गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

....एक नज़ारा ये भी है।

               मेरी सांसों में बसा इस हवा का नशा...।
               मेरा दिल.......मेरा पता.......मेरी शान...।
               दिल्ली है मेरी जान..।

यह गाना दिल्ली का थीम सॉन्ग है।वाकई दिल्ली हमारी शान है और दिल्ली पर अपनी जान लुटा रहें हैं। दिल्ली की ऊंची-ऊंची इमारतें,मेट्रो,सड़कों पर तेज़ रफ्तार से दौड़ती गाड़ियां और तमाम तकनीकों से लैस इस महानगर के विकसित होने का परिचायक है।लेकिन मैं इसी महानगर के उस तस्वीर की बात कर रहा हूं, जो आज़ादी के बाद से लेकर आज तक उदासीन ही है।मेरा सामना रोज़ इन तस्वीरों से आते-जाते होता है।

इन तस्वीरों को देखने के बाद मन में कई सवाल हैं,कई राय भी हैं और नतीज़े भी हैं,लेकिन मैं जानता चाहता हूं कि इस महानगर के भीतर ये लोग कैसे विकास से वंचित रह जा रहें है? उन तमाम सरकारी नियम और वादों का क्या हुआ,जिसमें ऐसे लोगों के विकास की बात कही गई है?वो तमाम गैर-सरकारी संस्थान क्या कर रही है,जो दिन-रात गरीबों की विकास की बात करती है।मैं बात कर रहा हूं उन लोगों की जो खुले आसमान में बारहों मास इस महानगर के रोड किनारे अपने जीवन का गुज़ारा करते हैं। आप कल्पना कीजिए वो जीवन कैसा होगा,जिसको ना तो ठीक से पेट भरने के लिए भोजन है,ना पीने के लिए पानी और ना तन ढ़कने के लिए कपड़ा,आवास की तो बात ही मत कीजिए। रोज आने-जाने के क्रम में इन लोगों के खाने की चीज़ों पर नज़र पड़ जाती है।कई बार इनके बच्चों को देखता हूं कि बिना सब्ज़ी के रोटी,वो भी मिट्टी लगी हुई खाये जा रहें हैं।एक बार देखा कि उबले हुए मुर्गे की खाल,वो पंख सहित थी,जिसका पंख हटा कर खाने की तैयारी कर रहे थें।सोचिए ये नज़ारा कितना हृदय विदारक है ना।बच्चे इस बात से अंजान तो हैं ही,उनके परिजन भी इस बात से अंजान हैं कि स्वच्छता कितनी ज़रुरी है।क्या ऐसे लोगों को स्वच्छता का महत्व बताये बिना स्वच्छ भारत की निर्माण संभव है?कौन बतायेगा इनको स्वच्छता के बारे में? जब भी मैं इनके करीब से गुज़रता हूं,तो सोंचता हूं कि आज़ादी से लेकर आज तक ये बात सिर्फ कहने जैसी ही क्यों लगती है किसरकार सबके भले के लिए काम करेगी। यदि सभी सरकारें सबके भले के लिए काम कर रही होती तो भारत की कुल आबादी का 22% हिस्सा कैसे वैश्विक गरीबी रेखा से नीचे है? आज़ादी से लेकर आज तक भारत के हुक्मरानों की वो चुनौतियां क्यों और कैसे बरकरार है जिसमें देश के नागरिकों का आर्थिक विकास और गरीबी के ख़ात्मे के लिए कारगर नीतियों को तैयार करने की थी?सुरेश तेन्दुलकर और रंगराजन समिति की रिपोर्ट का क्या हुआ?सी रंगराजन समिति ने तो जुलाई 2014 के प्रथम सप्ताह में योजना आयोग (नीति आयोग) को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी।इस रिपोर्ट पर क्यों बात नही हो रही है?ज़ाहिर है सरकार गरीबी और गरीबों को लेकर चिंतित नही है। जब साल 2014 में देश में सत्ता परिवर्तन हुआ,तब से लेकर आज तक सबका साथ-सबका विकासकी बात कही जा रही है।कैसा विकास हो रहा है कि देश की राजधानी में ही बदतर स्थिति में लोग रह रहें हैं।अब सवाल है कि जो कि सबसे महत्वपुर्ण है कि सबका विकास कैसे होगा?सिर्फ दफ़्तर में कर्मचारियों के लेखा-जोखा से,मंत्रियों के भाषण देने से या नेता और संबंधित विभाग की कर्मचारियों के ग्राउंड ज़ीरो पर जाकर लोगों से बात करके?क्या आपने कभी देखा है कि उपरोक्त दोनों में से किसी को जाकर मिलते हुए? खैर देश का यह तबका भी अपने विकास की राह तो देख ही सकता है।साथ में,हम और आप भी वर्तमान और आगे चुने जाने वाली सरकारों से यही उम्मीद करेंगे की,वो ‘ poverty in india is a historical reality and important issue’ को कहीं भी अंकित ना होने दे।

