मंगलवार, 29 अगस्त 2017

"Each drop of your tear Sears our heart."


फ़ूट-फ़ूटकर रोती ये तस्वीर ज़ोहरा की है।ज़ोहरा,उनलोगों में से है,जो अब कभी अपने पिता का प्यार नही पा सकेगी।ज़ोहरा के साथ-साथ उनके तीन भाई और एक बहन से हमेशा-हमेशा के लिए पिता का साया छिन गया है।ज़ोहरा के पिता एएसआई अब्दुल रशीद पीर को आतंकवादियों ने उस वक़्त गोली मार दी,जब वो अन्नतनाग स्थित थाना सद्दार के मेहंदी कादल इलाके में अपने ज़िम्मेदारी का निर्वाह कर रहे थें।मीडिया रिपोर्ट्स के मुताब़िक पीर,ज़ाम में फंसी गाड़ियों को निकलवा रहे थें,उसी वक़्त आतंकी ने उनके सीने में गोली मार दी।तमाम कोशिशों के बावजूद डॉक्टर्स उन्हें बचा ना सके।भारत माता के इस सपूत की शहादत से लोग गमगीन है।
ज़ोहरा की विलाप करती हुई,इस ह्रदय विदारक तस्वीर पर सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई है।देशभर से लोग अपने-अपने शब्दों से ज़ोहरा का ढाढस बढ़ा रहें हैं,तो कोई सहानुभूति प्रकट कर रहा है।लेकिन एक सवाल,जो मेरे मन में कौंध रहा है,वो ये कि आख़िर वो लोग और शीर्ष के राष्ट्रीय हिन्दी न्यूज़ चैनल्स,जो दिन-रात देशभक्ति बनाम देशद्रोही पर चीखते हैं।उस चैनल्स के संपादक,एंकर और रिपोर्टर्स, एक ऐसे वक़्त में ख़ामोश क्यूं है,जब ज़ोहरा के इस ह्रदय विदारक तस्वीरों पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई।क्यूं बलात्कारी बाबाओं को ही प्रधानता दिया जा रहा है?क्या जनता सिर्फ़ बलात्कारी बाबा को ही देखना चाहती है?
दक्षिण कश्मीर के डीआईजी ने अपने फ़ेसबुक पर लिखा है-My dear Zohra,your tears have shake many heart.The sacrifice made by your father will always rememberded.you are too young to understand to why this hapende.your father like all of us represent j&k police force-A hallmark of volour and sacrifice.Each drop of your tear Sears our heart.(मीडिया रिपोर्ट के अनुसार)

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

यूपी के स्वास्थ्य मंत्री के नाम मेरा ख़त.......

