चुनाव लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
चुनाव लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 30 जुलाई 2018

अलग-अलग राग से बन पाएगी विपक्षी एकता?


आगामी लोकसभा चुनाव में अब कुछ हीं महीनें बाकी है। लिहाज़ा सभी दलों ने अपनी तैयारी शुरू कर दी है। मार्च 2019 तक पीएम मोदी क़रीब 50 रैलियां करेंगे, ऐसी सूचना है। एनडीए और यूपीए, दोनों की तरफ़ से जमकर एक-दूसरे की पर मौखिक हमले हो रहें है। इन हमलों में मुख्य भूमिका में भाजपा और कांग्रेस है। कांग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार ने कोई काम नहीं किया, वहीं भाजपा का कहना है कि हमने देश की सत्ता बिल्कुल बदहाल स्थिति में सम्भाली थी, जिसके बावज़ूद भी कई बेहतरीन काम किये हैं। चुनावी साल में काम ना करने और काम करने की शोर के अलावा कई और शोर है, जो इस बात की तरफ़ इशारा कर रही है कि यदि यही स्थिति रही तो आकांक्षाओं में डूबी विपक्षी दलें,  मोदी सरकार को चुनौती देने में नाकामयाब साबित होगी।  कांग्रेस इस वक़्त अपने चुनावी इतिहास में सबसे कमज़ोर स्थिति में है। केन्द्र और राज्य दोनों जगह ऐसी स्थिति में नहीं है जिसके बदौलत अपने दम पर मोदी सरकार को चुनौती दे सके। राजग सरकार को चुनौती देने के लिए केन्द्र में कांग्रेस ख़ुद को बड़ा भाई मानते हुए, क्षेत्रिय दलों से एक जुट होनी की बात कर रही है। लेकिन ख़ुद की सियासी ज़मीन वाली मुख्य क्षेत्रीय दलों के बयानों से पता चल रहा है कि आम चुनाव के नतीज़े से पहले एकजुट होना नहीं चाहते हैं। क्या इसकी वजह कांग्रेस की स्थिति या सबके पीएम बनने की लालसा को माना जा सकता है? सियासत ‘सूत्रों के हवाले’ से तब तक होती है,जबतक उस बात की अधिकारिक पुष्टि या खंडन नहीं होता है। ऐसा हीं कुछ हुआ था, जब राहुल गांधी ने महिला पत्रकारों से मुलाक़ात की थी। ख़बर आई कि राहुल ने उनके अलावा किसी महिला को प्रधानमंत्री बनाने पर हामी भर दी है। लेकिन कांग्रेस की तरफ़ से अभी तक इस बात की पुष्टि नहीं हुई है। कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में बाद मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा था कि “ कांग्रेस का निर्णय सटीक, सपाट और स्पष्ट  है। राहुल गांधी हमारा चेहरा हैं। 2019 के चुनाव में हम उनके हीं नेतृत्व में जनता के बीच जाएंगे।” अब सवाल है कि जब कांग्रेस राहुल गांधी को पीएम का चेहरा बनाकर जनता के बीच जाने की बात कर रही है, तो वो कौन-कौन सी विपक्षी पार्टियां होगी, जो राहुल के नेतृत्व में चुनाव लड़ेंगी? शायद ये आने वाले वक़्त में पता चल पाएगा। फ़िलहाल तीन मुख्य विपक्षी पार्टियों के बयान से साफ़ है कि वो चुनाव से पहले गठबंधन के लिए तैयार नहीं है। 
सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने पहले हीं स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव बाद गठबंधन का नेता तय होगा। सपा के नेता कह रहें हैं कि गठबंधन बनने से पहले कांग्रेस कैसे पीएम उम्मीदवार की दावेदारी कर सकती है? 
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने पार्टी के शहीदी दिवस पर कह दिया है कि 2019 का लोकसभा चुनाव बंगाल में अकेले लड़ेगी। 
बसपा प्रमुख मायावती ने तो कह दिया है कि उनकी पार्टी तब हीं गठबंधन में चुनाव लड़ेगी,जब सम्मानजनक सीटें मिलेंगी। ऐसे में मायावती के लिए सम्मानजनक सीट का मतलब कितना है,ये अभी साफ़ नही है।
एनसीपी ने अभी तक साफ़ नहीं किया है कि आम चुनाव से पहले गठबंधन पर उसकी क्या राय है। लेकिन वो इस बात से सहमत है कि जो सबसे बड़ी पार्टी होगी, उसका नेता पीएम बनेगा। एक नीजि चैनल से बातचीत में तारिक अनवर ने 2004 का हवाला देते हुए कहा है कि लोकतंत्र का तकाज़ा है कि जो सबसे बड़ी पार्टी होगी,नेतृत्व उसी को देना होगा।
जेडीएस और राजद की मिलीजुली राय है। दोनों को कांग्रेस के नेतृत्व में चुनाव लड़ने में कोई समस्या नहीं है। लेकिन तेजस्वी ने एक शर्त रखी है। तेजस्वी का कहना कि जो संविधान बचाएगा,उसका समर्थन करेंगे। तेजस्वी की ये शर्त बताती है कि लोकतंत्र को लेकर उनकी समझ स्पष्ट नहीं है। तेजस्वी को जिस कांग्रेस के नेतृत्व में चुनाव लड़ने में कोई परेशानी नहीं है, वही कांग्रेस ने सत्ता के लिए संविधान को रद्दी किताब का टुकड़ा बना दिया था। ख़ैर संविधान को ख़तरे में बताना ये सियासी हथकंठा हो गया है।

मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

अब कर्नाटक के सियासत में महंथों की दस्तक!

अगले महीने होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव में सियासत कर वो रंग अब खुलकर सामने लगा है,जो इससे पहले यहां की सियासत में कभी दिखाई नहीं दिया।विकास के भरोसे राजनीति करने का दम्भ भरने वाली दो बड़ी पार्टियां भगवा के भरोसे अपनी सियासी नैया पार कराने में जुट गई है।भाजपा और कांग्रेस के नेताओं की सियासी दौड़ जारी है। मठ,मन्दिर और दरगाह सियासत का केन्द्र बन गए हैं।क़ानून की दुहाई देने वाले दोनों बड़ी पार्टी के अध्यक्षों की लगातार धार्मिक स्थानों पर दौरे की ख़बरें आ रही हैं,जो संवैधानिक रूप से ग़लत है।आनेवाले समय में लोकतंत्र के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को चुनाव आयोग कितना अक्षुण्ण रख पाएगी ये तो आनेवाला वक़्त ही बताएगा।जनप्रतिनिधित्व क़ानून 1951 की धारा 13(3) साफ़ कहती है कि कोई भी उम्मीदवार या उसका एजेंट धर्म,जाति,समुदाय या भाषा के आधार पर वोट नहीं मांग सकता।
इन नेताओं के दौरे के बीच,भाषाई भिन्नता होने के कारण बोलते वक़्त में होने वाली गड़बड़िया एक-दूसरे पर हमलावर होेने का मौका दे रही हैं,तो वहीं जनता के लिए हास्य का विषय।लेकिन इन सब के बीच अचानक से एक साथ चार महतों की यहां के सियासत में एंट्री,बीजेपी के लिए कम लेकिन कांग्रेस के लिए ज़्यादा परेशानी का सबब बनता दिखाई दे रहा है।उडुपी से लक्ष्मीवारा तीर्था स्वामी,धारवाड़ से बासवानन्दा स्वामी, मेंगलुरू से राजशेखरनन्दा स्वामी और चित्रदुर्ग से मद्रचेन्नया स्वामी बीजेपी के टिकट से चुनाव लड़ना चाहते हैं। दिलचस्प बात ये है कि इन चारों के निशाने पर कांग्रेस हैं।हालांकि मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी ने इन सबको टिकट देने को लेकर कोई वादा नहीं किया।ये लोग हमेशा से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के काम और नीतियों की भी तारीफ़ करते रहे हैं।इन चारों के अलावा कई और साधु-संतों के भी चुनाव लड़ने के संकेत मिल रहे हैं।साधु-संत भी अब इस बात को समझने लगें हैं जब राजनीति 'धर्म' के इर्द-गिर्द घुमने लगी है तो सियासी इस्तेमाल होने से अच्छा है,ख़ुद क्यों ना नेता बन जाए।इसलिए इतनी बड़ी संख्या में साधु-संतों ने दिलचस्पी दिखाई है।
उडुपी के आठ प्राचीन श्रीकृष्ण मठों में एक शिरूर मठ के मठाधीश लक्ष्मीवारा तीर्था स्वामी ने यहां तक कह दिया है कि उन्हें टिकट नहीं मिलता है तो निर्दलीय भी लड़ सकते हैं।स्वामी के ऐलान ने राजनेताओं की नीन्द उड़ा दी  है।भाजपा के पूर्व विधायक रघुपति भट के अलावा कई नेता उनका विरोध भी कर रहें है।स्वामी की राजनीति में आने से भक्त खुश हैं।स्वामीजी का कहना है कि वह हिन्दू के पक्षधर हैं।इसका मतलब ये नहीं है कि वहां के ईसाई और मुसलमान मेरी इज्ज़त नहीं करते।सब मुझे बहुत सम्मान देते हैं.जिसकी वजह से मैं लोगों का सेवा करना चाहता हूं।ख़ास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की जिनके पास विकास की रौशनी तक अभी भी पहुंचना बाकी है।
व्रजदेही मठ के राजशेखरनन्दा स्वामी तो छह बार के विधायक और कर्नाटक सरकार में वन मंत्री रमानाथ के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ना चाहते हैं।राजशेखरनन्दा स्वामी बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हैं।इनको भड़काऊ और विवादस्पद भाषण के लिए जाना जाता है।
बात दक्षिण भारत की राजनीति में महंतों की भूमिका की हो रही है तो दक्षिण भारत के ही एक प्रसिद्ध संत की बड़ी दिलचस्प जानकारीआपके साथ साझा कर रहा हूं,जो मुझे शोध के दौरान मिली।ये जानकारी संत माणिक्कवाचकर और आज के साधु-संतो की सियासी सोच में कितना फ़र्क है ये बतायेगा।नौवीं सदी में द.भारत के प्रसिद्ध संत माणिक्कवाचकर पांड्य राजवंश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे।उनमें जब आध्यात्मिकता जगी,तो उन्होंने सबसे पहले प्रधानमंत्री पद का त्याग किया और लिखा-'कटारैयान वेंडेन करपडम इनियुम।'यानि इससे आगे वो चतुर या राजनीतिज्ञों का साथ नहीं चाहते हैं।उनका मानना था कि राजसत्ता और राजनीति के लिए जिस चतुराई की ज़रुरत होती है,वह अध्यामिकता की दुश्मन होती है।आध्यात्मिक साधक की सेवा-भावना को नष्ट करने के लिए सत्ता से जुड़ा ऐश्वर्य और अहंकार पर्याप्त होता है।इसलिए सच्चे संतों और समाज सेवियों ने स्वयं को सत्ता से दूर रखा है। 

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...