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बुधवार, 22 जनवरी 2020

फ़िल्म छपाक को सपरिवार क्यों देखने जाना चाहिए?

आज मैं फ़िल्म छपाक देखने गया था। यह जानकारी थी मुझे कि फ़िल्म अच्छी कमाई नहीं कर रही है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ फ़िल्म छपाक रिलीज़ होने के बाद से अबतक क़रीब 40 करोड़ रूपये ही कमा पाई है। जबकि यह चार कांग्रेस शासित राज्य राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पुडुचेरी में टैक्स फ़्री है। इन चारों ने तब इस फ़िल्म को टैक्स फ़्री करने का ऐलान किया,जब दीपिका पादुकोण जेएनयू में फ़ीस विवाद को लेकर आंदोलनरत छात्रों से यकजहती का इज़हार करने पहुंची थीं। बिना पूर्व सूचना के जब दीपिका जेएनयू पहुंची तो, सोशल मीडिया पर बायकॉट छपाक ट्रेंड करने लगा था। दीपिका को गन्दी-गन्दी गालियां तक दी गई। कहा गया कि दीपिका टुकड़े-टुकड़े गैंग की समर्थक हैं। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि कुछ दिनों पहले जब एक RTI के माध्यम से गृह मंत्रालय से कथित टुकड़े-टुकड़े गैंग के सदस्यों का नाम पूछा गया तो गृह मंत्रालय के पास कोई नाम नहीं था। मतलब टुकड़े-टुकड़े गैंग शब्द का इस्तेमाल पीएम Narendra Modi, गृह मंत्री अमित शाह समेत तमामBharatiya Janata Party (BJP) के नेताओं और उनके समर्थकों द्वारा सियासी फ़ाइदे के लिए किया जाता है। जेएनयू में जाने पर दीपिका को समाज के एक वर्ग से शाबाशी भी मिली थी, लेकिन फ़िल्म के लिहाज़ से वहाँ जाना शायद ग़लत साबित हुआ। दीपिका ने अबतक इस बात का खुलासा नहीं किया है कि वो किसके कहने और क्या समझ कर जेएनयू गईं थीं।

अब बात करते हैं कि यह फ़िल्म हर माता-पिता को अपने बच्चों के साथ ख़ासकर बेटों के साथ क्यों देखने जाना चाहिए। मेरे फ़िल्म देखने जाने की वज्ह बिल्कुल साफ़ थी। यह एक सामाजिक फ़िल्म है, इसलिए मैं देखने गया था। कहते हैं ना फ़िल्म समाज का आईना होता है, तो इसी बात को मानते हुए हर इंसान को इस फ़िल्म को देखने जाना चाहिए ताकि पता चल सके कि हमारा समाज कैसा है। 03 बजकर 05 मिनट पर शुरू होने वाले शो के लिए तीन बजने में पांच मिनट कम था तो मैं थियेटर पहुँच गया था। जिस ऑडी में फ़िल्म दिखाया जाना था,जब मैं वहाँ पहुँचा तो बिल्कुल ख़ाली था। मुझे लगा कि मैं कहीं बहुत पहले तो मैं ही नहीं पहुँच गया हूँ। फिर मैं बाहर आ गया। लेकिन फ़िल्म शुरू होने के क़रीब दो-तीन मिनट तक क़रीब 200 लोगों के बैठने की क्षमता वाले ऑडी में मैं अकेला था। फिर एक-एक करके लोग आने शुरू हुए। फ़िल्म समाप्त होने के बाद जब हमलोग निकले,तो हमारी संख्या मुश्किल से दस थी। फ़िल्म की कमाई नहीं हो रही है, लेकिन फ़िल्म सामाजिक होने की वज्ह से मैं देखने गया था। मेरे साथ फ़िल्म देखने वाली एक महिला ने कहा था कि इससे अच्छा तो हमलोग तान्हाजी देख लेते। मुझे थोड़ा अजीब लगा था, लेकिन मैं चुप रहा।

फ़िल्म में कई ऐसी तस्वीरें हैं जो आपको भीतर से झकझोर देती है। हंसती-खेलती बेटियां अपने शैशवास्था में जैसे घरों की रौनक होती हैं, वैसे ही हंसती-खेलती बेटियां समाज के लिए भी रौनक होती हैं। बदलते ज़माने में पुरुषवादी मानसिकता वालों को यह समझना पड़ेगा कि  बेटियां जब बड़ी हो जाती हैं,तो उनके सपनों को पंख लगाने के ज़िम्मावारी माता-पिता के साथ समाज की भी होती है। एक कहावत भी तो है कि बेटियां समाज की होती हैं, मतलब बेटियों की देखभाल की ज़िम्मावारी समाज की भी होती है। सामाजिक बेड़ियों को तोड़कर अपने सपनों को हक़ीक़त में बदलने के लिए दहलीज़ पार करने वाली बेटियों को तंग नज़र की बजाय सहायता के लिए हाथ बढ़ाना पड़ेगा।

