नाउम्मीदी के बावजूद भी आपको ये ख़त लिख रहा हूं।बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज एण्ड हॉस्पिटल,गोरखपुर में बच्चों की हुई मौत के करीब-करीब तीन दिन बीत चुके हैं।मुझे मालूम नही की आप बच्चों की मौत से कितने आहत हुए थे,लेेकिन आपके राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को कई माताओं की गोद सुनी हो जाने की बात आम बात लगी है।मैंने ये ख़त आलोचना या इस्तीफ़ा देने जैसी बातों के लिए नही लिख़ा है।क्योंकि सत्तानशी को आलोचनाओं से फ़र्क नही पड़ता है।और यदि इस्तीफ़े से चीजें बदल जाती तो आपके ही दादाजी (लाल बहादुर शास्त्री जी) नें 1956 में हुए एक रेल हादसे पर इस्तीफ़ा दे दिया था,लेकिन आज रेलवे की क्या हालात है सबको पता है।बल्कि मैंने ये ख़त एक विशेष गुज़ारिश के लिए लिखा है।घटना के तकरीबन तीन दिन बीत जाने के बाद सब कुछ सामान्य सा हो गया है। अब आपको टीवी में अपने बुझ चुके चिराग को लेकर फुटकर-फुटकर रोते -बिलखते परिजन नही दिखाई देंगे।गुज़ारिश ये है कि जिस दिन मेरी ये चिट्ठी आप के हाथ लगे,उस दिन किसी एकान्त जगह पर जाकर दो दृश्यों को याद कीजिएगा।पहली दृश्य -जिस दिन आप ने हिन्दुस्तान के सबसे बड़े राज्य के स्वास्थय मंत्री के रुप में शपथ लेते वक़्त जो बात कही थी और दूसरी दृश्य-बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज एण्ड हॉस्पिटल,गोरखपुर में फुटकर-फुटकर रोते -बिलखते उन परिजनों की जिनका चिराग हमेशा-हमेशा के लिए बुझ गया है।उम्मीद है इन दोनों तस्वीरों से ये साफ़ हो जाएगा कि इस घटना से पहले आपने अपने कर्तव्य का पालन कितनी ज़िम्मेदारीपूर्वक निभाया है।
आज़ हमारा देश आज़ादी की 70वीं सालगिरह के जश्न में डूबा हुआ है। हर हिन्दुस्तानी अपने-अपने तरीके से आज़ादी का जश्न मना रहा है।आज़ आपने उन नन्हें-नन्हें बच्चे-बच्चियों को तो देखा ही होगा जो आज़ादी के इस पावन पर्व में झुमते हुए नज़र आये होंगे,ठीक उसी तरह अपनी जगह उन माता-पिता को रख के सोचिए जिसके बच्चे को,आपलोगों के सामुहिक लापारवाही ने उनकी चिराग को बुझा दिया।17 परिजनों ने तो अपने बच्चे का नामकरण तक नही किया था।हैरानी की बात ये है कि लाल किले के प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने गोरखपुर हादसे का ज़िक्र तो किया,लेकिन चन्द शब्दों में वो भी बिना गोरखपुर का नाम लिए।इसको क्या समझा जाए?
घटना का आज़ चौथा दिन है। बीआरडी अस्पताल में बच्चों की मौत,व्यक्तिगत लापरवाही से हुई कि सामूहिक लापरवाही से,अबतक पता नही चल पाया है।क्या उम्मीद की जा सकती है कि दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई होगी?हत्या से जुड़ी अबतक के सभी घटनाक्रम पर डाले तो,जो मैं समझ पा रहा हूं वो ये है कि आप सब लोग अपने आप को निर्दोष ठहरा रहें है।फ़िर आख़िर इतने बच्चों की जान कैसे चली गई?डीएम,अस्पताल प्रशासन और एक स्वास्थ्य मंत्री के नाते,आपलोगों के बयान में काफ़ी भिन्नता नज़र आ रही है।मौत के कारणों पर डीएम के रिपोर्ट के बावजूद भी अापलोग(सरकार)मानने के लिए तैयार नही है कि बच्चों की जान अॉ़क्सीजन की वज़ह से गई है।जबकि डीएम ने अपने रिपोर्ट में साफ़-साफ़ कहा है कि अॉक्सीजन सप्लाई में बाधा उत्पन्न होने के कारण मौत हुई है।कितने बच्चों की उस दिन मौत हुई,इसका भी अधिकारिक आंकड़ा नही पता चल पाया है।
दुख की घड़ी में विपक्षी नेताओं का गोरखपुर अस्पताल का दौरा करके,अपनी उपलब्धियों को गिनाने वाली बात तो समझ आती है,लेकिन आपका प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ये कहना कि अगस्त में तो मौतें होती रहती है और साल दर साल मौत के आंकड़े को गिनाने वाली बात आज़ तक समझ नही आई।इन बातों से आप क्या साबित करना चाहते थें?क्या इसी के लिए यूपी की जनता ने आपको चुना था?या फ़िर जनता के लिए कहीं इस बात का संकेत तो नही है कि "सिर्फ़ सरकार बदली है व्यवस्था नही?" रही बात सत्तावीहीन नेताओं की तो,कम से कम उनको तो इस दुखद वक़्त में ये सोचना चाहिए था कि यदि वो इतने ही अच्छे होते तो जनता उनको सत्तावीहीन क्यों करती।मीडिया की रिपोर्टिंग और सोशल मीडिया ने मुद्दे को भटका दिया है।मौत के कारणों की जांच और दोषियों पर कार्रवाई से भटक कर मामला इंसेफेलाइटिस वार्ड के डॉ.कफ़ील और साम्प्रदायिक बना दिया गया है।अब सिर्फ़ डॉ.कफ़ील के बारे में बात हो रही है और रिपोर्ट छप रही है।इससे क्या ये अनुमान किया जाए कि बच्चों की मौत के ज़िम्मेदार सिर्फ़ कफील ही हैं?
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें