#2019 में #2014 की बात हो रही है। वैसे इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है और ना होनी चाहिए,क्योंकि एक नागरिक के रूप में हम इस रवायत के वाहक हैं। रविवार को मुज़फ़्फ़रपुर,बिहार के #SKMCH में केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री Dr. Harshvardhan बीमार बच्चों का हाल जानने के बाद मीडिया से गुफ़्तगू में जो बात कही, वही बात विपक्षी दलों और आम लोगों के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है। बात ये है कि 2014 में इसी हस्पताल में 20-22 जून के अपने दौरे के बाद डॉक्टर हर्षवर्धन ने एक ब्लॉग लिखा था। वो आज भी मौजूद है। चाहे तो पढ़ भी सकते हैं।
डॉक्टर हर्षवर्धन ने ब्लॉग के माध्यम से जो कहा था उसकी कुछ ज़रूरी बातें इस प्रकार है-
- #SKMCH में बच्चों के लिए 100 बिस्तर की व्यवस्था की जाएगी।
- मुज़फ़्फ़रपुर और दरभंगा में उच्चस्तरीय रिसर्च सेंटर क़ायम किया जाएगा।
- गया, भागलपुर, बेतिया, पावापुरी और नालन्दा में वायरोलॉजी लैब स्थापित किए जाएंगे।
- सौ फ़ीसद बच्चों का टीकाकरण होना चाहिए,एक भी नहीं छुटना चाहिए।
- मेडिकल कॉलेजों में सीटों की संख्या बढ़ेगी।
क्या आप जानते हैं कि मंत्री जी ने जो-जो बातें कही थी, वो इन पांच सालों में पूरे हो गये? शायद नहीं। मेरे ख़याल में इसकी एक मात्र वजह है कि लोगों का सियासत का शिकार हो जाना। ये बात मैं इसलिए कह रहा हूँ कि रिसर्च के दौरान मैंने कहीं नहीं पाया कि मंत्री जी ने जो वादे किए थे,उसको लेकर सालभर,दो साल या तीन बाद भी इब्तिदा ना होने की वजह से लोग एहतेजाज के लिए अपने घरों से बाहर आए थे। हमारे मुल्क में ऐसी रवायत है कि एक मंत्रालय में शायद ही कोई मंत्री पांच साल बिताता होगा और अपने दृष्टिकोण के आधार पर काम कर पाता होगा, अपवाद को छोड़ दीजिएगा। यहां एक बात जोड़ना चाहता हूं कि पीएम Narendra Modi ने 2014 लोकसभा चुनाव प्रचार के दरमियान कहा था कि यदि हमारी सरकार बनेगी तो हमारे काम करने का तरीक़ा अलग होगा। वज़ारत तब्दीली की व्यवस्था केन्द्र और राज्य दोनों में है। इसके कारण क्या हैं,ये अलग चर्चा का विषय है। तो इसी व्यवस्था का शिकार हुए थे डॉक्टर हर्षवर्धन। दौरे के बाद उनका मंत्रालय बदल गया था और जेपी नड्डा को हमारे मुल्क के स्वास्थ्य विभाग की ज़िम्मावारी सौंपी गई थी। नड्डा जी ने एक स्वास्थय मंत्री होने के नाते, डॉक्टर हर्षवर्धन के वादों का कहीं ज़िक्र किया ऐसा कहीं पढ़ने को नहीं मिला। आप भी 2014 से अबतक #NEWINDIA की बातों में खोये रहें और #NEWINDIA का सपना दिखाने वाली हमारी सरकार भी। नतीजा ये हुआ कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ 'चमकी' बुखार से अबतक सौ से ज़्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। 2014 में 139 बच्चों की मौत हुई थी। अब मैं यहां ये कहना चाहता हूँ कि एक ज़िम्मावार नागरिक बनिए, सियासत को किनारे रखिए। वरना बुनियादी सुविधाओं के अभाव में बच्चे मरते रहेंगे,और नेताओं के भी रस्मी दौरे चलते रहेंगे। इसलिए रस्मी दौरों और बातों के चक्कर में अब से भी ना पड़िए, अपने विधायक, सांसद और मंत्रियों से अपनी बुनियादी ज़रूरतों की पूरा करने की मांग पर अड़े रहिए।
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सोमवार, 17 जून 2019
बिहार की फ़िज़ा में डॉ. हर्षवर्धन की बातें गूंजने की क्या वजह है?
