हमारे देश को आज़ाद हुए 70 साल हो गये है।आजादी के बाद से आज तक सभी सरकारों
ने भारत के आर्थिक रुप से पिछड़े लोगों को आधुनिक करने,उनके मूलभूत आवश्यकताओं की पुर्ती और उनको विकास की मुख्य
धारा में लाने को लेकर बड़ी-बड़ी बाते की है,लेकिन हकीकत क्या है,किस से छिपा है।
हमारे नेताओं ने आर्थिक रुप से पिछड़े लोगों लिए ज़मीनी रुप से आज तक कितना काम किया है। कागजी
विकास की बात मत कीजिएगा।आर्थिक रुप से पिछड़े लोगो के लिए सबसे बड़ी दिक्कत यह है
कि ,वह जितना सरकार की नीतियों और समाज मे चली आ रही परम्पराओं से परेशान है,उससे
कही ज्यादा अपने आप में परिवर्तन न लाने की मानसिकता से।उन लोगों ने भी तय कर लिया
है कि हम अपनी ज़िंदगी, समय-समय पर सरकार की मन लुभावन योजना के बीच गुजारते
रहेंगे।
दो दिन के भीतर उड़ीसा से जो ख़बरे हमारे बीच
आई,वो खबर जितना मानवता को शर्मसार करने वाली है,उतना ही ये बताने के लिए भी काफ़ी
है कि हमने अपनी इंसानियत को कहीं गिरवी रख दिया हैं।
उड़ीसा के वैसे इलाके से पहली खबर आई,जिस इलाके के बारे में इतना बार लिखा और
बोला गया है कि सिस्टम ने भी सुनना-समझना बन्द कर दिया है।मैं बात कर हूं उड़ीसा
के कालाहांडी की।यह इलाका हमेशा से गरीबी और भूखमरी का शिकार रहने के कारण खबरों
मे रहा है,लेकिन आज जिस कारण से खबर में है वो सरकार के तमाम सरकारी व्यवस्थाओं पर
सवाल खड़े कर रहा है।खबर यह है कि आदिवासी दाना मांझी को अपने मृत पत्नी को कंधे
पर 10 किलोमीटर इसलिए लेके चलना पड़ा कि उसके पास गाड़ी करने के पैसे नही थे और
अस्पताल ने कोई इन्तजाम करने से मना कर दिया था। आप कल्पना कीजिए, जब दाना मांझी अपने पत्नी की लाश को इस तरह से
लेकर चल रहा होगा,तो वह किस मानसिक
स्थिती से गुजर रहा होगा।क्या वो सरकारी व्यवस्था नही कोस रहा होगा?
वहीं दूसरी खबर यह आई कि 80 वर्षीय विधवा सलमानी बेहड़ा की मालगाड़ी के चपेट
में आने से मौत हो गई।जिसके बाद उनकी लाश को सोरो कॉम्युनिटी सेंटर ले जाया गया।इस
घटना कि जानकारी राजकीय रेलवे पुलिस को दी गई,सूचना मिलने के 12 घंटे बाद शाम को
अस्पताल पहुंचे।पोस्टमॉर्टम के लिए लाश को बालासोर जिला ले जाना था। जिसका किराया
टेम्पू वाले ने 3500 मांगा,लेकिल जीआरपी के अधिकारी ने कहा कि हम ऐसे कामों के लिए
सिर्फ 1000 रुपये दे सकते हैं।मेरे पास सीएचसी के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के
द्वारा लाश ले जाने के सिवा दूसरा रास्ता नही है।देरी होने की वज़ह से लाश अकड़ गई
थी,जिसकी वजह से कामगारों को लाश बांधने में दिक्कत हो रही थी,इसलिए लाश को कुल्हे
के पास से तोड़ दिया। उसके बाद चादर में लपेट कर,बांस से उठाकर ले जाया गया।
उड़ीसा ही नही किसी भी कथित प्रगतिशील राज्य जैसे गुजरात,मध्य प्रदेश,हरियाणा
और बिहार के तमाम सरकारी अस्पताल के बारे में बात कर लीजिए,सभी जगहों पर यही
कुव्यवस्था मिलेगी।
देशभक्ति जैसे फालतू के विषय के इतर,उड़ीसा की इन दो हृदय विदारक ख़बरों के बहाने
क्या आपको केन्द्र और राज्य सरकार से इस भ्रष्ट और लाचार व्यवस्था के बारे में
सवाल नही करना चाहिए?
फालतू के विषयों पर सोशल मीडिया पर दिन-रात बकवास करने से अच्छा है कि आप,सरकार
से सोशल मीडिया के माध्यम से अपने बुनियादी सुविधाओं को लेकर बात करें।


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें