गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

जानिए, पद्मावती विवाद के लिए कैसे दोनों पक्ष ज़िम्मेदार हैं!

‘इतिहास में कोई पद्मावती थी भी या नही?’ का पता तमाम विवाद और आरोपों के बाद भी पता नही चल पाया।इतिहास को ग़लत बताते हुए फ़िल्म ‘पद्मावती’ से वास्तविक ‘पद्मावती’ के होने की बात को बताने का जो हिंसक तरीका अपनाया गया था,एक लोकतांत्रिक समाज के लिए बेहद ख़तरनाक है।वैश्विक शान्ति के दूत महात्मा गांधी अपनी धरती हिन्दुस्तान,जहां से दुनियाभर में शान्ति पहुंचाने में अपनी ज़िन्दगी खपा दी।उन्हीं की धरती पर विवादित फ़िल्म को लेकर किसी के सिर कलम करने,तो किसी के नाक काटने तक की धमकी,आगजनी और किसी भी तरह की हिंसा का होना एक गंभीर और सोचनीय सवाल है,जिसपे व्यक्तिगत और सामाजिक रुप से सोचा जाना चाहिए।गांधी जी के कथन “अहिंसा सबसे बड़ा कर्तव्य है।यदि हम इसका पालन नही कर सकते हैं तो हमे इसकी भावना को अवश्य समझना चाहिए और जहां तक सम्भव हो हिंसा से दूर रहकर मानवता का पालन करना चाहिए।” को उग्र मत के सिद्धान्त को मानने वाले उन तमाम संगठनो और इंसानो के लिए,गली-मुहल्ले के चप्पे-चप्पे पर बड़े-बड़े अक्षरों में छपवा कर चिपका देना चाहिए।इस नेक स्व और परसंबंध कार्य की ज़िम्मेदारी समाज के हर व्यक्ति को निभाना चाहिए।
संजय लीला भंसाली की विवादित फ़िल्म पद्मावती ने पहली बार पद्मावती के काल्पनिक और वास्तविक चरित्र को लेकर साहित्यकारों और इतिहासकारों को सीरियस चुनौती पेश की। राजस्थान के राजपुताने के इतिहास पर काम करने वाली इरा चंद ओझा ने बीबीसी से बातचीत में साफ़-साफ़ कहा है कि ये चरित्र पुरी तरह काल्पनिक है।हिन्दी साहित्य के विद्वान रामचन्द्र शुक्ल ने भी इसे काल्पनिक चरित्र माना है।पद्मावती के काल्पनिक चरित्र होने की पुष्टि इस बात से भी होती है कि फ़िल्म पद्मावती, महाकाव्य ‘पद्मावत’ पर आधारित है जिसकी रचना 16वीं शताब्दी की है,जबकि अलाउद्दीन ख़िलजी का काल 14वीं शताब्दी की शुरुआत से शुरु होता है।इसलिए इस बात की संभावना ज़्यादा है कि महाकाव्य ‘पद्मावत’ के सूफ़ी कथाकार मलिक मुहम्मद जायसी ने कहानी को आगे बढ़ाने के लिए कल्पना का सहारा लिया हो।अलाउद्दीन के काल में जो रचनाएं लिखी गईं,उनमें तो पद्मावती नाम का कोई चरित्र भी नही है।
जनवरी में शुरु हुए इस विवाद को अबतक दोनों पक्षों की एक के बाद एक ग़लत कदम ने आग में घी का काम किया।करणी सेना और उनके समर्थकों ने देश के अलग-अलग हिस्सों में जो उपद्रव मचाया,वो सरकारों की सियासी मज़बूरियां और नाकामियों का ही प्रमाण है।हंगामेबाज़ो को ये समझना होगा कि उनके कृत्यों से समाज में बुरा प्रभाव पड़ता है।किसी भी विवाद को सुलझाने का एक मात्र तरीका संवाद ही है।समाज के हर व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है कि किसी भी विवाद में हिंसा को बढ़ावा ना दें।