प्राचीन समय से ही, महिलाओं को भारतीय समाज में अपने
परिवार और समाज के लिये एक अभिशाप के रुप में देखा जाता है। इन कारणों से, तकनीकी उन्नति के समय से ही भारत में
बहुत वर्षों से कन्या भ्रूण हत्या की प्रथा चल रही है। 2011 के सेंसस के आंकड़ों के अनुसार, पुरुष और स्त्री अनुपात 1000 से 947 है। कुछ
वर्ष पहले, लगभग सभी
जोड़े जन्म से पहले शिशु के लिंग को जानने के लिये लिंग निर्धारण जाँच का इस्तेमाल
करते थे। और लिंग के लड़की होने पर गर्भपात निश्चित होता था।
1990 के आरंभ में लिंग निर्धारण परीक्षण का
केन्द्र अल्ट्रासाउंड तकनीक का विकास था। भारतीय समाज के लोग लड़के से पूर्व सभी
बच्चियों को मारने के द्वारा लड़का प्राप्त करने तक लगातार बच्चे पैदा करने के आदी
थे। जनसंख्या नियंत्रण और कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिये, कन्या भ्रूण हत्या और लिंग निर्धारण
जाँच के बाद गर्भपात की प्रथा के खिलाफ भारतीय सरकार ने विभिन्न नियम और नियमन
बनाये। गर्भपात के द्वारा बच्चियों की हत्या पूरे देश में एक अपराध है। चिकित्सों
द्वारा यदि लिंग परीक्षण और गर्भपात कराते पाया जाता है, खासतौर से बच्चियों की हत्या की जाती
है तो वो अपराधी होंगे साथ ही उनका लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है। कन्या भ्रूण
हत्या से निज़ात पाने के लिये समाज में लड़कियों की महत्ता के बारे में जागरुकता
फैलाना एक मुख्य हथियार है।
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