अगले महीने होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव में सियासत कर वो रंग अब खुलकर सामने लगा है,जो इससे पहले यहां की सियासत में कभी दिखाई नहीं दिया।विकास के भरोसे राजनीति करने का दम्भ भरने वाली दो बड़ी पार्टियां भगवा के भरोसे अपनी सियासी नैया पार कराने में जुट गई है।भाजपा और कांग्रेस के नेताओं की सियासी दौड़ जारी है। मठ,मन्दिर और दरगाह सियासत का केन्द्र बन गए हैं।क़ानून की दुहाई देने वाले दोनों बड़ी पार्टी के अध्यक्षों की लगातार धार्मिक स्थानों पर दौरे की ख़बरें आ रही हैं,जो संवैधानिक रूप से ग़लत है।आनेवाले समय में लोकतंत्र के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को चुनाव आयोग कितना अक्षुण्ण रख पाएगी ये तो आनेवाला वक़्त ही बताएगा।जनप्रतिनिधित्व क़ानून 1951 की धारा 13(3) साफ़ कहती है कि कोई भी उम्मीदवार या उसका एजेंट धर्म,जाति,समुदाय या भाषा के आधार पर वोट नहीं मांग सकता।
इन नेताओं के दौरे के बीच,भाषाई भिन्नता होने के कारण बोलते वक़्त में होने वाली गड़बड़िया एक-दूसरे पर हमलावर होेने का मौका दे रही हैं,तो वहीं जनता के लिए हास्य का विषय।लेकिन इन सब के बीच अचानक से एक साथ चार महतों की यहां के सियासत में एंट्री,बीजेपी के लिए कम लेकिन कांग्रेस के लिए ज़्यादा परेशानी का सबब बनता दिखाई दे रहा है।उडुपी से लक्ष्मीवारा तीर्था स्वामी,धारवाड़ से बासवानन्दा स्वामी, मेंगलुरू से राजशेखरनन्दा स्वामी और चित्रदुर्ग से मद्रचेन्नया स्वामी बीजेपी के टिकट से चुनाव लड़ना चाहते हैं। दिलचस्प बात ये है कि इन चारों के निशाने पर कांग्रेस हैं।हालांकि मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी ने इन सबको टिकट देने को लेकर कोई वादा नहीं किया।ये लोग हमेशा से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के काम और नीतियों की भी तारीफ़ करते रहे हैं।इन चारों के अलावा कई और साधु-संतों के भी चुनाव लड़ने के संकेत मिल रहे हैं।साधु-संत भी अब इस बात को समझने लगें हैं जब राजनीति 'धर्म' के इर्द-गिर्द घुमने लगी है तो सियासी इस्तेमाल होने से अच्छा है,ख़ुद क्यों ना नेता बन जाए।इसलिए इतनी बड़ी संख्या में साधु-संतों ने दिलचस्पी दिखाई है।
उडुपी के आठ प्राचीन श्रीकृष्ण मठों में एक शिरूर मठ के मठाधीश लक्ष्मीवारा तीर्था स्वामी ने यहां तक कह दिया है कि उन्हें टिकट नहीं मिलता है तो निर्दलीय भी लड़ सकते हैं।स्वामी के ऐलान ने राजनेताओं की नीन्द उड़ा दी है।भाजपा के पूर्व विधायक रघुपति भट के अलावा कई नेता उनका विरोध भी कर रहें है।स्वामी की राजनीति में आने से भक्त खुश हैं।स्वामीजी का कहना है कि वह हिन्दू के पक्षधर हैं।इसका मतलब ये नहीं है कि वहां के ईसाई और मुसलमान मेरी इज्ज़त नहीं करते।सब मुझे बहुत सम्मान देते हैं.जिसकी वजह से मैं लोगों का सेवा करना चाहता हूं।ख़ास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की जिनके पास विकास की रौशनी तक अभी भी पहुंचना बाकी है।
व्रजदेही मठ के राजशेखरनन्दा स्वामी तो छह बार के विधायक और कर्नाटक सरकार में वन मंत्री रमानाथ के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ना चाहते हैं।राजशेखरनन्दा स्वामी बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हैं।इनको भड़काऊ और विवादस्पद भाषण के लिए जाना जाता है।
बात दक्षिण भारत की राजनीति में महंतों की भूमिका की हो रही है तो दक्षिण भारत के ही एक प्रसिद्ध संत की बड़ी दिलचस्प जानकारीआपके साथ साझा कर रहा हूं,जो मुझे शोध के दौरान मिली।ये जानकारी संत माणिक्कवाचकर और आज के साधु-संतो की सियासी सोच में कितना फ़र्क है ये बतायेगा।नौवीं सदी में द.भारत के प्रसिद्ध संत माणिक्कवाचकर पांड्य राजवंश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे।उनमें जब आध्यात्मिकता जगी,तो उन्होंने सबसे पहले प्रधानमंत्री पद का त्याग किया और लिखा-'कटारैयान वेंडेन करपडम इनियुम।'यानि इससे आगे वो चतुर या राजनीतिज्ञों का साथ नहीं चाहते हैं।उनका मानना था कि राजसत्ता और राजनीति के लिए जिस चतुराई की ज़रुरत होती है,वह अध्यामिकता की दुश्मन होती है।आध्यात्मिक साधक की सेवा-भावना को नष्ट करने के लिए सत्ता से जुड़ा ऐश्वर्य और अहंकार पर्याप्त होता है।इसलिए सच्चे संतों और समाज सेवियों ने स्वयं को सत्ता से दूर रखा है।
