आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गुजरात दौरे का दूसरा दिन हैं।पीएम मोदी आज अपने गृहनगर वडनगर में हैं।वडनगर से करीब 232 किलोमीटर दूर भरुच जिले के
एक एग्रीकल्चरल कॉलेज में हैलीपैड बना है।5 अक्टूबर को ‘द इण्डियन
एक्सप्रेस’ ने एक ख़बर छापी।ख़बर में बताया
कि एग्रीकल्चरल कॉलेज में करीब 40 हेक्टेयर में शोध के लिए उगाये गए कपास
में से हैलीपैड के लिए करीब 10 हेक्टेयर कपास के फ़सलों को काटा जा रहा
है।छात्र इस फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं। छात्रों का कहना है कि कपास की
फसलों के काटे जाने से उन्हें काफी नुकसान होगा
और उनके शोध में बाधा आएगी।सुत्रों के मुताबिक 28 किस्म के कपास,शोध के
लिए उगाये गये थे।यह दूसरी बार है जब फसलों को काटा जा रहा है।इससे पहले
मार्च में भी 'नव कृषि विश्वविद्यालय' (एनएयू) से मान्यता प्राप्त इस
एग्रीकल्चरल कॉलेज के परिसर में लगी फसलों को एक हेलीपैड
बनाने के लिए काटा गया था।छात्रों ने इस बात की लिखित शिकायत भरुच के
कलेक्टर से की है। पहले उन्होंने कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ कांतिलाल पटेल से
इस मामले पर बात की थी,लेकिन उन्होंने छात्रों की बातों को अनसुना कर
दिया।जब छात्रों के विरोध के बारे में कांतिलाल पटेल
से पूछा गया, तो उन्होंने कहा, 'ज़िला कलेक्टर ने हमसे कहा था कि वे हमारे
परिसर का इस्तेमाल प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के लिए हेलिपैड बनाने में
करना चाहते है। इसलिए हमने अपनी ज़मीन दे दी। मैं इस विषय पर अधिक नहीं
बोलना चाहता।'एनएयू के उप-कुलपति डॉ सीजे डोंगरिया
का कहना है, 'हमे बताया गया कि 8 अक्टूबर को भरुच में प्रधानमंत्री की एक
सार्वजनिक बैठक होगी। हमने उनसे कहा कि खेतों में कपास की फसल लगी है। तो
हमें कहा गया कि सुरक्षा कारणों से उन्हें काटना पड़ेगा।
प्रधानमंत्री के दौरे के लिए फ़सलों को काटने के कई उदाहरण मिल जाएंगे।
किसान जब फ़सल काटने का विरोध करते हैं तो मुआवज़ा देकर उनका मुंह बंद करा
दिया जाता है। छात्रों का काम मुआवज़ा से तो नहीं चलेगा ना?उपरोक्त घटना पर
गौर करेंगे तो सब आपको आदेश का पालन करते नज़र
आयेंगे।किसी ने छात्रों के मेहनत की परवाह नहीं की। मैंने गुगल पर कपास की
खेती के बारे में रिसर्च किया।रिसर्च में पाया कि बुआई के समय लाईन से
लाईन की दूरी कम से कम 70सीएम होनी चाहिए और पौधों से पौधों की दूरी 30सीएम
होनी चाहिए।एक जगह पर केवल तीन-चार बीज़ को बोना
चाहिए।कपास के फ़सल को तैयार होने में कम से 150-160 या ज़्यादा दिन लग
जातें हैं।इसकी निराई हर दस में की जाती है।बताइए इतनी मेहनत के बाद
छात्रोंं ने फ़सल उगाये थे।और सिर्फ़ सुरक्षा कारणों से उसको काट दिया गया।
जबकि प्रधानमंत्री तो कहीं और भी रैली कर सकते है।
भारत में कपास को 'सफ़ेद सोना' भी कहा जाता है। कपास भारत की आदि फ़सल है,
जिसकी खेती बहुत ही बड़ी मात्रा में की जाती है। यहाँ आर्यावर्त में
ऋग्वैदिक काल से ही इसकी खेती की जाती रही है। भारत में इसका इतिहास काफ़ी
पुराना है। हड़प्पा निवासी कपास के उत्पादन में संसार
भर में प्रथम माने जाते थे। कपास उनके प्रमुख उत्पादनों में से एक था।
भारत से ही 327
ई.प के लगभग यूनान में इस पौधे का प्रचार हुआ। यह भी उल्लेखनीय है कि भारत से
ही यह पौधा चीन और विश्व के अन्य देशों को ले जाया गया। व्यापारिक
दृष्टिकोण से भारत में मुख्यतः 14 क़िस्मों की कपास पैदा की जाती है।
कपास उत्पादन के क्षेत्र में गु़जरात का देश में पहला स्थान है।
17 मार्च 2017 को 'गांव कनेक्शन' वेबसाइट ने केन्द्रीय कपास अनुसंधान
संस्थान, नागपुर की एक ख़बर छापी।जिसमें संस्थान द्वारा एक नई किस्म विकसित
की है,जो मात्र 200 दिन में तैयार हो जाती है और इसमें बीमारियां भी नहीं
लगती हैं।''युगांक'' नामक कपास की इस नई किस्म
के बार में जानकारी देते हुए केन्द्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, नागपुर के
निदेशक डा. केशव राज क्रांति ने बताया '' हमारे संस्थान के वैज्ञानिकों ने 9
साल की मेहनत के बाद कपास की ऐसी वेराइटी को डेवलप किया है जो मात्र 100
दिन में तैयार हो जाएगी।केशव ने बताया कि संस्थान
के क्राप इंप्रूवमेंट डिपार्टमेंट के वैज्ञानिक संतोष और धारवाड़ के
प्रसिद्ध् कपास वैज्ञानिक
एस.एस.पाटिल ने कपास की इस नई किस्म को विकसित करने में लगे थे। इसमें
कपास किसानों के साथ नेटवर्क बनाकर काम किया गया। जिसका नतीजा है कि कपास
की यह किस्म विकसित हो पाई है।बताइए कितना मेहनत और इंतज़ार वाला काम
है,कपास की नई किस्म को तैयार करना।और सिर्फ रैली
के फ़सलों को काट दिया गया।
इंटरनेशनल कॉटन एडवाइजरी कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर, टेक्स्टाइल मंत्रालय
ने 9 मार्च को प्रेस रिलीज जारी कर बताया कि दुनियाभर में कपास उत्पादन
में भारत का स्थान पहला और निर्यात में दूसरा।भारतीय कपास का सबसेे ज़्यादा
निर्यात बांग्लादेश, पाकिस्तान, वियतनाम, इंडोनेशिया,टर्की
और थाईलैंड इत्यादि है।

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