सोमवार, 6 जनवरी 2020

जेएनयू में हिंसा की वज्ह।

इन दिनों फ़ासिस्ट, कट्टरपंथी, नाज़ी और हिटलर जैसे शब्द एक वर्ग की ज़ुबान पर गाहे-बगाहे आ जाता है। आज़ाद हिन्दुस्तान में इन दिनों जितना संविधान संविधान जपा जा रहा है,शायद ही पहले कभी जपा गया होगा। क्या इसके पीछे यह कारण हो सकता है कि एक विचारधारा जो कभी सत्ताहीन होने की सोच भी नहीं सकता था,उसको उस विचारधारा ने सत्ताहीन कर दिया है, जिससे वो राजनीति करते थें? आपका जवाब क्या होगा, हाँ या ना? 

कल रात जेएनयू में जो हुआ वो किसी भी रूप में जायज़ नहीं कहा जा सकता है। हिंसा सिर्फ़ एक देह(शरीर) को ही नष्ट नहीं करता है, बल्कि इंसानियत को भी मारता है, इसलिए ज़रूरी है कि हिंसा को संवाद से ख़त्म करें। जेएनयू में मैं पढ़ तो नहीं सका, लेकिन जेएनयू को जितना जानता हूँ,उस आधार पर कह सकता हूँ कि तर्कशील बनाने वाले इस धरोहर को हर स्तर पर सुरक्षित रखा जाना चाहिए। इससे समाज को फ़ाइदा तो होगा कि सत्ता को भी किसी विषय पर अलग परिपेक्ष्य में सोचने का मौक़ा मिलेगा। यह बिल्कुल ग़लत बात है कि यदि कोई जो भी और जितना सोचता और चीज़ों को जितना देखता हैं उतना काफ़ी है। 

कल रात जब जेएनयू से हिंसा की ख़बरें आनी शुरू हुई,तब से अब तक उस विषय को ग़ायब ही कर दिया गया है कि हिंसा की शुरूआत कैसे हुई? लिखा और कहा जाने लगा कि फ़ासिस्ट, कट्टरपंथी, नाज़ी और हिटलर के ग़ुण्डों ने हिंसा की है, अलग विचारधारा वाले लोग तो सिर्फ़ शिकार हुए हैं। दरअस्ल हिंसा की वज्ह इतना आसान नहीं हैं। हिंसा के लिए सिर्फ़ अकेले कोई ज़िम्मावार हो सकता है? कल शाम से पहले की घटना को भी जानना पड़ेगा। यहां मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ, मैं एक हिंसा से दूसरे हिंसा को जायज़ नहीं ठहरा रहा हूँ। लोग कह रहे ये कि Bharatiya Janata Party (BJP) या केन्द्र सरकार प्रगतिशील लोगों और विचार पर हमले करवा रही है। तो ऐसे लोगों से सवाल है कि क्या ऐसी सोच जो जेएनयू विवि के कम्यूनिकेशन विभाग में जाकर वहां की मशीनों को नुक़सान पहुंचा देता है,सर्बर में छेड़छाड़ कर देता है ताकि छात्र रजिस्ट्रेशन ना करवा सके, बिजली की आपूर्ति बन्द करवा देता है,जो छात्र पढ़ना चाहते हैं उनसे मारपीट करता है,उसको भी प्रगतिशील सोच के खांचे में रखेंगे क्या? यह सब सिर्फ़ इसलिए कर रहे हैं कि उनकी अपनी मांग को अबतक नहीं मांगा गया। अपनी मांग की वज्ह से दूसरे को भी ना पढ़ने देना,क्या प्रगतिशील सोच और संविधानिक रूप से जायज़ है? सरकार और मांग कर रहे छात्रों के बीच कई दफ़ा बातचीत हो चुकी है, लेकिन अबतक नतीज़ा नहीं निकला है। क्या जब तक नतीज़ा नहीं निकलता है,तक विवि में पठन-पाठन का कार्य नहीं होना चाहिए? पठन-पाठन कार्य में व्यवधान उत्पन्न करने वालों कैसे प्रगतिशील सोच मान लिया जाए?

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