मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

......अलविदा अम्मो


4 तारीख़ की शाम से तमिलनाडु की गमगीन फिज़ाओं ने अब तक देश के कोने-कोने अपना पांव जमा लिया है।देश दक्षिण भारत के नेता नही बल्कि एक जन नेता के ज़िन्दगी से हार जाने के शोक में डूबा हुआ है। रविवार की शाम को भौगोलिक और भाषाई विविधता के बाद भी देश के पूरब,पश्चिम और उत्तरी इलाकों से जयललिता के लिए मौत से जंग जितने की दुआओं पर सोमवार की रात करीब ग्यारह बजे विराम लग गया और भगवान उनके आत्मा को शान्ति दें जैसी आवाज़ें वातावरण में गुंजने लगी।अम्मा मौत से जंग तो हार गईं लेकिन जाते-जाते भारतीय राजनीति में हमेशा के लिए एक जीवन्त उदारहण बन गईं।उम्मीद है भविष्य के नेता जब अम्मा के द्वारा लोकहित में किए गए कार्यों के बारे में पढ़ेंगे, तो उन्हें एक बेहतर जन नेता बनने में सहायता मिलेगी।वो ये बात सोंचने पर जरुर मजबूर होंगे कि आखिर कौन सी ऐसी चीज थी,जिसके वजह से उन्होंने लोगों के दिल पर राज किया।

संचार के अलग-अलग माध्यमों से तमिलनाडु से छाती पीट-पीटकर रोते-बिलखते लोगों की आने वाली तस्वीरें,यह बता रही थी कि अम्मा किस तरह से वहां के लोगों के लिए जरुरी थीं।आप ही सोंचिए अम्मा ने कितनी तपस्या और त्याग के बाद लोगों के दिल पर राज किया था।अम्मा को बस नजर देखने के लिए उमड़ी भीड़ उनकी लोकप्रियता का उदारहण तो था ही,साथ हीं देशभर के नेताओं,ख़ासकर के उत्तर भारत के नेताओं के सीख के लिए भी।मैं उत्तर भारत के नेताओं की कर्तव्य निष्ठा पर कोई सवाल नही खड़ा कर रहा हूं,बस इतनी सी बात कहना चाह रहा हूं कि आप लोग अपने और जयललिता की लोकप्रियता के पैमाने पर विचार करें और सोंचे कि वो आप लोगों से वो क्यों भिन्न थीं? अम्मो के द्वारा जनहित के लिए किया गया काम या फिर आप लोगों की जातिगत राजनीति,जनहित के विकास के लिए सिर्फ शोर के साथ बात करना,प्रचारतंत्र या फिर आपका सोशल मीडिया, आपको कौन एक बेहतर जन नेता बनाने में सहायक होगा।

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