गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

केन्द्र में मज़बूत बीजेपी, बिहार में मजबूर क्यूँ?

बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए में सीटों का बंटवारा हो चुका है। बड़े भाई की भूमिका में रहने वाले जेडीयू के ख़ाते में कुल 122 सीटें मिलीं हैं,जिसमें से 7 सीटों पर जीतन राम मांझी की पार्टी चुनाव लड़ेगी। वहीं बीजेपी के ख़ाते में 121 सीटें हैं जिसमें से मुकेश साहनी की पार्टी 'वीआईपी' 11 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। कुल मिलाकर बिहार में एनडीए में दलों की संख्या चार है।
सीट बंटवारे के ऐलान के बाद बीजेपी का पूरा फ़ोकस इस बात पर रहा कि बिहार में एनडीए का चेहरा नीतीश कुमार ही होंगे और कोई नहीं, सीटें चाहे जितनी भी आए, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही होंगे। प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि "मीडिया के बंधुओं से भी अनुरोध है कि किसी भी तरह के भ्रम में न पड़े। कहीं कोई कंफ़्यूजन, इफ़ या बट नहीं है। नीतीश कुमार जी ही एनडीए के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। सुशील मोदी ने लोजपा अध्यक्ष चिराग़ पासवान के फ़ैसले पर तंज़ कसते हुए कहा कि श्री नीतीश कुमार जी ही एनडीए के सर्वमान्य नेता हैं। और जो उनको नेता मानेगा, वही एनडीए में रहेगा। हाल ही मोदी सरकार में केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा ने नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है।
बिहार बीजेपी के अध्यक्ष डॉक्टर संजय जयसवाल ने कहा कि "मैं फिर से एक बार दोहराना चाहता हूं कि बिहार में नीतीश कुमार जी ही एनडीए गठबंधन के सीएम पद के उम्मीदवार हैं। हम एक बार फिर 2010 का इतिहास दोहराने जा रहे हैं और तीन-चौथाई बहुमत के साथ जीत कर आएंगे।
बीते मंगलवार को बिहार बीजेपी के इन दो बड़े नेताओं के बयान के बाद मेरे ज़हन में दो सवाल आए। पहला सवाल- बीजेपी, जो ख़ुद को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी मानती है, आख़िर वो बिहार में जेडीयू के नेतृत्व में चुनाव क्यूँ लड़ना चाहती है? दूसरा सवाल- आख़िर वो कौन सी मजबूरी कि राष्ट्रीय स्तर पर NDA का नेतृत्व में करने वाली बीजेपी, बिहार में जेडीयू के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है? इस दोनों सवालों का जवाब इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारियों से मिलता है। बीजेपी और जेडीयू के बीच लोकसभा और विधानसभा चुनावों को लेकर तुलनात्मक अध्यन्न करें तो मालूम चलता है कि बीजेपी से ज़्यादा पॉप्यूलर जेडीयू है या यूँ कहें कि बिहार में बीजेपी से ज़्यादा जेडीयू पर लोगों का भरोसा है। मैं पिछले चार लोकसभा चुनावों में बीजेपी और जेडीयू की विजेता सीटों का आंकड़ें को इकट्ठा किया, उसमें से मैंने पाया कि साल 2014 का आम चुनाव छोड़ दें तो बीजेपी हमेशा जेडीयू से पिछे रही,या मामूली अन्तर से जेडीयू पीछे रही है। साल 2014 का वो चुनाव जिसमें हिन्दुस्तान को बताया गया था कि सिर्फ़ मोदी ही है जो सब कुछ बदल सकते हैं उसके अलावा कोई नहीं। इसी वज्ह से बिहार के लोगों ने भी 30 सीटों में से 22 सीटें बीजेपी के ख़ाते में डाले थे और जेडीयू 38 में से मात्र 2 सीटें जीत सकी। साल 2019 में बीजेपी को जहां 17 सीटें मिलीं, वहीं दूसरी तरफ़ जेडीयू को 14 सीटें मिलीं। ये हाल तब है जब नरेन्द्र मोदी दूसरी बार पीएम बने। साल 2004 में बीजेपी को 5 तो, जेडीयू को 6 सीटें मिली थी। अगर साल 2009 के चुनाव की बात करें तो जेडीयू को कुल 20 सीटें तो वहीं बीजेपी को मात्र 13 सीटों से संतोष करना पड़ा था। बीते बीस साल के इन आंकड़ों के आधार पर देखें तो अब भी बिहार बीजेपी में राजकीय स्तर पर एक भी ऐसा चेहरा नहीं जो प्रभावशाली हो, बीजेपी को लीड करने की क्षमता हो।
अब अगर बात विधानसभा चुनावों की करें तो साल 2015 के चुनाव में जेडीयू और बीजेपी एक-दूसरे के ख़िलाफ़ चुनाव लड़े थे, जिसमें मोदी लहर के बावजूद विधानसभा चुनाव में बिहार के लोगों ने बीजेपी से ज़्यादा जेडीयू में लोगों ने भरोसा दिखाया था। वो दौर ऐसा था कि एक के बाद एक बीजेपी राज्य दर राज्य चुनाव जीतते जा रही थी। साल 2015 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मात्र 53 सीटें और जेडीयू को 71 सीटें मिली थी। साल 2005 के विधानसभा चुनाव में एक ही साल में दो बार चुनाव हुए उसमें भी बीजेपी को दूसरी बार भी जेडीयू से कम सीटें मिली। बिहार के लोगों ने जेडीयू को 88 सीटों पर विजेता बनाया तो वहीं बीजेपी 55 सीटें ही हासिल कर पाई। अब ज़िक्र साल 2010 के विस चुनाव का करते हैं, जिसके बारे में मंगलवार को हुई NDA की पीसी में बिहार बीजेपी अध्यक्ष संजय जयसवाल ने की थी। डॉ.जयसवाल ने कहा था कि हम एक बार फिर 2010 का इतिहास दोहराने जा रहे हैं और तीन-चौथाई बहुमत के साथ जीत कर आएंगे। साल 2010 मे बीजेपी-जेडीयू को क्रमश: 115 और 91 सीटें मिली थी। डॉ.जयसवाल शायद यह बात कहते हुए भूल गए थे कि वो साल दूसरा था ये साल दूसरा है। साथ में भारतीय राजनीति में एंटी इनकम्बेंसी नाम की कोई चीज़ होती है। भले ही सीएम नीतीश कुमार इस बात को न स्वीकार करें, लेकिन लॉकडाउन के दौरान दूसरे राज्यों में फंसें बिहारियों में नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ काफ़ी नाराज़गी है। बीजेपी ने ऐसा कौन सा काम किया जिससे लोगों की नाराज़गी कम हो सके? आंकड़ें इस बात की साफ़-साफ़ गवाही दे रहें हैं कि आख़िर बिहार में बीजेपी क्यूँ मजबूर है। बिहार बीजेपी में फ़िलहाल ऐसा कोई नेता नहीं मालूम पड़ता है जो चेहरा बन सके। एक नेता हैं सुशील कुमार मोदी, जिनकों सिर्फ़ इतने में ही ख़ुशी मिलती है कि डिप्टी सीएम वाली उनकी कुर्सी बरक़रार रहे।

मंगलवार, 14 जुलाई 2020

एमपी के बाद राजस्थान की सियासी संकट से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को सबक सीखनी होगी।



राजस्थान में सियासी घमासान जारी है। आज कांग्रेस के आला कमान ने सचिन पायलट को उप-मुख्यमंत्री और राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष पद से बर्खास्त कर दिया है, जिसके बाद टोंक ज़िले के 59 ऑफ़िस बेयर्स ने इस्तीफ़े का ऐलान कर दिया है। आने वाले समय में कांग्रेस की मुश्किलें और नहीं बढ़ सकती, ऐसा नहीं कहा जा सकता है। रणदीप सुरजेवाला ने जब सचिन को पद से बर्ख़ास्त किए जाने का ऐलान किया है, उसके बाद कांग्रेस के बहुत सारे नेता ट्वीटर पर अफ़सोस जता रहे हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के बाद एक और तेज़ तर्रार नेता का नाता कांग्रेस पार्टी से टूट गया है। हाल कांग्रेस पार्टी के बहुच सारे नेता कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के ख़िलाफ़ बोल तो रहे हैं लेकिन संजय झा जितना खुल कर कोई क्यूँ नहीं बोल रहा है, यह समझ से परे है। आख़िर ऐसे नेताओं को किस बात का डर है, पार्टी से निकाल दिए जाने या पार्टी में किसी पद पर हैं तो उससे हटा दिए जाने का? नेहरू परिवार के ग़लत और वक़्त की मांग के अनुसार राजनीतिक समझ में फ़ेल होने से अगर जीते हुए राज्य से भी सत्ता हाथ से चली जाए तो फिर पार्टी में रहने का क्या मतलब है?पार्टी की बदहाली पर ट्वीट करने वाले सभी नेताओंं को एकजुट होना चाहिए और सोनिया और राहुल गांधी से बात करनी चाहिए। बातचीत करने से समस्या का समाधान होता है इसलिए बातचीत करनी चाहिए। हो सकता है कि सोनिया और राहुल गांधी समझ जाएं कि कांग्रेस एक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी नहीं है जिसकी बागडोर हमेशा नेहरू परिवार के हाथों में रहेगी। सोचिए अगर सोशल मीडिया पर लिखने/ बोलने वाले नेता इस बात में कामयाबी हासिल कर लेंगे तो कैसा होगा। कांग्रेस की कायाकल्प ही हो जाएगी। लेकिन इसके लिए बात करनी होगी।

साल 2018 में राजस्थान और मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही फ़र्स्ट और सेकेण्ड जनरेशन के नेताओं के बीच सत्ता की बागडोर सम्भालने के लेकर घमासान जारी है। एमपी में आपने पहले ही देख लिया और अब राजस्थान में  घमासान जारी है। मुझे ठीक-ठीक याद है कि जब  इन दोनों विधानसभा के नतीजे आए थे इस वक़्त भी मुख्यमंत्री पद लेकर घमासान मचा हुआ था। सचिन तो आसानी से मान गये थे,लेकिन ज्योतिरादित्य ने नहीं माना था। ज्योतिरादित्य अब बीजेपी में हैं, सचिन अपनी राजनीति को कैसे आगे बढ़ाते हैं इसके लिए इन्तज़ार करना होगा। क्योकिं ज्योतिरादित्य की तरह सचिन ने कभी कुछ ऐसे संकेत नहीं दिए है कि अगर कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व उनकी नहीं सुनता है तो उनके लिए बीजेपी के द्वार खुले हुए हैं।

मुझे लगता है कि सोनिया और राहुल गांधी को अब यह समझ लेना चाहिए कि मां-बेटे के नेतृत्व वाली कांग्रेस को शायद देश की जनता और पार्टी के बहुत सारे नेता स्वीकार नहीं कर रहे है। वक़्त बदल चुका है देश की जनता नए  जनरेशन के युवा नेताओं के साथ नए तरीक़े से आगे बढ़ना चाहती है। युवा नेता कहे जाने वाले राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस का क्या हाल हुआ है,किसी से छिपा नहीं है। पत्रकारों की तरह प्रियंका गांधी वाड्रा में इंदिरा गांधी जैसी करिश्माई शैली देखकर वक़्त बर्बाद करने से कोई फ़ाइदा नहीं है। प्रियंका गांधी कांग्रेस को जितना बुलन्द कर सकती थीं कर दी, अब इससे ज़्यादा कुछ नहीं कर सकती हैं। मतलब नेहरू परिवार से कांग्रेस पार्टी की बागडोर किसी अन्य व्यक्ति के हाथों में जाना चाहिए, जो बदलती राजनीति को समझता हो। एक युवा नेता के भरोसे पार्टी कितने दिनों तक चलेगी। वक़्त बदल गया है दूसरे युवाओं को भी मौक़ा मिलना चाहिए।

बुधवार, 17 जून 2020

भारत-चीन सीमा-विवाद: संयम बरतने का वक़्त है जनाब!