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

......अलविदा अम्मो


4 तारीख़ की शाम से तमिलनाडु की गमगीन फिज़ाओं ने अब तक देश के कोने-कोने अपना पांव जमा लिया है।देश दक्षिण भारत के नेता नही बल्कि एक जन नेता के ज़िन्दगी से हार जाने के शोक में डूबा हुआ है। रविवार की शाम को भौगोलिक और भाषाई विविधता के बाद भी देश के पूरब,पश्चिम और उत्तरी इलाकों से जयललिता के लिए मौत से जंग जितने की दुआओं पर सोमवार की रात करीब ग्यारह बजे विराम लग गया और भगवान उनके आत्मा को शान्ति दें जैसी आवाज़ें वातावरण में गुंजने लगी।अम्मा मौत से जंग तो हार गईं लेकिन जाते-जाते भारतीय राजनीति में हमेशा के लिए एक जीवन्त उदारहण बन गईं।उम्मीद है भविष्य के नेता जब अम्मा के द्वारा लोकहित में किए गए कार्यों के बारे में पढ़ेंगे, तो उन्हें एक बेहतर जन नेता बनने में सहायता मिलेगी।वो ये बात सोंचने पर जरुर मजबूर होंगे कि आखिर कौन सी ऐसी चीज थी,जिसके वजह से उन्होंने लोगों के दिल पर राज किया।

संचार के अलग-अलग माध्यमों से तमिलनाडु से छाती पीट-पीटकर रोते-बिलखते लोगों की आने वाली तस्वीरें,यह बता रही थी कि अम्मा किस तरह से वहां के लोगों के लिए जरुरी थीं।आप ही सोंचिए अम्मा ने कितनी तपस्या और त्याग के बाद लोगों के दिल पर राज किया था।अम्मा को बस नजर देखने के लिए उमड़ी भीड़ उनकी लोकप्रियता का उदारहण तो था ही,साथ हीं देशभर के नेताओं,ख़ासकर के उत्तर भारत के नेताओं के सीख के लिए भी।मैं उत्तर भारत के नेताओं की कर्तव्य निष्ठा पर कोई सवाल नही खड़ा कर रहा हूं,बस इतनी सी बात कहना चाह रहा हूं कि आप लोग अपने और जयललिता की लोकप्रियता के पैमाने पर विचार करें और सोंचे कि वो आप लोगों से वो क्यों भिन्न थीं? अम्मो के द्वारा जनहित के लिए किया गया काम या फिर आप लोगों की जातिगत राजनीति,जनहित के विकास के लिए सिर्फ शोर के साथ बात करना,प्रचारतंत्र या फिर आपका सोशल मीडिया, आपको कौन एक बेहतर जन नेता बनाने में सहायक होगा।

