"I don't think it(hate crime) is new in India.it is feudal in nature.Today they shake the conscience.you can't say lynching or hate crime are something new.I think they are over hyped and over reported."
ये कहना है उस मंत्रालय के सचिव का,जिसकी ज़िम्मेदारी देश में सुरक्षा,शान्ति और सौहार्द बनाए रखने की है।राजीव महर्षि का ये बयान मुझे शोध के दरमयान मिली,जो 25 जून 2017 को India today की वेबसाइट पर छपी है।महर्षि के इस बयान से कई लोग सहमत और असहमत हो सकते हैं।मेरी जो असहमती है,जहां तक मैं उनके बयान को समझ पा रहा हूं।लाचारी और बेबसी से भरा ये बयान बता रहा कि भीड़ के द्वारा की गई हत्या से इनको कोई फ़र्क नही पड़ता है।ये बात सही है कि भीड़ के द्वारा किसी की हत्या कर देना कोई नई बात नही है।लेकिन क्या ये कह कर अपनी ज़िम्मेदारी से किनारा करना कैसे उचित है?मीडिया को दोषी ठहराना फ़ैशन हो गया,जो उन्होंने भी किया।उन्होंने कहा कि भीड़ के द्वारा की गई हत्या को मीडिया ज़्यादा प्रचारित और रिपोर्ट कर रही है।महर्षि साहब को ये बात कहने से पहले सोचना चाहिए कि मीडिया क्यों रिपोर्ट कर रही है? क्या ऐसी घटनाएं नही हो रही है?या फ़िर मीडिया की रिपोर्ट से सरकार की छवि ख़राब होने की चिन्ता है?महर्षि साहब,हत्या के कारण कुछ भी हो सकते हैं लेकिन ये कहना कि मीडिया ज़्यादा रिपोर्ट कर रही है,बिल्कुल अनुचित है।आप अपनी ज़िम्मेदारी निभाइए और मीडिया को अपनी ज़िम्मेदारी निभाने दीजिए।हाल ही में इंण्डिया स्पेण्ड ने न्यूज़ रिपोर्ट के आधार पर बताया कि साल 2017 के पहले 6 महीने में गाय को लेकर 20 हमले हुए,जो साल 2016 से 75% ज़्यादा है।यह आंकड़ा अब तक के सबसे ख़राब साल 2010 से भी ज़्यादा है।
भीड़ के अलग-अलग स्वरूप होते हैं।लेकिन जिस भीड़ की अब चर्चा हो रही है वो है हिंसक भीड़।जो कुछ लोग मिलकर शक और अफ़वाह के आधार पर किसी की हत्या करने के लिए तैयार करते हैं।जुनैद और मोहम्मद अयुब पंडित इसका उदाहरण हैं।राजनीति से प्रेरित इन कुछ लोगों की वज़ह से कोई धर्म या जाति बदनाम हो जाता है।मीडिया को भी ऐसी घटनाओं को रिपोर्ट करते वक्त ख़ास सावधानी बरतनी चाहिए, जिससे की किसी को किसी के प्रति नफ़रत पैदा ना हो।मीडिया के गलत रिपोर्टिंग का ताज़ा मामला जुनैद की हत्या है।मुझे जहां तक याद है कि उसके भाई ने घटना के कुछ ही घंटों बाद कह दिया था कि झगड़ा सीट के लिए हुआ था।लेकिन मीडिया संस्थानों नें ज़बरदस्ती बीफ़ का मामला बताकर अपनी टीआरपी बढ़ाई।दर्शकों को ख़ास कर ऐसी ख़बरों की टीआरपी के खेल से बचना चाहिए और मीडिया के शुरुआती रिपोर्ट से कोई धारणा तैयार नही करना चाहिए।सरकारी रिपोर्ट का इन्तजार करना चाहिए।जब भी कोई घटना घटती है,ख़ासकर गाय को लेकर तो विपक्षी दलों के नेता समेत सरकार विरोधी लोग ये कहते हैं कि ये सब केन्द्र सरकार की सह पर हो रहा है।लेकिन मुझे जहां तक याद है,जब से नरेंद्र मोदी पीएम बने हैं,कई बार राज्य सरकारों से कह चुके हैं कि ऐसी घटनाओं पर सख़्त कर्रवाई करें।कानून-व्यवस्था राज्य का मामला होता है।ऐसे में ये राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी होती है कि ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगायें और दोषियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करें,ताकि दुबारा किसी की हिम्मत ना हो।अब सवाल ये है कि पीएम के बार-बार कहने पर भी राज्य सरकारें कार्रवाई क्यों नही करती है?सबसे हैरानी की बात ये है कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी हत्या को लेकर कोई अलग से कानून नही है।
अब मैं शोध के आधार पर कुछ उदाहरण दे रहा हूँ,उन लोगों के लिए जिनके दिमाग़ में ये बात साजिश के तहत भरी जा रही है कि सिर्फ़ हिन्दुओं द्वारा मुसलमानों पर अत्याचार किया जा रहा है-
▶देश की राजधानी दिल्ली के विकासपुरी इलाके में 15 लोगों की भीड़ जिसको नासिर लीड कर रहा था,ने डॉक्टर पंकज नारंग को रॉड और हॉकी स्टिक से,उसके पत्नी-बच्चे के सामने तब तक मारा जब तक नारंग ने दम नही तोड़ दिया।
▶कोयम्बटूर के फ़ारूक जिसकी ईश्वर में कोई आस्था नही था,उसी के बचपन के साथी ने उसकी एक फ़ेसबुक पोस्ट की वज़ह से हत्या कर दी।
▶एक हिन्दू रेल पैसेंजर को मुस्लिम युवकों ने सीट विवाद में पीटकर मार डाला।
▶एक दलित युवक को मुस्लिमों की भीड़ ने इसलिए पीटकर मार डाला,क्योंकि वो एक मुस्लिम लड़की से प्यार करता था।
▶झारखंड में भीड़ ने कुछ हिन्दुओं और मुसलमानों को बच्चा चोरी के शक में पीट-पीटकर मार डाला।
▶हाल ही में दिल्ली में 15-20 युवाओं की भीड़ ने एक रिक्शा चालक को पीट -पीटकर मार डाला क्योंकि उसमें किसी एक को चालक ने एक दिन पहले खुले में पेशाब करने से मना किया था।
उपरोक्त उदाहरण से क्या ये साबित हो रहा है कि सिर्फ़ हिन्दु ही मुसलमानों पर हमला कर रहें हैं?ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं,जो इंटरनेट पर मौजूद है।जिसको किसी धर्म के ख़िलाफ़ धारणा तैयार करने से पहले ज़रूर देखिए।किसी भी तरह के हिंसा का कोई समर्थन नही करता है,चाहे वो गाय को लेकर हो या किसी अन्य कारण से।
एक भीड़ जो हत्या करती है,दूसरी भीड़ जो हत्यारे भीड़ के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती।हत्यारे भीड़ के ख़िलाफ़ 28 जून को #Notinmyname अभियान के तहत देशभर के लोग सड़क पर निकले थे।जिनका कहना था कि सरकार भीड़ द्वारा की जा रही हिंसा के ख़िलाफ़ स़ख्त कार्रवाई करे।इस प्रदर्शन में ऐसा नही था कि किसी एक ख़ास धर्म या जाति के थे।
एक बात जो मुझे बहुत दुखी करती है वो ये है कि जब भी कोई घटना घटती है तो फेंक यूनिवर्सिटी के कुछ लोग सक्रिय हो जाते हैं और हिन्दू-मुसलमान करने लगते हैं।एक दूसरे के प्रति नफ़रत फ़ैलाने वाले मैसेजेस भेजने लगते हैं।ऐसे लोगों से मेरी गुज़ारिश है कि आप ऐसा ना करें।आपने जो पढ़ाई के दरमयान'सर्व धर्म सम्भाव, जियो और जिने दो,हमें एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए,मनुष्य एक सामाजिक प्राणि है'जैसे वाक्यों को राजनीति से प्रेरित होकर क्यों महत्वहीन बना रहे हो?