भारत-चीन सीमा विवाद में 20 जवानों की शहादत के बाद चीन के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर आक्रोश और अपशब्दों के बाढ़ आ गए हैं। क्या आम क्या ख़ास, सब ग़ुस्से में हैं। और हो भी क्यूँ ना, माँ भारती की रक्षा में हमारे 20 जवान वीरगति को प्राप्त हुए हैं। लेकिन ग़ुस्से का इज़हार करते वक़्त याद रखना चाहिए कि आवेश में आकर हम कुछ ऐसा तो नहीं कर रहे हैं, जिससे दुश्मन को फ़ाइदा हो जाए... हमारे किए को सबूत बनाकर वैश्विक स्तर पर भारत के ख़िलाफ़ चाइना उसका इस्तेमाल ना कर लें।

बहुत सारे पत्रकारों का भी पोस्ट पढ़ा, वे लोग भी भड़काने जैसे वाक्य लिखे हैं। कई तो कह रहे हैं कि तोप,बम-बारूद किस लिए रखे हो..चीन को सबक़ सिखाने के लिए उसका इस्तेमाल करना चाहिए। ऐसे बन्धुओं से अनुरोध है कि जब ग़ुस्सा आए तो एक गिलास ठंडा पानी पिएं और फिर सोचे कि वो जो हिंसक ख़याल उनके मन में आया है,उससे कोई फ़ाइदा होगा? युद्ध से ना तो विवाद समाप्त होता और ना ही शान्ति स्थापित होती है, फिर युद्ध क्यों करना? गांधी की धरती से पूरी दुनिया में अहिंसा का सन्देश फैला और उन्ही की धरती से मरने-मारने की बात होना,थोड़ा अजीब है। 

जैसा कि हम सब जानते हैं कि चाइना एक धोखेबाज़ देश है। छल उसके डीएनए में है। यह कई मौक़ों पर साबित हो चुका है और इस बार फ़िर उसने साबित कर दिया है। 6 जून को कमांडर लेवल की बातचीत में तय हो गया था कि दोनों देश के सैनिक अपनी-अपनी सीमा में लौट जाएंगे, लेकिन चीन ने ऐसा नहीं किया है। अभी कुछ देर पहले दोनों देश के विदेश मंत्रियों की बातचीत में भारत के विदेश मंत्री एस.जयशंकर ने चेताया है कि LAC पर चीन अगर अपनी आदत से बाज नहीं आता है तो द्विपक्षीय रिश्ते पर असर पड़ेगा। बातचीत में दोनों से कशीदगी कम करने पर सहमति बनी है। देखना होगा चाइना क्या करता है।

भारत सरकार सीमा-विवाद को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी देती नहीं है, यह आदत बदलनी चाहिए। भारत..चाइना जैसा नहीं है कि कितने जवान मारे गए, उसकी जानकारी अपने देशवासियों को भी नहीं देता है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है और सरकार की ज़िम्मेवारी होती है विपक्षी दलों और देशवासियों को जानकारी दे कि सीमा पर क्या हालात हैं। लोगों को भी सरकार से सवाल पूछना चाहिए, ज़िम्मेवारी तय करनी चाहिए कि सीमा पर क्या हालात है, वरना चाइनीज़ ऐप अन-इंस्टॉल और चाइनीज़ सामानों का बहिष्कार करते रह जाएंगे और चीन हम पर ज़ुल्म करता रहेगा।

बुधवार, 3 जून 2020

कोरोना काल में ‘क्या करें...क्या ना करें’


फ़िल्म रंगीला का एक गाना है क्या करें क्या ना करें कैसी मुश्किल है, कोई तो बता दे इसका हल ओ मेरे भाईमुझे लगता है कि कोरोना संकट में पुरे दुनिया की यही स्थिति है। हर देश की निगाहें उस संस्था पर जाके टिक जाती है जो कोरोना वायरस की वैक्सीन तैयार करने या उसके लक्षणों पर रिसर्च कर रहा है, लेकिन पुख़्ता तौर पर अभी भी कोई कोरोना संकट का हल नही बता पाया है। ऐसे में दुनियाभर में असंमजस की स्थिति बनी हुई है कि संकट से निजात पाने के लिए क्या किया जाए, कौन सा क़दम उठाया जाए जिससे कोरोना संक्रमण की श्रृखंला टूटे।

हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने लॉकडाउन 1.0 का ऐलान करते वक़्त भी इसी बात पर ज़ोर दिया था कि किसी भी तरह से हमें कोरोना के संक्रमण को तोड़ना है और इसके लिए सबसे ज़रूरी है सोशल डिस्टेंसिंग। तब देश में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 564 थी। इसके बाद लॉकडाउन 2.0, 3.0, 4.0 और अब हमारा देश अनलॉक 1.0 हो गया है। मतलब कुछ गतिविधियों को केन्द्र सरकार ने सशर्त खोल दिया है, कुछ गतिविधियों को आने वाले दिनों में धीरे-धीरे खोल दिया जाएगा और साथ ही राज्यों को अधिकार दे दिया है कि यदि राज्य सरकार चाहे तो कुछ गतिविधियों पर पाबन्दी आयत कर सकती है। चार लॉकडाउन के बाद वर्तमान में देश में कोरोना वायरस से मरीज़ों की संख्या एक लाख के पार है, एक लाख़ से ज़्यादा लोग स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं और पांच हज़ार से ज़्यादा लोगों की ज़्यादा लोगों की दुर्भाग्यपूर्ण मौत हो चुकी है। मतलब कुल मिलाकर क़रीब 135 करोड़ की आबादी वाले हमारे देश में कोरोना वायरस के कुल मरीज़ों की संख्या 2,07,615 है। अच्छी बात यह है कि यदि आज के आधार पर बात करें तो आज कोरोना से पूरे देश में 8,909 लोग वायरस से संक्रमित हुए हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ 4,776 लोग ठीक भी हुए हैं, मतलब जितने लोग संक्रमित हुए उससे आधे से ज़्यादा लोग ठीक हुए। लेकिन कोरोना वायरस से एक व्यक्ति का भी संक्रमित होना हमारे लिए चिन्ता की बात है। भारत में जब पहली बार लॉकडाउन का ऐलान किया था तब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत की तारीफ़ की थी और कहा था कि केन्द्र सरकार ने बहुत सही समय पर तालाबन्दी का फ़ैसला किया है। और उसके बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन  ने दुनिया को समय-समय पर चेताया कि यदि तालाबन्दी खोलने में किसी ने भी जल्दबाज़ी की तो नताइज बुरे होंगे। मतलब साफ़ है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन तब तक तालाबन्दी के पक्ष में है जबतक कोरोना वायरस के संक्रमण का ख़तरा समाप्त नहीं हो जाता है। अब सवाल है कि आख़िर कितने दिनों तक देश को लॉकडाउन रखा जा सकता है? शायद यह जवाबहीन सवाल है। वज्ह ये है कि कोरोना वायरस के संक्रमण के बारे में अबतक कोई पुख़्ता जानकारी नहीं मिल सकी है। रोज़ नये-नये लक्षण और नई-नई जानकारी सामने आ रही है। ऐसे में बहुत मुश्किल काम है यह ठीक-ठीक बता पाना कि कितने दिनों की तालाबन्दी के बाद कोरोना का संक्रमण ख़त्म हो जाएगा। शायद इसी वज्ह से दुनियाभर के देशों में तालाबन्दी को धीरे-धीरे हटाकर आर्थिक गतिविधियों को शुरू किया जा रहा है, ताकि भूखमरी की स्थिति ना उत्पन्न हो जाए। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए अब जान भी और जहान भी  ज़रुरी है, इसलिए सरकार ने तालाबन्दी खोल दिया है। ऐसी स्थिति में एक नागरिक के रूप में हम सब की ज़िम्मेवारी बनती है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सुझाए उन तमाम उपायों का पालन करें जब तक कोरोना से ठीक होने का इलाज नहीं मिल जाता है। घर से बाहर निकलते समय ग्लब्स और फ़ेस मास्क का इस्तेमाल करें, दो मीटर की दूरी बनाए रखें, कोशिश करें कि किसी भी भीड़ में शामिल ना हों चाहे कुछ ख़रीदना ही क्यूँ ना हो। ऑफ़िस/ काम से लौटने के बाद कोशिश करें कि बच्चों और परिवार के बुढ़े लोगों के सम्पर्क में बिना ख़ुद साफ़-सुथरा किए हुए ना आये। 

बुधवार, 27 मई 2020

पंडित जवाहरलाल नेहरू का समाजवाद पर नज़रिया-

आज पूरा देश आधुनिक भारत के प्रणेता कहे जाने वाले पहले प्रधानमंत्री को याद कर रहा है। इसी क्रम में समाजवाद पर नेहरू जी के नज़रिए को आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मैं भारत के पहले वज़ीर-ए-आज़म को अलग-अलग माध्यमों से जानने की कोशिश करता हूँ। इसी क्रम में कुछ दिनों पहले मैंने लेखक हंसराज रहबर की लिखी किताब ' नेहरू बे-नक़ाब' पढ़ी। आइए जानते हैं कि पंडित जी का समाजवाद पर क्या नज़रिया था। पंडित जी समाजवाद के बारे में क्या सोचते थें। किताब में लिखा है- 

जवाहरलाल ने करंजिया के साथ अपनी भेंट में कहा था, " मैं समाजवाद में पिछले पचास वर्षों से विश्वास करता आ रहा हूँ और उसमें विश्वास करता तथा उसके लिए काम करता रहूँगा।" ( द माइंड ऑफ़ मिस्टर नेहरू)

लेकिन उनके इस विश्वास का दार्शनिक आधार क्या था? और उनके दिमाग़ में समाजवाद की धारणा क्या थी? 15 अगस्त 1958 को नेहरू जी ने अपने 'मूलभूत दृष्टिकोण' निबंध में लिखा था," लेकिन, समाजवाद क्या है? इसका कोई ठीक उत्तर देना कठिन है और समाजवाद की अनेक परिभाषाएं हैं। कुछ लोग शायद अस्पष्ट ढंग से सिर्फ़ यह सोचते हैं कि वह कोई अच्छी चीज़ है और उसका मक़सद समानता स्थापित करना है। पर यह सोच हमें किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचाती है।" जब पंडित नेहरू के पास जब कोई ठोस उत्तर नहीं और उनके दिमाग़ में समाजवाद की कोई निश्चित परिभाषा ही नहीं तो उनका विश्वास कैसे बना? और उन्होंने किस समाजवाद के लिए क्या काम किया? इस सिलसिले में स्पष्ट बात उन्होंने सिर्फ़ इतनी ही कही है कि, " समाजवाद बुनियादी तौर पर पूंजीवाद से भिन्न मार्ग है तथापि ख़याल है कि दोनों का बड़ा अन्तर ख़त्म होता जा रहा है क्योंकि समाजवाद के बहुत से विचार धीरे-धीरे पूंजीवादी व्यवस्था का अंग बनते जा रहे हैं।" मतलब समाजवाद के विचार अपना लेने से ख़ुद पूंजीवाद के समाजवाद में बदल जाने की सम्भावना है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू समाजवाद पर मार्क्स के वैज्ञानिक परिभाषा को स्वीकार नहीं करते थें,क्योंकि उनके अनुसार कम्युनिज्म मनुष्य की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है। कम्युनिज्म में व्यक्ति को समाज पर क़ुर्बान किया जाता है। इससे भी ज़्यादा नेहरू को कम्युनिज्म से इस बात से ऐतराज़ था कि कम्युनिज्म का ताल्लुक़ हिंसा से है जो गांधी के शान्तिपूर्ण और अहिंसात्मक मार्ग से बिल्कुल विपरीत है।

(नोट- मैं नेहरूवियन नहीं हूँ। मैं नेहरू जी को जानने की कोशिश कर रहा हूँ। इसलिए मैं दावे के साथ नहीं कह रहा हूँ कि मैंने जो आपके साथ साझा किया है, वही अन्तिम सत्य है। इसलिए किसी पाठक के पास नेहरू जी का समाजवाद के प्रति इससे इतर भी नज़रिया था,तो कृपया साझा करें ताकि मैं भी जान सकूँ)

बुधवार, 22 अप्रैल 2020

टाइम टू एक्जिट फ़्रॉम 'द थॉट्स ऑफ़ हिप्पोक्रेटिक गैंग'

पिछले एक हफ़्ते से कोरोनावायरस संकट के बीच हमेशा की तरह हिन्दू-मुस्लिम टॉपिक पर चर्चा अपने चरम पर है। ऐसी चर्चाओं से ना तो घबराने की ज़रूरत है और ना ही ज़्यादा रूचि लेने की ज़रूरत है, क्योंकि इसमें कुछ नया नहीं है। ये सब पहले से होता आ रहा है और आगे भी जारी रहेगा क्योंकि यह करने वाले जो भी हैं, वो 'हिन्दू-मुस्लिम' टॉपिक में फंसे लोग हैं, जो ख़ुद को इस दलदल से निकालने की बजाय युवाओं को फंसाते रहते हैं। मेरे कई साथी भी ' थॉट्स ऑफ़ हिप्पोक्रेटिक गैंग' से प्रभावित हैं। कोई जाति तो कोई धर्म के नाम पर किसी के ख़िलाफ़ ज़हर बोते रहते हैं। बहुत सारे उदाहरण दे सकता हूँ, लेकिन पिछले एकाध-दो हफ़्ते के दो उदाहरण आपको दे रहा हूँ, ताकि समझने में आसानी होगी कि लोग कैसे धर्म को लेकर अंटके हुए हैं। 

हिन्दुस्तान में Pandemic कोरोनावायरस के साथ-साथ Infodemic और समाज के उपद्रवियों से भी लड़ाई चल रही है। इसी से संबंधित दो ताज़ा उदाहरण देता हूँ।
एक दिन मैंने फ़ेसबुक पर इस बात की जानकारी दी कि राजस्थान के दो मुस्लिम युवकों को पुलिस ने टिकटॉक के माध्यम से अफ़वाह फैलाने के मामले में गिरफ़्तार किया है। तो मेरे एक मुस्लिम मित्र ने आपत्ति दर्ज कराई और कॉमेंट किया कि क्या हिन्दू- मुसलमान किए हो? तो मैंने पूछा कि क्या आप नहीं चाहते हैं कि फ़ेक न्यूज़ पर लगाम लगे? आज तक उन्होंने जवाब नहीं दिया है। 
दूसरा उदाहरण, 19 अप्रैल को मैंने लिखा कि "एक तरफ़ देश के अलग-अलग हिस्सों से ख़बरें आ रही हैं कि एक वर्ग पुलिसकर्मियों और चिकित्साकर्मियों पर लाठी-डंडों और पत्थर से हमले कर रहे हैं, जान लेने पर आमदा हैं। वहीं दूसरी तरफ़, एक दूसरा वर्ग है जो कोरोनावायरस से हमें-आपको बचाने में जुटे हुए हैं,उनका सम्मान भी किया जा रहा है।" मेरे इस बात पर एक मित्र ने 'वर्ग' शब्द का इस्तेमाल किए जाने को लेकर आपत्ति जताई। उनको लगा कि वर्ग लिखने से मेरा संबंध मुस्लिमों से है, जबकि मैंने वर्ग शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया था क्योंकि देश के अलग-अलग हिस्सों में कहीं कोरोना वॉरियर्स पर हमले हुए तो कही स्वागत हुए। लेकिन मैंने अपने मित्र को कोई जवाब देना उचित नहीं समझा, क्योंकि मैं जानता हूँ कि इस बहस में फंसने का मतलब है समय की बर्बादी। हक़ीक़त क्या है किसी से छिपा है? आज सरकार ने स्वास्थ्यकर्मियों पर बढ़ते हमलों को देखते हुए एक अध्यादेश लाई है। इस अध्यादेश की जानकारी देते हुए केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले को बर्दास्त नहीं किया जाएगा। हमला करने वालों को जमानत नहीं मिलेगी और एक साल के भीतर सुनवाई पूरी की जाएगी। इसमें 50 हज़ार से 2 लाख रूपये तक जुर्माने और 3 महीने से 5 साल तक की सज़ा का भी प्रावधान है। गम्भीर चोट के मामले में अधिकतम सात साल की सज़ा हो सकती है।
                                      ये दोनों उदाहरण मैंने अपने मुस्लिम मित्रों के दिए हैं। सिर्फ़ यह बताने के लिए कैसे लोग 'हिन्दू-मुस्लिम' में फंसे हुए हैं कि सच को सुनने और हर बात को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से देखने के सिवा कोई उपाय ही नहीं रह गया है। मुझे लगता है कि देश के युवाओं को 'द थॉट्स ऑफ़ हिप्पोक्रेटिक गैंग' से बाहर निकलना चाहिए और बिना लेकिन-किन्तु- परन्तु के सच को सच कहने और सुनने की आदत डालनी चाहिए। किसी की भी ग़लती से किसी की ग़लती को जस्टिफ़ाई नहीं किया जाना चाहिए। 
अब बात करते हैं तब्लीग़ी जमात की। हिन्दुस्तान में कोरोनावायरस से संक्रमित लोगों में से अकेले 30 फ़ीसद लोगों के संबंध जमात से हैं। बिल्कुल शुरुआत में जब जमात का मामला सामने आया था तो स्वघोषित सेकुलरों ने 'छिपे' शब्द को लेकर आपत्ति जताई थी। आज आलम यह है कि राज्य सरकारें बार-बार अपील कर रही हैं कि जमात के लोग ख़ुद से सामने आएं और अपनी जांच कराएं, नहीं तो जानकारी मिलने पर क़ानूनी कार्रवाई होगी, तब भी लोग सामने नहीं आ रहे हैं। जमात से जुड़े लोगों की कई ऐसी शर्मनाक़ हरक़तें सामने आईं, जिसकी मज़म्मत बहुत सारे मुसलमानों ने भी किए है। सोमवार को ख़बर आई थी कि हरिद्वार के एक क्वॉरेंटाइन सेंटर से तब्लीग़ी जमात से जुड़ा शख़्स भाग गया था, जिसको बाद में गिरफ़्तार कर लिया है। गूगल करेंगे तो तब्लीग़ी जमात से जुड़े लोगों की बहुत सारी घटिया हरकतें आपको देखने को मिल जाएंगी। नर्सों से बदतमीज़ी के भी कई मामले सामने आए हैं। आज ही दिल्ली में कोरोनावायरस के शिकार एक मुस्लिम शख़्स ने नर्स से हाथापाई तक की, लेकिन किसी तरह से जान बचाकर वो नर्स उन लोगों से जान बचाकर भाग आई। नीचे लिंक दे रहा हूँ, वीडियो में आप सुनेंगे कि निज़ामुद्दीन मरकज़ के प्रवक्ता कह रहे हैं नर्स को छेड़खानी की वीडियो दिखानी चाहिए।https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3260874297302174&id=138762029513432
कोरोना महामारी को देखते हुए कई मुस्लिम देशों ने सामूहिक नमाज़ पढ़ने पर रोक लगा दी है। लेकिन भारत में क्या हो रहा है? जुमे की नमाज़ के लिए देश के किसी ना किसी हिस्से में लोग इकट्ठे मिल जाते हैं और जब पुलिस कार्रवाई करती है तो रोना रोने लगते हैं। मुझे ठीक-ठीक याद है कि पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के पोते की शादी हो, बीजेपी विधायकों के जुलूस और जन्मदिन मनाने की घटना हो या सीएम योगी और शिवराज सिंह चौहान की बात हो, सब की काफ़ी आलोचना हुई है और डिबेट हुई है। फिर ऐसे में तब्लीग़ी जमात या वो मुस्लिम, जिनकी वज्ह से पूरा मुस्लिम समाज शर्मसार होता है, उसपर मीडिया में चर्चा क्यूँ नहीं होनी चाहिए? कब तक कथित रूप से अल्प-संख्यक होने के नाम पर इनके ग़लत कामों पर पर्दा डालने की कोशिश होती रहेगी? तब्लीग़ी जमात की आलोचना और उनकी करतूतों पर सवाल करने का मतलब सभी मुसलमानों से नहीं होता है। तब्लीग़ी जमात की हरकतों से देश के नामवर मौलानाओं और मुस्लिमों ने ख़ुद को अलग कर लिया है। हिन्दुस्तान में क़ानून सबसे के लिए बराबर है, इसलिए सवाल सभी होगा।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

कोरोना'काल में और बाद में हम!

