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बुधवार, 27 मई 2020

पंडित जवाहरलाल नेहरू का समाजवाद पर नज़रिया-

आज पूरा देश आधुनिक भारत के प्रणेता कहे जाने वाले पहले प्रधानमंत्री को याद कर रहा है। इसी क्रम में समाजवाद पर नेहरू जी के नज़रिए को आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मैं भारत के पहले वज़ीर-ए-आज़म को अलग-अलग माध्यमों से जानने की कोशिश करता हूँ। इसी क्रम में कुछ दिनों पहले मैंने लेखक हंसराज रहबर की लिखी किताब ' नेहरू बे-नक़ाब' पढ़ी। आइए जानते हैं कि पंडित जी का समाजवाद पर क्या नज़रिया था। पंडित जी समाजवाद के बारे में क्या सोचते थें। किताब में लिखा है- 

जवाहरलाल ने करंजिया के साथ अपनी भेंट में कहा था, " मैं समाजवाद में पिछले पचास वर्षों से विश्वास करता आ रहा हूँ और उसमें विश्वास करता तथा उसके लिए काम करता रहूँगा।" ( द माइंड ऑफ़ मिस्टर नेहरू)

लेकिन उनके इस विश्वास का दार्शनिक आधार क्या था? और उनके दिमाग़ में समाजवाद की धारणा क्या थी? 15 अगस्त 1958 को नेहरू जी ने अपने 'मूलभूत दृष्टिकोण' निबंध में लिखा था," लेकिन, समाजवाद क्या है? इसका कोई ठीक उत्तर देना कठिन है और समाजवाद की अनेक परिभाषाएं हैं। कुछ लोग शायद अस्पष्ट ढंग से सिर्फ़ यह सोचते हैं कि वह कोई अच्छी चीज़ है और उसका मक़सद समानता स्थापित करना है। पर यह सोच हमें किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचाती है।" जब पंडित नेहरू के पास जब कोई ठोस उत्तर नहीं और उनके दिमाग़ में समाजवाद की कोई निश्चित परिभाषा ही नहीं तो उनका विश्वास कैसे बना? और उन्होंने किस समाजवाद के लिए क्या काम किया? इस सिलसिले में स्पष्ट बात उन्होंने सिर्फ़ इतनी ही कही है कि, " समाजवाद बुनियादी तौर पर पूंजीवाद से भिन्न मार्ग है तथापि ख़याल है कि दोनों का बड़ा अन्तर ख़त्म होता जा रहा है क्योंकि समाजवाद के बहुत से विचार धीरे-धीरे पूंजीवादी व्यवस्था का अंग बनते जा रहे हैं।" मतलब समाजवाद के विचार अपना लेने से ख़ुद पूंजीवाद के समाजवाद में बदल जाने की सम्भावना है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू समाजवाद पर मार्क्स के वैज्ञानिक परिभाषा को स्वीकार नहीं करते थें,क्योंकि उनके अनुसार कम्युनिज्म मनुष्य की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है। कम्युनिज्म में व्यक्ति को समाज पर क़ुर्बान किया जाता है। इससे भी ज़्यादा नेहरू को कम्युनिज्म से इस बात से ऐतराज़ था कि कम्युनिज्म का ताल्लुक़ हिंसा से है जो गांधी के शान्तिपूर्ण और अहिंसात्मक मार्ग से बिल्कुल विपरीत है।

(नोट- मैं नेहरूवियन नहीं हूँ। मैं नेहरू जी को जानने की कोशिश कर रहा हूँ। इसलिए मैं दावे के साथ नहीं कह रहा हूँ कि मैंने जो आपके साथ साझा किया है, वही अन्तिम सत्य है। इसलिए किसी पाठक के पास नेहरू जी का समाजवाद के प्रति इससे इतर भी नज़रिया था,तो कृपया साझा करें ताकि मैं भी जान सकूँ)

शनिवार, 14 जुलाई 2018

इतिहास से लेकर वर्तमान में फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट की हालत!