                                                                                                                                                    
आदरणीय सिद्धार्थनाथ सिंह जी,
नाउम्मीदी के बावजूद भी आपको ये ख़त लिख रहा हूं।बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज एण्ड हॉस्पिटल,गोरखपुर में बच्चों की हुई मौत के करीब-करीब तीन दिन बीत चुके हैं।मुझे मालूम नही की आप बच्चों की मौत से कितने आहत हुए थे,लेेकिन आपके राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को कई माताओं की गोद सुनी हो जाने की बात आम  बात लगी है।मैंने ये ख़त आलोचना या इस्तीफ़ा देने जैसी बातों के लिए नही लिख़ा है।क्योंकि सत्तानशी को आलोचनाओं से फ़र्क नही पड़ता है।और यदि इस्तीफ़े से चीजें बदल जाती तो आपके ही दादाजी (लाल बहादुर शास्त्री जी) नें 1956 में हुए एक रेल हादसे पर इस्तीफ़ा  दे दिया था,लेकिन आज रेलवे की क्या हालात है सबको पता है।बल्कि मैंने ये ख़त एक विशेष गुज़ारिश के लिए लिखा है।घटना के तकरीबन तीन  दिन बीत जाने के बाद सब कुछ सामान्य सा हो गया है। अब आपको टीवी में अपने बुझ चुके चिराग को लेकर फुटकर-फुटकर रोते -बिलखते परिजन नही दिखाई देंगे।गुज़ारिश ये है कि जिस दिन मेरी ये चिट्ठी आप के हाथ लगे,उस दिन किसी एकान्त जगह पर जाकर दो दृश्यों को याद कीजिएगा।पहली दृश्य -जिस दिन आप ने हिन्दुस्तान के सबसे बड़े राज्य के स्वास्थय मंत्री के रुप में शपथ लेते वक़्त जो बात कही थी और दूसरी दृश्य-बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज एण्ड हॉस्पिटल,गोरखपुर में फुटकर-फुटकर रोते -बिलखते उन परिजनों की जिनका चिराग हमेशा-हमेशा के लिए बुझ गया है।उम्मीद है इन दोनों तस्वीरों से ये साफ़ हो जाएगा कि इस घटना से पहले आपने अपने कर्तव्य का पालन कितनी ज़िम्मेदारीपूर्वक निभाया है।
 आज़ हमारा देश आज़ादी की 70वीं सालगिरह के जश्न में डूबा हुआ है। हर हिन्दुस्तानी अपने-अपने तरीके से आज़ादी का जश्न मना रहा है।आज़ आपने उन नन्हें-नन्हें बच्चे-बच्चियों को तो देखा ही होगा जो आज़ादी के इस पावन पर्व में झुमते हुए नज़र आये होंगे,ठीक उसी तरह अपनी जगह उन माता-पिता को रख के सोचिए जिसके बच्चे को,आपलोगों के सामुहिक लापारवाही ने उनकी चिराग को बुझा दिया।17 परिजनों ने तो अपने बच्चे का नामकरण तक नही किया था।हैरानी की बात ये है कि लाल किले के प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने गोरखपुर हादसे का ज़िक्र तो किया,लेकिन चन्द शब्दों में वो भी बिना गोरखपुर का नाम लिए।इसको क्या समझा जाए?
घटना का आज़ चौथा दिन है। बीआरडी अस्पताल में बच्चों की मौत,व्यक्तिगत लापरवाही से हुई कि सामूहिक लापरवाही से,अबतक पता नही चल पाया है।क्या उम्मीद की जा सकती है कि दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई होगी?हत्या से जुड़ी अबतक के सभी घटनाक्रम पर डाले तो,जो मैं समझ पा रहा हूं वो ये है कि आप सब लोग अपने आप को निर्दोष ठहरा रहें है।फ़िर आख़िर इतने बच्चों की जान कैसे चली गई?डीएम,अस्पताल प्रशासन और एक स्वास्थ्य मंत्री के नाते,आपलोगों के बयान में काफ़ी भिन्नता नज़र आ रही है।मौत के कारणों पर डीएम के रिपोर्ट के बावजूद भी अापलोग(सरकार)मानने के लिए तैयार नही है कि बच्चों की जान अॉ़क्सीजन की वज़ह से गई है।जबकि डीएम ने अपने रिपोर्ट में साफ़-साफ़ कहा है कि अॉक्सीजन सप्लाई में बाधा उत्पन्न होने के कारण मौत हुई है।कितने बच्चों की उस दिन मौत हुई,इसका भी अधिकारिक आंकड़ा नही पता चल पाया है।
दुख की घड़ी में विपक्षी नेताओं का गोरखपुर अस्पताल का दौरा करके,अपनी उपलब्धियों को गिनाने वाली बात तो समझ आती है,लेकिन आपका प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ये कहना कि अगस्त में तो मौतें होती रहती है और साल दर साल मौत के आंकड़े को गिनाने वाली बात आज़ तक समझ नही आई।इन बातों से आप क्या साबित करना चाहते थें?क्या इसी के लिए यूपी की जनता ने आपको चुना था?या फ़िर जनता के लिए कहीं इस बात का संकेत तो नही है कि "सिर्फ़ सरकार बदली है व्यवस्था नही?" रही बात सत्तावीहीन नेताओं की तो,कम से कम उनको तो इस दुखद वक़्त में ये सोचना चाहिए था कि यदि वो इतने ही अच्छे होते तो जनता उनको सत्तावीहीन क्यों करती।मीडिया की रिपोर्टिंग और सोशल मीडिया ने मुद्दे को भटका दिया  है।मौत के कारणों की जांच और दोषियों पर कार्रवाई से भटक कर मामला इंसेफेलाइटिस वार्ड के डॉ.कफ़ील और साम्प्रदायिक बना दिया गया है।अब सिर्फ़ डॉ.कफ़ील के बारे में बात हो रही है और रिपोर्ट छप रही है।इससे क्या ये अनुमान किया जाए कि बच्चों की मौत के ज़िम्मेदार सिर्फ़ कफील ही हैं?




शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

कुर्सी पर सिर्फ़ बोलने वाला नही बैठा है!

'राजनीति में नेताओं की सियासी समस्या ही आपकी भी बुनियादी समस्या है,नेताओं की बड़ी-बड़ी बातें आपकी समस्यों का समाधान है',न्यूज़ चैनल के अनुसार।यदि आप न्यूज़ चैनलों को ध्यान से देखेंगे तो उपरोक्त बात आसानी से समझ आ जाएगी। ऐसा नही है कि ये सिर्फ़ हिन्दुस्तान में ही  हो रहा है और वो भी आज़कल हो रहा है।दुुनिया के किसी भी देश में न्यूज़ चैनल्स, उदय के कुछ दिनों बाद से ही पत्रकारिता छोड़ दलों के प्रवक्ता के रुप में काम करने लगें।राजनीतिक दलों और उनके नेताओं की पलपल की जानकारी आप तक पहुंचाने लगे। बीच-बीच में अपनी विश्वसनीयता कायम रखने के लिए कुछ जन समस्याओं को दिखाकर,धीरे-धीरे आपको अपना शिकार बना लिए,जो आज सामने है। टीवी में एक नये प्रारुप का आगमन हुआ,जिसको 'डिबेट शो' के नाम से जाना जाता है।डिबेट शो का आगमन किसी भी मुद्दे पर अलग-अलग जानकारों की राय से एक निष्कर्ष पर पहुुचने के लिए हुआ था,लेकिन ये फॉरमेट भी राजनीति का शिकार हो गया।आज आलम ये है कि किसी भी मुद्दे पर डिबेट हो,किसी भी दल का एक ही प्रवक्ता सभी विषयों पर बोल देगा,समस्या चाहे हिन्दुस्तान के किसी भी कोने का हो।भले ही वो दिल्ली से या फ़िर अपने शहर से कई महीनों से निकला ना हो।अब  डिबेट शो में तो अपशब्दों का भी इस्तेमाल होने लगा है।
एक ऐसे वक्त में जब डिबेट शो राजनीति से ग्रसित हो गया है, कुछ अभी भी डिबेट शो है जहां जनहित की लिए शान्ति से बात होती है।उसी में से एक है एनडीटीवी इण्डिया का 'प्राइम टाइम' शो।प्राइम टाइम के एंकर हैं रविश कुमार।जिनकी कोशिश होती है कि बहस के दौरान मुद्दे के कई पक्षों पर बात हो।गुरुवार को उन्होंने अपने कार्यक्रम में सीवर सफ़ाईकर्मियों की लगातार हो रही मौत के कारणों पर स्टुडियों में बुलाकर  बात की। इस कार्यक्रम की सबसे खास बात ये है कि इसमें सिर्फ़ बोलने वाले  यानि किसी दल के प्रवक्ता नही थे़ं। कार्यक्रम का लिंक भी दे रहा हूूं।
https://www.youtube.com/watch?v=PvQlXa2bOsM

सोमवार, 7 अगस्त 2017

सोशल मीडिया की वज़ह से जनता और सरकार में सीधा संवाद हो रहा है?