आज प्रधानमंत्री मोदी ने लॉकडाउन को 3 मई 2020 तक बढ़ा दिया है। मतलब आजतक हम लोग लॉकडाउन के जिन-जिन नियमों का पालन कर रहे थें उसका 3 मई तक पालन करना होगा। बिना ज़रूरत के पहले की तरह लक्ष्मण रेखा पार नहीं करना होगा। पीएम मोदी ने अपने सम्बोधन में कहा है कि अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो 20 अप्रैल के बाद से कुछ गतिविधियों में छूट दी जाएगी, लेकिन मामला गड़बड़ होने पर छूट को समाप्त कर दिया जाएगा। मतलब साफ़ है कि आप और हम (जनता) सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन के नियमों का कैसे पालन करते हैं, ताकि कोरोनावायरस के संक्रमण का मामला बढ़े भी ना और उन लोगों कामगारों, व्यापारियों, दुकानदारों का आर्थिक पहिया घूमने लगे, जो देश की अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 
इस वक़्त पूरी दुनिया में कोरोनावायरस के संक्रमण को रोकने के लिए एक मात्र विकल्प है सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन, क्योंकि कोविड-19 अबतक लाइलाज बीमारी है।  कोरोनावायरस के आगे वो सारे मुल्क जो मिसाइल और आधुनिक हथियारों के दम पर दूसरे देशों को धमकाते फिरते थे, वो सब लाचार नज़र आ रहे है। विश्व की दो महाशक्ति कहे जाने वाले चीन और अमेरिका की हालात कितनी बदतर है, किसी से छिपा नहीं है। इन दोनों देशों में कोरोनावायरस से हर रोज़ सैंकड़ों लोगों की जानें जा रही है, लेकिन सरकारें कुछ कर नहीं पा रही हैं। अगर लोग संक्रमित हो जा रहें तो उनकी ज़िन्दगी भगवान भरोसे ही है। मलेरिया के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली दवाइयों का अबतक कोई पुख़्ता प्रमाण नहीं मिला है कि कोरोनावायरस के मरीज़ों का इन दवाइयों से इलाज किया जा सकता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कोरोनावायरस के आगे सब कोई लाचार है। इसलिए दुनियाभर के देश लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग बनाएं रखने और स्वच्छता पर ध्यान देने की सलाह दे रहे हैं। इन सब के बीच कुछ सवाल जो सबसे महत्वपूर्ण है वो यह है कि कोरोना'काल से दुनिया कबतक निकलेगी और जब निकलेगी तो कैसी होगी दुनिया? देशों की आर्थिक सेहत कितनी बुरी होगी और कितनी जल्दी आर्थिक सेहत ठीक हो जाएगा? क्या मिसाइल और आधुनिक हथियारों के दम पर डराने वाले मुल्कों की आर्थिक हालत वैसी ही रहेगी,जैसी पहली थी? शायद इन सवालों के जवाब आने वाले वक़्त में मिलेंगे। एक जो सवाल है कि कैसी होगी दुनिया, अगर इसके आर्थिक परिप्रेक्ष्य की बात ना करें, तो इंसानों की बदली आदतों के आधार पर दावे के साथ तो नहीं, लेकिन अनुमान लगाया जा सकता है, जो इस काल से बचकर निकल जाएंगे, वो इस बात का ज़रूर ख़याल रखेंगे कि प्राकृतिक से खिलवाड़ नहीं करेंगे और स्वच्छता और खान-पान में आए बदलाव को जारी रखेंगे। 
हम सब जानते हैं कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में हमारे देश की हालत कैसी है। ना तो ज़रूरत के हिसाब चिकित्साकर्मी हैं और ना ही ज़रूरत के हिसाब से स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर है। ऐसे में इन दिनों बहुत ज़रूरी है कि ख़ुद ही अपना ख़याल रखें और कोरोनावायरस के संक्रमण से बचने के लिए जो उपाय सुझाए गए हैं, उनका पालन करें।

दुनियाभर में इन दिनों हाथ मिलाकर अभिवादन करने की बजाय नमस्ते किया जा रहा है,जो हमारी भारतीय सभ्यता में पहले से ही थी, लेकिन आधुनिकता के दौर में हम में से ज़्यादातर लोग भूल गए थें। लेकिन इस बदले हुए जमाने में भी मैं और मेरे सहकर्मी अमित पालित एक दूसरे का अभिवादन नमस्ते करके ही करते हैं।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने हाथों को समय-समय पर ठीक से धोने के लिए सलाह दिया,जिसको हमसब को कोरोना'काल के बाद भी जारी रखना होगा। ताकि हम स्वच्छ और स्वस्थ रहेंगे तो देश भी स्वच्छ और स्वस्थ रहेगा।

आयुष मंत्रालय,भारत सरकार ने इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए कुछ सुझाव दिए हैं, जिसका पालन करने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। 

इन दिनों भारत की तमाम नदियां पहले से ज़्यादा निर्मल दिखाई दे रहीं हैं। यह सही वक़्त है उन सभी फ़ैक्ट्री मालिकों के पास जिनकी वज्ह से नदियों का पानी दूषित होता है, विचार करें और नदियों में जाने वाले अवशेषों को रोकने की व्यवस्था करें।

इन दिनों भारत के वे सभी शहर जिसकी गिनती वायु प्रदुषण की वज्ह से दुनिया के दूषित शहरों में होती थी, वहां के जीव-जन्तु लॉकडाउन की वज्ह से शुद्ध हवा ले रहे हैं।ऐसे शहरों में रहने वाले सभी लोगों को चाहिए कि लॉकडाउन के समाप्त होने के बाद भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करें ताकि वायु प्रदुषित होने से बचा रहे।

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

पीएम मोदी ने कहीं ये नहीं, इन वज्हों से देश को सम्बोधित तो नहीं किया है!

वैश्विक महामारी कोरोना वायरस को लेकर प्रधानमंत्री मोदी का देश को सम्बोधन, आप किस रूप में देखते हैं? कई लोगों ने पीएम की बातों पर अम्ल करते हुए उनकी बातों को प्रसारित करने में लगे हुए हैं तो बहुत सारे लोग तनक़ीद भी कर रहे हैं। आलोचना करने वाले लोग पीएम के सम्बोधन को इस रूप में देख रहे हैं कि सरकार ने ख़ुद को सरेंडर कर दिया है। मेरे मित्र @Chaman Mishra ने लिखा कि “ऐसे वक़्त में मोदी जी में नेहरू जी समा जाते हैं” तो जवाब में @अंकित द्विवेदी ने लिखा कि ये महाशय (नरेन्द्र मोदी) कभी भी नेहरू नहीं बन सकते हैं। कई लोग कह रहे हैं कि पीएम मोदी हर चीज़ को इवेंट बना देते हैं। कोरोना वायरस से संकट के समय पीएम को इवेंट से बचना चाहिए और ज़रूरी कामों पर ध्यान देना चाहिए। आपका क्या कहना है?

पीएम मोदी ने अपने सम्बोधन में बहुत सारी बातें बताई, लेकिन चर्चा 'जनता कर्फ़्यू' की ही हो रही है। पीएम की बातों के आलोचकों और समर्थकों में वाक्य युद्ध हो रहे हैं। इस वाक्य युद्ध का नतीजा 22 मार्च को पता चल जाएगा। लेकिन मेरे ख़याल से पीएम मोदी की बातों को जनता कर्फ़्यू और इवेंट के इतर भी देखना चाहिए कि पीएम मोदी आख़िर देश को सम्बोधित करने क्यूँ आएं थें? एक तरफ़ कोरोना वायरस के ख़तरे से गाँव-क़स्बों के लोग अब भी जागरूक नहीं है। वहाँ के लोग इस वायरस को अब भी काफ़ी हलके में ले रहे हैं। दूसरी तरफ़ जान-बूझकर भी लोग लापरवाही बरत रहे हैं। सरकार रोज़-रोज़ बता रही है कि कोरोना वायरस से बचने के लिए क्या-क्या करना चाहिए, लेकिन लोग मान नहीं रहे हैं। मुल्कभर के दीगर शहरों में धारा 144 क्यूँ लागू करनी पड़ रही है? शायद इसी वज्ह से कि लोग मान नहीं रहे हैं। ना जाने ट्रैवल हिस्ट्री क्यूँ छिपा रहे हैं।

हमारे देश में कोरोना वायरस के शिकार मरीज़ों में मुसलसल इज़ाफ़ा हो रहा है, सिर्फ़ इसलिए कि लोग लापरवाही बरत रहे हैं। एक नागरिक के रुप में इस संकट की घड़ी में आपको एक आदर्श नागरिक का परिचय देते हुए सरकार ने जो भी उपाय बताएं हैं उसका पालन करना चाहिए। बताए गए उपायों का पालन करना हमारा संवैधानिक कर्तव्य भी है। अफ़वाहों पर लोग ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं। गुरूवार को देश के कई हिस्सों से ख़बरें आईं कि लोग अपने-अपने घरों में राशन इकट्ठा करने लगे हैं। लोगों में राशन इकट्ठा करने को लेकर बे-वज्ह अफ़रा-तफ़री मची है। शायद इन्ही सब वज्हों से पीएम मोदी को देश को सम्बोधित करना पड़ा। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर तमाम कई सारी अंन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने कोरोना वायरस के ख़तरे से निपटने के लिए भारत सरकार द्वारा उठाये गए क़दमों की तारीफ़ की है। आप थाली या ताली बजाएंगें या नहीं, यह आपकी मर्ज़ी है। लेकिन आप अपनी नैतिक और संवैधानिक ज़िम्मावारियों को समझते हुए बहुत ज़रूरत हो तब ही किसी से मिलिए और अफ़वाहों को फैलाने से बचिए। आप इस रूप में सोचिए कि आपकों ख़ुद को इस वायरस से बचाना है और अगर ऐसे ही सभी लोग सोचने लगेंगे तो कोरोना वायरस को आसानी से मात दिया जा सकता है।