ये कहना है उस मंत्रालय के सचिव का,जिसकी ज़िम्मेदारी देश में सुरक्षा,शान्ति और सौहार्द बनाए रखने की है।राजीव महर्षि का ये बयान मुझे शोध के दरमयान मिली,जो 25 जून 2017 को India today की वेबसाइट पर छपी है।महर्षि के इस बयान से कई लोग सहमत और असहमत हो सकते हैं।मेरी जो असहमती है,जहां तक मैं उनके बयान को समझ पा रहा हूं।लाचारी और बेबसी से भरा ये बयान बता रहा कि भीड़ के द्वारा की गई हत्या से इनको कोई फ़र्क नही पड़ता है।ये बात सही है कि भीड़ के द्वारा किसी की हत्या कर देना कोई नई बात नही है।लेकिन क्या ये कह कर अपनी ज़िम्मेदारी से किनारा करना कैसे उचित है?मीडिया को दोषी ठहराना फ़ैशन हो गया,जो उन्होंने भी किया।उन्होंने कहा कि भीड़ के द्वारा की गई हत्या को मीडिया ज़्यादा प्रचारित और रिपोर्ट कर रही है।महर्षि साहब को ये बात कहने से पहले सोचना चाहिए कि मीडिया क्यों रिपोर्ट कर रही है? क्या ऐसी घटनाएं नही हो रही है?या फ़िर मीडिया की रिपोर्ट से सरकार की छवि ख़राब होने की चिन्ता है?महर्षि साहब,हत्या के कारण कुछ भी हो सकते हैं लेकिन ये कहना कि मीडिया ज़्यादा रिपोर्ट कर रही है,बिल्कुल अनुचित है।आप अपनी ज़िम्मेदारी निभाइए और मीडिया को अपनी ज़िम्मेदारी निभाने दीजिए।हाल ही में इंण्डिया स्पेण्ड ने न्यूज़ रिपोर्ट के आधार पर बताया कि साल 2017 के पहले 6 महीने में गाय को लेकर 20 हमले हुए,जो साल 2016 से 75% ज़्यादा है।यह आंकड़ा अब तक के सबसे ख़राब साल 2010 से भी ज़्यादा है।
भीड़ के अलग-अलग स्वरूप होते हैं।लेकिन जिस भीड़ की अब चर्चा हो रही है वो है हिंसक भीड़।जो कुछ लोग मिलकर शक और अफ़वाह के आधार पर किसी की हत्या करने के लिए तैयार करते हैं।जुनैद और मोहम्मद अयुब पंडित इसका उदाहरण हैं।राजनीति से प्रेरित इन कुछ लोगों की वज़ह से कोई धर्म या जाति बदनाम हो जाता है।मीडिया को भी ऐसी घटनाओं को रिपोर्ट करते वक्त ख़ास सावधानी बरतनी चाहिए, जिससे की किसी को किसी के प्रति नफ़रत पैदा ना हो।मीडिया के गलत रिपोर्टिंग का ताज़ा मामला जुनैद की हत्या है।मुझे जहां तक याद है कि उसके भाई ने घटना के कुछ ही घंटों बाद कह दिया था कि झगड़ा सीट के लिए हुआ था।लेकिन मीडिया संस्थानों नें ज़बरदस्ती बीफ़ का मामला बताकर अपनी टीआरपी बढ़ाई।दर्शकों को ख़ास कर ऐसी ख़बरों की टीआरपी के खेल से बचना चाहिए और मीडिया के शुरुआती रिपोर्ट से कोई धारणा तैयार नही करना चाहिए।सरकारी रिपोर्ट का इन्तजार करना चाहिए।जब भी कोई घटना घटती है,ख़ासकर गाय को लेकर तो विपक्षी दलों के नेता समेत सरकार विरोधी लोग ये कहते हैं कि ये सब केन्द्र सरकार की सह पर हो रहा है।लेकिन मुझे जहां तक याद है,जब से नरेंद्र मोदी पीएम बने हैं,कई बार राज्य सरकारों से कह चुके हैं कि ऐसी घटनाओं पर सख़्त कर्रवाई करें।कानून-व्यवस्था राज्य का मामला होता है।ऐसे में ये राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी होती है कि ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगायें और दोषियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करें,ताकि दुबारा किसी की हिम्मत ना हो।अब सवाल ये है कि पीएम के बार-बार कहने पर भी राज्य सरकारें कार्रवाई क्यों नही करती है?सबसे हैरानी की बात ये है कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी हत्या को लेकर कोई अलग से कानून नही है।