"सोशल मीडिया की वज़ह से जनता और सरकार के बीच सीधा संवाद हो रहा है।"ये कहना है मेरे एक मित्र का।मेरे मित्र के इस बयान से कई लोग सहमत भी होंंगे, तो कई लोग मेरी तरह असहमत भी।उनके इस बयान का आधार क्या-क्या हो सकता है,ये जानने की मैंने कोशिश की।मैंने अपने गांव और शहरों में रहने वाले कई साथियों से इस सन्दर्भ में बात कि जो स्मार्टफ़ोन,टैबलेट, डेस्कटॉप या लैपटॉप का इस्तेमाल 2014 के पहले के कई सालों से इस्तेमाल करतें आ रहें हैं। इन तमाम डिवाइस वाले साथियों से इसलिए बात कि,क्योंकि मसला सोशल मीडिया से जुड़ा है।वो भी एक ऐसे वक़्त में जब सोशल मीडिया अफ़वाहों का अड्डा बन गया है।हकीकत से रूबरू होने के लिऐ एक असाधारण कोशिश आपको भी करनी चाहिए।अपने ही सोशल मीडिया को पूरा छान मारिये, ताकि पता चल की हकीकत क्या है।यदि आपका संबंध गांव से है तो ,अपने गांव के 10 लोग(सभी वर्ग के) से सोशल मीडिया के बारे में पूछिए।इसके अलावा मैंने गूगल की भी मदद ली।इस विषय के शोधपरक हिन्दी और इंग्लिश के कई वेबसाइटों को पढ़ा,ताकि कोई तो ऐसी बात पता चले जिससे लगे की सरकार जनता से सीधे संवाद कर रही है।इन तमाम कोशिशों के बावजूद जिस निष्कर्ष पर मैं पहुंचा, उससे लगा कि मैं उनके सोचने के स्तर तक नही पहुंच पाया।उम्मीद करता हूं कि उनसे जब इस मुद्दे पर बात होगी तो जानने की कोशिश करूंगा कि उनके कहने का आधार क्या था।
बहरहाल मैं अपनी असहमति के पक्ष में कुछ शोधपरक आकड़ों को प्रस्तुत कर रहा हूं।तमाम वेबसाइटों को पढ़ने के बाद एक मुख्य बात जो सामने आई वो ये कि सब कुछ 'उम्मीद' पर टिका हुआ है,वो भी साल 2020 तक।लेकिन अभी जो हालात है वो बहुत बद्दतर है।मैंने दो बातों को शोध का आधार बनाया।पहला कितने लोग स्मार्टफ़ोन इस्तेमाल करते हैं और दूसरा कितने लोग इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं।क्योंकि ये दोनों बातें एक दूसरे के पूरक हैं और सोशल मीडिया का वजूद ही इन बातों से है।शोध करते वक़्त मैंने पूरी सावधानी बरती है।फ़िर भी यदि कोई चूक हो गई हो तो पहले से क्षमा।क्योंकि मेरा मकसद सिर्फ़ हकीकत को आपके सामने लाना है,क्योंकि सिर्फ़ बातों से बात नही है।
शोध के किसी भी बिन्दु को पढ़ते वक़्त भारत की जनसंख्या को ध्यान में रखिएगा।2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 1,210,193,422 है।worldometers के अनुसार 6 अगस्त 2017 तक भारत की आबादी 1,343,961,178 है,जिसका 32.8% हिस्सा यानि 439,801,466 लोग शहर में निवास करते हैं।