इन नेताओं के दौरे के बीच,भाषाई भिन्नता होने के कारण बोलते वक़्त में होने वाली गड़बड़िया एक-दूसरे पर हमलावर होेने का मौका दे रही हैं,तो वहीं जनता के लिए हास्य का विषय।लेकिन इन सब के बीच अचानक से एक साथ चार महतों की यहां के सियासत में एंट्री,बीजेपी के लिए कम लेकिन कांग्रेस के लिए ज़्यादा परेशानी का सबब बनता दिखाई दे रहा है।उडुपी से लक्ष्मीवारा तीर्था स्वामी,धारवाड़ से बासवानन्दा स्वामी, मेंगलुरू से राजशेखरनन्दा स्वामी और चित्रदुर्ग से मद्रचेन्नया स्वामी बीजेपी के टिकट से चुनाव लड़ना चाहते हैं। दिलचस्प बात ये है कि इन चारों के निशाने पर कांग्रेस हैं।हालांकि मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी ने इन सबको टिकट देने को लेकर कोई वादा नहीं किया।ये लोग हमेशा से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के काम और नीतियों की भी तारीफ़ करते रहे हैं।इन चारों के अलावा कई और साधु-संतों के भी चुनाव लड़ने के संकेत मिल रहे हैं।साधु-संत भी अब इस बात को समझने लगें हैं जब राजनीति 'धर्म' के इर्द-गिर्द घुमने लगी है तो सियासी इस्तेमाल होने से अच्छा है,ख़ुद क्यों ना नेता बन जाए।इसलिए इतनी बड़ी संख्या में साधु-संतों ने दिलचस्पी दिखाई है।
उडुपी के आठ प्राचीन श्रीकृष्ण मठों में एक शिरूर मठ के मठाधीश लक्ष्मीवारा तीर्था स्वामी ने यहां तक कह दिया है कि उन्हें टिकट नहीं मिलता है तो निर्दलीय भी लड़ सकते हैं।स्वामी के ऐलान ने राजनेताओं की नीन्द उड़ा दी है।भाजपा के पूर्व विधायक रघुपति भट के अलावा कई नेता उनका विरोध भी कर रहें है।स्वामी की राजनीति में आने से भक्त खुश हैं।स्वामीजी का कहना है कि वह हिन्दू के पक्षधर हैं।इसका मतलब ये नहीं है कि वहां के ईसाई और मुसलमान मेरी इज्ज़त नहीं करते।सब मुझे बहुत सम्मान देते हैं.जिसकी वजह से मैं लोगों का सेवा करना चाहता हूं।ख़ास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की जिनके पास विकास की रौशनी तक अभी भी पहुंचना बाकी है।
व्रजदेही मठ के राजशेखरनन्दा स्वामी तो छह बार के विधायक और कर्नाटक सरकार में वन मंत्री रमानाथ के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ना चाहते हैं।राजशेखरनन्दा स्वामी बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हैं।इनको भड़काऊ और विवादस्पद भाषण के लिए जाना जाता है।
बात दक्षिण भारत की राजनीति में महंतों की भूमिका की हो रही है तो दक्षिण भारत के ही एक प्रसिद्ध संत की बड़ी दिलचस्प जानकारीआपके साथ साझा कर रहा हूं,जो मुझे शोध के दौरान मिली।ये जानकारी संत माणिक्कवाचकर और आज के साधु-संतो की सियासी सोच में कितना फ़र्क है ये बतायेगा।नौवीं सदी में द.भारत के प्रसिद्ध संत माणिक्कवाचकर पांड्य राजवंश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे।उनमें जब आध्यात्मिकता जगी,तो उन्होंने सबसे पहले प्रधानमंत्री पद का त्याग किया और लिखा-'कटारैयान वेंडेन करपडम इनियुम।'यानि इससे आगे वो चतुर या राजनीतिज्ञों का साथ नहीं चाहते हैं।उनका मानना था कि राजसत्ता और राजनीति के लिए जिस चतुराई की ज़रुरत होती है,वह अध्यामिकता की दुश्मन होती है।आध्यात्मिक साधक की सेवा-भावना को नष्ट करने के लिए सत्ता से जुड़ा ऐश्वर्य और अहंकार पर्याप्त होता है।इसलिए सच्चे संतों और समाज सेवियों ने स्वयं को सत्ता से दूर रखा है।