सोमवार, 21 नवंबर 2016

ट्रेन हादसा ।

रविवार की आधी रात दफ़्तर से कई सवालों के साथ घर लौटा।सारे सवाल रविवार की तड़के करीब 3.50 बजे कानपुर से 100 किलोमीटर दूर पुखरायां गांव में हुए ट्रेन हादसे से संबंधित है।इंदौर-पटना एक्सप्रेस के दुर्घटनागस्त होने से जुड़ी हर ख़बरें,समय-समय पर अलग-अलग माध्यमों से आ रही थी।जैसे-जैसे दिन बीत रहा था,तस्वीरें भयावह होती जा रही थी। बिखरे सामान,छोटे-छोटे बच्चों के रोने की आवाज़,किसी के अपने माता-पिता को,किसी के अपने भाई-बहन,तो किसी के अपने बच्चों से बिछड़ने की बो बातें और रोने की आवाज मुझे लगातार परेशान कर रही थी। सुबह में 70 मौतों के साथ शुरु हुई ख़बर, देर रात तक करीब 130 तक पहुंच गई।इस हादसे में करीब 200 लोग भी ज़ख्मी हुए।यह अनुमानित आंकड़ा है,वास्तविक नही।
यह ख़बर सामने आते ही लगभग नेताओं और जनता के सोशल मीडिया सक्रिय हो गये।मारे गये व्यक्ति के परिवार वालों के प्रति संवेदना,मृतक के आत्मा को भगवान शान्ति दें,दोषियों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।जैसे तमाम सन्देशों के साथ-साथ रेलवे और भारत सरकार को विपक्षियों और आम जनता के आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा।सबसे हैरानी कि बात है कि आलोचक नेताओं की जमात में से एक भी नेता घटनास्थल पर नही पहुंचे।आखिर क्यों? क्या उनलोगों की जिम्मेदारी ट्वीटर और लम्बे चौड़े भाषणों तक ही है?हमेशा की तरह ही इस दुर्घटना के बहाने कई लोगों ने केन्द्र सरकार के बुलेट ट्रेन वाली परियोजना पर भी हमला बोल दिया। वैसे मुझे आजतक समझ नही आया कि बुलेट ट्रेन विरोधी लोग भारतीय रेलवे के साथ जोड़कर क्यों देखते हैं?
माकपा के पोलित ब्युरो ने कहा कि बुलेट ट्रेनकी अधिक चिंता करने वाले प्रधानमंत्री और रेल मंत्री इस घटना की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं हैं।वहीं गरीबों की स्व-घोषित हितैषी मायावती ने यहां तक कह दिया कि जब देशभर की गरीब जनता दुखी है,वहीं नरेन्द्र मोदी सबसे खुश है।आगे उन्होंने कहा कि बुलेट ट्रेन परियोजना में पैसा निवेश करने के बजाय रेलवे ट्रैकों के दुरुस्त बनाए रखने में पैसा खर्च किए होते तो शायद ये हादसा ना होता।आमतौर पर जब भी कोई रेल दुर्घटनाग्रस्त होती है,तो रेलमंत्री को ही दोषी ठहराया जाता है।लेकिन मेरे जानने में ममता बैनर्जी ही अकेले ऐसी नेता हैं,जिन्होंने रेलमंत्री सुरेश प्रभु को दोषी नही ठहराया है और दुर्घटना के लिए नरेन्द्र मोदी की विचारधाराओं और नीतियों को जिम्मेदार ठहराया।
इस दुर्घटना में वही सब कुछ हुआ जो पहले से होता चला आ रहा है। घटनास्थल पर रेलवे बचाव दल के सदस्य और राष्ट्रीय आपदा मोचन बल के सदस्य दिन-रात एक करके बचाव कार्य को पूरा किया। जल्द ही रेल राज्यमंत्री और संबंधित अधिकारी भी घटनास्थल पर पहुंच गये थें। केन्द्रीय रेलमंत्री शाम तक दुर्घटनास्थल और अस्पताल में जाकर पीड़ितों के हाल का जायजा लिया।रेलवे,मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकार ने मुआवजा देने की घोषणा की।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आगरा की रैली में स्वागत के वक्त फूलों के माला से स्वागत वाले रश्म के लिए मना कर दिया।पीड़ितों के प्रति संवेदना व्यक्त की और उच्च स्तरीय जांच जांच करवानें की बात कही।इस पुरी प्रक्रिया में कुछ भी नया नही था।सवाल यह है कि आखिर इस चली आ रही परम्परा से कब तक और कैसे निजात मिलेगा?
रेलमंत्री के 2016-17 बजट भाषण में दुर्घटना रहित भारतीय रेल विजन पर कहां तक अमल हुआ? साल 2014 में नई सरकार के सत्ता में आने से लेकर अब तक,सबसे ज्यादा रेलवे के समृद्ध होने की बात कही जा रही है।सोशल मीडिया से लेकर तमाम रिपोर्ट रेलवे के समृद्ध होनी की बात कह रही है।हम समय-समय पर सुनते रहते हैं कि सफ़र के दौरान किसी भी तरह की परेशानी से जूझ रहे यात्री,अगर ट्वीट कर देता है तो रेलवे उसको सहायता पहुंचाती है।यह एक नया तरीका है समृद्धों के लिए हो सकता है,लेकिन उनका क्या जो ट्वीटर पर नही है।
यह हादसा इतना भयावह था कि इसकी गिनती रेलवे के बड़े हादसों में होनी लगी। रविवार को बीबीसी ने 6 जून 1981 से लेकर 20 मार्च 2015 तक की बड़े रेल हादसों की एक रिपोर्ट छापी। जिसको मैने फेसबुक पर किया है,चाहे तो पढ़ सकते हैं।भारत में रेल हादसों का इतिहास कोई नया नही है।भारतीय रेल अपने उद्भव काल से ही समय-समय पर अलग-अलग कमियों के कारण हादसे का शिकार होती रही है। 6 जून 1981 को बिहार में तूफान के कारण एक ट्रेन नदी में जा गिरी,जिसमें 800 लोगों की मौत हुई और 1000 से ज्यादा लोग घायल हो गये।अगर रविवार को हुए हादसे के कारण के बारे में हम बात करें तो रेलवे ने सोमवार को 16.30 बजे तक वास्तविक कारण का पता नही लगा पाई है।आखिर क्यों? दोषियों को कड़ी सज़ा की मांग करने वालों से मेरा एक सवाल है कि सजा देकर आखिर आप क्या हासिल करना चाहते है?इतने सारे हादसे हुए,जिसमें दोषियों को सजा मिली।उससे क्या हासिल हो गया?दुर्घटनाएं कम हो गई?
आज ही रेलवे बोर्ड के पूर्व सदस्य रह चुके आदित्य प्रकाश मिश्रा ने बीबीसी को बताया कि भारतीय रेल के बुनियादी ढांचे को ठीक करने की ज़रूरत है। साथ ट्रेन के पटरी से उतरने की वजहों और इससे जुड़े दूसरे तकनीकी पक्षों के बारे में बताया।उन्होंने कहा कि "भारत में पटरी से उतरने की वजह से होने वाले रेल हादसों का इतिहास कोई नया नहीं है।ट्रेन के पटरी पर से उतरने के चार मुख्य कारण हो सकते हैं.
पहला- सामने किसी अवरोध के आने के कारण ट्रेन पटरी पर से उतर सकती है।कई बार ऐसा होता है कि कोई मवेशी या बड़ा जानवर अचानक से पटरी पर आ जाता है तो ट्रेन पटरी पर से उतर जाती है।
दूसरा- इंजन का कोई हिस्सा या पार्ट अगर गिर जाए और उस पर ट्रेन चढ़ जाए तो ऐसी स्थिति में भी पटरी पर से ट्रेन उतर सकती है।
तीसरा- पटरी के टूटे होने की स्थिति में भी ट्रेन पटरी पर से उतर सकती है।लेकिन ऐसी स्थिति में इंजन के साथ ट्रेन उतरती है।कानपुर के पास जो हादसा हुआ है उसमें इंजन पटरी पर से नहीं उतरा है।कभी-कभी यह भी हो सकता है कि इंजन के निकलने के बाद पटरी के बीच का गैप बढ़े और तब पीछे के डिब्बे पटरी पर से उतर जाएं.
चौथा- कई बार किसी-किसी इलाके में उपद्रवी और ग़ैर सामाजिक तत्वों के तोड़-फोड़ करने के कारण भी ट्रेन पटरी पर से उतर जाती है।

साथ ही उन्होंने कहा कि कानपुर के पास जो हादसा हुआ है उसमें मानवीय चूक होने की संभावना नहीं लगती है।मैंने अभी जो चार तकनीकी वजहें बताई है इनकी संभावना ही ज्यादा लगती है।"



शनिवार, 12 नवंबर 2016

अफवाहों से नफा-नुकसान किसका ?