worldometer एक वेबसाइट है जो दुनियाभर के जनसंख्या की जानकारी देता है।
▶द मोबाइल इकोनॉमी इण्डिया 2016 के अनुसार जून-2016 तक भारत के 27.50 करोड़ लोग स्मार्टफ़ोन इस्तेमाल करते हैं।उम्मीद लगाई जा रही है कि 2020 तक देश के 68% आबादी के पास स्मार्टफ़ोन होगा।वर्तमान में 61.6% लोग मोबाइल यूजर्स हैं।वर्तमान में देश में देश में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या 34 करोड़ 30 लाख है,जो कुल आबादी का 27% है।जहां 2020 तक यह संख्या बढ़कर 60 करोड़ पहुंचने की उम्मीद है।
▶टू बैलेंस मोबाइल एप ने 01 अगस्त 2017 को एक रिपोर्ट में बताया कि पिछले 8 महीने में भारत में मोबाइल डाटा का इस्तेमाल बढ़ा है।इसके बावजूद भी भारत में 56% स्मार्टफ़ोन यूजर्स के पास इंटरनेट की सुविधा नही है।इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में इंटरनेट की कनेक्टिविटी आज़ भी काफ़ी ख़राब है,जिसके चलते यूजर्स इस्तेमाल नही कर पाते है।
▶एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सोशल मीडिया में से सबसे ज़्यादा इस्तेमाल फ़ेसबुक का होता है।इसको इस्तेमाल करने वाले ज़्यादातर 18-24 साल के युवक हैं।इसमें से भी 76% प्रतिशत उपभोक्ता पुरूष हीं हैं।मात्र 24% महिला ही फ़ेसबुक इस्तेमाल करतीं हैं।
दूसरे नम्बर पर ट्विटर आता है।जिसके मात्र 17% उपभोक्ता हैं।
इंस्टाग्राम को इस्तेमाल करने वाले भारत मे 71% पुरूष और मात्र 29% महिलाएं इस्तेमाल करतीं हैं।इसके सबसे ज़्यादा सक्रिय उपभोक्ता दिल्ली और मुंबई में हैं।उपयोगकर्ता में 60% कॉलेज के लड़के-लड़कियां हैं।
इसके अलावा लिंक्डइन, युट्यूब, मैसेन्जर वगैरह है।
                             अब आप ही सोचिए कि जिस देश की पूरी आबादी के पास स्मार्टफ़ोन और इंटरनेट की सुविधा नही है।भाषाई अंतर तो है ही।वहां ये कहना कि 'सोशल मीडिया की वज़ह से जनता और सरकार में सीधा संवाद हो रहा है' कितना न्यायोचित है?मेरे मित्र का यह बयान जनहित में सवाल पूछने वाले पत्रकारों पर कटाक्ष करते हुए आया है।उनका तर्क है कि सवाल पूछने वालों पत्रकारों को सरकार ज़वाब क्यूँ दे,जब सोशल मीडिया के माध्यम से जनता से सीधा संवाद हो ही रहा है।वो ये कहते हुए भुल गयें कि पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है,जिसका काम ही है सवाल पूछना ना कि सरकार की चाटुकारिता करना।

