संख्या बल के लिहाज़ से देखें तो तीन भारी है।लेकिन वर्तमान में भारतीय राजनीति में एक मॅाडल ऐसा है जो तीन मॅाडलों पर भारी है।
पहला है, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ।यह देश का सबसे पुराना मॅाडल है। इसकी स्थापना भारतीय जनता पार्टी द्वारा 1998 में की गई।इसमें भाजपा प्रभावशाली भूमिका में होती है और तमाम क्षेत्रीय पार्टियां सहयोगी के रूप में।वर्तमान में यह भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा मॅाडल है।इसमे 44 पार्टियां शामिल है।लोकसभा में इसके सांसदों की संख्या 337 है तो वहीं राज्यसभा में 67 ।यूपीए सरकार से त्रस्त हो चुकी जनता के पास मौका था 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपीए सरकार को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने का।सो वैसा हीं 2014 में जनता ने किया।2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को जिस तरह से देशभर की जनता ने पुर्ण बहुमत देकर देश की सत्ता सौंपी,इससे इस मॅाडल का और भाजपा का कद भारतीय राजनीति में एकाएक बढ़ गया।शायद ही कोई इस बात से इंकार करेगा कि इसकी लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।हाल में पांच राज्यों में हुए विधानसभा के चुनाव इसकी लोकप्रियता के उदारहण है।
दूसरा है,संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन।इसकी स्थापना देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के द्वारा 2004 में की गई।कांग्रेस इसमें प्रभावशील भूमिका में है और बाकि क्षेत्रीय दल सहयोगीकी भूमिका में।पहले इसमें लगभग 13 पार्टियां थी,लेकिन अब 10 रह गई है ।"प्रगतिशील"सिर्फ इसके नाम में ही है,लेकिन दिन-प्रतिदिन मॅाडल का स्तर गिरता चला गया।वर्तमान में क्या हस्र है इसका ,किससे छिपा है।2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार से इस पार्टी ने कुछ नहीं सिखा।2014-लोकसभा के चुनाव के बाद जहां-जहां भी विधानसभा के चुनाव हुए,लगभग सभी जगह विलुप्त होती जा रही है।असम का विधानसभा का चुनाव इसका ताजा उदाहरण है।
तीसरा है,नीतीश कुमार का मॅाडल जिस पर वो जोर दे रहें हैं।इसके तहत गठबंधन क्षेत्रीय स्तर पर किया जाता है और परिस्थिति के अनुसार प्रभावशाली दल अथवा सहयोगी की भूमिका बदलती रहती है।इसी के तहत हालिया बिहार चुनाव में राजद और उसका सहयोगी दल जदयू सीनियर पार्टनर की भूमिका में थे और कांग्रेस स्पस्ट रूप से छोटे सहयोगी के तौर पर थी।नीतीश को यह उम्मीद है कि इस प्रयोग को उत्तर प्रदेश चुनाव में भी आजमाया जा सकता है,जहां सपा सीनियर पार्टनर की भूमिका में होगी।पंजाब में भी यह काम हो सकता है,जहां कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का गठबंधन हो सकता है।
चौथा है,ममता बनर्जी का फेडरल फ्रंट।इस मॅाडल के अनुसार एक ऐसा राष्ट्रीय गठबंधन बनना चाहिए,जिसमे भाजपा,कांग्रेस और वामदल ना हो।इस फ्रंट के उम्मीद का आधार 2014 के आम चुनाव में प०बंगाल,उड़ीसा,तमिलनाडु,आंध्र और तेलंगाना के नतीजे हैं,जहां केवल क्षेत्रीय दलों ने जीत हासिल की।राष्ट्रीय दलों को अपने यहाँ घुसपैठ करने से रोक दिया था।
