सोमवार, 13 जनवरी 2020

ग़लत तो ग़लत ही होता है।

सोमवार को घर से निकलकर बैट्री से चलने वाली रिक्शे पर बैठ गया। क़रीब एक किलोमीटर चला ही होगा कि अचानक से रिक्शे में कुछ ख़राबी आ गई। रिक्शाचालक के बगल में मैं ही बैठा,तो चालक ने मुझसे कहा कि, सर..थोड़ा सीट से उठ जाइए..देखना है कि कहीं तार तो छूटा नहीं हैं ना। मैं सीट से उतरकर बगल में खड़ा हो गया। चालक ने जैसे ही सीट को हटाया ,तो देखा कि तारें जैसे-तैसे उलझी हुई हैं। चालक कुछ देर तक तारों को हिलाकर देखता रहा कि कहीं जोड़ पर से छूट गया होगा तो पता चल जाएगा‌। लेकिन पहली कोशिश में कामयाबी नहीं मिली। फिर उसने सीट के नीचे ही चाभी रखा हुआ,उसको निकालकर ऑन-ऑफ़ करने लगा। कई बार ऑन-ऑफ़ करने के बाद रिक्शा चालू नहीं हुआ। दूसरा उसने तारों को हिलाना शुरू किया, अचानक से रिक्शा स्टार्ट हो गया है। हमलोग वहां से आगे बढ़े। 
मैं चालक से कहा कि यार... तुम सिर्फ़ पैसा ही m हो.. कुछ पैसा रिक्शे पर भी ख़र्च किया करना...यह तुम्हारी लिए आमदनी का ज़रिया है। 
चालक ने मुझसे कहा, नहीं... नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, रिक्शे को मेंटेन रखने के लिए ख़र्च करता हूँ।
मैं कहा कि,क्या मेंटेन करते हो.. तारें उलझी हुईं हैं, चाभी लगाने के लिए मीटर के बगल मे जो बॉक्स लगा हुआ वो ढीला ढककर है...चाभी तुम सीट के निचे रखते हो। यही तुम मेंटेन रखते हो?
चालक ने घबराहट में कहा कि, पुलिस की वज्ह से चाभी लगाने है... पुलिस वाला पहले चाभी निकाल लेता है। 
फिर मैंने कहा कि, पुलिस वाले पागल होते हैं क्या कि चाभी निकाल लेते हैं...जब तक तुम ग़लत नहीं करते होगे... ग़लत करो ही मत की पुलिस वाले को चाभी निकालने की ज़रूरत पड़े। मेरी बात सुन चालक मुस्कुराने लगा। मुझे और जगह का तो नहीं मालूम, लेकिन दिल्ली-एनसीआर और बिहार के रिक्शा और टेम्पू वालों के  बारे में कह सकता हूँ कि वो सिर्फ़ पैसा ही कमाते हैं। बहुत कम लोग रिक्शा और टेम्पू को दुरुस्त रखने के लिए पैसे ख़र्च करते हैं।

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