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

नीतीश जी:दाग अब भी लगे हैं!

दिन 26 जुलाई 2017,शाम का वक्त, राष्ट्रीय मीडिया की नज़र बिहार पर।क्योंकि इस शाम से अगली शाम तक भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय लिखा जा रहा था,एक व्यक्ति की साफ़-सुथरी छवि बनाये रखने के लिए।इस अध्याय में कई ऐसी चीजें लिखीं गई,जो अबतक की राजनीति में एक बानगी है।जैसे नीतीश कुमार छठी बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले अबतक के एकमात्र मुख्यमंत्री बने।सबसे अल्प समय तक मुख्यमंत्री ना रहने वाले मुख्यमंत्री बने।अपने पुरानी साथी से हाथ मिलाने जा रहे थे,जिससे साल 2013 में यह कहते हुए नाता तोड़ दिया था कि 'मिट्टी में मिल जाऊंगा, लेकिन दुबारा कभी नाता नही जोड़ूंगा।'इस शाम नीतीश ने उस गठबंधन से नाता तोड़ दिया,जिसकी बुनियाद सांप्रदायिक ताकतों के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए रखी थी।महज़ 20 महीने में उसी सांप्रदायिक ताकत से हाथ मिला लिए,जिससे लड़ने के लिए ख़ुद के सहयोग से एक गठबंधन का निर्माण किया था।इस गठबंधन से अलग होने के बाद उनके कई उपनाम भी अस्तित्व में आए।जैसे-कुर्सी कुमार,पलटूराम,रणछोड़ इत्यादि।
अपने वर्तमान साथी भाजपा से साल 2013 में नाता तोड़ते वक़्त नीतीश कुमार ने कहा था कि ये निर्णय सिद्धांत के आधार पर लिया गया है।भाजपा एक सांप्रदायिक पार्टी है।आइए एक नज़र डालते हैं दोनों साथियों के साल 2013 से लेकर 2015 तक के उन कुछ वचनों पर ताकि आपको तय करने में आसानी हो जाए की राजनीति में नैतिकता का क्या महत्व होता है।नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार चुने जाने पर नीतीश ने कहा था कि भाजपा एक ऐसे उम्मीदवार को चेहरा बना रही है,जिसका नाम सुनते ही देश के करोड़ों अल्पसंख्यकों में भय उत्पन्न हो जाता है।नीतीश ने नरेंद्र मोदी की तुलना हिटलर से की थी।सुशील मोदी ने नीतीश को धोखेबाज़ कहा था।नरेन्द्र मोदी ने नीतीश को अवसरवादी नेता कहा था।
हाल ही में 26 जुलाई को गठबंधन से अलग होते वक़्त साफ़ -सुथरी छवि के जाने जाने वाले नीतीश ने कहा था कि मैंने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई में ये कदम उठाया है और अगले ही दिन भाजपा के सहयोग से सरकार बना लिए।आइए एडीआर के रिपोर्ट की मदद से जानते हैं कि राजद-कांग्रेस के गठबंधन वाले नीतीश मंत्रिमंडल में कितने दागी मंत्री थे और अब भाजपा के सहयोग से बनी मंत्रिमंडल में कितने दागी हैं।एडीआर ने ये रिपोर्ट नेताओं द्वारा चुनाव आयोग में दाखिल किए गए चुनावी हलफनामे के आधार पर तैयार किया है।
एडीआर(एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म) एक संस्था है,जिसको कह सकते हैं कि ये राजनीतिक प्रणाली को दूरूस्त करने के लिए काम करती है।इसकी स्थापना 1999 में आईआईएम, अहमदाबाद के प्रोफेसरों ने मिलकर की है।
रिपोर्ट की शुरुआत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से ही करते हैं।साल1991 में एक मर्डर केस में उन पर हत्या,हत्या की कोशिश, दंगा भड़काने और आर्म्स एक्ट का मामला दर्ज़ है।
                             उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी पर मानहानि, शान्ति भंग करने और आपराधिक साज़िश के केस दर्ज़ है।ऐसे ही नीतीश के वर्तमान मंत्रिमंडल के कई नेताओं पर चोरी, धर्म, जाति,लिंगभेद के आधार पर सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने ,घर में घुस कर चोरी,रंगदारी, धोखाधड़ी, सम्पत्ति, बेईमानी, आपराधिक धमकी और जालसाजी जैसे  मामले दर्ज़ हैं।नीतीश के वर्तमान 29 सदस्यीय मंत्रिमंडल का हाल-
👉मंत्रिमंडल में 22(76%)मंत्रीयों पर आपराधिक मामले में केस दर्ज़ है।जिनमें से 9 पर जघन्य अपराध के आरोप हैं।जबकि पिछली सरकार में 19(68%) मंत्रियों पर आरोप थे।
👉मंत्रिमंडल में 21(76%) करोड़पति,जबकि पिछली सरकार में22(79%)थें।
इस सरकार में सबसे ज़्यादा और सबसे कम सम्पत्ति वाले मंत्री भाजपा के ही हैं।जिनके पास सबसे ज़्यादा सम्पत्ति है,वो हैं लखीसराय से भाजपा विधायक विजय कुमार सिन्हा।इनके पास 15.64 करोड़ की सम्पत्ति है।इनकी चल सम्पत्ति 9,81,72,626 और अचल सम्पत्ति 5,82,38,000 है।
इसी सरकार में सबसे कम सम्पत्ति वाले हैं मंगल पाण्डेय,जो कि भाजपा से एमएलसी हैं।इनके पास अचल सम्पत्ति है 0 और चल सम्पत्ति है 49,93,582।
👉इस मंत्रिमंडल में एक महिला मंत्री है,जबकि पिछली सरकार में दो महिला मंत्री थी।