मंगलवार, 17 मार्च 2020

ज़िन्दगी में छांव।


आज दोपहर के वक़्त हस्पताल से मैं लौट रहा था, अचानक से मेरी नज़र इस शख़्स पर पड़ी। कुछ दूरी पर रेड लाइट होने की वज्ह से हमारी गाड़ी की रफ़्तार धीमी हो गई तो मैंने ये तस्वीर क़ैद कर ली। 24*7 वर्किंग कल्चर के कर्मचारियों के लिए यह तस्वीर कुछ पल से लिए सुकून तो पहुंचा ही सकती है। हाँ, उनलोगों को शायद नहीं जिन लोगों ने कैरियर के नाम पर रोबोट बनना स्वीकार कर लिया है। 24*7 वर्किंग कल्चर में स्वीकार्यता उनकी है जिनकी इंसानियत क़रीब-क़रीब शून्य पर पहुंच चुकी है। एक बार एक सीनियर ने मुझसे कहा था कि तुम इतने संवेदनशील क्यूँ हो, तुम्हे काम करना है। इतने संवेदनशील रहोगे तो हो गया काम। इस बात ने तब भी मुझे आश्चर्यचकित कर दिया था और अब भी जब कभी याद आ जाती है,तो मैं इस उलझन में पड़ जाता हूँ कि ऐसे लोगों की मानसिकता का स्तर क्या होता होगा,निम्न या उच्च?

ख़ैर,जब भी यह तस्वीर आखों के सामने हो रही है, तो ख़याल आ रहा है कि थकना मना है हो चुकी ज़िन्दगी में छांव की कितनी ज़रूरत है। छांव में लेटा हुआ यह व्यक्ति अपने काम को करके जब थक जाता होगा तो थोड़ी देर ऐसे ही आराम कर लेता होगा, फिर नई ऊर्जा के साथ अपने काम की शुरूआत करता होगा। कॉरपोरेट कल्चर में काम कर-करके थका हुआ व्यक्ति चाय की चुस्की या सिगरेट की कश या फिर दोनों से अपनी थकान मिटाता है। वर्षों तक काम करके, चाय की चुस्की और सिगरेट की कश से थकान मिटाने वाला व्यक्ति एक वक़्त के बाद जब पीछे मुड़कर देखता है तो शायद की किसी को वो समाज नसीब होता होगा, जहां थोड़ी देर बैठकर वक़्त बीता सके। दिन-दुनिया की बातें कर सके। डिओ न मारने वाले पाँच-दस लोग जानते हो, जो खेत-खलिहान गांव-जवार की बातें कर सके। 

रविवार, 23 फ़रवरी 2020

सरकारी सुविधाओं से महरूम ज़िन्दगानी।

तस्वीरें नोएडा के सेक्टर 16 मेट्रो स्टेशन के पास की है। आज सुब्ह 10 बजे मैं एक झुग्गी की तरफ़ जा रहा था, वहाँ रहने वाले लोगों से बातचीत कर यह जानने कि क्या उनकी ज़िन्दगी में 'सब चंगा सी' है या नहीं। लेकिन अचानक से मेरी नज़र इन लोगों पर पड़ी। देर रात को काम से लौटने के बाद सुब्ह में महिलाएं और पुरुष आपस में बात कर रहे थें।
 ऐसा कम ही होता है कि इतनी देर तक सब इकट्ठे होकर बातचीत करते हैं। काम को लेकर देर रात को अपनों के बीच लौटना और सुब्ह जल्दी उठकर काम की तलाश में निकल जाना पुरुषों की दिनचर्या होती है। यह बात इन्हीं लोगों में एक व्यक्ति ने तस्वीर ना खींचने और अपना नाम ना बताने की शर्त पर बताई। जिस व्यक्ति ने मुझसे बात की, पूरी बातचीच के दौरान लगा कि वह कैमरे की नज़र से बचना चाहता था। इस बात का एहसास तब हुआ, जब उसने कहा कि मीडिया वाले रिकॉर्डिंग करके ले जाते हैं और टीवी पर दिखा देते हैं। बाद में पुलिस आकर हमारे झोपड़ियों को तोड़ देती है। हमारे बातचीत का सिलसिला जैसे ही शुरु हुआ था, दो तीन महिलाएं क़रीब आकर मुझसे अपना दर्द बयां करने लगीं। ये सभी बिहार की राजधानी पटना के अनीसाबाद इलाक़े के रहने वाले थीं। कुछ महिलाएं और पुरुष अपनी बात साझा करने में हिचक रहे थें, जिसकी वज्ह से वो दूर से हमारे बातचीत को ग़ौर से देख रहे थें कि हम क्या कर रहे हैं या क्या करने वाले हैं। हमारी बातचीत आगे बढ़ी। मैं इन छोटे-छोटे बच्चों के बारे में पूछा कि क्या यह सभी पढ़ने जाते हैं?
 एक महिला ने बड़ी ही उदासी से कहा कि नहीं...नहीं जाता है सब पढ़ने...कहां जाएगा पढ़ने...6 महीनें तक मैं अपने बच्चों को सेक्टर 18 में एक स्कूल है...उसमें भेजी लेकिन ‘क’ भी लिखने नहीं आया। एक मास्टर जी यहीं उस पेड़ के नीचे (पास के एक पेड़ की तरफ़ इशारा करते हुए) पढ़ाने आते थें वो भी अब नहीं आते हैं। ऐसे में बच्चे कहां पढ़ पा रहे हैं। दिनभर ऐसे ही इधर-उधर खेलते रहते हैं। 

एक महिला जो सालों से यहीं रहती हैं, कहने लगी की कोई सरकारी आदमी पूछने तक नहीं आता है। और टीवीवाला पर जब दिखा देता है तो पुलिस आकर बहुत परेशान करती है। झोपड़िया तोड़ देती है। इतने में पुरुष ने कहा कि जैसे-जैसे साल बीतता जा रहा है...नोएडा में स्वच्छता बढ़ता जा रहा है...नोएडा साफ़-सुथरा होता जा रहा है...साफ़ सुथरा देखने में कितना अच्छा लगता है ना..हो सकता है कि इस वज्ह से पुलिस हमारी झोपड़ियों को तोड़ देती है। 

पुरुष उदास मन से अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहने लगा कि हमलोग क्या करें...बिहार में नौकरी हइए नहीं है..जिसकी वज्ह से हमलोगों को यह काम करना पड़ता है...मैंने कहा कि नीतीश कुमार इतने दिनों से शासन में हैं, तब भी नौकरी नहीं है? जवाब में पुरुष ने कहा कि   आप ही बताइए ना..बिहार में कहां है नौकरी...कम्पनी है ही नहीं तो रोज़गार कहाँ से मिलेगा। इसलिए हमलोगों को यह सब करना पड़ता है।

एक महिला कहने लगीं कि सरकार हमलोगों पर ध्यान देती तो हमलोग भी कुछ काम करते...शहद बेचने, सड़क किनारे बच्चों से ग़ुब्बारा बेचवाने से तो अच्छा रहता कि हमलोग भी कुछ काम करतें।

काफ़ी से देर तक बातचीत के बाद महसूस हुआ कि इनलोगों की ज़िन्दगी को बेहतर बनाने के लिए सरकार को ध्यान देना चाहिए। ये लोग सरकारी योजनाओं के बारे में कुछ नहीं जानते हैं। ऐसे में सरकार की ज़िम्मावारी होनी चाहिए कि अपने कर्मचारियों को ऐसे लोगों के बीच भेज कर, इनलोगों से बात करे। ऐसे लोगों को शिक्षा,स्वास्थ्य और आवास उपलब्ध कराये।

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

रिश्ते की बुनियाद में ‘तहज़ीब’ होनी चाहिए।

हर कोई किसी ना किसी रिश्ते की डोर में बंधा होता है और रिश्ते की पहली शर्त होती है कि हर कोई उम्मीद करता है कि चाहे वह ख़ुद कैसे भी बोले/ बात करे लेकिन सामने वाला तहज़ीब से बात करे। लेकिन आज के समय में ऐसी उम्मीद करना शायद ख़ुद से बेईमानी करने जैसा है। जैसे को तैसा वाले समय में हर किसी को समझना पड़ेगा कि आप जब किसी का सम्मान नहीं करेंगे तो शायद ही सामने वाला भी आपका सम्मान करेगा। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं तो आपके रिश्तों में मतभेद का होना तय है। इसलिए बहुत ज़रूरी है कि बातचीत करते वक़्त तहज़ीब यानि तरीक़े से बात करें। हमारे समाज में सास-बहू का रिश्ता ऐसा है जिसके मतभेद में यह तय करना लगभग नामुमकिन होता है कि सास ग़लत है या बहू। इस रिश्ते में मतभेद के अनन्त किस्से हैं। मैं आपको यहाँ एक उदाहरण दे रहा हूँ कि तहज़ीब कैसे रिश्ते में मतभेद नहीं होने देता है।

अभी कुछ दिनों पहले मैं अपने एक परिचित के घर गया हुआ था। हाल ही में उनके बेटे की शादी हुई है। मैं उनके साथ बैठकर बातें कर रहा था, तो देखा कि उनकी बहू गिलास में दाल लेकर आई। दाल एक ऐसी चीज़ है जो थोड़ी बहुत बच ही जाती है। मुझे याद है कि जब मैं छोटा था तो शाम को जो दाल बच जाती थी, उनको कई बार मुझे पीने के लिए दिया जाता था। हम दोनों एक दूसरे से भोजपुरी में बात कर रहे थे,इसलिए मैं उनकी बातों को भोजपुरी में लिख रहा हूँ ताकि समझने में आसानी हो कि किसी बात को समझाने का लहजा कैसा होना चाहिए।

