भारत एक कृषि प्रधान
देश है, ये हम सब जानते है लेकिन अब हमें इस बात को भी स्वीकार कर लेना चाहिए कि
भारतीय किसान, सियासत का एक मात्र ज़रिया भर बन गये है। वो इसलिए कि किसानों की बेहतरी
की बात चुनाव के वक़्त सारे राजनीतिक दल करते हैं। चुनाव प्रचार में नेतावाणी में ‘कर्ज़माफ़ी से किसानों की समस्याओं का समाधान हो जाएगा’ ही किसानों
की असल समस्या है। किसानो को ये समझना होगा कि उनकी समस्या के लिए प्रचार के वक़्त
ये नेता लोग जो कर्ज़माफ़ी करने की बात करते है, वो दरअसल इस बात की ओर इशारा होता
है कि यदि हम चुन के आएंगे तो भी आपकी मूल समस्या की ओर हम ध्यान नही देंगे। कुछ
ऐसा ही गुजरात चुनाव में भी हो रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान सीएम विजय रुपाणी ने
किसानो को तीन लाख रुपये तक का ब्याज़ मुक्त कर्ज़ देने की घोषणा की है, तो वहीं
राहुल गांधी ने कहा है कि यदि गुजरात में हमारी सरकार बनी तो हम किसानों का कर्ज़
10 के दिन भीतर माफ़ करेंगे।
साल 2014 के लोकसभा
चुनाव के समय गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान में देश के प्रधानमंत्री
ने कहा था कि केन्द्र में यदि भाजपा की सरकार बनेगी तो किसानों की फ़सल के दाम दफ़्तर
में बैठकर नही, बल्कि किसान की मेहनत-मज़दूरी पर 50% ज़्यादा पैसे मिलें इस तरह से तय किये जायेंगे। लेकिन तब से लेकर आज़ तक दिन-प्रतिदिन
किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है।
यदि हम गुजरात में सीएस
रुपाणी और राहुल के बयानों के सन्दर्भ में किसानों के बारे में बात करें तो,मीडिया
रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 25 लाख़ किसान हैं,जो हर
साल कर्ज़ लेते हैं।नेशनल सैम्पल सर्वे,भारत सरकार के 2014 रिपोर्ट के मुताबिक
गुजरात में 49 लाख़ किसान है,जिनकी एक महीने की आय प्रति परिवार सिर्फ़ 7926 रुपये
है।आय के आधार गुजरात के किसानों का स्थान 12 वां है।आईचौक.इन पर रुपाणी के वादे
को लेकर एक लेख छपी है,जिसमें अर्थशास्त्री हेमंत शाह ने कहा है कि सरकार के
ज़रिये ये एक चक्रव्यूह रचा जा रहा है,जिसके ज़रिए किसान और शहर में रहने वाले
मध्यम वर्ग को एक-दूसरे के सामने खड़ा किया जा रहा है।मध्यम वर्ग के लोगों को लगता
है कि यहां सबकुछ किसानों के लिये ही किया जा रहा है।लेकिन हकीकत ये है कि किसान
सबसे ज़्यादा परेशान हैं।3 लाख तक के जिस लोन पर सरकार बिना ब्याज़ के कर्ज़ देने
की बात कर रही है,उसे ही देंखे तो किसान को ये लोन 7 प्रतिशत के ब्याज़ दर पर
सब्सिडी दी जाती थी।इसमें से 4 प्रतिशत ब्याज़ के पैसे केन्द्र सरकार देती थी और
राज्य सरकार 2 प्रतिशत ब्याज़ देती थी।किसानों को सिर्फ़ 1% ब्याज़ देना होता पड़ता था।हालांकि अब किसान को
एक प्रतिशत ब्याज़ भी नही देना होगा।ये प्रतिशत ब्याज़ सरकार भरेगी।सरकारी आंकड़ों
के मुताबिक इस ब्याज़ को भरने की वज़ह से सरकार पर 700 करोड़ रुपये का अतिरिक्त
बोझ आएगा।
अब राहुल गांधी के
वादे की बात करें तो, राहुल ने कहा है कि हम किसानों का कर्ज़ 10 दिन के भीतर
किसानों का कर्ज़ माफ़ करेंगे।इससे पहले राहुल गांधी ने यूपी सरकार द्वारा किसानों
के कर्ज़माफ़ी के फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा कि वो खुश हैं कि बीजेपी ऐसा करने
पर मज़बूर हुई।किसानों को राहत देने के लिए केन्द्र सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर
प्रयास करना चाहिए।राज्यों के नाम पर किसानों के साथ भेदभाव करना ठीक नहीं है।
इन सब के इतर
केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यूपी सरकार के ऋण माफ़ी के फ़ैसले के वक़्त
ही स्पस्ट कर दिया था कि किसानों का कर्ज़ माफ़ करना केन्द्र सरकार के बस की नहीं
है।आगे उन्होंने कहा था कि ऐसा सम्भव नही है कि केन्द्र सरकार एक राज्य का कर्ज़
माफ़ कर दे और बाकी राज्यों का नही।राज्य सरकार यदि ऐसा करती है तो इसका ख़र्च भी
उसे ही उठाना होगा।ऐसे में सवाल ये बनता है कि राहुल के कर्ज़ माफ़ी का ऐलान कैसे
कर दिया है?
किसानों की समस्याओं
में एक समस्या ये भी है कि उनके जो रहनुमा हैं,जिसकी ज़िम्मेदारी है कि वो बेहतरी
के लिए सरकार से मांग करे,मगर अफ़सोस कि वो किसी ना किसी राजनीतिक दल का झण्डा
थामें हुए हैं।

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