रविवार, 19 मार्च 2017

वादाख़िलाफ़ी ना करना सेवकों

5 राज्यों में लोकतंत्र का महापर्व शनिवार(11 मार्च)को समाप्त हो गया।पीएम नरेन्द्र मोदी के शब्दों में,इस महापर्व में मणिपुर,उत्तराखंड,गोवा,पंजाब और यूपी ने अपना राजकीय सेवक चुन लिया है।बीते दो शनिवार के बीच में गोवा को मनोहर पर्रिकर,उत्तराखण्ड को त्रिवेन्द्र सिंह रावत,पंजाब को कैप्टन अमरिन्दर सिंह,मणिपुर को एन बीरेन सिंह और यूपी को योगी आदित्यनाथ के रुप में सीएम रुपी सेवक मिल गया है।ये सभी राज्य इनके कार्यकाल में कितना विकास कर पाएंगे,ये आने वाला वक्त बताएगा।लेकिन जनता ने इस चुनाव में सत्ता गवां चुकी पार्टीयों को सबक तो सिखा ही दिया,साथ ही सत्ता हासिल कर चुकी पार्टीयों को भी संकेत दे दिया है कि सत्ता का गुरुर आप ना करेंगे।यूपी में सपा,पंजाब में अकाली+बीजेपी और उत्तराखण्ड में कांग्रेस की भारी पराजय ने बता दिया कि यहां कि जनता उनके शासन से खुश नही थें,साथ ही गोवा में बीजेपी और मणिपुर में कांग्रेस की सरकार होते हुए भी स्पस्ठ बहुमत ना मिलना भी ये बता रहा है कि वहां के लोग भी अपनी सरकार से खुश नही थें।भाषाई और भौगोलिक दूरी से लेकर तमाम संसाधनों के कारण दिल्ली से चलने वाली स्थानीय किन्तु राष्ट्रीय कहलाने वाले चैनलों की दुनिया में हमेशा की तरह मणिपुर को लोकतंत्र के महापर्व में भी प्रमुखता से जगह नही मिली,जिसके कारण वहां हो रही राजनीति हलचल की स्पस्ठ और पुर्ण जानकारी नही मिल पाई,जिससे पता चल सके की वहां के नेताओं की भाषाई स्तरता क्या है और जनता उनको कैसे देखती है।उम्मीद है बाकि 4 राज्यों में हुए चुनाव के बारे में तो बताने की ज़रुरत ही नही है।पीएम से लेकर सीएम और स्टार प्रचारक से लेकर फ़ायर ब्राण्ड नेताओं की बयानबाज़ी और बदजुबानी ही न्यूज़ चैनलों की टीआरपी में सहयोगी बनी।यह दौर अख़बारों और वेब पत्रकारिता करने वालों के लिए भी स्वर्णिम दौर रहा। खैर अब मैं चुनावी मोड से निकलकर घोषणा-पत्र में किए गए वादों पर,आपसे बतिया रहा हूं।इस लम्बे लेख का मकसद है,इन 5 राज्यों के सत्ताधारियों के वादों में से मुख्य वादों को सामने लाना।
पाचों राज्य में सत्ता हासिल कर चुकी पार्टीयों के घोषणा-पत्र को जब पढ़ रहा था तो एक बड़ी दिलचस्प जानकारी हासिल हुई वो ये कि जिस राज्य का घोषणा-पत्र था,उसका प्रमुख जारीकर्ता का संबंध उस राज्य के राजनीति से प्रत्यझ रुप से था ही नही बल्कि आयातित व्यक्ति था।जैसे- यूपी बीजेपी के घोषणा-पत्र के प्रमुख जारीकर्ता अमित शाह, वैसे ही पंजाब कांग्रेस के मनमोहन सिंह,उत्तराखण्ड बीजेपी के वित्तमंत्री अरुण जेटली और गोवा बीजेपी के महाराष्ट्र के सीएम देवेन्द्र फडनवीस और मणिपुर के विज़न डॉक्यूमेंट के जारीकर्ता थें गृहमंत्री राजनाथ सिंह।अब पांचों राज्यों में सत्ता पर काबिज़ हो चुकी पार्टियों द्वारा चुनावी दौर में किए गये वादों को भुलते हुए, सिर्फ़ घोषणा-पत्र में किए गए वादों में से प्रमुख वादों के बारे में बात कर रहा हूं। शुरुआत करने से पहले याद दिला दूं कि किसानों की समस्याएं,ग़रीबी और रोज़गार का मुद्दा समस्या कम,राजनीतिक विषय ज़्यादा हैं।यूपी,उत्तराखण्ड और पंजाब के घोषणा-पत्र में लैपटॉप, इंटरनेट डाटा और मोबाइल फ़ोन का जलवा रहा।
आइए शुरुआत करते हैं उत्तर प्रदेश से-
यहां के चुनाव में विकास की बातों को छोड़कर गदहा,श्मशान,बिजली,होली,दिवाली ईद,बाथरुम,कुत्ता,हिजड़ा वगैरह-वगैरह से संबंधित वाक्यों का बोलबाला रहा है। खैर हम बात करते हैं घोषणा-पत्र की।
बीजेपी अध्यझ अमित शाह ने घोषणा-पत्र लोक कल्याण संकल्प पत्र जारी करते अपने उद्देश्य ना गुंडा राज ना भ्रष्टाचार के तहत 45 दिनों के अंदर सभी गुण्डों और भू-माफ़ियाओं को जेल में बन्द करने,100% नौकरी में से युवाओं को 90%,लैपटॉप के हर माह 1जीबी मुफ़्त इंटरनेट डाटा,50% से ज़्यादा अंक हासिल करने वाले सभी विद्याधियों को स्नातक तक मुफ़्त शिक्षा,गरीब परिवार में हर बच्ची के जन्म पर 5000 रुपया,बिना उम्र सीमा के विधवाओं को 1000 रुपया पेंशन,आगामी पांच साल में हर घर में गैस और शौचालय की सुविधा के साथ 150 करोड़ रुपया कृषि के विकास में ख़र्च करने का वादा किया है।
अब बात करते हैं पंजाब की-
पंजाब का घोषणा-पत्र विज़नरी डॉक्यूमेंट दिल्ली से जारी करते हुए पुर्व पीएम मनमोहन सिंह ने कहा कि अकाली-बीजेपी के लूट,बुट और शुट की नीति के तहत 10 साल के कार्यकाल में बर्बाद हो चुकी राज्य को कैप्टन अमरिन्दर सिंह बचायेंगे।कैप्टन द 9 नुक्ते के तरह नशे की समस्या से जुझ रही पंजाब को 4 हफ़्ते के भीतर नशा मुक्त पंजाब के निर्माण का,यदि किसी को विश्वास नही हो तो स्टाम्प पेपर पर मुहर लगाकर देने का वादा किया था।सरकार गठन हो चुकी है,आने वाले 4 हफ़्ते में अमरिन्दर के इस फौलादी वादे का पता लग जाएगा।आगे उन्होंने अपने सहित अपनी विरादरी का ख़्याल ना रखते हुए वीआईपी कल्चर को समाप्त करने,आगामी 5 साल में 25-26 लाख़ युवाओं को रोज़गार देने और रोज़गार ना मिलने तक 2500 रुपये हर युवाओं को देने,बेघर दलितों और पिछड़ों को मुफ़्त में गृह उपलब्ध कराने का वादा किया है।
अब बात करते हैं उत्तराखण्ड की-
बीजेपी के स्टार प्रचारक और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने केन्द्र में भी अपनी सरकार होने का हवाला देते हुए कहा कि यदि उत्तराखण्ड में भी हमारी सरकार बनेगी तो यहां के लोगों को ज़्यादा फ़ायदा होगा।आगे उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य राज्य के अंतिम व्यक्ति का सम्पुर्ण विकास करना है।भ्रष्टाचार मुक्त सरकार,बेहतर शिक्षा और रोज़गार उपलब्ध कराने का वादा किया है।
अब बात करते हैं गोवा की-
यहां के घोषणा-पत्र को पढ़ते हुए बाकि राज्यों से बिल्कुल अलग लगा।  शिक्षा,रोज़गार और विकास तो मुख्य मुद्दा है ही,यहां का कैसिनो भी राजनीति का मुद्दा है।तमाम पार्टियों के उल्ट तत्कालीन सीएम लक्ष्मीकान्त पारसेकर ने कहा कि यदि कैसिनो वाले सभी कानूनी प्रक्रिया को पूरा करते हैं,तो उन्हें हम हटा नही सकते हैं।यदि ऐसा करेंगे तो वे न्यायालय में चैलेज करेंगे,जो सरकार के चेहरे पर जोरदार तमाचा होगा।महाराष्ट्र के सीएम देवेन्द्र फ़डनवीस ने घोषणा-पत्र ज़ारी करते हुए कहा कि पर्यटन के अलावा निवेश योग्य कारखानों, सुचना तकनीक और कृषि आधारित कार्य क्षेत्र का निर्माण करेंगे।
और अब बात करते हैं मणिपुर की-
यहां पर केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के साथ बीजेपी महासचिव राममाधव ने विज़न डॉक्यूमेंट-2017 जारी करते हुए यहां के लोगों को भाजपा को एकमात्र सहारा बताया।सभी को पेयजल,स्नातक तक महिलाओं को मुफ़्त शिक्षा,सभी बेघरों को घर देने का वादा किया है।साथ ही कहा कि क्षेत्रीय अखण्डता,संस्कृति और लोगों की सुरक्षा का वादा किया है।आगे उन्होंने राजमार्ग सुरक्षा बल के गठन पर जोर दिया।

