
उम्मीद है 15 नवम्बर 2017 को आई प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे के उस बिन्दु को आपने ज़रूर सुना होगा, जिसमें ये बताया गया है कि भारतीय राजनीति में पीएम मोदी लोकप्रियता के शीर्ष पर बरक़रार है।पिछले साल के मुकाबले नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में 7% फ़ीसदी का इज़ाफा हुआ है।इस साल 88% लोगों ने माना है कि नरेंद्र मोदी अच्छे नेता है, जबकि साल 2016 में 81% फ़ीसदी लोगों का मानना था।सर्वे में ये बात भी सामने आई है कि कांग्रेस उपाअध्यझ राहुल गांधी की लोकप्रियता में 5% की गिरावट दर्ज़ की गई है।पिछले साल 62% लोगों में राहुल गांधी की लोकप्रियता थी,जबकि इस साल घटकर 58% हो गया है।वहीं इस सर्वे में कांग्रेस अध्यझ सोनिया गांधी और दिल्ली के सीएम अरविन्द केजरीवाल की लोकप्रियता का भी ज़िक्र है।लेकिन मीडिया में इन दोनों की ज़िक्र ना मात्र की है।सोनिया गांधी की लोकप्रियता का प्रतिशत 57 और केजरीवाल की लोकप्रियता का प्रतिशत 39 है। जिस वक़्त सर्वे आई थी उस वक़्त की ख़बरों और डिबेट शो को आप उठाकर देखेगें तो पाएंगे कि लोकप्रियता के मसले पर ज़्यादातर मीडिया ख़ासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी तक हीं सीमित रह गई,जबकि सर्वे में सरकार की तमाम कमियां भी सामने आई है।आख़िर क्यों?सिर्फ़ इसलिए की गुजरात में चुनाव होने हैं?हमारे देश की सियासत में सर्वे को लेकर एक अजीब सी अवधारणा है।सर्वे अन्तर्राष्ट्रीय भी हो तो,विपक्षी दलों और उनके समर्थकों को लगता है कि सरकार ने मैनेज कर लिया है।प्यू सर्वे पर सब के अपने-अपने तर्क हैं।विपक्षी दलों ने सर्वे के प्रकाशित होने के समय पर ही सवाल खड़ा कर दिया है।ये बात भी सही है कि विपक्ष सर्वे में लोकप्रियता के मसले पर ही उलझी रह गई,जबकि विपक्षियों के पास मौका था,सर्वे में आई तमाम कमियों से सरकार को घेरने का।बीजेपी सूत्रों का कहना है कि
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