पांच राज्यों में
चुनाव का ऐलान हो चुका है।पार्टियां चुनाव प्रचार में जुट चुकी है। राजनीतिक दलों
ने मतदाताओं को हैण्डबिल थमाने के साथ-साथ गली-मोहल्लों की दीवारों को अपने
लोक-लुभावन वादों वाले पोस्टरों से पाट दिया है। वहीं दूसरी तरफ़ दलों की सोशल
मीडिया की टीमों ने अपने-अपने दल के पक्ष में बैटिगं करनी शुरु कर दी है।
क्या आपने कभी सोचा
है कि दलों के द्वारा दी जाने वाली हैण्डबिल,पोस्टर,बैज,दलों की छाप वाली टोपी
वगैर-वगैर क्या है?दरअसल यह एक तरह का विज्ञापन है,जिसको हम
राजनीतिक विज्ञापन(रा. वि.) कहते हैँ।इस विज्ञापन के माध्यम से सभी दल अपने लोकहित
कार्यों के वर्तमान,भूत और भविष्य तीनों काल के बारे में बताते हैं।मसलन वर्तमान
में वो आपके बेहतरी के लिए किन नीतियों और योजनाओं पर काम कर रहें हैं,बीते समय
में किन नीतियों और योजनाओं पर का काम कर चुके हैं और भविष्य में किन नीतियों और
योजनाओं पर काम करने वाले हैं। कुल मिलाकर वो आपके अच्छे दिन की बात करते हैं। मगर
वास्तविकता क्या है कौन नही जानता है।
भारत में रा. वि. को
लेकर कोई ठोस कानून नही है,होता भी तो कितना पालन होता आपको पता ही है।भारत में
राजनीतिक विज्ञापन का इतिहास बहुत पुराना है। बदलते समय के साथ भारत में विज्ञापन
का भी स्वरुप बदलता चला गया।मुद्रित माध्यम से शुरु हुआ राजनीतिक विज्ञापन,आज
डिजिटल माध्यम तक पहुंच गया है।पहले राजनीतिक दल हैण्डबिल,पोस्टर,बैच,दलों की छाप
वाली टोपी वगैर-वगैर इस्तेमाल करते थें,लेकिन बदलते समय के साथ टीवी और इंटरनेट ने
भारतीय राजनीति को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया है।बदलते दौर में कुछ और बदलाव हुए
वो है भाषा का,अपनी बात रखने के तरीके और सत्यता का।चुनाव के वक्त पार्टियां विज्ञापन के माध्यम से अपने किए कार्यों के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बतातें है।बीते
कुछ सालों से राजनीति में आरोप'वार शुरु हो गया है,जिसमें नेता एक-दूसरे पर निशाना
साधने के लिए अपनी भाषाई मर्यादा का ख़्याल नही रख रहें हैं।
अपने शोध के दौरान
मैने गुगल से भी बात की,पाया कि भारत में टीवी और इंटरनेट का रा. वि. के रुप में
इस्तेमाल करने का चलन मुद्रित माध्यम के जैसा ज़्यादा पुराना नही है,मगर विश्व में
सबसे पहले अमेरिका में 1952 में टीवी का रा. वि.के रुप में इस्तेमाल होना शुरु हो गया।अमेरिका के 34वें
राष्ट्रपति Dwight D.Eisenhower
के नाम यह रिकार्ड है।उन्होंने भाषण के रुप में
इस्तेमाल किया।लेकिन अमेरिका में हीं 1964 में नकारात्मक राजनीतिक विज्ञापन की भी
शुरुआत हो जाती है,जो अब दुनियाभर में हो रही है।इसका श्रेय 36वें राष्ट्रपति Lyndon Baines Johnson को जाता है। उनके इस रा.वि. वाले विडियो जो कि इंटरनेट
पर मौज़ूद है, में आप देखेंगे कि एक छोटी बच्ची है जो डेजी फुल की पंखुड़ियों को एक-एक
करके तोड़ते हुए गिनती करती है,तभी तेज़ आवाज़ के साथ उलटी गिनती शुरु होती है और
नाभिकीय बम धमाका होता है।विज्ञापन के अन्त में Johnson के
पक्ष में 3 नवम्बर को वोट करने की अपील की जाती है।मगर ये विज्ञापन एक ही बार
प्रसारित हुआ।ऐसा क्यों हुआ पता नही।भारत में इस तरीके से टीवी रा.वि. की शुरुआत नही
होती है,लेकिन यहां भी फटने की बात होती है,मगर ‘इंडिया शाइनिंग’ गुब्बारे की। साल 2004 में भाजपा का नारा था ‘इंडिया शाइनिंग’ और
भाजपा दूसरे नम्बर की पार्टी बनी थी।इसलिए विरोधी ‘इंडिया शाइनिंग’ गुब्बारे के फुटने की बात करते हैँ।वर्तमान में
पार्टियां अब लोगों तक अपना सन्देश पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर
रही है।इसका भी श्रेय भाजपा को ही जाता है,क्योंकि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में रा.
वि. के लिए सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया था।उस वक्त बाकि राजनीतिक पार्टियां
सोशल मीडिया के इस्तेमाल में काफी पीछे छुट गई थीं,लेकिन धीरे-धीरे सभी ने सीख
लिया है।अब कोई किसी से कम नही है। कम शारीरिक श्रम और खर्चों के,लोगों तक पहुंचने
का सबसे आसान माध्यम है सोशल मीडिया। सो.मी के सन्देश में किस तरीके की बात होती
है,हम और आप सब जानते हैं।बताने की ज़रुरत नही है।लेकिन एक बात याद रखिएगा कि जिस सोशल
मीडिया को समाज में क्रान्ति लाने के रुप में देखा जा रहा है,अब अफ़वाहों का अड्डा
बन गया है।
पार्टियां आपके
चन्दे के रुप में दिए पैसे को कब और कहां खर्च करती है नही बताती है।इकट्ठे बता
देती है कि इतना पैसा खर्च हुआ,कई तो बताती ही नही हैँ।मेरा सवाल है कि आप पार्टियों
को चन्दा क्यों देते हैं?क्यों आपको आपके पैसों के गलत इस्तेमाल पर अफ़सोस
नही होता है?क्या आप राजनीतिक दलों को चन्दा देके पुण्य का
काम करते हैं?मेरी राय में राजनीतिक दलों को चन्दा देना बन्द
कर,किसी ज़रुरतमन्द को वो पैसा दे दें,जो आप राजनीतिक दलों को देना चाहते हैं।आपके
पैसे से किसी का संतान पढ़ लेगा,तो किसी की ज़िन्दगी सवंर जाएगी।
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