                           अन्त में इन 5 राज्यों के जनता से यही कहना चाहता हूं कि सरकारी सेवाओं का लाभ उठाने के लिए अपनी तरफ़ से कोशिश कीजिए।

गुरुवार, 9 मार्च 2017

एग्जिट पोल:काल्पनिक खुशी और गम का !

'एग्जिट पोल:कही किसी के लिए खुशी तो कही किसी के लिए गम',वाले शो की झलक विभिन्न न्यूज़ चैनलों के माध्यम से आज आप सब ने देखा। करीब-करीब 5 घंटे तक चले ये शो,राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों को मतगणना से पहले काल्पनिक खुशी और गम प्रदान करने वाला था।आज जिन लोगों को खुशियां हाथ लगी है वो कम से कम 10 तारीख़ तक तो आन्नदित रह सकते है और जिनको गम हाथ लगी है,उनको बिल्कुल भी उदास रहने की ज़रुरत नही है।क्योंकि वास्तविक खुशी और गम का तो 11 तारीख़ को होने वाले मतगणना के बाद ही पता चलेगा।
एग्जिट पोल में ज़्यादातर बार देखा गया है कि मतगणना से उलट इसका फ़ैसला होता है।अपवाद की बात नही कर रहा हूं।एग्जिट पोल क्या है,कैसे काम करता है और क्यों किया जाता है?उम्मीद है बताने की ज़रुरत नही,क्योंकि ऐसा माना जाता है कि जिन 5 राज्यों में चुनाव हुए हैं वहां के ज़्यादातर मतदाता राजनीति में दक्षता हासिल होने का दावा करते हैं।फ़िर भी जिनको जानकारी नही है,उनकी जानकारी के लिए बता दूं कि यू-ट्यूब पर एग्जिट पोल के तमाम स्टिंग के विडियो पड़े हैं,उसको देख जानकारियां हासिल कर लें।मैंने भी इन्ही विडियोस और वरिष्ठों के बतकही से थोड़ी बहुत जानकारी हासिल किया है।
अब एग्जिट पोल के दिलचस्प बातों के बारे में आपसे बात करता हूं।यदि आपने पूरे एग्जिट पोल को गौर से देखा होगा तो पाया होगा कि कोई दल तो इसको सिरे से हीं खारिज़ कर देता,तो कोई दल जहां उसको कम या बहुमत हासिल नही होता है उसको मानने से इनकार कर देता और यदि इसी दल को कहीं बहुमत हासिल होता है तो उसको स्वीकारते हुए और अधिक मत हासिल करने की बात करता है।राजनीतिक पंडित भी इस बात को कहते हुए अनुमान लगाते हैं कि मतगणना के दिन ही वास्तविकता का पता चलता है।लगभग हर चुनाव में एग्जिट पोल करने वाली कई कम्पनियां आस्तित्व में आती है।

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

बेचैन मन और सवाल!


दिल्ली के सीमान्त इलाके में रहता हूं।रोज़गारी ज़िन्दगी होने के कारण दिल्ली में किसी दिन सूर्योदय तो किसी दिन चन्द्रोदय का दर्शन हो पाता है।रोज़ दफ़्तर आने-जाने के क्रम में जिस रास्ते से गुजरता हूं,कई तस्वीरें ऐसी होती है,जो मन को विचलित कर देती है।मन में कई सवालों को पैदा कर देती है।कुछ ऐसी ही बात,इस बात को ध्यान में रखते हुए कि जो बात आपके साथ साझा कर रहा हूं,वो कोई नई बात नही है।या फ़िर ऐसा भी नही है कि इससे पहले उस बात के बारे में बात ही नही हुई है।लेकिन फ़िर भी आपके साथ सिर्फ़ अपने सवालों से भरे मन की बेचैनी को लिखते हुए शान्त करने के लिए साझा कर रहा हूं।हम जानते ही हैं कि बदलते वक्त के साथ ही हम इंसानों की सारी आवश्यकताओं का राजनीतिकरण हो गया है।हमारी सारी आवश्यकताएं जैसे रोटी,कपड़ा और मकान के साथ ही वस्त्र,शिक्षा,स्वास्थय,रोज़गार वगैर-वगैर को हमारे नेता जाति और धर्म के चश्में से देखने लगे हैं।सबसे बेहतरीन उदारहण है यूपी चुनाव में पीएम मोदी का बिज़ली वाले बयान पर मची हाय-तौबा।मैं सबसे बेहतरीन उदारहण इसलिए कहा है कि सत्ता के शिखर पुरुष भी ऐसी राजनीति से अछुते नही है।हमारे राजनीतिज्ञों के इस खेल में मीडिया भी अपनी भूमिका बखूबी निभाता है।पीएम से लेकर सीएम और नेताओं के बयानों को मीडिया अपने राजनीतिक निष्ठा के अनुसार पेश कर,जनता को भी इस खेल में शामिल करवा देती है।जनता भी अपनी आवश्यकताओं को भुलकर इस खेल में खुशी-खुशी शामिल हो जाती है।वो ये बात भुल जाती है कि हमारे लिए क्या ज़रुरी है-हमारी आवश्यकताएं या फ़िर जाति और धर्म।ख़ैर ये बात तो सक्रिय तबके की हुई,लेकिन भारत में एक तबका ऐसा भी जिसको हमारी सरकारों के द्वारा लगातार अनदेखी के किए जाने के कारण,उसको देश-दुनिया से कोई मतलब नही है।उसको इस बात से भी कोई मतलब नही कि हमारी सरकारें हमारी विकास के लिए क्या कर रही है।जैसे-तैसे कटनें वाली अपनी ज़िन्दगी की धुन में मस्त है। जैसे-तैसे कहने का मतलब है कि ना ही उनके पास शुद्ध से भोजन,ना ही तन ढ़कने के लिए पुरा कपड़ा।उम्मीद है कि आप समझ ही गए होंगे कि मैं किस तबके के बारे में बात कर रहा हूं। नोएडा में सड़क किनारे रह रहे परिवार के एक बुजुर्ग व्यक्ति से मैंने बात की,उनकी निराशाभरी बातों ने मुझे भी निराश कर दिया।उनकी बातों से ऐसा लगा कि कम से कम जो बुनियादी सुविधाएं होती है,वो प्राप्त करने की चाहत रखते हैं।बातचीत के दरमयान उन्होंने बताया कि हमलोगों को सरकारी सुविधाएं मिलना तो दूर,एक बार कोई सरकारी आदमी पुछने तक नही आता है।हमलोग अपनी ज़िन्दगी को लोगों से मांग कर बिता रहें है आज यहां से तो कल वहां से।मैं खुद कई बार देखता हूं कि रेड लाइट पर उनके छोटे-छोटे बच्चे भी लोगों से मांग रहे होते हैं। आगे कहते हैं  कि हम भी चाहते हैं कि हमारा भी एक मकान हो,हम तो नही पढ़ पाये लेकिन हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे पढ़े, लेकिन हमारी कोई नही सुनता है।

मैं बातचीत कर पैदल ही अपने घर के तरफ़ बढ़ चला।रास्ते में मेरे दिमाग में उनकी बिखरी बरतनों पर भिनकती मक्खियां,खुले आसमान में ज़मीन पर लेटे और खेलते हुए उनके छोटे-छोटे निर्वस्त्र बच्चें,बारिश के कारण भिंगे उनके फ़टे विछावन और पोशाक की तस्वीरें घुम रही थी।सोच रहा था कि आख़िर ये लोग अपनी ज़िन्दगी का गुज़ारा कैसे करते होंगे?अशुद्ध भोजन के कारण इनकी पुर्ण शारीरिक और मानसिक विकास होती होगी?यदि बदकिस्मती से इनका सामना बिमारीयों से होता होगा तो क्या करते होगें?यदि इनके बच्चे पढ़ेंगे नही तो इनकी ज़िन्दगी में बदलाव कैसे आएगा?इन बच्चों और अभिभावकों को शिक्षा और स्वच्छता की महत्ता कैसे समझ आएगा? सरकारों द्वारा शिक्षा,स्वास्थय,रोज़गार और स्वच्छता को लेकर चलाई जा रही तमाम जागरुकता अभियानें और योजनाओं से इनकी ज़िन्दगीयों में बदलाव क्यों नही हो पा रहा है?आज़ादी के बाद से देश और राज्यों में तमाम सरकारें आईं और गई,देश ने साल 2014 में भी राष्ट्रीय सत्ता में भी विकास के नाम पर परिवर्तन किए,मगर इनलोगों की ज़िन्दगी में कोई बदलाव क्यों नही हो रहा है?किसी भी सरकार की योजनाएं तभी सफ़ल मानी जाती है,जब देश के अन्तिम व्यक्ति तक उसका लाभ पहुंचे। आख़िर कब और कैसे होगा इनका विकास?चुनाव के वक्त हेलीकॉप्टर से आये,भाषण दिए और उड़ गये,से विकास होगा? सिर्फ़ योजनाएं लाने से लागू करने से विकास होगा?मेरा ऐसा मानना है कि सरकारों को इन समस्याओं से सम्बंधित अपने नौकरशाहों से लेकर कर्मचारीयों तक को भौतिक सुविधाओं से निकालकर ऐसे लोगों के बीच भेजना होगा,नौकरशाहों को समझाना होगा कि आपका कर्तव्य सिर्फ़ दफ़्तर में बैठकर भौतिक सुविधाओं का लाभ उठाते हुए काग़जी काम करना नही है,बल्कि ज़मीन पर जाकर वास्तविकता का भी सामना करना है। जब वो वास्तविकता का सामना करेंगे तो सरकारों को बताएंगें फलां-फलां जगह पर कमी है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो सरकार गठन के बाद अपने सांसदों से अपील की थी कि वो दिल्ली में ज़्यादा वक्त बिताने के बजाय अपने संसदीय क्षेत्र में बितायें।उस अपील का क्या हुआ?आखिर सांसद अपने संसदीय क्षेत्र में जाने से क्यों कतराते हैं?सभी जन प्रतिनिधियों को सोचना चाहिए कि जनता ने उनको सिर्फ़ अपनी सेवा के लिए चुना है।

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

राजनीति के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल ही आज के राजनीति की तस्वीर है!