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अफवाहों से नफा-नुकसान किसका ?
"always remember...remours are carried by haters ,spread by fools and accepted by iditos."
Ziad k. Abdelnour ने भी क्या खुब कहा है।इनका यह कथन थोड़ा कड़वा है,लेकिन सच है।मैं इस कथन से पुर्ण सहमत हूं,उम्मीद करता हूं आप भी सहमत होंगे।
अफ़वाह एक ऐसी चीज है,जो हमारे सभी ज्ञानइन्द्रियों को निष्क्रिय कर देता है और अपना गुलाम बना लेता है।वैसे तो सबसे बुद्धिजीवी प्राणी इंसान है,लेकिन अफवाहों के वक्त मन:स्थिति क्या होती है,बताने की ज़रूरत नही है।
अफ़वाह कोई नई चीज नही है।इससे समय-समय पर हमारा और आपका सामना होते रहता है।अफ़वाहों से मनुष्यों का जन्म-जन्मान्तर का संबंध है।समय-समय पर कुछ लोगों द्वारा अफ़वाहें उड़ाई जाती रहती है।कुछ ऐसा ही बीती रात को भी हुअा।नमक और चीनी का अफवाह कोई नया नही है।बचपन में भी सुना,अब भी सुन लिया और आगे नही सुनुंगा,इस बात से इनकार नही कर सकता।
शुक्रवार की आधी रात को जब देश के आधे से ज़्यादातर लोग सो रहे होंगे, तब असमाजिक तत्वों के द्वारा देश के छह राज्यों में बिजली की तरह अफवाह फैलाई गई कि नमक और चीनी की भारी किल्लत होने वाली है।लोग ₹400/कि०ग्रा० तक नमक खरीदने लगे। यह अफ़वाह यूपी से उड़ी।सबसे मजे की बात यह है कि जिन-जिन जगहों पर अफ़वाह फैली,वो सभी देश के विकसित इलाके है। जैसे-पटना,दिल्ली,लखनऊ,बम्बई और म०प्र० के आसपास के इलाके।ज्यादातर पढ़े-लिखे और विकसित लोग हीं यहां निवास करते हैं।इस बात से इनकार नही किया जा सकता कि अफ़वाह फैलाने में इन लोगों का हाथ नही होगा।इन लोगों ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल भरपुर रूप से किया और अफ़वाह फैलाने में ज़बरदस्त सफलता पाई।जब तक केन्द्रीय खाद्य एवम् आपुर्ती मंत्री रामविलास पासवान,यूपी और दिल्ली के मुख्यमंत्री यह बात बोले कि नमक और चीनी की कोई कमी नही है।कृप्या अफवाहों पर ध्यान ना दें,तब तक यह अफ़वाह हिंसक रूप धारण कर चुकी थी।
दिल्ली के 4 सरकारी बसों को उपद्रवियों ने क्षतिग्रस्त कर दिया और मामले को शान्त करने आई पुलिस से झड़प करने लगे।उपद्रवियों को यह सोचना चाहिए कि बसों के क्षतिग्रस्त होने से नुकसान किसको होगा और किसको परेशानियों का सामना करना पड़ेगा?क्या बस में नेता या उसके परिवार के लोग सफर करते हैं?जिन बसों को क्षतिग्रस्त किया गया है,वो किसके पैसे से खरीदा गया था?हमारे टैक्स के पैसे से या फिर नेताओं के अपने धन से?क्या यह सवाल पुछना उचित नही होगा कि पुलिस हमारी सहायता के लिए क्यों आएगी? पुलिसकर्मी तो हमारी ही सहायता के लिए होते है ना।अगर हम उनको व्यवस्था बनाये रखने में सहयोग नही करेंगे,तो कौन करेगा?
क्या सिर्फ सरकार और प्रशासन को दोषी ठहराने से हमारा काम चल जाएगा?एक नागरिक होने के नाते हमारी कुछ जिम्मेदारी है कि?
एक ख़बर आई कि म०प्र० के एक दुकान में आधी रात को तकरीबन 100 लोगों ने एक दुकान को लुट लिया।क्या इस बात से इनकार किया जा सकता है कि लुटेरे आसपास के नही होंगे ? लुटेरे दूर-दराज के इलाके से तो नही आए होंगे।क्यों वहां के स्थानीय लोगों ने दुकान को लुटने से बचाने की कोशिश नही की।क्या यही मानवता है? या ये बुद्धिजिवी होने का परिचायक है। कम से कम लुटेरों को इस बात का ख्याल तो रखना चाहिए था कि दुकानदार अपने कितनें वर्षों की खून-पसीने की कमाई और मेहनत से सींच कर,अपनी दुकानदारी से जनता की सेवा कर रहा होगा।क्या लूटा दुकानदार इतनी जल्दी अपने दुकान को पहले की तरह तैयार कर पाएगा?और दुकान नही होने से किसको परेशानियों का सामना करना पड़ेगा?
जब यह सब घटित हो रहा था,उस समय देश का बहुत बड़ा हिस्सा,जो सोशल मीडिया पर नही है,या सोशल मीडिया का निरन्तर उपयोगकर्ता नही होगा वो इस ख़बर से बेख़बर चैन की नीन्द में सोया था।और सुबह जब जगा होगा तो इस ख़बर को क्या सोंच रहा होगा?आप भी कल्पना कर सकते हैं।
अन्त में यहीं कहना चाहता हूँ कि अफ़वाह के वक्त अपने ज्ञानइन्द्रियों को खुला रखें,बाकि आपकी मर्जी।

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

Ravindranath Tagore

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Go not to the temple to put flowers upon the feet of God,
First fill your own house with the Fragrance of love…

Go not to the temple to light candles before the altar of God,
First remove the darkness of sin from your heart…

Go not to the temple to bow down your head in prayer,
First learn to bow in humility before your fellowmen…

Go not to the temple to pray on bended knees,
First bend down to lift someone who is down-trodden…

Go not to the temple to ask for forgiveness for your sins,
First forgive from your heart those who have sinned against you.


                                                      - Rabindranath Tagore

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

हमारी इंसानियत किसी साजिश का शिकार हो गई है ?

हमारे देश को आज़ाद हुए 70 साल हो गये है।आजादी के बाद से आज तक सभी सरकारों ने भारत के आर्थिक रुप से पिछड़े लोगों को आधुनिक करने,उनके मूलभूत आवश्यकताओं की पुर्ती और उनको विकास की मुख्य धारा में लाने को लेकर बड़ी-बड़ी बाते की है,लेकिन हकीकत क्या है,किस से छिपा है।
हमारे नेताओं ने आर्थिक रुप से पिछड़े लोगों  लिए ज़मीनी रुप से आज तक कितना काम किया है। कागजी विकास की बात मत कीजिएगा।आर्थिक रुप से पिछड़े लोगो के लिए सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि ,वह जितना सरकार की नीतियों और समाज मे चली आ रही परम्पराओं से परेशान है,उससे कही ज्यादा अपने आप में परिवर्तन न लाने की मानसिकता से।उन लोगों ने भी तय कर लिया है कि हम अपनी ज़िंदगी, समय-समय पर सरकार की मन लुभावन योजना के बीच गुजारते रहेंगे।
दो दिन के भीतर उड़ीसा  से जो ख़बरे हमारे बीच आई,वो खबर जितना मानवता को शर्मसार करने वाली है,उतना ही ये बताने के लिए भी काफ़ी है कि हमने अपनी इंसानियत को कहीं गिरवी रख दिया हैं।
उड़ीसा के वैसे इलाके से पहली खबर आई,जिस इलाके के बारे में इतना बार लिखा और बोला गया है कि सिस्टम ने भी सुनना-समझना बन्द कर दिया है।मैं बात कर हूं उड़ीसा के कालाहांडी की।यह इलाका हमेशा से गरीबी और भूखमरी का शिकार रहने के कारण खबरों मे रहा है,लेकिन आज जिस कारण से खबर में है वो सरकार के तमाम सरकारी व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े कर रहा है।खबर यह है कि आदिवासी दाना मांझी को अपने मृत पत्नी को कंधे पर 10 किलोमीटर इसलिए लेके चलना पड़ा कि उसके पास गाड़ी करने के पैसे नही थे और अस्पताल ने कोई इन्तजाम करने से मना कर दिया था। आप कल्पना कीजिए, जब दाना मांझी अपने पत्नी की लाश को इस तरह से लेकर चल रहा होगा,तो वह किस मानसिक स्थिती से गुजर रहा होगा।क्या वो सरकारी व्यवस्था नही कोस रहा होगा?

वहीं दूसरी खबर यह आई कि 80 वर्षीय विधवा सलमानी बेहड़ा की मालगाड़ी के चपेट में आने से मौत हो गई।जिसके बाद उनकी लाश को सोरो कॉम्युनिटी सेंटर ले जाया गया।इस घटना कि जानकारी राजकीय रेलवे पुलिस को दी गई,सूचना मिलने के 12 घंटे बाद शाम को अस्पताल पहुंचे।पोस्टमॉर्टम के लिए लाश को बालासोर जिला ले जाना था। जिसका किराया टेम्पू वाले ने 3500 मांगा,लेकिल जीआरपी के अधिकारी ने कहा कि हम ऐसे कामों के लिए सिर्फ 1000 रुपये दे सकते हैं।मेरे पास सीएचसी के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के द्वारा लाश ले जाने के सिवा दूसरा रास्ता नही है।देरी होने की वज़ह से लाश अकड़ गई थी,जिसकी वजह से कामगारों को लाश बांधने में दिक्कत हो रही थी,इसलिए लाश को कुल्हे के पास से तोड़ दिया। उसके बाद चादर में लपेट कर,बांस से उठाकर ले जाया गया।

उड़ीसा ही नही किसी भी कथित प्रगतिशील राज्य जैसे गुजरात,मध्य प्रदेश,हरियाणा और बिहार के तमाम सरकारी अस्पताल के बारे में बात कर लीजिए,सभी जगहों पर यही कुव्यवस्था मिलेगी।
देशभक्ति जैसे फालतू के विषय के इतर,उड़ीसा की इन दो हृदय विदारक ख़बरों के बहाने क्या आपको केन्द्र और राज्य सरकार से इस भ्रष्ट और लाचार व्यवस्था के बारे में सवाल नही करना चाहिए?

फालतू के विषयों पर सोशल मीडिया पर दिन-रात बकवास करने से अच्छा है कि आप,सरकार से सोशल मीडिया के माध्यम से अपने बुनियादी सुविधाओं को लेकर बात करें। 

शनिवार, 4 जून 2016

तीन पर एक भारी....?



संख्या बल के लिहाज़ से देखें तो तीन भारी है।लेकिन वर्तमान में भारतीय राजनीति में एक मॅाडल ऐसा है जो तीन मॅाडलों पर भारी है।
पहला है, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ।यह देश का सबसे पुराना मॅाडल है। इसकी स्थापना भारतीय जनता पार्टी द्वारा 1998 में की गई।इसमें भाजपा प्रभावशाली भूमिका में होती है और तमाम क्षेत्रीय पार्टियां सहयोगी के रूप में।वर्तमान में यह भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा मॅाडल है।इसमे 44 पार्टियां शामिल है।लोकसभा में इसके सांसदों की संख्या 337 है तो वहीं राज्यसभा में 67 ।यूपीए सरकार से त्रस्त हो चुकी जनता के पास मौका था 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपीए सरकार को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने का।सो वैसा हीं 2014 में जनता ने किया।2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को जिस तरह से देशभर की जनता ने पुर्ण बहुमत देकर देश की सत्ता सौंपी,इससे इस मॅाडल का और भाजपा का कद भारतीय राजनीति में एकाएक बढ़ गया।शायद ही कोई इस बात से इंकार करेगा कि इसकी लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।हाल में पांच राज्यों में हुए विधानसभा के चुनाव इसकी लोकप्रियता के उदारहण है।
दूसरा है,संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन।इसकी स्थापना देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के द्वारा 2004 में की गई।कांग्रेस इसमें प्रभावशील भूमिका में है और बाकि क्षेत्रीय दल सहयोगीकी भूमिका में।पहले इसमें लगभग 13 पार्टियां थी,लेकिन अब 10 रह गई है ।"प्रगतिशील"सिर्फ इसके नाम में ही है,लेकिन दिन-प्रतिदिन मॅाडल का स्तर गिरता चला गया।वर्तमान में क्या हस्र है इसका ,किससे छिपा है।2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार से इस पार्टी ने कुछ नहीं सिखा।2014-लोकसभा के चुनाव के बाद जहां-जहां भी विधानसभा के चुनाव हुए,लगभग सभी जगह विलुप्त होती जा रही है।असम का विधानसभा का चुनाव इसका ताजा उदाहरण है।
तीसरा है,नीतीश कुमार का मॅाडल जिस पर वो जोर दे रहें हैं।इसके तहत गठबंधन क्षेत्रीय स्तर पर किया जाता है और परिस्थिति के अनुसार प्रभावशाली दल अथवा सहयोगी की भूमिका बदलती रहती है।इसी के तहत हालिया बिहार चुनाव में राजद और उसका सहयोगी दल जदयू सीनियर पार्टनर की भूमिका में थे और कांग्रेस स्पस्ट रूप से छोटे सहयोगी के तौर पर थी।नीतीश को यह उम्मीद है कि इस प्रयोग को उत्तर प्रदेश चुनाव में भी आजमाया जा सकता है,जहां सपा सीनियर पार्टनर की भूमिका में होगी।पंजाब में भी यह काम हो सकता है,जहां कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का गठबंधन हो सकता है।
चौथा है,ममता बनर्जी का फेडरल फ्रंट।इस मॅाडल के अनुसार एक ऐसा राष्ट्रीय गठबंधन बनना चाहिए,जिसमे भाजपा,कांग्रेस और वामदल ना हो।इस फ्रंट के उम्मीद का आधार 2014 के आम चुनाव में प०बंगाल,उड़ीसा,तमिलनाडु,आंध्र और तेलंगाना के नतीजे हैं,जहां केवल क्षेत्रीय दलों ने जीत हासिल की।राष्ट्रीय दलों को अपने यहाँ घुसपैठ करने से रोक दिया था।
यूपीए,ममता और नीतीश ,इन तीनों मॅाडल का एक ही उद्देश्य है , राजग को राज्यों में होने वाले चुनाव में पराजित किया जाए,ताकि 2019 के लोकसभा में राजग को हराने के लिए एक बेहतर मंच तैयार किया जा सके। कागज पर राजग को छोड़कर सभी की अपनी चुनावी व्यवहारिकता है।जिस तरह से नीतीश और ममता के मॅाडल में क्षेत्रीय दलों की प्राथमिकता है,उससे एक बात तो साफ हो जाता है कि क्षेत्रीय दल तब ही सफल हो पाएंगे,जब कांग्रेस 2014-लोकसभा के चुनाव में हासिल 45 सीटों तक सिमटी रहे और अपने राष्ट्रीय पुन्रजीवन की आस छोड़ दे।

बुधवार, 23 मार्च 2016

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ

देश में छोटी बच्चियों को सशक्त करने के साथ-साथ समाज में लड़कियों की  गिरती संख्या के अनुपात के मुद्दे को बताने के लिये एक उद्देश्यपूर्णं ढंग से एकराष्ट्रव्यापी योजना की शुरुआत हुई जिसका नाम बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ है। हरियाणा के पानीपत में 22 जनवरी 2015 को भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सफलतापूर्वक इस योजना का आरंभ हुआ। लड़कियों के प्रति लोगों की विचारधारा में सकारात्मक बदलाव लाने के साथ ही ये योजना भारतीय समाज में लड़कियों की महत्ता की ओर भी इंगित करता है। भारतीय समाज में लड़कियों के प्रति लोगों की मानसिकता बहुत क्रूर हो चुकी है। ऐसे लोगों का मानना है कि लड़कियाँ पहले परिवार के लिये बोझ होती है और फिर पति के लिये तथा ये सिर्फ लेने के लिये होती है देने के लिये नहीं।

