अफवाहों से नफा-नुकसान किसका ?
"always remember...remours are carried by haters ,spread by fools and accepted by iditos."
Ziad k. Abdelnour ने भी क्या खुब कहा है।इनका यह कथन थोड़ा कड़वा है,लेकिन सच है।मैं इस कथन से पुर्ण सहमत हूं,उम्मीद करता हूं आप भी सहमत होंगे।
अफ़वाह एक ऐसी चीज है,जो हमारे सभी ज्ञानइन्द्रियों को निष्क्रिय कर देता है और अपना गुलाम बना लेता है।वैसे तो सबसे बुद्धिजीवी प्राणी इंसान है,लेकिन अफवाहों के वक्त मन:स्थिति क्या होती है,बताने की ज़रूरत नही है।
अफ़वाह कोई नई चीज नही है।इससे समय-समय पर हमारा और आपका सामना होते रहता है।अफ़वाहों से मनुष्यों का जन्म-जन्मान्तर का संबंध है।समय-समय पर कुछ लोगों द्वारा अफ़वाहें उड़ाई जाती रहती है।कुछ ऐसा ही बीती रात को भी हुअा।नमक और चीनी का अफवाह कोई नया नही है।बचपन में भी सुना,अब भी सुन लिया और आगे नही सुनुंगा,इस बात से इनकार नही कर सकता।
शुक्रवार की आधी रात को जब देश के आधे से ज़्यादातर लोग सो रहे होंगे, तब असमाजिक तत्वों के द्वारा देश के छह राज्यों में बिजली की तरह अफवाह फैलाई गई कि नमक और चीनी की भारी किल्लत होने वाली है।लोग ₹400/कि०ग्रा० तक नमक खरीदने लगे। यह अफ़वाह यूपी से उड़ी।सबसे मजे की बात यह है कि जिन-जिन जगहों पर अफ़वाह फैली,वो सभी देश के विकसित इलाके है। जैसे-पटना,दिल्ली,लखनऊ,बम्बई और म०प्र० के आसपास के इलाके।ज्यादातर पढ़े-लिखे और विकसित लोग हीं यहां निवास करते हैं।इस बात से इनकार नही किया जा सकता कि अफ़वाह फैलाने में इन लोगों का हाथ नही होगा।इन लोगों ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल भरपुर रूप से किया और अफ़वाह फैलाने में ज़बरदस्त सफलता पाई।जब तक केन्द्रीय खाद्य एवम् आपुर्ती मंत्री रामविलास पासवान,यूपी और दिल्ली के मुख्यमंत्री यह बात बोले कि नमक और चीनी की कोई कमी नही है।कृप्या अफवाहों पर ध्यान ना दें,तब तक यह अफ़वाह हिंसक रूप धारण कर चुकी थी।
दिल्ली के 4 सरकारी बसों को उपद्रवियों ने क्षतिग्रस्त कर दिया और मामले को शान्त करने आई पुलिस से झड़प करने लगे।उपद्रवियों को यह सोचना चाहिए कि बसों के क्षतिग्रस्त होने से नुकसान किसको होगा और किसको परेशानियों का सामना करना पड़ेगा?क्या बस में नेता या उसके परिवार के लोग सफर करते हैं?जिन बसों को क्षतिग्रस्त किया गया है,वो किसके पैसे से खरीदा गया था?हमारे टैक्स के पैसे से या फिर नेताओं के अपने धन से?क्या यह सवाल पुछना उचित नही होगा कि पुलिस हमारी सहायता के लिए क्यों आएगी? पुलिसकर्मी तो हमारी ही सहायता के लिए होते है ना।अगर हम उनको व्यवस्था बनाये रखने में सहयोग नही करेंगे,तो कौन करेगा?
क्या सिर्फ सरकार और प्रशासन को दोषी ठहराने से हमारा काम चल जाएगा?एक नागरिक होने के नाते हमारी कुछ जिम्मेदारी है कि?
एक ख़बर आई कि म०प्र० के एक दुकान में आधी रात को तकरीबन 100 लोगों ने एक दुकान को लुट लिया।क्या इस बात से इनकार किया जा सकता है कि लुटेरे आसपास के नही होंगे ? लुटेरे दूर-दराज के इलाके से तो नही आए होंगे।क्यों वहां के स्थानीय लोगों ने दुकान को लुटने से बचाने की कोशिश नही की।क्या यही मानवता है? या ये बुद्धिजिवी होने का परिचायक है। कम से कम लुटेरों को इस बात का ख्याल तो रखना चाहिए था कि दुकानदार अपने कितनें वर्षों की खून-पसीने की कमाई और मेहनत से सींच कर,अपनी दुकानदारी से जनता की सेवा कर रहा होगा।क्या लूटा दुकानदार इतनी जल्दी अपने दुकान को पहले की तरह तैयार कर पाएगा?और दुकान नही होने से किसको परेशानियों का सामना करना पड़ेगा?
जब यह सब घटित हो रहा था,उस समय देश का बहुत बड़ा हिस्सा,जो सोशल मीडिया पर नही है,या सोशल मीडिया का निरन्तर उपयोगकर्ता नही होगा वो इस ख़बर से बेख़बर चैन की नीन्द में सोया था।और सुबह जब जगा होगा तो इस ख़बर को क्या सोंच रहा होगा?आप भी कल्पना कर सकते हैं।
अन्त में यहीं कहना चाहता हूँ कि अफ़वाह के वक्त अपने ज्ञानइन्द्रियों को खुला रखें,बाकि आपकी मर्जी।
"always remember...remours are carried by haters ,spread by fools and accepted by iditos."
Ziad k. Abdelnour ने भी क्या खुब कहा है।इनका यह कथन थोड़ा कड़वा है,लेकिन सच है।मैं इस कथन से पुर्ण सहमत हूं,उम्मीद करता हूं आप भी सहमत होंगे।
अफ़वाह एक ऐसी चीज है,जो हमारे सभी ज्ञानइन्द्रियों को निष्क्रिय कर देता है और अपना गुलाम बना लेता है।वैसे तो सबसे बुद्धिजीवी प्राणी इंसान है,लेकिन अफवाहों के वक्त मन:स्थिति क्या होती है,बताने की ज़रूरत नही है।
अफ़वाह कोई नई चीज नही है।इससे समय-समय पर हमारा और आपका सामना होते रहता है।अफ़वाहों से मनुष्यों का जन्म-जन्मान्तर का संबंध है।समय-समय पर कुछ लोगों द्वारा अफ़वाहें उड़ाई जाती रहती है।कुछ ऐसा ही बीती रात को भी हुअा।नमक और चीनी का अफवाह कोई नया नही है।बचपन में भी सुना,अब भी सुन लिया और आगे नही सुनुंगा,इस बात से इनकार नही कर सकता।
शुक्रवार की आधी रात को जब देश के आधे से ज़्यादातर लोग सो रहे होंगे, तब असमाजिक तत्वों के द्वारा देश के छह राज्यों में बिजली की तरह अफवाह फैलाई गई कि नमक और चीनी की भारी किल्लत होने वाली है।लोग ₹400/कि०ग्रा० तक नमक खरीदने लगे। यह अफ़वाह यूपी से उड़ी।सबसे मजे की बात यह है कि जिन-जिन जगहों पर अफ़वाह फैली,वो सभी देश के विकसित इलाके है। जैसे-पटना,दिल्ली,लखनऊ,बम्बई और म०प्र० के आसपास के इलाके।ज्यादातर पढ़े-लिखे और विकसित लोग हीं यहां निवास करते हैं।इस बात से इनकार नही किया जा सकता कि अफ़वाह फैलाने में इन लोगों का हाथ नही होगा।इन लोगों ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल भरपुर रूप से किया और अफ़वाह फैलाने में ज़बरदस्त सफलता पाई।जब तक केन्द्रीय खाद्य एवम् आपुर्ती मंत्री रामविलास पासवान,यूपी और दिल्ली के मुख्यमंत्री यह बात बोले कि नमक और चीनी की कोई कमी नही है।कृप्या अफवाहों पर ध्यान ना दें,तब तक यह अफ़वाह हिंसक रूप धारण कर चुकी थी।
दिल्ली के 4 सरकारी बसों को उपद्रवियों ने क्षतिग्रस्त कर दिया और मामले को शान्त करने आई पुलिस से झड़प करने लगे।उपद्रवियों को यह सोचना चाहिए कि बसों के क्षतिग्रस्त होने से नुकसान किसको होगा और किसको परेशानियों का सामना करना पड़ेगा?क्या बस में नेता या उसके परिवार के लोग सफर करते हैं?जिन बसों को क्षतिग्रस्त किया गया है,वो किसके पैसे से खरीदा गया था?हमारे टैक्स के पैसे से या फिर नेताओं के अपने धन से?क्या यह सवाल पुछना उचित नही होगा कि पुलिस हमारी सहायता के लिए क्यों आएगी? पुलिसकर्मी तो हमारी ही सहायता के लिए होते है ना।अगर हम उनको व्यवस्था बनाये रखने में सहयोग नही करेंगे,तो कौन करेगा?
क्या सिर्फ सरकार और प्रशासन को दोषी ठहराने से हमारा काम चल जाएगा?एक नागरिक होने के नाते हमारी कुछ जिम्मेदारी है कि?
एक ख़बर आई कि म०प्र० के एक दुकान में आधी रात को तकरीबन 100 लोगों ने एक दुकान को लुट लिया।क्या इस बात से इनकार किया जा सकता है कि लुटेरे आसपास के नही होंगे ? लुटेरे दूर-दराज के इलाके से तो नही आए होंगे।क्यों वहां के स्थानीय लोगों ने दुकान को लुटने से बचाने की कोशिश नही की।क्या यही मानवता है? या ये बुद्धिजिवी होने का परिचायक है। कम से कम लुटेरों को इस बात का ख्याल तो रखना चाहिए था कि दुकानदार अपने कितनें वर्षों की खून-पसीने की कमाई और मेहनत से सींच कर,अपनी दुकानदारी से जनता की सेवा कर रहा होगा।क्या लूटा दुकानदार इतनी जल्दी अपने दुकान को पहले की तरह तैयार कर पाएगा?और दुकान नही होने से किसको परेशानियों का सामना करना पड़ेगा?
जब यह सब घटित हो रहा था,उस समय देश का बहुत बड़ा हिस्सा,जो सोशल मीडिया पर नही है,या सोशल मीडिया का निरन्तर उपयोगकर्ता नही होगा वो इस ख़बर से बेख़बर चैन की नीन्द में सोया था।और सुबह जब जगा होगा तो इस ख़बर को क्या सोंच रहा होगा?आप भी कल्पना कर सकते हैं।
अन्त में यहीं कहना चाहता हूँ कि अफ़वाह के वक्त अपने ज्ञानइन्द्रियों को खुला रखें,बाकि आपकी मर्जी।

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