शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

नेताओं के बिगड़ते बोल का ज़िम्मेदार कौन?

बदलते युग के साथ हमारे देश की राजनीति में भी काफ़ी बदलाव हो रहा है।इस बात से इनकार किया जा सकता है?हाल के वर्षों को अगर हम गौर से देखें तो पाएंगे कि हमारे देश की राजनीति काफ़ी आक्रामक और हल्की हो गई है।सभी नेता तो नही लेकिन कुछ नेताओं की जमात ने पार्टी और एक-दूसरे को निशाना बनाने के लिए काफ़ी घटिया से घटिया शब्दों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।जिसका हमारे समाज में काफ़ी बुरा प्रभाव पड़ रहा है।हाल ही में हमारे गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू ने जूता मारने तक की बात कह डाली।जिसकी काफ़ी आलोचना भी हुई।लेकिन क्या यह सोचने वाली बात नही है कि रिजीजू के बात में यह तत्व कहां से आया?मेरी स्मरण में पूर्वी भारत से आने वाले नेताओं में रिजीजू पहले ऐसे नेता हैं,जिन्होंने ऐसे शब्द का इस्तेमाल किया है।संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से हम न्यूनतम उम्मीद कर सकते हैं कि उसकी भाषा शालीन हो।
ऐसा माना जाता है कि देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश और बिहार के नेताओं की पकड़ के साथ-साथ ज़्यादा हस्तक्षेप होती है।और इन दोनो राज्यों के कुछ नेताओं की राजनीति में भाषाई स्तर क्या है,उम्मीद है बताने की ज़रूरत नही है।कहावत है 'संगत से गुण होत है,संगत से गुण जात।'वैसे मैं जिन कुछ नेताओं की बात कर रहा हूं,उनमें शायद ही किसी नेता के साथ रिजीजू का उठना-बैठना होगा।फिर वही सवाल कि रिजीजू के बात में यह तत्व कहां से आया?मुझे लगता है कि हमारे देश के नेताओं के बिगड़ते बोल के लिए किसी हद तक कुछ मीडिया संस्थान भी ज़िम्मेदार है।TRP के लिए नेताओं के फ़िजूल की बातों को दिन-रात दिखाने से जाहिर तौर पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।इसी प्रभाव का उदाहरण है किरण रिजीजू का बयान।
वर्तमान में नेताओं को कानून का डर नही,लिहाज नाम की चीज नहीं बच गई है।पहले के नेता तो मीडिया के डर के भागते थें,लेकिन अब तो नेता मीडियाकर्मीयों को डांट कर भगा दे रहें हैं।ताज़ा स्मरण में है कि सपा नेता रामगोपाल यादव ने मुलायम सिंह यादव के बारे में सवाल पूछे जाने पर संवाददाताओं को डांट दिया।अब समय आ गया है कि मीडिया संस्थान द्वारा किसी नेता या दल को ज़्यादा तरजीह ना दिया जाए।
बेंगलुरू में 31 दिसम्बर 2016 की रात हुए बलात्कार के मामले में कर्नाटक के गृहमंत्री का बयान बताने के साथ-साथ संकेत भी है कि नेताओं द्वारा कुछ भी बिना सोचे समझे बोल देने की आदत का शिकार अब सिर्फ उत्तर भारत के नेता ही नही है।यदि इस बात पर रोक नही लगाई गयी तो आने वाले समय में देश की राजनीति और बदतर हो जाएगी।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...