अब मैं शोध के आधार पर कुछ उदाहरण दे रहा हूँ,उन लोगों के लिए जिनके दिमाग़ में ये बात साजिश के तहत भरी जा रही है कि सिर्फ़ हिन्दुओं द्वारा मुसलमानों पर अत्याचार किया जा रहा है-
▶देश की राजधानी दिल्ली के विकासपुरी इलाके में 15 लोगों की भीड़ जिसको नासिर लीड कर रहा था,ने डॉक्टर पंकज नारंग को रॉड और हॉकी स्टिक से,उसके पत्नी-बच्चे के सामने तब तक मारा जब तक नारंग ने दम नही तोड़ दिया।
▶कोयम्बटूर के फ़ारूक जिसकी ईश्वर में कोई आस्था नही था,उसी के बचपन के साथी ने उसकी एक फ़ेसबुक पोस्ट की वज़ह से हत्या कर दी।
▶एक हिन्दू रेल पैसेंजर को मुस्लिम युवकों ने सीट विवाद में पीटकर मार डाला।
▶एक दलित युवक को मुस्लिमों की भीड़ ने इसलिए पीटकर मार डाला,क्योंकि वो एक मुस्लिम लड़की से प्यार करता था।
▶झारखंड में भीड़ ने कुछ हिन्दुओं और मुसलमानों को बच्चा चोरी के शक में पीट-पीटकर मार डाला।
▶हाल ही में दिल्ली में 15-20 युवाओं की भीड़ ने एक रिक्शा चालक को पीट -पीटकर मार डाला क्योंकि उसमें किसी एक को चालक ने एक दिन पहले खुले में पेशाब करने से मना किया था।
उपरोक्त उदाहरण से क्या ये साबित हो रहा है कि सिर्फ़ हिन्दु ही मुसलमानों पर हमला कर रहें हैं?ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं,जो इंटरनेट पर मौजूद है।जिसको किसी धर्म के ख़िलाफ़ धारणा तैयार करने से पहले ज़रूर देखिए।किसी भी तरह के हिंसा का कोई समर्थन नही करता है,चाहे वो गाय को लेकर हो या किसी अन्य कारण से।
एक भीड़ जो हत्या करती है,दूसरी भीड़ जो हत्यारे भीड़ के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती।हत्यारे भीड़ के ख़िलाफ़ 28 जून को #Notinmyname अभियान के तहत देशभर के लोग सड़क पर निकले थे।जिनका कहना था कि सरकार भीड़ द्वारा की जा रही हिंसा के ख़िलाफ़ स़ख्त कार्रवाई करे।इस प्रदर्शन में ऐसा नही था कि किसी एक ख़ास धर्म या जाति के थे।
एक बात जो मुझे बहुत दुखी करती है वो ये है कि जब भी कोई घटना घटती है तो फेंक यूनिवर्सिटी के कुछ लोग सक्रिय हो जाते हैं और हिन्दू-मुसलमान करने लगते हैं।एक दूसरे के प्रति नफ़रत फ़ैलाने वाले मैसेजेस भेजने लगते हैं।ऐसे लोगों से मेरी गुज़ारिश है कि आप ऐसा ना करें।आपने जो पढ़ाई के दरमयान'सर्व धर्म सम्भाव, जियो और जिने दो,हमें एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए,मनुष्य एक सामाजिक प्राणि है'जैसे वाक्यों को राजनीति से प्रेरित होकर क्यों महत्वहीन बना रहे हो?

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