बताव..तू जोन इ रोज़-रोज़ दाल फेंक देवे लू...केतना महंगा आवेला...या त कम बनावअ चाहे बच जाए तक हमनी के दे द पीए ला...फेंकला पर त बर्बादे नू होई...कहने मतलब यह है कि जो रोज़- रोज़ दाल बच जाती थी उसको उनकी बहू फेंक देती थी। जब उन्होंने बहू को समझा दिया तो शाम को जब भी बर्तन धोने जाती है, बचे हुए दाल या जो कुछ भी बचा रहता है उसको फेंकने की बजाय खाने के लिए दे जाती है।

कहने तात्पर्य यह है किसी से भी बात करने का लहजा बिल्कुल ही शान्त और नर्म होने चाहिए।   

गुरुवार, 30 जनवरी 2020

अहिंसा: एक राह, जिस पर चलना ही होगा।

पूरी दुनिया में आज राष्ट्रपिता को याद किया जा रहा है। दुनिया को अहिंसा का मंत्र देने वाले शख़्स को आज ही के दिन यानि 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। अहिंसा के पुजारी की हत्या करनी की सातवीं कोशिश थी। एक तरफ़ बापू की पुण्यतिथि पर उनकी बातों को याद करने की रवायत है, जो हर साल की तरह आज किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ़ बीते वर्षों में बापू के हत्यारे से सहानुभूति रखने वाले गर्व से और ठंके की चोट पर रोज़-रोज़ बापू के अहिंसा वाले विचार पर आघात कर रहे हैं। साल  2019 में अलीगढ़ में अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की राष्ट्रीय सचिव पूजा शकुन पाण्डेय ने गांधी जी के पुतले को गोली मारी, और नाथूराम गोडसे की तुलना भगवान कृष्ण से की थी। गाँधी की मूर्तियों को तोड़ना आम बात हो गया है। राजनीतिक संरक्षण प्राप्त ऐसी हरकत करने वालों के समर्थन में एक झुण्ड तैयार कर दिया जाता है, जो चीख़-चीख़कर कहता है कि इसमें क्या ग़लत है। अगर गाँधी आज ज़िन्दा होते तो देश और भी कई टुकड़ों में बंट गया होता। 

ख़ैर, गांधी अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन गांधी की बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके जीते जी थी। इसलिए मैंने हेडिंग लिखा है ‘अहिंसा: एक राह, जिस पर चलना ही होगा’। यह हेडिंग लिखने की वज्ह ये है कि इन दिनों कई लोग पूछ रहे हैं कि, बताओ यदि तुम्हें कोई अचानक से थप्पड़ मार दे तो क्या करोगे? क्या तुम उसको पलट के नहीं मारोगे? यह सवाल इसलिए लोग पूछ रहे हैं कि अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव की एक जनसभा में देश के वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने देश के ग़द्दारों को...गोली मारने की बात लोगों से कहलवाई, जिसका मैंने पुरज़ोर विरोध किया था। हिंसक और कट्टरवादी सोच का मैं कभी भी समर्थन नहीं कर सकता हूँ। जो लोग मुझसे थप्पड़ मारने को लेकर सवाल पूछ रहे हैं, उनसे कहना चाहता हूँ कि सिरफिरे लोगों से उलझने में सिर्फ़ नुक़सान ही है। जो लोग समस्याओं को सुलझाने के लिए संवाद में यक़ीन नहीं रखते हैं, वैसे लोगों से निबटने के लिए हमारे देश में संविधान और क़ानून नाम की चीज़ है। वक़्त है धर्म और जाति के नाम पर रगों में दौड़ते हुए ख़ून को शान्त करने का और ये तभी हो सकता है जब नफ़रत को ख़त्म कर इंसानियत को आत्मसात किया जाएगा। प्रमोद कपूर ने अपनी किताब  Gandhi: An Illustrated Biography में लिखा है कि जिस दिन गाँधी की हत्या हुई थी उस शाम पंडित जवाहर लाल नेहरू ने ऑल इण्डिया रेडियो पर देश को सम्बोधित करते हुए कहा था कि “The light has gone out of our lives”। हम में से गांधी तो कोई नहीं बन सकता है लेकिन हम गांधी की राह पर तो चलकर मानवता की दीप जला सकते हैं।

बुधवार, 22 जनवरी 2020

फ़िल्म छपाक को सपरिवार क्यों देखने जाना चाहिए?

आज मैं फ़िल्म छपाक देखने गया था। यह जानकारी थी मुझे कि फ़िल्म अच्छी कमाई नहीं कर रही है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ फ़िल्म छपाक रिलीज़ होने के बाद से अबतक क़रीब 40 करोड़ रूपये ही कमा पाई है। जबकि यह चार कांग्रेस शासित राज्य राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पुडुचेरी में टैक्स फ़्री है। इन चारों ने तब इस फ़िल्म को टैक्स फ़्री करने का ऐलान किया,जब दीपिका पादुकोण जेएनयू में फ़ीस विवाद को लेकर आंदोलनरत छात्रों से यकजहती का इज़हार करने पहुंची थीं। बिना पूर्व सूचना के जब दीपिका जेएनयू पहुंची तो, सोशल मीडिया पर बायकॉट छपाक ट्रेंड करने लगा था। दीपिका को गन्दी-गन्दी गालियां तक दी गई। कहा गया कि दीपिका टुकड़े-टुकड़े गैंग की समर्थक हैं। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि कुछ दिनों पहले जब एक RTI के माध्यम से गृह मंत्रालय से कथित टुकड़े-टुकड़े गैंग के सदस्यों का नाम पूछा गया तो गृह मंत्रालय के पास कोई नाम नहीं था। मतलब टुकड़े-टुकड़े गैंग शब्द का इस्तेमाल पीएम Narendra Modi, गृह मंत्री अमित शाह समेत तमामBharatiya Janata Party (BJP) के नेताओं और उनके समर्थकों द्वारा सियासी फ़ाइदे के लिए किया जाता है। जेएनयू में जाने पर दीपिका को समाज के एक वर्ग से शाबाशी भी मिली थी, लेकिन फ़िल्म के लिहाज़ से वहाँ जाना शायद ग़लत साबित हुआ। दीपिका ने अबतक इस बात का खुलासा नहीं किया है कि वो किसके कहने और क्या समझ कर जेएनयू गईं थीं।

अब बात करते हैं कि यह फ़िल्म हर माता-पिता को अपने बच्चों के साथ ख़ासकर बेटों के साथ क्यों देखने जाना चाहिए। मेरे फ़िल्म देखने जाने की वज्ह बिल्कुल साफ़ थी। यह एक सामाजिक फ़िल्म है, इसलिए मैं देखने गया था। कहते हैं ना फ़िल्म समाज का आईना होता है, तो इसी बात को मानते हुए हर इंसान को इस फ़िल्म को देखने जाना चाहिए ताकि पता चल सके कि हमारा समाज कैसा है। 03 बजकर 05 मिनट पर शुरू होने वाले शो के लिए तीन बजने में पांच मिनट कम था तो मैं थियेटर पहुँच गया था। जिस ऑडी में फ़िल्म दिखाया जाना था,जब मैं वहाँ पहुँचा तो बिल्कुल ख़ाली था। मुझे लगा कि मैं कहीं बहुत पहले तो मैं ही नहीं पहुँच गया हूँ। फिर मैं बाहर आ गया। लेकिन फ़िल्म शुरू होने के क़रीब दो-तीन मिनट तक क़रीब 200 लोगों के बैठने की क्षमता वाले ऑडी में मैं अकेला था। फिर एक-एक करके लोग आने शुरू हुए। फ़िल्म समाप्त होने के बाद जब हमलोग निकले,तो हमारी संख्या मुश्किल से दस थी। फ़िल्म की कमाई नहीं हो रही है, लेकिन फ़िल्म सामाजिक होने की वज्ह से मैं देखने गया था। मेरे साथ फ़िल्म देखने वाली एक महिला ने कहा था कि इससे अच्छा तो हमलोग तान्हाजी देख लेते। मुझे थोड़ा अजीब लगा था, लेकिन मैं चुप रहा।

फ़िल्म में कई ऐसी तस्वीरें हैं जो आपको भीतर से झकझोर देती है। हंसती-खेलती बेटियां अपने शैशवास्था में जैसे घरों की रौनक होती हैं, वैसे ही हंसती-खेलती बेटियां समाज के लिए भी रौनक होती हैं। बदलते ज़माने में पुरुषवादी मानसिकता वालों को यह समझना पड़ेगा कि  बेटियां जब बड़ी हो जाती हैं,तो उनके सपनों को पंख लगाने के ज़िम्मावारी माता-पिता के साथ समाज की भी होती है। एक कहावत भी तो है कि बेटियां समाज की होती हैं, मतलब बेटियों की देखभाल की ज़िम्मावारी समाज की भी होती है। सामाजिक बेड़ियों को तोड़कर अपने सपनों को हक़ीक़त में बदलने के लिए दहलीज़ पार करने वाली बेटियों को तंग नज़र की बजाय सहायता के लिए हाथ बढ़ाना पड़ेगा।

बेटे के साथ इस फ़िल्म को देखने जाने से मेरा तात्पर्य यह है कि आपका बेटा इस बात को महसूस कर सकें कि ज़ुल्म की शिकार बेटियों को कैसे-कैसे सामाजिक और मानसिक यातनाओं से गुज़रना पड़ता है। फ़िल्म में मालती के भाई को,जब वह पार्क में खेल रहा होता है,तो उन्हीं में से एक कहता है कि घर जा ना..क्यूं नहीं जा रहा...भूत आ गई है तुम्हारे घर में ना... इसलिए नहीं जा रहा है ना...ऐसा कहते हुए मज़ाक उड़ाते हैं, उनके बाद मालती के भाई को कितना बुरा लगता है। कहीं जाने-अनजाने में आपका बेटा तो ऐसा नहीं करता हैं ना।

दूसरी तस्वीर जिसको देखकर मेरी आँखें भर आईं थीं। मालती को बचपन के सजना-संवरना बहुत अच्छा लगता था, इसलिए वो श्रृंगार की सभी चीज़ें ख़रीदकर रखती थी, लेकिन एक दिन दरिंदगी की शिकार हो जाती है। तेज़ाब की वज्ह से चेहरे के साथ उसके कान भी जल जाते हैं। चेहरे की पहली सर्जरी देखकर फूटकर रोने लगती है। फिर एकाध और सर्जरी के बाद जब वो अपने कान में पहनने वाले गहने को निकालती है और आईने के सामने जब कान के पास हाथ ले जाती है तो एक कान ही नहीं दिखता है। क्या इस बात की कल्पना करना मुश्किल है कि ऐसे वक़्त में बेटियां कितना टूट जाती हैं? 