यूपीए,ममता और नीतीश ,इन तीनों मॅाडल का एक ही उद्देश्य है , राजग को राज्यों में होने वाले चुनाव में पराजित किया जाए,ताकि 2019 के लोकसभा में राजग को हराने के लिए एक बेहतर मंच तैयार किया जा सके। कागज पर राजग को छोड़कर सभी की अपनी चुनावी व्यवहारिकता है।जिस तरह से नीतीश और ममता के मॅाडल में क्षेत्रीय दलों की प्राथमिकता है,उससे एक बात तो साफ हो जाता है कि क्षेत्रीय दल तब ही सफल हो पाएंगे,जब कांग्रेस 2014-लोकसभा के चुनाव में हासिल 45 सीटों तक सिमटी रहे और अपने राष्ट्रीय पुन्रजीवन की आस छोड़ दे।
दूसरा है,संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन।इसकी स्थापना देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के द्वारा 2004 में की गई।कांग्रेस इसमें प्रभावशील भूमिका में है और बाकि क्षेत्रीय दल सहयोगीकी भूमिका में।पहले इसमें लगभग 13 पार्टियां थी,लेकिन अब 10 रह गई है ।"प्रगतिशील"सिर्फ इसके नाम में ही है,लेकिन दिन-प्रतिदिन मॅाडल का स्तर गिरता चला गया।वर्तमान में क्या हस्र है इसका ,किससे छिपा है।2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार से इस पार्टी ने कुछ नहीं सिखा।2014-लोकसभा के चुनाव के बाद जहां-जहां भी विधानसभा के चुनाव हुए,लगभग सभी जगह विलुप्त होती जा रही है।असम का विधानसभा का चुनाव इसका ताजा उदाहरण है।
तीसरा है,नीतीश कुमार का मॅाडल जिस पर वो जोर दे रहें हैं।इसके तहत गठबंधन क्षेत्रीय स्तर पर किया जाता है और परिस्थिति के अनुसार प्रभावशाली दल अथवा सहयोगी की भूमिका बदलती रहती है।इसी के तहत हालिया बिहार चुनाव में राजद और उसका सहयोगी दल जदयू सीनियर पार्टनर की भूमिका में थे और कांग्रेस स्पस्ट रूप से छोटे सहयोगी के तौर पर थी।नीतीश को यह उम्मीद है कि इस प्रयोग को उत्तर प्रदेश चुनाव में भी आजमाया जा सकता है,जहां सपा सीनियर पार्टनर की भूमिका में होगी।पंजाब में भी यह काम हो सकता है,जहां कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का गठबंधन हो सकता है।
चौथा है,ममता बनर्जी का फेडरल फ्रंट।इस मॅाडल के अनुसार एक ऐसा राष्ट्रीय गठबंधन बनना चाहिए,जिसमे भाजपा,कांग्रेस और वामदल ना हो।इस फ्रंट के उम्मीद का आधार 2014 के आम चुनाव में प०बंगाल,उड़ीसा,तमिलनाडु,आंध्र और तेलंगाना के नतीजे हैं,जहां केवल क्षेत्रीय दलों ने जीत हासिल की।राष्ट्रीय दलों को अपने यहाँ घुसपैठ करने से रोक दिया था।
यूपीए,ममता और नीतीश ,इन तीनों मॅाडल का एक ही उद्देश्य है , राजग को राज्यों में होने वाले चुनाव में पराजित किया जाए,ताकि 2019 के लोकसभा में राजग को हराने के लिए एक बेहतर मंच तैयार किया जा सके। कागज पर राजग को छोड़कर सभी की अपनी चुनावी व्यवहारिकता है।जिस तरह से नीतीश और ममता के मॅाडल में क्षेत्रीय दलों की प्राथमिकता है,उससे एक बात तो साफ हो जाता है कि क्षेत्रीय दल तब ही सफल हो पाएंगे,जब कांग्रेस 2014-लोकसभा के चुनाव में हासिल 45 सीटों तक सिमटी रहे और अपने राष्ट्रीय पुन्रजीवन की आस छोड़ दे।
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