देश में जब भी कोई बेटी या महिला दरिन्दगी की शिकार होती है तो समाज से एक आवाज़ आती है 'मामले की सुनवाई फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में हो।' समाज के भीतर से आती इस आवाज़ का एक हीं मक़सद होता है, आरोपी को जल्दी से जल्दी फ़ासी की सज़ा हो। इस सुर से सरकारें भी अपना सुर मिला देतीं हैं, क्योंकि मामला बलात्कार का होता है।
'द हिन्दू' के मुताबिक, 11वें वित्त आयोग की सिफ़ारिश पर 1 अप्रैल 2001 में देश के सबसे पहले फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट(एफ़टीसी) की शुरूआत हैदराबाद के सिटी सिविल कोर्ट से हुई थी। इस कोर्ट का उद्घाटन सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीएन किरपाल ने किया था। उद्घाटन भाषण में जस्टिस बीएन किरपाल ने न्यायिक प्रक्रिया में लेट-लतीफ़ी लेकर जो उस वक़्त कहा था वो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस वक़्त था। जस्टिस किरपाल ने कहा था ''We are still in the bullock cart age as far as court procedures are concerned.'' मतलब कहने का आशय है कि जहां तक कोर्ट के कार्यप्रणाली के सम्बन्ध में बात करें तो हमारी स्थिति उसी दौर जैसी है जब बैलगाड़ी हुआ करती थी। आगे उन्होंने कोर्ट को सूचना प्रौद्योगिकी से जोड़ने की भी बात कही थी। जैसे वीडियो कांन्फ्रेंसिग के ज़रिए गवाही वगैरह-वगैरह। एफ़टीसी का गठन ज़िला स्तर पर होता है।
11वें वित्त आयोग की सिफ़ारिश पर 509.90 करोड़ की लागत से 1734 एफ़टीसी बनाए जाने थें। लेकिन 31 मार्च 2005 तक मात्र 1562 एफ़टीसी हीं कार्यरत थें। पांच साल के लिए बनाए गए इस कोर्ट का मक़सद ज़िला न्यायालयों में विचारधीन क़ैदियों और लम्बे समय से लम्बित पडे़ मुक़दमों का निपटारा करना था। उम्मीद जताई गई थी कि महीनेभर में एक कोर्ट 14 मुक़दमों का निपटारा करेगा। मार्च 2005 से मार्च 2010 तक के लिए फिर से इस कोर्ट के कार्यावधि को बढ़ा दिया गया। मार्च 2010 के बाद से फ़िर से एक साल के लिए इस कोर्ट के कार्यावधि को बढ़ा दिया गया। मार्च 2011 आते-आते मात्र 1192 एफ़टीसी कार्यरत रह गए थें। केन्द्र सरकार ने वित्तीय सहायता प्रदान करना बन्द कर दिया। लेकिन कुछ राज्य सरकारों ने अपने ख़र्च से चालू रखा।
साल 2012 में 16 दिसम्बर की आधी रात को दिल्ली की सड़क पर निर्भया जब दरिन्दों का शिकार बनी तो एक बार फिर से एफ़टीसी की मांग ज़ोर-शोर से उठी। तब से लेकर अब तक बलात्कार के मामले में एफ़टीसी में सुनवाई की मांग होती है, ताकि जल्दी से जल्दी दोषी को फ़ांसी की सज़ा हो जाए। लेकिन भारतीय क़ानून में ऐसा सम्भव नहीं है। यदि एफ़टीसी फ़ांसी की सज़ा सुना भी देता है तो आरोपी के पास हाईकोर्ट, हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी, राष्ट्रपति के पास आरोपी दया याचिका दायर कर सकता है । उदाहरण के लिए निर्भया बलात्कार काण्ड को ले लेते हैं। सभी 6 आरोपियों का मामला एफ़टीसी में चला। सुनवाई के दौरान हीं एक आरोपी ने तिहाड़ जेल में खुदकुशी कर ली। 13 सितम्बर 2013 को चार दोषियों को फ़ासी की सज़ा सुनाई और नाबालिग को तीन साल की अधिकतम सज़ा सुनाकर सुधार केन्द्र में भेज दिया।नाबालिग अपनी सज़ा पूरी करके आज़ाद हो गया। 13 मार्च 2014 को दिल्ली हाईकोर्ट ने भी फ़ासी की सज़ा को बरकरार रखा। 5 मई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुनाते हुए दोषियों की मौत की सज़ा को बरकरार रखा। 9 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने तीन आरोपियों की पुर्नविचार याचिका को ख़ारिज कर दिया। हालांकि अब भी इन दोषियों के पास फ़ासी से पहले राष्ट्रपति के सामने दया याचिका कर सकते हैं। तो देखा आपने! इतने साल बाद भी निर्भया के आरोपी को फ़ासी की सज़ा नहीं मिली है।
इसी केस में एक दूसरा पहलु ये भी है कि कुछ लोग फ़ांसी की सज़ा का विरोध भी कर रहें हैं। उनका कहना है कि 115 देशों ने मौत की सज़ा को ख़त्म कर दिया है।सभ्य समाज में इसका कोई स्थान नहीं है। फ़ांसी देकर अपराधी को ख़त्म किया जा सकता है अपराध को नहीं। मौत की सज़ा जीने के अधिकार को छीन लेती है। ये दुर्लभतम से दुर्लभ अपराध की श्रेणी में नहीं आता।
14वें वित्त आयोग की सिफ़ारिश पर साल 2020 तक के लिए क़रीब 4100 करोड़ की लागत से 1800 एफ़टीसी बनाने का फ़ैसला लिया गया है।  30 जून 2018 की 'द प्रिन्ट' की रिपोर्ट है, जिसमें लिखा है कि अभी भी 60% एफ़टीसी का गठन होना बाकी है।कम से कम 15 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों मे एक भी एफ़टीसी नहीं है।महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराध में जिन 10 शीर्ष राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों का नाम है,वहां बलात्कार जैसे मामलों की सुनावाई के लिए एक भी एफ़टीसी  नहीं है।यहां तक दिल्ली जो महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध में शीर्ष पर है, में मात्र 14 एफ़टीसी है। जबकि साल 2015 में केन्द्र सरकार के एक ज्ञापन के अनुसार 63 एफ़टीसी होना चाहिए। न्याय विभाग के अनुसार आधारभूत संरचना, ज़रूरी सामान और योग्य न्यायाधीश के बिना  देशभर के एफ़टीसी में 6.5 लाख मुक़दमे विचाराधीन है,जिसमें से 1500 सिर्फ़ दिल्ली के हैं।

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...