नेताओं को अपनी आवाज़ धीमी रखनी चाहिए और एक-दूसरे को अपमानित करने से बचना चाहिए।
ये वाक्य रोमन कैथोलिक चर्च के वर्तमान और 266वें पोप फ़्रांसिस का है।उन्होंने ये बात भारतीय चुनावी मौसम में चल रही जुबानी जंग के बीच भारत से सुदूर,इटली की राजधानी रोम में कही है।बीते शुक्रवार को रोम स्थित University Roma Tre में आयोजित कार्यक्रम में अपने 45 मिनट के भाषण में दुनियाभर में राजनीति में गिरती भाषाई स्तरता पर बात की।उन्होंने उदाहरण सहित राजनीतिज्ञों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे अमर्यादित शब्दों और भाषाओं पर दुख जताते हुए कारण भी बताया।उन्होंने नेताओं से भाषणों में शालीनता और सहनशीलता बरतने की अपील भी की।मैं उनके 45 मिनट के भाषण को ना ही पूरा सुन सका और ना ही पढ़ सका।लेकिन जितना पढ़ और सुन पाया,उसमें से कहीं शाब्दिक तो कही भावनात्मक हिन्दी अनुवाद पेश कर रहा हूं।अनुवाद पेश करने से पहले आप पाठकों से गुजारिश करुंगा कि आप पोप की बातों को किसी एक दल और नेता के सन्दर्भ में देखने की ग़लती ना करें,क्योंकि पूरब से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक के ज़्यादातर नेताओं में अब ये दुर्गुण पाया जा रहा है।जिसको आप भी अनुभव करते ही होंगे।अब अनुवाद पेश कर रहा हूं-
नेताओं को अपने विरोधियों को ध्यान में रखते हुए अपनी बात शुरु करनी चाहिए और बेवज़ह की जुबानी जंग की बीज बोआई से बचना चाहिए।नेताओं को अपनी आवाज़ धीमी रखनी चाहिए,साथ ही कम बोलना और ज़्यादा सुनना चाहिए।
हम रोज अख़बारों में पढ़ते ही हैं कि किस तरह से एक दल के नेता दूसरे दल के नेता को अपमानित करते रहते हैं।टीवी डिबेट में एक को अपनी बात पूरी करने से पहले ही दूसरा उसको बाधित करते रहता है।
यदि हम एक-दूसरे के सामने खुलकर अपनी बात रखेंगे,किसी मुद्दे पर आपस में बातचीत करेंगे और एक-दूसरे का सम्मान करेंगे तो ये जुबानी जंग कैसे होगा?
उन्होंने अपने भाषण के केन्द्र में राजनीति को रखते हुए,दुनियाभर के समाज में गिरती राजनीतिक स्तरता पर दुख जताया।आगे उन्होंने कहा कि अमर्यादित भाषणों से हम सामाजिक जीवन को बेहतर बनाने वाली भावनाओं को भी खोते जा रहें हैं।
मैंने पोप फ़्रांसिस की बात इसलिए आपलोगों के सामने रखी है,क्योंकि ये बात भारत,भारत के राजनीतिज्ञों और उनके बदजुबानी से समाज में पड़ रहे बुरे असर के बारे में भी कही गई है।अब आप पोप की बातों को अपनी-अपनी भाषाओं में रुपान्तरित करके,सोशल मीडिया पर लिखने के साथ-साथ सम्भव हो सके तो अपने गली-मोहल्लों की दीवारों और चौपालों पर चिपका दीजिए ताकि पंचायत स्तरीय नेताओं के साथ-साथ राजनीति में पदार्पण कर रहे युवा नेता भी सीख लें।साथ ही कहीं आपके विधायक और सांसद की नज़र पर गई तो,उनमें भी कही बदलाव आ सकता है।

अच्छा होता कि हाल ही में जिस तरह से भारतीय मीडिया में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और हिलेरी क्लींटन की चुनावी जुबानी जंग को तरजीह दी जा रही थी,वैसे ही पोप की बातों को एक दिन ही सही मगर तरजीह दी जाती तो सम्भवत: नेताओं में बदलाव आने के साथ-साथ आप दर्शकों और पाठकों में भी बदलाव आने की उम्मीद की जा सकती थी।क्योंकि इन दिनों भारत में भी नेताओं से ज़्यादा आम जनता को इस बात को जानने में दिलचस्पी रहती है कि आज किस दल के नेता ने किस दल के नेता को जुबानी जंग में मात दी है।कई बार तो पार्टी के समर्थक ही आपस में भीड़ जाते हैं,जो कि लोकतंत्र के लिए ठीक नही है।एक नागरिक होने के नाते आपको किसी दल या नेता का फैन होने की बजाय,आपको अपने जन प्रतिनिधियों से शिक्षा से लेकर रोज़गार,भोजन से लेकर आवास और तमाम बुनियादी सुविधाओं की मांग करनी चाहिए,क्योंकि उनका निर्माण आपकी सेवा करने के लिए ही हुआ है,ना कि बदजुबानी की बदौलत समाज में मतभेद पैदा करने के लिए।

शनिवार, 28 जनवरी 2017

शिक्षा.....बिजली....और उसका भावुक होना।


जिस माध्यम से देश में क्रान्ति आने की बात कही जा रही है,उसी माध्यम पर मेरे एक दोस्त और युवा शिक्षक ने शिक्षा पर बल देते हुए अपने गांव में बिजली की समस्या को लेकर पोस्ट लिखा।पोस्ट पढ़ कर ऐसा लगा कि समस्या को लेकर वो काफ़ी आक्रोशित हैं।स्मार्टफ़ोन ना होने की वज़ह से उसने अपनी व्यथा फेसबुक पर हिंग्लिश में लिखी है,जिसका भावात्मक तर्जुमा इस प्रकार है-
नीतीश कुमार कहते हैं कि बिजली की व्यवस्था नही सुधरी तो मैं वोट मांगने नही आऊंगा।मेरे गांव में मुश्किल से 4-5 घंटे बिजली रह रही है।क्या यही नीतीश निश्चय है?सांसद महोदय जब आते हैं तो बिजली रहती है।क्या सिर्फ़ उन्हें ही बिजली की ज़्यादा ज़रुरत है और लोगों को नही?क्या रात में बिजली का काम चल रहा है कहीँ?
अगर बिहार के ग्रामीण इलाकों में बिजली की व्यवस्था सुधर जाए तो गरीब के बच्चे शाम को ज़रुर पढ़ पाएंगे,जिससे ग्रामीण इलाके के बच्चे भी शिक्षित हो पाएंगे।
दोस्त की बात मुझे सौ फ़ीसदी सही लगी।आपके साथ सिर्फ़ इसलिए साझा कर रहा हूं,ताकि पता चले कि युवाओं के भीतर सत्ताधारीयों से सवाल पुछने की साहस का अभी ह्रास नही हुआ है।आदर्श स्थिती तो ये होता कि वो राष्ट्रीय और राजकीय सत्ता के दोनों शिखर पुरुषों से सवाल पुछता,लेकिन उसने सिर्फ़ राजकीय सत्ता के शिखर पुरुष से ही सवाल पुछा है।ऐसा उसने क्यों किया मुझे नही मालूम। लेकिन हम उम्मीद करेंगे कि उसको उसके सवाल का जवाब मिल जाएगा।
लाइव मिंट वेबसाइट ने 15 अगस्त 2015 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण को छापा,जिसमें उन्होंने लाल किले की प्राचीर से संकल्प लिया था कि 1000 दिन के भीतर राज्य सरकार की मदद से हर गांव में बिजली पहुंचाने का काम करेंगे।साथ ही उन्होंने कहा कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी 18500 गांव ऐसे हैं जहां अब तक बिजली नही पहुंची है।ये तो हुई पीएम की बात।
16 अक्टूबर 2015 को द हिन्दू अख़बार ने साल 2012 में नीतीश कुमार की कही बात यदि मैं पुरे गांव में बिजली नही पहुंचा पाया तो साल 2015 के विधानसभा में वोट मांगने नही आऊंगा को दोहराते हुए कुमार के बयान को छापा जिसमें उन्होंने कहा कि साल 2016 के अन्त में राज्य के सभी गांव में बिजली होगा।फ़िर 28 अक्टूबर 2016 को द टाइम्स ऑफ इण्डिया ने उस ख़बर को छापी,जिसमें कुमार ने कहा कि साल 2017 के अन्त तक सभी गांव में बिजली की सुविधा उपलब्ध हो जाएगी।
मैंने विकास पुरुष के संकल्प और सुशासन बाबू के बदलते बयान को आपके सामने रख दिया।अब आप अंदाजा लगा सकतें हैं कि विकास पुरुष के संकल्प की रफ्तार कितनी तेज़ है और सुशासन बाबू के कथनी और करनी में कितना अंतर है।बहरहाल हम उम्मीद करेंगे कि जल्दी से जल्दी बिजली की सुविधा उपलब्ध हो जाएगा,ताकि जिस युवा के नाम पर राजनीति होती है,का भविष्य सुधर सके।
खैर मुझे उसकी पोस्ट को पढ़कर काफ़ी खुशी हुई कि ऐसे वक्त में उसने समस्याओं ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है,जब ज़्यादातर युवा अपनी बुनियादी समस्याओं के ख़िलाफ़ आवाज़ ना उठाकर,सिर्फ़ राजनीतिक विचारधारा को लेकर सोशल मीडिया पर आपस में भिड़ते रहते हैं।
उसके इस पोस्ट को पढ़ने के बाद मैंने उससे काफ़ी देर तक बात की।वो कई समस्याओं के बारे में बात करते-करते भावुक हो गया और कहने लगा कि मैं अपनी पढ़ाई के साथ-साथ समय निकालकर कुछ ऐसे बच्चों को भी पढ़ाता हूं,जो शिक्षा की दूकान में जाकर पढ़ने में असमर्थ हैं।कई बच्चों के अभिभावक तो ऐसे हैं कि वो दो वक्त तक की रोटी ही जुटा पाते हैं,पढाई का ख़र्च उठाने में अक्षम हैं।विधायक और सांसद की रवैये को दोहराते हुए कहा कि इन दोनों में कोई कभी मिलने नही आता है।इसलिए सरकार कोई ऐसी व्यवस्था कर दे कि कम से कम शाम 6 बजे से रात 10 बजे तक बिजली मिले ताकि बच्चे पढ़ सके।यदि बच्चे पढ़ेंगे नही तो आगे कैसे बढ़ेंगे?इस युवा शिक्षक के छोटे से पोस्ट ने काफ़ी सोचने पर मज़बूर कर दिया और बता दिया कि गांव में बुनियादी सुविधाओं की अभी भी कितनी कमी है।

अन्त में मैं युवाओं से अपील करता हूं कि सोशल मीडिया बेहद सरल और आसान माध्यम है अपनी समस्याओं के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द करने का। आप सिर्फ़ राजनीति का मोहरा ना बने रहें,अपनी समस्याओं के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द करें।यदि आप नही बोलेंगे तो कौन बोलेगा?यदि अब आप नही सोचेंगे,तब कब सोचेंगे?

बुधवार, 25 जनवरी 2017

राजनीतिक विज्ञापन:राजनीति का महत्वपुर्ण औज़ार है।


पांच राज्यों में चुनाव का ऐलान हो चुका है।पार्टियां चुनाव प्रचार में जुट चुकी है। राजनीतिक दलों ने मतदाताओं को हैण्डबिल थमाने के साथ-साथ गली-मोहल्लों की दीवारों को अपने लोक-लुभावन वादों वाले पोस्टरों से पाट दिया है। वहीं दूसरी तरफ़ दलों की सोशल मीडिया की टीमों ने अपने-अपने दल के पक्ष में बैटिगं करनी शुरु कर दी है।
क्या आपने कभी सोचा है कि दलों के द्वारा दी जाने वाली हैण्डबिल,पोस्टर,बैज,दलों की छाप वाली टोपी वगैर-वगैर क्या है?दरअसल यह एक तरह का विज्ञापन है,जिसको हम राजनीतिक विज्ञापन(रा. वि.) कहते हैँ।इस विज्ञापन के माध्यम से सभी दल अपने लोकहित कार्यों के वर्तमान,भूत और भविष्य तीनों काल के बारे में बताते हैं।मसलन वर्तमान में वो आपके बेहतरी के लिए किन नीतियों और योजनाओं पर काम कर रहें हैं,बीते समय में किन नीतियों और योजनाओं पर का काम कर चुके हैं और भविष्य में किन नीतियों और योजनाओं पर काम करने वाले हैं। कुल मिलाकर वो आपके अच्छे दिन की बात करते हैं। मगर वास्तविकता क्या है कौन नही जानता है।
भारत में रा. वि. को लेकर कोई ठोस कानून नही है,होता भी तो कितना पालन होता आपको पता ही है।भारत में राजनीतिक विज्ञापन का इतिहास बहुत पुराना है। बदलते समय के साथ भारत में विज्ञापन का भी स्वरुप बदलता चला गया।मुद्रित माध्यम से शुरु हुआ राजनीतिक विज्ञापन,आज डिजिटल माध्यम तक पहुंच गया है।पहले राजनीतिक दल हैण्डबिल,पोस्टर,बैच,दलों की छाप वाली टोपी वगैर-वगैर इस्तेमाल करते थें,लेकिन बदलते समय के साथ टीवी और इंटरनेट ने भारतीय राजनीति को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया है।बदलते दौर में कुछ और बदलाव हुए वो है भाषा का,अपनी बात रखने के तरीके और सत्यता का।चुनाव के वक्त पार्टियां विज्ञापन के माध्यम से अपने किए कार्यों के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बतातें है।बीते कुछ सालों से राजनीति में आरोप'वार शुरु हो गया है,जिसमें नेता एक-दूसरे पर निशाना साधने के लिए अपनी भाषाई मर्यादा का ख़्याल नही रख रहें हैं।
अपने शोध के दौरान मैने गुगल से भी बात की,पाया कि भारत में टीवी और इंटरनेट का रा. वि. के रुप में इस्तेमाल करने का चलन मुद्रित माध्यम के जैसा ज़्यादा पुराना नही है,मगर विश्व में सबसे पहले अमेरिका में 1952 में टीवी का रा. वि.के रुप में  इस्तेमाल होना शुरु हो गया।अमेरिका के 34वें राष्ट्रपति Dwight D.Eisenhower के नाम यह रिकार्ड है।उन्होंने भाषण के रुप में इस्तेमाल किया।लेकिन अमेरिका में हीं 1964 में नकारात्मक राजनीतिक विज्ञापन की भी शुरुआत हो जाती है,जो अब दुनियाभर में हो रही है।इसका श्रेय 36वें राष्ट्रपति Lyndon Baines Johnson को जाता है। उनके इस रा.वि. वाले विडियो जो कि इंटरनेट पर मौज़ूद है, में आप देखेंगे कि एक छोटी बच्ची है जो डेजी फुल की पंखुड़ियों को एक-एक करके तोड़ते हुए गिनती करती है,तभी तेज़ आवाज़ के साथ उलटी गिनती शुरु होती है और नाभिकीय बम धमाका होता है।विज्ञापन के अन्त में Johnson के पक्ष में 3 नवम्बर को वोट करने की अपील की जाती है।मगर ये विज्ञापन एक ही बार प्रसारित हुआ।ऐसा क्यों हुआ पता नही।भारत में इस तरीके से टीवी रा.वि. की शुरुआत नही होती है,लेकिन यहां भी फटने की बात होती है,मगर इंडिया शाइनिंग गुब्बारे की। साल 2004 में भाजपा का नारा था इंडिया शाइनिंग और भाजपा दूसरे नम्बर की पार्टी बनी थी।इसलिए विरोधी इंडिया शाइनिंग गुब्बारे के फुटने की बात करते हैँ।वर्तमान में पार्टियां अब लोगों तक अपना सन्देश पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रही है।इसका भी श्रेय भाजपा को ही जाता है,क्योंकि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में रा. वि. के लिए सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया था।उस वक्त बाकि राजनीतिक पार्टियां सोशल मीडिया के इस्तेमाल में काफी पीछे छुट गई थीं,लेकिन धीरे-धीरे सभी ने सीख लिया है।अब कोई किसी से कम नही है। कम शारीरिक श्रम और खर्चों के,लोगों तक पहुंचने का सबसे आसान माध्यम है सोशल मीडिया। सो.मी के सन्देश में किस तरीके की बात होती है,हम और आप सब जानते हैं।बताने की ज़रुरत नही है।लेकिन एक बात याद रखिएगा कि जिस सोशल मीडिया को समाज में क्रान्ति लाने के रुप में देखा जा रहा है,अब अफ़वाहों का अड्डा बन गया है।