फ़िल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली,उनके समर्थन में सिर्फ़ अभिव्यक्ति की आज़ादी एवं रचनात्मकता स्वतंत्रता की बात करने वाले और राजपूत समाज को भला-बुरा कहने वाले ये भूल गये कि बिना प्रतिबंध वाला कोई भी व्यक्ति और समाज अव्यवस्था के रसातल की ओर चला जाएगा। भंसाली और करणी सेना जैसों के समर्थन में खड़े लोगों, ख़ासकर पत्रकारों के साथ मुख्यत: तीन समस्या होती है।पहला-वो एकपक्षीय हो जाते हैं,दूसरा- अपनी विचारधारा के अनुसार हीं चीजों को पढ़ते हैं और तीसरा- स्वतंत्रता के बारे में सिर्फ़ इतना ही जानतें हैं कि ‘हम’ यानि कर्ता जो भी कर रहा है वो सही है। ऐसे लोगों के लिए मैं एक जानकारी दे रहा हूं। उदारवाद के इतिहास के सबसे प्रभावशाली दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल का एक 'हानि सिद्धान्त' है।इस सिद्धांत को बताने से पहले ये बता दें रहा हूं मिल के अनुसार प्रतिबंध तभी लगाए जा सकते हैं जब किसी को पहुंचने वाली हानि अत्यंत गंभीर हो। सामान्य नुकसान के लिए कानूनी शक्ति के स्थान पर मात्र सामाजिक स्तर पर अमान्य करार देने की राय देते है।मिल ने अपने सिद्धांत में स्वसंबंद्ध और परसंबंद्ध कार्यों में अन्तर स्पस्ट किया है।स्वसंबंद्ध कार्य वे हैं जिनके बारे में यह कहा जा सकता है कि मेरा कार्य आपको किसी प्रकार से प्रभावित नहीं करता है तो इससे आपका कोई लेना देना नहीं हैं। परसंबंद्ध कार्य वे हैं जिनके बारे में यह कहा जा सकता है कि कर्ता के किसी गतिविधियों अथवा क्रियाकलापों से किसी को हानि पहुंचती है तो किसी-न-किसी बाहरी सत्ता का कर्त्तव्य है कि उन हानिकारक कार्यों से सुरक्षा प्रदान करें। स्वतंत्रता से संबंधित विषयों में राज्य किसी भी व्यक्ति को ऐसे क्रियाकलाप अथवा गतिविधियां करने से रोक सकता है जो किसी अन्य के लिए हानिकारक हो।अब आप परसंबंद्ध से फ़िल्म पद्मावती के विवाद के कारणों को जोड़ कर देखिए,पता चल जाएगा कि भंसाली ने कैसे समाज के एक जनमानस ठेस पहुंचाया है।
अब यहां पर फ़िल्म पद्मावती को लेकर भंसाली की एक के बाद की गई कुछ ग़लतियों के बारे में बताता हूं,जो विवाद का मुख्य कारण है-
-फ़िल्म को लेकर जब शुरू से ही विवाद है तो ट्रेलर में क्यों नहीं लिखा की फ़िल्म काल्पनिक है?
-करणी सेना और राजपूत सभा के अनुसार जब भंसाली ने राजपूत संगठनों से वादा किया था कि जब भी फिल्म -रिलीज होगी उससे पहले राजपूत संगठनों को यह फिल्म दिखाई जाएगी। उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया?
-फ़िल्म को लेकर जब पहली बार विवाद हुआ,तब से लेकर अबतक भंसाली ने विवाद को सुलझाने के लिए दूसरे पक्षों से बात क्यों नहीं की।यदि दूसरे पक्ष ने बात करने से इंकार किया तो लोगों को क्यों नहीं बताया?
-फ़िल्म को आख़िर भंसाली ने किस उद्देश्य से केन्द्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड को दिखाने से पहले कुछ चुनिंदा पत्रकारों को दिखाया?
-भंसाली जब संसदीय समिति के सामने ये कह रहें हैं कि फ़िल्म पद्मावती एक काल्पनिक है,तो किरदारों का नाम ऐतिहासिक क्यों रखा है?


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