हालाँकि ये सच नहीं है, दुनिया की आधी जनसंख्या लगभग महिलाओं की है इसलिये वो धरती पर जीवन के अस्तित्व के लिये आधी जिम्मेदार होती है। लड़कियों या महिलाओं को कम महत्ता देने से धरती पर मानव समाज खतरे में पड़ सकता है क्योंकि अगर महिलाएँ नहीं तो जन्म नहीं। लगातार प्रति लड़कों पर गिरते लड़कियों का अनुपात इस मुद्दे की चिंता को साफतौर पर दिखाता है। इसलिये, उन्हें गुणवत्तापूर्णं शिक्षा प्रदान कराने के साथ, छोटी बच्ची की सुरक्षा को पक्का करना ,लड़कियों को बचाना, कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिये इस योजना की शुरुआत की गयी है।

लिंग परिक्षण एक अपराध

प्राचीन समय से ही, महिलाओं को भारतीय समाज में अपने परिवार और समाज के लिये एक अभिशाप के रुप में देखा जाता है। इन कारणों से, तकनीकी उन्नति के समय से ही भारत में बहुत वर्षों से कन्या भ्रूण हत्या की प्रथा चल रही है। 2011 के सेंसस के आंकड़ों के अनुसार, पुरुष और स्त्री अनुपात 1000 से 947 है। कुछ वर्ष पहले, लगभग सभी जोड़े जन्म से पहले शिशु के लिंग को जानने के लिये लिंग निर्धारण जाँच का इस्तेमाल करते थे। और लिंग के लड़की होने पर गर्भपात निश्चित होता था।
1990 के आरंभ में लिंग निर्धारण परीक्षण का केन्द्र अल्ट्रासाउंड तकनीक का विकास था। भारतीय समाज के लोग लड़के से पूर्व सभी बच्चियों को मारने के द्वारा लड़का प्राप्त करने तक लगातार बच्चे पैदा करने के आदी थे। जनसंख्या नियंत्रण और कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिये, कन्या भ्रूण हत्या और लिंग निर्धारण जाँच के बाद गर्भपात की प्रथा के खिलाफ भारतीय सरकार ने विभिन्न नियम और नियमन बनाये। गर्भपात के द्वारा बच्चियों की हत्या पूरे देश में एक अपराध है। चिकित्सों द्वारा यदि लिंग परीक्षण और गर्भपात कराते पाया जाता है, खासतौर से बच्चियों की हत्या की जाती है तो वो अपराधी होंगे साथ ही उनका लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है। कन्या भ्रूण हत्या से निज़ात पाने के लिये समाज में लड़कियों की महत्ता के बारे में जागरुकता फैलाना एक मुख्य हथियार है।



महिला सशक्तिकरण की जरुरत क्यों पड़ी ?

 भारत एक पुरुष प्रधान समाज है, जहाँ पुरुष का हर क्षेत्र में दखल है और महिलाएँ सिर्फ घर-परिवार की जिम्मेदारी उठाती है साथ ही उनपर कई पाबंदीयाँ भी होती है। भारत की लगभग 50 प्रतिशत आबादी केवल महिलाओं की है मतलब, पूरे देश के विकास के लिये इस आधी आबाधी की जरुरत है जो कि अभी भी सशक्त नहीं है और कई सामाजिक प्रतिबंधों से बंधी हुई है। ऐसी स्थिति में हम नहीं कह सकते कि भविष्य में बिना हमारी आधी आबादी को मजबूत किये हमारा देश विकसित हो पायेगा। अगर हमें अपने देश को विकसित बनाना है तो ये जरुरी है कि सरकार, पुरुष और खुद महिलाओं द्वारा महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया जाये।
महिला सशक्तिकरण की जरुरत इसलिये पड़ी क्योंकि प्राचीन समय से भारत में लैंगिक असमानता थी और पुरुषप्रधान समाज  था। महिलाओं को उनके अपने परिवार और समाज द्वार कई कारणों से दबाया गया तथा उनके साथ कई प्रकार की हिंसा हुई और परिवार और समाज में भेदभाव भी किया गया ऐसा केवल भारत में ही नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी दिखाई पड़ता है। महिलाओं के लिये प्राचीन काल से समाज में चले आ रहे गलत और पुराने चलन को नये रिती-रिवाजों और परंपरा में ढ़ाल दिया गया था। भारतीय समाज में महिलाओं को सम्मान देने के लिये माँ, बहन, पुत्री, पत्नी के रुप में महिला देवियो को पूजने की परंपरा है लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं कि केवल महिलाओं को पूजने भर से देश के विकास की जरुरत पूरी हो जायेगी। आज जरुरत है कि देश की आधी आबादी यानि महिलाओं का हर क्षेत्र में सशक्तिकरण किया जाए जो देश के विकास का आधार बनेंगी।
भारत एक प्रसिद्ध देश है जिसने विविधता में एकताके मुहावरे को साबित किया है, जहाँ भारतीय समाज में विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग रहते है। महिलाओं को हर धर्म में एक अलग स्थान दिया गया है जो लोगों की आँखों को ढ़के हुए बड़े पर्दे के रुप में और कई वर्षों से आदर्श के रुप में महिलाओं के खिलाफ कई सारे गलत कार्यों (शारीरिक और मानसिक) को जारी रखने में मदद कर रहा है। प्राचीन भारतीय समाज दूसरी भेदभावपूर्ण दस्तूरों के साथ सती प्रथा, नगर वधु व्यवस्था, दहेज प्रथा, यौन हिंसा, घरेलू हिंसा, गर्भ में बच्चियों की हत्या, पर्दा प्रथा, कार्य स्थल पर यौन शोषण, बाल मजदूरी, बाल विवाह तथा देवदासी प्रथा आदि परंपरा थी। इस तरह की कुप्रथा का कारण पितृसत्तामक समाज और पुरुष श्रेष्ठता मनोग्रन्थि है।