पार्टियां आपके चन्दे के रुप में दिए पैसे को कब और कहां खर्च करती है नही बताती है।इकट्ठे बता देती है कि इतना पैसा खर्च हुआ,कई तो बताती ही नही हैँ।मेरा सवाल है कि आप पार्टियों को चन्दा क्यों देते हैं?क्यों आपको आपके पैसों के गलत इस्तेमाल पर अफ़सोस नही होता है?क्या आप राजनीतिक दलों को चन्दा देके पुण्य का काम करते हैं?मेरी राय में राजनीतिक दलों को चन्दा देना बन्द कर,किसी ज़रुरतमन्द को वो पैसा दे दें,जो आप राजनीतिक दलों को देना चाहते हैं।आपके पैसे से किसी का संतान पढ़ लेगा,तो किसी की ज़िन्दगी सवंर जाएगी।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

नेताओं के बिगड़ते बोल का ज़िम्मेदार कौन?

बदलते युग के साथ हमारे देश की राजनीति में भी काफ़ी बदलाव हो रहा है।इस बात से इनकार किया जा सकता है?हाल के वर्षों को अगर हम गौर से देखें तो पाएंगे कि हमारे देश की राजनीति काफ़ी आक्रामक और हल्की हो गई है।सभी नेता तो नही लेकिन कुछ नेताओं की जमात ने पार्टी और एक-दूसरे को निशाना बनाने के लिए काफ़ी घटिया से घटिया शब्दों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।जिसका हमारे समाज में काफ़ी बुरा प्रभाव पड़ रहा है।हाल ही में हमारे गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू ने जूता मारने तक की बात कह डाली।जिसकी काफ़ी आलोचना भी हुई।लेकिन क्या यह सोचने वाली बात नही है कि रिजीजू के बात में यह तत्व कहां से आया?मेरी स्मरण में पूर्वी भारत से आने वाले नेताओं में रिजीजू पहले ऐसे नेता हैं,जिन्होंने ऐसे शब्द का इस्तेमाल किया है।संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से हम न्यूनतम उम्मीद कर सकते हैं कि उसकी भाषा शालीन हो।
ऐसा माना जाता है कि देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश और बिहार के नेताओं की पकड़ के साथ-साथ ज़्यादा हस्तक्षेप होती है।और इन दोनो राज्यों के कुछ नेताओं की राजनीति में भाषाई स्तर क्या है,उम्मीद है बताने की ज़रूरत नही है।कहावत है 'संगत से गुण होत है,संगत से गुण जात।'वैसे मैं जिन कुछ नेताओं की बात कर रहा हूं,उनमें शायद ही किसी नेता के साथ रिजीजू का उठना-बैठना होगा।फिर वही सवाल कि रिजीजू के बात में यह तत्व कहां से आया?मुझे लगता है कि हमारे देश के नेताओं के बिगड़ते बोल के लिए किसी हद तक कुछ मीडिया संस्थान भी ज़िम्मेदार है।TRP के लिए नेताओं के फ़िजूल की बातों को दिन-रात दिखाने से जाहिर तौर पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।इसी प्रभाव का उदाहरण है किरण रिजीजू का बयान।
वर्तमान में नेताओं को कानून का डर नही,लिहाज नाम की चीज नहीं बच गई है।पहले के नेता तो मीडिया के डर के भागते थें,लेकिन अब तो नेता मीडियाकर्मीयों को डांट कर भगा दे रहें हैं।ताज़ा स्मरण में है कि सपा नेता रामगोपाल यादव ने मुलायम सिंह यादव के बारे में सवाल पूछे जाने पर संवाददाताओं को डांट दिया।अब समय आ गया है कि मीडिया संस्थान द्वारा किसी नेता या दल को ज़्यादा तरजीह ना दिया जाए।
बेंगलुरू में 31 दिसम्बर 2016 की रात हुए बलात्कार के मामले में कर्नाटक के गृहमंत्री का बयान बताने के साथ-साथ संकेत भी है कि नेताओं द्वारा कुछ भी बिना सोचे समझे बोल देने की आदत का शिकार अब सिर्फ उत्तर भारत के नेता ही नही है।यदि इस बात पर रोक नही लगाई गयी तो आने वाले समय में देश की राजनीति और बदतर हो जाएगी।

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...