गुरुवार, 25 अप्रैल 2019
काले झण्डे के समर्थक अबतक ख़ामोश हैं।
हो सकता है आपको याद भी हो, याद नहीं भी है तो इस बात के लिए गूगल कर
लीजिए कि साल 2014 से अब तक कितने ऐसे मौक़े आएं जब लिखने और कहने वालों ने काले
झण्डे दिखाए जाने को सही माना और कहा कि लोकतंत्र में विरोध की आवाज़/प्रक्रिया का सम्मान होना चाहिए। कुछ
दिनों पहले बिहार के बेगूसराय से काले झण्डे दिखाएं जाने की ख़बर आई थी,तब से लेकर
आजतक मैं उन लोगों कि लेखनी और वक्तव्य को ढूंढ रहा हूँ, जो
तब लोकतंत्र में काले झण्डे का समर्थन
कर रहे थें। जानना चाहता हूं कि इस घटना में उन लोगों ने काले झण्डे का समर्थन
किया है या नहीं। यदि मैं बात करूं अपने मित्रों को जो काले झण्डे के समर्थन में
इन पांच सालों में अपनी आवाज़ बुलन्द किएं। अब ख़ामोश हैं। कुछ तो ऐसे व्यवहार कर
रहें हैं कि उनको पता ही नहीं है कि कन्हैया को काला झण्डा दिखाया गया है।
ख़ैर अब हम मुद्दे पर लौटते हैं। जैसा कि हम सब जानते ही हैं कि
बेगूसराय से कन्हैया कुमार चुनाव लड़ रहे हैं। कन्हैया सीपीआई के उम्मीदवार हैं।
इनका मुक़ाबला बीजेपी के नेता गिरिराज सिंह और राजद के तनवीर हसन से हैं। कन्हैया, प्रचार करने बेगूसराय
के गढ़पुरा थाना के किसी क्षेत्र में गए थें। रोड-शो में कुछ लोगों ने उनको काले
झण्डे दिखाएं, जिसके बाद कन्हैया के कारकूनों( कार्यकर्ताओं) ने लाठी-डंडों से काले
झण्डे दिखाने वालों की जमकर पिटाई की। इस दौरान किसी व्यक्ति ने मना किया तो
लाठी-डंडे वालों ने मना करने व्यक्ति की उसी के घर में घुसकर पिटाई की। किसी तरह वहां
मौजूद पुलिसकर्मियों ने मामले को शान्त किया। अब यहां आप कन्हैया के छात्र राजनीति
से मुख्यधारा की राजनीति के सफ़र को याद कीजिए। आप पाएंगे कि मोदी सरकार की नीतियों
के विरोध से ही कन्हैया का,देश की मुख्यधारा की राजनीति मे प्रवेश हुआ है। देशभर
में कन्हैया खुलकर मोदी सरकार का विरोध करते रहें हैं,जिससे समाज के एक तबके को
लगा कि कन्हैया एक बेहतर रहनुमा बन सकते हैं। मुख्यधारा के नेताओं से दीगर एक छवि
तैयार हुई,जिसकी बदौलत आज वो चुनावी मैदान में हैं।
अब यहां दो तस्वीर आपके सामने है। दोनों में ‘विरोध’ है। पहले में आपने देखा कि सत्ता का
विरोध करने वाले का विरोध है, तो दूसरे में सत्ता का विरोध है। अब यहां सवाल ये है
कि क्या लोकतंत्र में विरोध की आवाज़ सिर्फ़ सत्ता पक्ष के लिए होता है? यदि बात सिर्फ़ पीएम नरेन्द्र मोदी को
झण्डा दिखाएं जाने के सन्दर्भ में ही करें तो, पिछले पांच सालों में ये स्थापित
करने की कोशिश गई कि पीएम मोदी के जलसे में काले झण्डे ले जाने से रोकना या उसकी
जांच करना, लोकतांत्रिक नहीं तानाशाही रवैया है। तो क्या इसी कसौटी पर कन्हैया और
उनके कार्यकर्ताओं के कारनामे को नहीं कसा जाना चाहिए? या फिर तब काले झण्डे का समर्थन करने