बेटे के साथ इस फ़िल्म को देखने जाने से मेरा तात्पर्य यह है कि आपका बेटा इस बात को महसूस कर सकें कि ज़ुल्म की शिकार बेटियों को कैसे-कैसे सामाजिक और मानसिक यातनाओं से गुज़रना पड़ता है। फ़िल्म में मालती के भाई को,जब वह पार्क में खेल रहा होता है,तो उन्हीं में से एक कहता है कि घर जा ना..क्यूं नहीं जा रहा...भूत आ गई है तुम्हारे घर में ना... इसलिए नहीं जा रहा है ना...ऐसा कहते हुए मज़ाक उड़ाते हैं, उनके बाद मालती के भाई को कितना बुरा लगता है। कहीं जाने-अनजाने में आपका बेटा तो ऐसा नहीं करता हैं ना।

दूसरी तस्वीर जिसको देखकर मेरी आँखें भर आईं थीं। मालती को बचपन के सजना-संवरना बहुत अच्छा लगता था, इसलिए वो श्रृंगार की सभी चीज़ें ख़रीदकर रखती थी, लेकिन एक दिन दरिंदगी की शिकार हो जाती है। तेज़ाब की वज्ह से चेहरे के साथ उसके कान भी जल जाते हैं। चेहरे की पहली सर्जरी देखकर फूटकर रोने लगती है। फिर एकाध और सर्जरी के बाद जब वो अपने कान में पहनने वाले गहने को निकालती है और आईने के सामने जब कान के पास हाथ ले जाती है तो एक कान ही नहीं दिखता है। क्या इस बात की कल्पना करना मुश्किल है कि ऐसे वक़्त में बेटियां कितना टूट जाती हैं? 

बेटियां सिर्फ़ उस घर की रौनक नहीं होती हैं, जिसमें वो पैदा होती हैं। वो तो उस घर और समाज के लिए भी रौनक होती हैं जहाँ ब्याही जाती हैं। बेटियों पर होने वाले ज़ुल्मों को रोकने के लिए समाज के लोगों को बिल्कुल वैसे ही उंगलियों का सहारा देना होगा, जैसे बचपन में चलने ‌के वक़्त देते हैं, ताकि वो अपने सपनों को पंख लगा सकें। हफ़्ते दिन पहले दिल्ली में पाँच साल की गुड़िया से पड़ोसियों द्वारा दुष्कर्म पर फ़ैसला सुनाते हुए दिल्ली की अदालत के एक जज ने कहा था कि कई मौक़े पर हम बेटियों को लक्ष्मी की तरह पूजते हैं, लेकिन बाद में भूल जाते हैं। इसलिए समाज को भूलने की नहीं बल्कि याद रखने की ज़रूरत है।

बुधवार, 8 जनवरी 2020

फ़िल्म छपाक में एसिड अटैकर का क्या नाम है?

बुधवार की शाम अचानक से ख़बर आती है कि  Deepika Padukone जेएनयू में वामपंथियों के कार्यक्रम में शामिल हुईं है। यह कार्यक्रम जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष और कथित रूप से दक्षिणपंथियों के हमले में जिस्मानी रूप से घायल आईशी घोष की ज़ेर-ए-सदारत में आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में Kanhaiya Kumar भी शामिल हुए थें। बकौल दीपिका,वो जेएनयू में हुई हिंसा के ख़िलाफ़ और घायलों का हौसला बढ़ाने के लिए गईं थीं। लेकिन कल से लेकर अबतक दीपिका की बातों से इतर बहुत सारी बातें हो रही हैं। वामपंथी विचारधारा के समर्थकों में खुशी की लहरें उफ़ान मार रही है,क्योंकि उनकी नज़र में दीपिका Narendra Modi , Bharatiya Janata Party (BJP) की सरकार और एबीवीपी के ख़िलाफ़ खड़ी हुईं थीं, तो वहीं दूसरी तरफ़ दक्षिणपंथी हाय-तौबा मचाया हुए हैं। दीपिका को वामपंथी, टुकड़े-टुकड़े गैंग समर्थक और पता नहीं क्या-क्या कर रहे हैं। यहां तक कि इतनी गन्दी-गन्दी गालियां दे रहे हैं कि कल्पना से परे है। फ़िल्म छपाक का बहिष्कार करने की बात कर रहे हैं। मैंने तो ऐलान कर दिया है कि फ़िल्म छपाक को ज़रूर देखने जाऊंगा। यह फ़िल्म समाजिक बुराई पर आधारित है। साल 2005 में देश की राजधानी दिल्ली की लक्ष्मी अग्रवाल, नदीम ख़ान से शादी करने से इंकार कर देती है, जिसके बाद नदीम ख़ान लक्ष्मी पर चेहरे पर एसिड फेंक देता है।

एक और वबाल यह खड़ा कर दिया है कि फ़िल्म में नदीम ख़ान का जो रोल निभा रहा है,उसका नाम राजेश क्यों रखा गया है? कहा जा रहा है कि हिन्दू धर्म को बदनाम करने के साज़िश है। बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने ट्वीट यह कह दिया है कि फ़िल्म में राजेश नाम होगा तो कोई इश्करण,जो कि पेशे से वकील हैं, दीपिका और फ़िल्म निर्माता पर केस करेंगे। इस वबाल पर मैंने अपनी दोस्त उषा श्रीवास्तव से बात की। उषा ने बताया फ़िल्म मे एसिड फेंकने वाले का नाम राजेश, नहीं बल्कि बशीर ख़ान उर्फ़ बब्बू है।

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...