मंगलवार, 17 मार्च 2020

ज़िन्दगी में छांव।


आज दोपहर के वक़्त हस्पताल से मैं लौट रहा था, अचानक से मेरी नज़र इस शख़्स पर पड़ी। कुछ दूरी पर रेड लाइट होने की वज्ह से हमारी गाड़ी की रफ़्तार धीमी हो गई तो मैंने ये तस्वीर क़ैद कर ली। 24*7 वर्किंग कल्चर के कर्मचारियों के लिए यह तस्वीर कुछ पल से लिए सुकून तो पहुंचा ही सकती है। हाँ, उनलोगों को शायद नहीं जिन लोगों ने कैरियर के नाम पर रोबोट बनना स्वीकार कर लिया है। 24*7 वर्किंग कल्चर में स्वीकार्यता उनकी है जिनकी इंसानियत क़रीब-क़रीब शून्य पर पहुंच चुकी है। एक बार एक सीनियर ने मुझसे कहा था कि तुम इतने संवेदनशील क्यूँ हो, तुम्हे काम करना है। इतने संवेदनशील रहोगे तो हो गया काम। इस बात ने तब भी मुझे आश्चर्यचकित कर दिया था और अब भी जब कभी याद आ जाती है,तो मैं इस उलझन में पड़ जाता हूँ कि ऐसे लोगों की मानसिकता का स्तर क्या होता होगा,निम्न या उच्च?

ख़ैर,जब भी यह तस्वीर आखों के सामने हो रही है, तो ख़याल आ रहा है कि थकना मना है हो चुकी ज़िन्दगी में छांव की कितनी ज़रूरत है। छांव में लेटा हुआ यह व्यक्ति अपने काम को करके जब थक जाता होगा तो थोड़ी देर ऐसे ही आराम कर लेता होगा, फिर नई ऊर्जा के साथ अपने काम की शुरूआत करता होगा। कॉरपोरेट कल्चर में काम कर-करके थका हुआ व्यक्ति चाय की चुस्की या सिगरेट की कश या फिर दोनों से अपनी थकान मिटाता है। वर्षों तक काम करके, चाय की चुस्की और सिगरेट की कश से थकान मिटाने वाला व्यक्ति एक वक़्त के बाद जब पीछे मुड़कर देखता है तो शायद की किसी को वो समाज नसीब होता होगा, जहां थोड़ी देर बैठकर वक़्त बीता सके। दिन-दुनिया की बातें कर सके। डिओ न मारने वाले पाँच-दस लोग जानते हो, जो खेत-खलिहान गांव-जवार की बातें कर सके। 

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