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

कुदरत और राजनीति की मार झेल रहा है गुजरात।

देश के चार राज्य बारिश और बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित है।उनसे में एक राज्य है गुजरात।इस राज्य के कई ज़िले बारिश और बाढ़ से भयंकर रूप से प्रभावित है।मीडिया रिपोर्ट्स के मुताब़िक बनासकांठा और पाटन ज़िले के गांव ज़्यादा प्रभावित है।केन्द्र और राज्य सरकार के साझा सहयोग से राहत और बचाव कार्य ज़ारी है।SEOC यानि State Emergency operation center के रिपोर्ट के मुताब़िक बाढ़ से अबतक बनासकांठा में 61 और पाटन में सात लोग समेत 218 लोगों प्राकृतिक आपदा की वज़ह से मौत हो गई है।
लगातार हो रही बारिश से उत्पन्न हुई बाढ़ से 4.5 लाख़ लोग प्रभावित है।इसमें से अबतक 39000 लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया गया है।वायुसेना, राष्ट्रीय और राजकीय आपदा मोचन बल के सहयोग से पिछले हफ़्ते 11400 लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया।लगातार हो रही बारिश से बचावकर्मियों को काफ़ी मुश्किलों का सामना कर रहा है।लेकिन मुश्किल हालात के बावजूद अपने कर्तव्य का ईमानदारी से निर्वाह कर रहें हैं।
ऊधर गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी भी बनासकांठा और पाटन ज़िले में डेरा डाले हुए।रूपानी नें बताया की पाटन के 87 छतिग्रस्त सड़कों में से 58 सड़कों का मरम्मत कर दिया गया है और 153 चिकित्सा शिविर लगाये गये हैं।इण्डिया टुडे से बातचीत में रिलीफ़ कमांडर एजे शाह ने कहा कि आपदाग्रस्त इलाकों में राहत एंव बचाव का कार्य अब भी ज़ारी है और उम्मीद है मरने वालों की संख्या में इज़ाफ़ा नही होगा।
आपदा से इतर गुजरात राजनीतिक समस्या से भी जूझ रहा है।8 अगस्त को होने वाले राज्यसभा चुनाव में सिर्फ़ एक व्यक्ति को जिताने के लिए,कांग्रेस ने अपने 42 विधायकों को गुजरात से 1663.7 किमी दूर बैंगलोर के ईगलटोन रिसॉर्ट पहुंचा दिया है।इन 42 विधायकों में वो भी विधायक शामिल हैं,जिनका इलाका जलमग्न है।आपदाग्रस्त इलाके के विधायकों के लिए ये सबसे मुफ़ीद वक़्त था,पीड़ित लोगों की सहायता कर अपने और अपने पार्टी की विश्वसनीयता बहाल करने की।वो भी एक ऐसे वक़्त में जब देश के मात्र 6% आबादी पर कांग्रेस का शासन रह गया है।इन विधायकों को ये भी सोचना चाहिए था कि वो दुबारा वोट आधार पर मांगने जाएंगे?
रिसॉर्ट की वेबसाइट के मुताब़िक एक दिन के खाने और रहने का किराया न्यूनतम 7500 है।मीडिया रिपोर्ट के मुताब़िक इस रिसॉर्ट में एक विधायक ने अपने 12 साल के बेटे के जन्मदिन के अवसर पर 50 किलो का केक मंगवाया,साथ अॉर्केस्टा के साथ कॉकटेल डिनर पार्टी का आयोजन भी आयोजन किया।मगर आठ लोगों ने ही मंदिरापान किया।गुजरात वैसे भी ड्राई स्टेट है।