बेटियां सिर्फ़ उस घर की रौनक नहीं होती हैं, जिसमें वो पैदा होती हैं। वो तो उस घर और समाज के लिए भी रौनक होती हैं जहाँ ब्याही जाती हैं। बेटियों पर होने वाले ज़ुल्मों को रोकने के लिए समाज के लोगों को बिल्कुल वैसे ही उंगलियों का सहारा देना होगा, जैसे बचपन में चलने ‌के वक़्त देते हैं, ताकि वो अपने सपनों को पंख लगा सकें। हफ़्ते दिन पहले दिल्ली में पाँच साल की गुड़िया से पड़ोसियों द्वारा दुष्कर्म पर फ़ैसला सुनाते हुए दिल्ली की अदालत के एक जज ने कहा था कि कई मौक़े पर हम बेटियों को लक्ष्मी की तरह पूजते हैं, लेकिन बाद में भूल जाते हैं। इसलिए समाज को भूलने की नहीं बल्कि याद रखने की ज़रूरत है।

बुधवार, 15 जनवरी 2020

स्कूल तो मॉडल नहीं बन पाया, लेकिन बदतर ज़रूर हो गया है!

ग्यारह बजे से लेट नहीं एक बजे भेंट नहीये आदर्श वाक्य मेरे गांव के हाई स्कूल की बन गई है। बीते तीन चार-सालों में बद से बदतर हो गई इस स्कूल की शैक्षणिक व्यवस्था के लिए अकेले  कोई ज़िम्मावार नहीं है। पिछले 3-4 सालों में जब भी गाँव जाता था तो गिनती के लोग स्कूल की शैक्षणिक व्यवस्था के बारे में बताते हुए दुखी हो जाते थें। समय की कमी होने की वज्ह से मुझे भी सोचने का समय नहीं मिल पाता था। लोग कहते थें कि स्थानीय पत्रकार भी इस बदहाल स्थिति के बारे में लिखते-बोलते नहीं है। स्थानीय पत्रकारों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है कि स्कूल की क्या स्थिति हो गई है। गाँव से हज़ार किलोमीटर दूर रहने के बावजूद लोगों के बातें मुझे दुखी करती थी। कई वज्हों में से एक वज्ह यह भी है कि मैं इस विद्यालय का छात्र रहा हूँ। इस शिक्षा के मन्दिर में मैंने अनुशासन, विद्यार्थी और शिक्षक के बीच आदर्श संबंध कैसा होता है, विद्यार्थी और शिक्षक की आँखों में पढ़ने-पढ़ाने की लालसा को क़रीब से देखा है। इसलिए आज की बदतरीन तसावीरें जब सुनने और देखने को मिलती है तो सच में बुरा लगता है।

इस बार दिसम्बर में गाँव गया था,तो लोग स्कूल की बदहाली के बारे में बताते थें, उसको काफ़ी क़रीब से देखा और परखा। गाँव के कई लोगों इस पर बात करने की कोशिश भी की,लेकिन ज़्यादातर लोगों ने इस संबंध में बात करना अनुचित समझा, तो कुछ लोगों ने कहा कि उनको विद्यालय की बदहाली के बारे में जानकारी ही नहीं हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी थें जो दुखी मन से इतना कहकर बात बदल देतें कि बात करने से क्या फ़ाइदा। इन सभी लोगों से गुज़ारिश है कि यह विद्यालय आपका है,मतलब पैसा होने की वज्ह से आपका बच्चा तो किसी प्राइवेट या किसी शहर में पढ़ लेगा,लेकिन हो सकता है कि आपके पड़ोस का,आपके दोस्त का जिसके पास अपने बच्चे को इस स्कूल में भेजने के अलावा कोई विकल्प ना हो,तो क्या आप चाहेंगे की ऐसे लोगों का बच्चा अच्छी शिक्षा हासिल ना करे? एक वक़्त था कि हमारे गाँव की पहचान इसी स्कूल से हुआ करती थी। सभी ग्रामीणों से आग्रह तो कर ही सकता हूँ कि अपनी इस पहचान को खोने मत दीजिए। एकजुट होकर स्कूल प्रशासन से बात कीजिए,उन पुराने शिक्षको से आग्रह कीजिए कि सर..उस व्यवस्था को फिर से लौटाने में हमारी मदद कीजिए, जिसमें स्कूल के छात्र शिक्षा के अलावा साइंस, कला, साहित्य और खेल के क्षेत्र में नाम रौशन करते थें।

इस बार गाँव गया था तो मैं स्कूल के भीतर भी गया था। कुछ तस्वीरें खींच लाया हूँ उस तस्वीर को दिखाने के लिए स्कूल हालत क्या है। मैंने कई पुराने शिक्षकों को,जिन्होंने मुझे भी पढ़ाया है,वो सिर्फ़ हाज़िरी लगाने आते थें और समय से पहले स्कूल से निकल जाते थें। ऐसा एक दिन कई दिन मैंने देखा। मुझे मालूम है कि जब पुराने शिक्षकों की जानकारी में यह बात आएगी,तो बुरा लगेगा। पुराने शिक्षकों से मेरी विनती है कि साल-दो साल, पांच साल में आप रिटायर करके यहां से चले जाएंगे, लेकिन मेरे गाँव के बच्चों के लिए यही स्कूल रहेगा। इसलिए आपलोग फिर से उस व्यवस्था की शुरूआत कीजिए जिसमें पठन-पाठन हो। 
नीचे जो तस्वीर है वो स्कूल में प्रार्थना के वक़्त की है। एक दिन मैं जब कुछ सामान लाने के लिए घर से निकला तो देखा कि प्रार्थना हो रही थी। विद्यार्थियों की संख्या देखकर मैं हैरान हो गया। मुझे याद है कि मैं जब पढ़ता था, तो जो तस्वीर में ख़ाली जगह दिख रहा है, प्रार्थना के वक़्त भर जाता था। कहने का मतलब यह है कि तब विद्यार्थी आते थें और विद्यार्थी इसलिए आते थें कि पढ़ाई होती थी। लेकिन वर्तमान की ये तस्वीर बता रही है कि ना तो बच्चे पढ़ने आते हैं और ना ही मास्टर पढ़ाना चाहते हैं। स्कूल में कुल कितने छात्रों का नामांकन होता है इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा तो मेरे पास नहीं है,लेकिन जिनकी नज़र इस विद्यालय पर क़रीब से रहती है उनके मुताबिक़ कक्षा 9 और 10 में कुल बच्चों की संख्या 2500 के क़रीब है और 10+2 में 700 बच्चों का दाख़िला होता है। लेकिन तस्वीर तो कुछ और कह रहा है। मेरे समय में इस स्कूल में क्लास 6,7 और 8 भी हुआ करता था। लेकिन वर्तमान की तस्वीर के आधार पर क्या यह नहीं कहा जा सकता है कि पढ़ाई को लेकर बच्चे, परिजन, शिक्षक और शिक्षा तंत्र, सब के सब लापरवाह हैं?
बताने वालों में से एक ने बताया कि क़रीब 3-4 साल पहले इस स्कूल को मॉडल स्कूल के साथ-साथ इस स्कूल का इंडोर स्टेडियम बनाने की बात हुई थी। वर्तमान सांसद राजीव प्रताप रूडी के नेतृत्व में तब के ज़िलाधिकारी शाम के वक़्त स्कूल का और स्कूल के पीछे जहाँ इंडोर स्टेडियम बनाने की बात हुई, उस जगह का निरीक्षण तक किया गया था, लेकिन अबतक स्कूल ना तो मॉडल बन सका और ना ही इंडोर स्टेडियम। हाँ इन बीते सालों के लिए ये कहा जा सकता था कि जो भी था वो चौपट हो गया। 

नीचे स्कूल के पुस्तकालय की तस्वीर है। तस्वीर में साफ़-साफ़ दिख रहा है कि पुस्तकालय की सीढ़ी और आसपास घुटने से कम ऊँचाई तक घास उगा हुआ है। ये हाल तब है जब स्कूल में एक पुस्तकालय अध्यक्ष भी नियुक्त है। सवाल यह है कि पुस्तकालय अध्यक्ष क्या करते हैं? 
नीचे की तस्वीर स्कूल के प्रयोगशाला की है। दरवाज़ों में लगे तालों की स्थिति देखकर कहा जा सकता है कि पठन-पाठन की के लिए इस प्रयोगशाला खोला जाता होगा। हैरानी की बात ये है कि विज्ञान के छात्रों की प्रायोगिक परीक्षा भी होती है। एक दिलचस्प बात यहां बता देता हूँ कि 30 अंक के प्रायोगिक परीक्षा में 75-80 अंक तक दे दिए गये थें। मैं भी जब पढ़ता तब भी रोज़-रोज़ प्रयोगशाला तो नहीं खुलता था,लेकिन हां...राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस की प्रतियोगिता के समय श्रीराम पाण्डेय सर प्रायोगिक जांच कैसे करते हैं बताने के लिए प्रयोगशाला में ले जाते थें। अब मुझे मालूम नहीं कि राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस में स्कूल हिस्सा लेता है या नहीं?
नीचे की दोनों तस्वीरे विद्यालय के छात्रावास की है, जो खण्डहर में तबदील हो गया है। पहले कुछ छात्रों के साथ कई शिक्षक भी रहा करते थें, लेकिन अब कुछ ही शिक्षक रहते हैं। एक शिक्षक ने बताया कि मरम्मत का काम वही लोग कराते हैं। ये तो हाल है।