बेटी बचाआे अभियान

आज पूरे देश में लड़कियों को बचाने के सन्दर्भ में बेटी बचाओ विषय बहुत महत्वपूर्ण सामाजिक जागरुकता का विषय है। लड़कियों को बचाने के लिये बहुत से प्रभावशाली उपायों को अपनाया गया है, जिससे इन्हें बहुत हद तक बचाया जा सकता है। समाज में बड़े स्तर पर गरीबी का प्रसार है जो भारतीय समाज में अशिक्षा और लिंग असमानता का बहुत बड़ा कारण है। शिक्षा, गरीबी और लिंग भेदभाव को कम करने के साथ ही भारतीय समाज मे बालिकाओं और औरत की स्थिति मे सुधार के लिए महत्वपूर्ण तत्व है। आकड़ों के अनुसार, ये पाया गया है कि उड़ीसा में महिला साक्षरता लगातार गिर रही है जहाँ लड़कियाँ शिक्षा और अन्य गतिविधियों मे समान पहुँच नहीं रखती है।

शिक्षा गहराई के साथ रोजगार से जुड़ी हुई है। कम शिक्षा का अर्थ है कम रोजगार जो समाज में गरीबी और लिंग असमानता का नेतृत्व करता है। महिलाओं की स्थिति में सुधार करने के लिये शिक्षा बहुत प्रभावी कदम है क्योंकि ये इन्हें वित्तीय रुप से आत्मनिर्भर बनाता है। समाज में महिलाओं के समान अधिकार और अवसरों को सुनिश्चित करने के लिये सरकार ने कन्या बचाओं कदम उठाया है। बॉलीवुड अभिनेत्री (परिणीति चौपड़ा) को प्रधानमंत्री की हाल की योजना बेटी बचाओ (बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ) की एक आधिकारिक तौर पर ब्रांड एंबेसडर बनाया गया है।

भारत में लौंगिक असमानता

लैंगिक असमानता भारत में मुख्य सामाजिक मुद्दा है जिसमें महिलाएँ पुरुषवादी प्रभुत्व देश में पिछड़ती जा रही है। पुरुष और महिला को बराबरी पर लाने के लिये महिला सशक्तिकरण में तेजी लाने की जरुरत है। सभी क्षेत्रों में महिलाओं का उत्थान राष्ट्र की प्राथमिकता में शामिल  होना चाहिये। महिला और पुरुष के बीच की असमानता कई समस्याओं को जन्म देती है जो राष्ट्र के विकास में बड़ी बाधा के रुप में सामने आ सकती है। ये महिलाओं का जन्मसिद्ध अधिकार है कि उन्हें समाज में पुरुषों के बराबर महत्व मिले। वास्तव में सशक्तिकरण को लाने के लिये महिलाओं को अपने अधिकारों से अवगत होना चाहिये। न केवल घरेलू और पारिवारिक जिम्मेदारियों बल्कि महिलाओं को हर क्षेत्रों में सक्रिय और सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिये। उन्हें अपने आस-पास और देश में होने वाली घटनाओं को भी जानना चाहिये।
महिला सशक्तिकरण में ये ताकत है कि वो समाज और देश में बहुत कुछ बदल सकें। वो समाज में किसी समस्या को पुरुषों से बेहतर ढ़ंग से निपट सकती है। वो देश और परिवार के लिये अधिक जनसंख्या के नुकसान को अच्छी तरह से समझ सकती है। अच्छे पारिवारिक योजना से वो देश और परिवार की आर्थिक स्थिति का प्रबंधन करने में पूरी तरह से सक्षम है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ किसी भी प्रभावकारी हिंसा को संभालने में सक्षम है चाहे वो पारिवारिक हो या सामाजिक।

महिला सशक्तिकरण के द्वारा ये संभव है कि एक मजबूत अर्थव्यवस्था के महिला-पुरुष समानता  वाले देश को पुरुषवादी प्रभाव वाले देश से बदला जा सकता है। महिला सशक्तिकरण की मदद से बिना अधिक प्रयास किये परिवार के हर सदस्य का विकास आसानी से हो सकता है। एक महिला परिवार में सभी चीजों के लिये बेहद जिम्मेदार मानी जाती है अत: वो सभी समस्याओं का समाधान अच्छी तरह से कर सकती है। महिलाओं के सशक्त होने से पूरा समाज अपने आप सशक्त हो जायेगा।
आदित्य शुभम का  सभी  बड़ो को प्रणाम और छोटे को शुभ प्यार ,,,,,,,,

भारत की राज-व्यवस्था

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