इन सब के बीच,एक तरफ़ जिस व्यक्ति को राज्यसभा में पहुंचाने के लिए विधायकों को परमानंद की प्राप्ति कराई जा रही है,उस व्यक्ति को ख़ुद बाढ़ प्रभावित इलाकों में जाना पड़ा।सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल(राज्यसभा उम्मीदवार) और अशोक गहलोत ने बनासकांठा इलाके का दौरा किया और पटेल ने अपने दौरे की फ़ोटो ट्वीट करते हुए, राज्य सरकार के राहत एवं बचाव कार्य की आलोचना करते हुए कहा की,इसकी रफ़्तार बहुत ही धीमी है।वहीं दूसरी तरफ़ राज्यभा में गुलाम नबी आज़ाद ने भी इस मुद्दे को उठाया।पटेल और गहलोत के बाद,बाढ़ प्रभावित इलाकों में केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी भी गई।बीजेपी ने कांग्रेसी विधायकों के बैंगलोर जाने को मुद्दा बनाया है।केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके विधायक मौज-मस्ती कर रहे हैं,जबकि भाजपा के विधायक बाढ़ प्रभावित लोगों को राहत मुहैया कराने में व्यस्त हैं।उन्होंने आगे कहा कि गुजरात कांग्रेस के नेता बेंगलुरु में भाजपा पर आरोप लगा रहे हैं।यह उल्टा चोर कोतवाल को डांटे वाली बात हो गई।यदि उनके विधायक ख़ुद उन्हें छोड़कर आकर रहे हैं,तो इसका हमसे कोई लेना देना नही है। 30 जुलाई को कांग्रेस नेता शक्ति सिंह गोहिल ने रिसॉट में अपने सभी विधायकों के साथ प्रेस कॉफ्रेंस कर बताया कि हमारे विधायक यहां मौज-मस्ती करने नही आए हैं,बल्कि लोकतंत्र को बचाने आए हैं।भाजपा उनके विधायकों को धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल का इन्हें ख़रीदने की कोशिश कर रही है। गुजरात में कांग्रेस के कुल 57 विधायक थे, जिनमे से 6 ने पिछले दो दिनों में इस्तीफ़ा दे दिया है।उनमें से 3 ने 28 जुलाई को भाजपा का दामन धाम लिये। 7 अन्य बेंगलुरु में ठहरे विधायकों के समूह में शामिल नही हैं।गोहिल ने उम्मीद जताई की वे अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनेंगे और कांग्रेस के ख़िलाफ़ वोट नही करेंगे। बीजेपी हमारे 22 विधायकों ख़रीदने की कोशिश कर रही है।लेकिन हमारे विधायक एकजुट हैं।कांग्रेस आजकल अपने नेताओं को 'अंतरात्मा की आवाज़' सुनने की बात कर रही है। राष्ट्रपति चुनाव में भी मीरा कुमार ने अंतरात्मा की आवाज़ सुनने की बात कही थी। गोहिल को जब अपने विधायकों पर इतना ही भरोसा है तो विधायकों को बैंगलुरू क्यों पहुंचा दिए?

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...