सोमवार, 13 जनवरी 2020

ग़लत तो ग़लत ही होता है।

सोमवार को घर से निकलकर बैट्री से चलने वाली रिक्शे पर बैठ गया। क़रीब एक किलोमीटर चला ही होगा कि अचानक से रिक्शे में कुछ ख़राबी आ गई। रिक्शाचालक के बगल में मैं ही बैठा,तो चालक ने मुझसे कहा कि, सर..थोड़ा सीट से उठ जाइए..देखना है कि कहीं तार तो छूटा नहीं हैं ना। मैं सीट से उतरकर बगल में खड़ा हो गया। चालक ने जैसे ही सीट को हटाया ,तो देखा कि तारें जैसे-तैसे उलझी हुई हैं। चालक कुछ देर तक तारों को हिलाकर देखता रहा कि कहीं जोड़ पर से छूट गया होगा तो पता चल जाएगा‌। लेकिन पहली कोशिश में कामयाबी नहीं मिली। फिर उसने सीट के नीचे ही चाभी रखा हुआ,उसको निकालकर ऑन-ऑफ़ करने लगा। कई बार ऑन-ऑफ़ करने के बाद रिक्शा चालू नहीं हुआ। दूसरा उसने तारों को हिलाना शुरू किया, अचानक से रिक्शा स्टार्ट हो गया है। हमलोग वहां से आगे बढ़े। 
मैं चालक से कहा कि यार... तुम सिर्फ़ पैसा ही m हो.. कुछ पैसा रिक्शे पर भी ख़र्च किया करना...यह तुम्हारी लिए आमदनी का ज़रिया है। 
चालक ने मुझसे कहा, नहीं... नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, रिक्शे को मेंटेन रखने के लिए ख़र्च करता हूँ।
मैं कहा कि,क्या मेंटेन करते हो.. तारें उलझी हुईं हैं, चाभी लगाने के लिए मीटर के बगल मे जो बॉक्स लगा हुआ वो ढीला ढककर है...चाभी तुम सीट के निचे रखते हो। यही तुम मेंटेन रखते हो?
चालक ने घबराहट में कहा कि, पुलिस की वज्ह से चाभी लगाने है... पुलिस वाला पहले चाभी निकाल लेता है। 
फिर मैंने कहा कि, पुलिस वाले पागल होते हैं क्या कि चाभी निकाल लेते हैं...जब तक तुम ग़लत नहीं करते होगे... ग़लत करो ही मत की पुलिस वाले को चाभी निकालने की ज़रूरत पड़े। मेरी बात सुन चालक मुस्कुराने लगा। मुझे और जगह का तो नहीं मालूम, लेकिन दिल्ली-एनसीआर और बिहार के रिक्शा और टेम्पू वालों के  बारे में कह सकता हूँ कि वो सिर्फ़ पैसा ही कमाते हैं। बहुत कम लोग रिक्शा और टेम्पू को दुरुस्त रखने के लिए पैसे ख़र्च करते हैं।

रविवार, 12 जनवरी 2020

बिहार में बेरोज़गारी के स्तर का नमूना।

"National Youth Day" स्वामी विवेकानन्द के जन्मदिवस के दिन मनाया जाता है। 12 जनवरी यानि बीते दिन जब देशभर के मुख़्तलिफ़ शहरों में स्वामी जी के नाम पर कार्यक्रम हो रहे थे, तब बिहार के नौजवान अपने भविष्य को बेहतर बनाने के लिए धक्के खा रहे थें। पूरे सूबे की तस्वीरें यहां दिखा पाना सम्भव नहीं था, लेकिन इन्हीं दोनों तस्वीरों के आधार पर अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि बिहार में बेरोज़गारी का स्तर कितना हो‌ सकता है। रविवार को Biharpolice में सिपाही के 11880 पदों की भर्ती के लिए पहले दिन की परीक्षा हुई। 20 तारीख़ को दूसरे दिन की परीक्षा होगी। 11880 सीटों के लिए क़रीब 13 लाख़ अभ्यर्थियों के शामिल होने का अनुमान है। इन आंकड़ों से बेरोज़गार युवाओं का अनुमान लगा पाना क्या अब भी मुश्किल है? हाजीपुर स्टेशन पर अभ्यर्थियों ने नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी भी की। सूबे भर के रेलवे स्टेशन का सूरत-ए-हाल यह था कि ट्रेन की पटरियों पर अभ्यर्थियों खड़े रहते थें। प्लेटफ़ॉर्म पर सभी का खड़ा हो पाना सम्भव नहीं था। जैसे ही ट्रेन स्टेशन पर पहुंचती थी, छत्ते पर जैसे मधुमक्खी इकट्ठा हो जाती थीं, वैसे ही अभ्यर्थियों इंजन से लेकर बोगी के दरवाज़े पर तक लट जाते थे। जान जोख़िम में डालकर परीक्षा देने आए और गये।

बुधवार, 8 जनवरी 2020

फ़िल्म छपाक में एसिड अटैकर का क्या नाम है?

बुधवार की शाम अचानक से ख़बर आती है कि  Deepika Padukone जेएनयू में वामपंथियों के कार्यक्रम में शामिल हुईं है। यह कार्यक्रम जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष और कथित रूप से दक्षिणपंथियों के हमले में जिस्मानी रूप से घायल आईशी घोष की ज़ेर-ए-सदारत में आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में Kanhaiya Kumar भी शामिल हुए थें। बकौल दीपिका,वो जेएनयू में हुई हिंसा के ख़िलाफ़ और घायलों का हौसला बढ़ाने के लिए गईं थीं। लेकिन कल से लेकर अबतक दीपिका की बातों से इतर बहुत सारी बातें हो रही हैं। वामपंथी विचारधारा के समर्थकों में खुशी की लहरें उफ़ान मार रही है,क्योंकि उनकी नज़र में दीपिका Narendra Modi , Bharatiya Janata Party (BJP) की सरकार और एबीवीपी के ख़िलाफ़ खड़ी हुईं थीं, तो वहीं दूसरी तरफ़ दक्षिणपंथी हाय-तौबा मचाया हुए हैं। दीपिका को वामपंथी, टुकड़े-टुकड़े गैंग समर्थक और पता नहीं क्या-क्या कर रहे हैं। यहां तक कि इतनी गन्दी-गन्दी गालियां दे रहे हैं कि कल्पना से परे है। फ़िल्म छपाक का बहिष्कार करने की बात कर रहे हैं। मैंने तो ऐलान कर दिया है कि फ़िल्म छपाक को ज़रूर देखने जाऊंगा। यह फ़िल्म समाजिक बुराई पर आधारित है। साल 2005 में देश की राजधानी दिल्ली की लक्ष्मी अग्रवाल, नदीम ख़ान से शादी करने से इंकार कर देती है, जिसके बाद नदीम ख़ान लक्ष्मी पर चेहरे पर एसिड फेंक देता है।

एक और वबाल यह खड़ा कर दिया है कि फ़िल्म में नदीम ख़ान का जो रोल निभा रहा है,उसका नाम राजेश क्यों रखा गया है? कहा जा रहा है कि हिन्दू धर्म को बदनाम करने के साज़िश है। बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने ट्वीट यह कह दिया है कि फ़िल्म में राजेश नाम होगा तो कोई इश्करण,जो कि पेशे से वकील हैं, दीपिका और फ़िल्म निर्माता पर केस करेंगे। इस वबाल पर मैंने अपनी दोस्त उषा श्रीवास्तव से बात की। उषा ने बताया फ़िल्म मे एसिड फेंकने वाले का नाम राजेश, नहीं बल्कि बशीर ख़ान उर्फ़ बब्बू है।

सोमवार, 6 जनवरी 2020

जेएनयू में हिंसा की वज्ह।

इन दिनों फ़ासिस्ट, कट्टरपंथी, नाज़ी और हिटलर जैसे शब्द एक वर्ग की ज़ुबान पर गाहे-बगाहे आ जाता है। आज़ाद हिन्दुस्तान में इन दिनों जितना संविधान संविधान जपा जा रहा है,शायद ही पहले कभी जपा गया होगा। क्या इसके पीछे यह कारण हो सकता है कि एक विचारधारा जो कभी सत्ताहीन होने की सोच भी नहीं सकता था,उसको उस विचारधारा ने सत्ताहीन कर दिया है, जिससे वो राजनीति करते थें? आपका जवाब क्या होगा, हाँ या ना? 

कल रात जेएनयू में जो हुआ वो किसी भी रूप में जायज़ नहीं कहा जा सकता है। हिंसा सिर्फ़ एक देह(शरीर) को ही नष्ट नहीं करता है, बल्कि इंसानियत को भी मारता है, इसलिए ज़रूरी है कि हिंसा को संवाद से ख़त्म करें। जेएनयू में मैं पढ़ तो नहीं सका, लेकिन जेएनयू को जितना जानता हूँ,उस आधार पर कह सकता हूँ कि तर्कशील बनाने वाले इस धरोहर को हर स्तर पर सुरक्षित रखा जाना चाहिए। इससे समाज को फ़ाइदा तो होगा कि सत्ता को भी किसी विषय पर अलग परिपेक्ष्य में सोचने का मौक़ा मिलेगा। यह बिल्कुल ग़लत बात है कि यदि कोई जो भी और जितना सोचता और चीज़ों को जितना देखता हैं उतना काफ़ी है। 

कल रात जब जेएनयू से हिंसा की ख़बरें आनी शुरू हुई,तब से अब तक उस विषय को ग़ायब ही कर दिया गया है कि हिंसा की शुरूआत कैसे हुई? लिखा और कहा जाने लगा कि फ़ासिस्ट, कट्टरपंथी, नाज़ी और हिटलर के ग़ुण्डों ने हिंसा की है, अलग विचारधारा वाले लोग तो सिर्फ़ शिकार हुए हैं। दरअस्ल हिंसा की वज्ह इतना आसान नहीं हैं। हिंसा के लिए सिर्फ़ अकेले कोई ज़िम्मावार हो सकता है? कल शाम से पहले की घटना को भी जानना पड़ेगा। यहां मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ, मैं एक हिंसा से दूसरे हिंसा को जायज़ नहीं ठहरा रहा हूँ। लोग कह रहे ये कि Bharatiya Janata Party (BJP) या केन्द्र सरकार प्रगतिशील लोगों और विचार पर हमले करवा रही है। तो ऐसे लोगों से सवाल है कि क्या ऐसी सोच जो जेएनयू विवि के कम्यूनिकेशन विभाग में जाकर वहां की मशीनों को नुक़सान पहुंचा देता है,सर्बर में छेड़छाड़ कर देता है ताकि छात्र रजिस्ट्रेशन ना करवा सके, बिजली की आपूर्ति बन्द करवा देता है,जो छात्र पढ़ना चाहते हैं उनसे मारपीट करता है,उसको भी प्रगतिशील सोच के खांचे में रखेंगे क्या? यह सब सिर्फ़ इसलिए कर रहे हैं कि उनकी अपनी मांग को अबतक नहीं मांगा गया। अपनी मांग की वज्ह से दूसरे को भी ना पढ़ने देना,क्या प्रगतिशील सोच और संविधानिक रूप से जायज़ है? सरकार और मांग कर रहे छात्रों के बीच कई दफ़ा बातचीत हो चुकी है, लेकिन अबतक नतीज़ा नहीं निकला है। क्या जब तक नतीज़ा नहीं निकलता है,तक विवि में पठन-पाठन का कार्य नहीं होना चाहिए? पठन-पाठन कार्य में व्यवधान उत्पन्न करने वालों कैसे प्रगतिशील सोच मान लिया जाए?

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...