगे बढ़ता हूं। इस बार प्रेस की स्वतंत्रता और निर्भिक पत्रकारिता के हिसाब से 180 देशों में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत का स्थान 136वां है तो वहीं सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका का स्थान 43 वां।प्रथम.द्वतिय और तृतीय स्थान पर क्रमश: नॉर्वे,स्वीडन और फिनलैण्ड है।जहां ना तो मोदी है और ना ही ट्रम्प। पिछले साल के मुकाबले भारत की रैंकिग में 3 पायदान की गिरावट आई है।नरेन्द्र मोदी जब मई 2014 में प्रधानमंत्री बने तो भारत 140वें नम्बर था।उसके बाद 2015 में 136 और 2016 में 133वें नम्बर पर था।2010 में भारत इस सूची में 122वें नम्बर था और तब यूपीए सरकार सत्ता में थी।इसके बाद भारत 2014 तक 140वें नम्बर पर रहा।
16 नवम्बर 2016 को राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस के 50वें सालगिरह पर दिल्ली के विज्ञान भवन में पीएम मोदी ने पत्रकारिता की गिरती साख और चुनौतियों पर अपनी विचार को रखते हुए,पत्रकारिता जगत को एक समाज बताया और कहा कि पत्रकारिता की खामियों को दूर करने के लिए इस परिवार के मुखियाओं को एक साथ बैठ कर विचार करना चाहिए।प्रधानमंत्री की ये बात 100% दुरुस्त लगी।लेकिन आजकल के सनसनी पत्रकारिता और TRP के खेल में ऐसा सम्भव हो पाएगा?ये भी एक बड़ा सवाल है। आगे उन्होंने महात्मा गांधी के कथन अनियंत्रित लेखनी बहुत संकट पैदा कर सकती है,लेकिन लेखनी पर बाहर का नियंत्रण तो तबाह कर देगा का उदाहरण देते हुए कहा कि सरकारों को तो पत्रकारिता में ज़रा भी हस्तक्षेप नही करना चाहिए।ग़लतियों के आधार मीडिया का मूल्यांकन करना उचित नही होगा।पीएम मोदी की ये बात भी सही है।लेकिन सवाल ये है कि पत्रकारिता को लेकर इतना नेक इरादा रखने के बाद भी भारतीय पत्रकारिता की स्थिती इतनी ख़राब क्यों हैं?बहरहाल 3 मई को यानि विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के दिन पीएम मोदी ने ट्वीट किया हम स्वतंत्र और बहुमुखी पत्रकारिता का दृढ़ समर्थन करते हैं।यह लोकतंत्र के लिए ज़रुरी है। सोशल मीडिया के दौर में त्योहारों,जन्मदिन और गाहे-बगाहे ट्वीट करने वाले,केन्द्र से लेकर राज्य के मंत्रियों की ख़ामोशी बता रही है कि ये प्रेस की स्वतंत्रता का कितना समर्थन करते है।ख़ैर पीएम का ही एकमात्र ट्वीट उन पत्रकारों को हमेशा ऊर्जा देती रहेगी,जो सोशल मीडिया पर सत्ताधारी पक्ष के गुण्डों का सामना करते हुए लोगों के हित में सरकार से सवाल करते हैं।ये बात किसी से छिपी नही है कि ये गाली-दस्ता राष्ट्रवाद के नाम पर प्रश्नवाद को बेकार बताते हैं।सरकार से सवाल पुछने वाले पत्रकारों को सोशल मीडिया पर तरह-तरह की गालियां देते हैं।इन गाली-दस्तों को ख़ुद से सवाल पूछना चाहिए कि वो पत्रकारों के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करके क्या हासिल कर पाते हैं?ये बात सही है कि पेशेवेर दौर में पत्रकारिता में बहुत सारी खामिया हैं,लेकिन क्या उसका इलाज़ गाली है?पत्रकार को लोकतंत्र का प्रहरी माना जाता है।सरकार और उनके समर्थकों को ये समझना पड़ेगा कि जो पत्रकार सरकार की ख़ामियों को उज़ागर करता है,इसका मतलब ये नही होता है कि वह सरकार विरोधी होता है बल्किवो तो सरकार कमियों को उज़ागर करके उसे और मज़बूत बनने का मौका देता है।मीडिया और सरकार दोनो की ज़िम्मेदारी होती है कि मिलकर काम करते हुए,देश को विकास के पथ पर अग्रसर करे। ऐसे में क्या आपने कभी ख़ुद से सवाल पूछा है कि अगर आप ऐसे ही पत्रकारों को गाली देंगे तो पत्रकारिता की आनेवाली पीढ़ी पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

अन्त में, विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस इसलिए भी ज़्यादा महत्वपुर्ण है कि इस दिन सरकारों को मीडिया की स्वतंत्रता को याद दिलाता है और साथ उन पत्रकारों की शहादत को याद किया जाता है जो अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए जान गंवा दिए हैं।

भारत की राज-व्यवस्था

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