वाले अब इसलिए ख़ामोश हैं कि इस बार मामला कन्हैया का है। क्या लोकतांत्रिक
प्रक्रिया व्यक्ति और पार्टी देखकर लागू होगा? कन्हैया तो अभी मुख्यधारा की राजनीति
में प्रवेश ही किये हैं। अभी से ही लाठी-डंडों के ज़ोर पर सियासत कर रहे हैं तो
बाक़ी नेताओं से दीगर कैसे हैं? देशभर के अलग-अलग हिस्सों से कन्हैया
के समर्थन में बेगूसराय जाकर उनका प्रचार करने वाले ज़्यादातर लोग सोशल मीडिया पर
बहुत सक्रिय हैं। लेकिन कोई भी कन्हैया और उनके कार्यकर्ताओं की करतूत पर बोल नहीं
रहा है कि उन लोगों ने ग़लत किया या सही।
गुरुवार, 26 अप्रैल 2018
बीजेपी शासित राज्य देश के पिछड़ेपन का कारण है!
नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अमिताभ कान्त ने 'चैलेंज अॉफ़ ट्रांसफ़ॉरमिंग इण्डिया' पर बोलते हुए कहा कि सामाजिक संकेतकों के मामले में बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों के कारण भारत पिछड़ा बना हुआ है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया,नई दिल्ली में प्रथम अब्दुल गफ्फार ख़ान स्मारक व्याख्यान के दौरान श्री कान्त ने दक्षिण-पश्चिमी राज्यों की पीठ थपथपाई।कहा कि, दक्षिण-पश्चिम के राज्य बहुत अच्छा कर रहें हैं और तेज़ी से आगे बढ़ रहें हैं।
नीति आयोग को हिंदी में राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान के नाम से जाना जाता है।यह योजना आयोग का परिवर्तित रूप है। इसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता हैं।यह सरकार का थिंक टैंक होता है।इसकी ज़िम्मेदारी देश के समग्र विकास के लिए नीतियां बनाकर, क्रियान्वित करना है।इस संस्थान का निर्माण 2015 में हुआ है।
सतत विकास के महत्व पर ज़ोर देते हुए श्री कान्त ने कहा कि देश में शिक्षा और स्वास्थ्य बदहाल स्थिति में है,जिसकी वज़ह से देश पिछड़ रहा है।हमारे सीखने के परिणाम बहुत दुखद है।एक पांचवीं कक्षा का छात्र दूसरी कक्षा के जोड़-घटाव नहीं कर पाता है। पांचवीं कक्षा का छात्र अपनी मातृभाषा तक नहीं पढ़ पाता है। शिशु-मृत्यु दर बहुत ज़्यादा है।ये वो बिन्दु है जिनपर सुधार किए बिना सतत विकास करना बहुत मुश्किल होगा।
वर्तमान में बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शासन में है।एमपी और छत्तीसगढ़ में पिछले 15 साल से बीजेपी की सरकार है।इक्कीसवीं सदी के राजस्थान में 2013 से बीजेपी की सरकार है।इससे पहले 2003-2008 में भी बीजेपी की शासन में थी।जंगल राज के बाद से बिहार में काफ़ी लम्बे अरसे से सरकार की सहयोगी है बीजेपी हैं।2005 के बाद से अबतक के बीच में क़रीब 20 महीने के लिए जदयू का साथ छूटा था।यूपी में बीजेपी को शासन करते हुए मात्र एक साल हुए हैं।
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