एक बात है
जिसके बारे में सिर्फ़ बात ही हो रही है।
जिस बात के
बारे में सिर्फ़ बात हो रही है,वो बात 48 साल पुरानी बात है इसलिए भारत में ये कोई
नई बात नही है। दिक्कत इस बात की है कि बात को अंजाम तक पहुंचाने के लिए कई सर्व दलिय मुलाकात
के बाद भी बात अंजाम तक नही पहुंच पा रही है।एक साथ चुनाव प्रक्रिया की
शुरुआत आज़ाद भारत में 1951-52 में पहली बार हुई और उसके बाद से साल 1957,1962 और
1967 तक चली। साल 1968-1969 में कुछ विधानसभाओं और 1970 में लोकसभा के स्वतः भंग
हो जाने के बाद यह प्रक्रिया जारी नही रह पाई और 1970 में फिर से लोकसभा का चुनाव
हुआ।वर्तमान में एक साथ चुनाव कराने को लेकर चुनाव आयोग की अपनी दलील है तो एक साथ
चुनाव के ख़िलाफ़ कुछ पार्टियों की अपनी दलील। कानूनी जानकारों की माने तो संविधान
के अनुच्छेद 83,85,172 और 174 में संसोधन कर एक साथ चुनाव कराई जा सकती है। चुनाव
आयोग के अनुसार देश में यदि एक साथ चुनाव कराई जाती है,तो वोटिंग मशीनें खरीदने
में करीब 93 बिलियन का खर्च एक साथ आएगा।केन्द्रीय सुरक्षाबलों की ज़्यादा
आवश्यकता होगी।बार-2 होने वाले खर्चों से मुक्ति मिलेगी। पूर्व चुनाव आयुक्त एस वाई
कुरैशी ने कहा कि चुनाव आयोग के पास जनप्रतिनिधत्व कानून 1951 की धारा 14 और 15 के
अनुसार अधिकार है कि छह महीनें के भीतर लोकसभा और विधानसभा के चुनावों को एक साथ
क्लब कर सकता है।यदि इसकी अवधि बढ़ा दी जाए तो किसी हद तक सुधार हो सकता है।साथ ही
उन्होंने कहा कि एक साथ चुनाव होने से किसी हद तक साम्प्रदायिक ताकतों पर भी रोक
लगाई जा सकती है।
16 वीं लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणापत्र
में लिखा कि “भाजपा चुनाव सुधार करने के लिए कटीबद्ध है,जिससे अपराधियों को राजनीति से
बाहर किया जा सके।भाजपा दूसरे दलों के साथ विचार विमर्श करके ऐसा तरीका बनाना
चाहती है,जिससे विधानसभा और लोकसभा के चुनाव साथ-साथ हो।इससे सरकार और राजनैतिक
दलों का खर्चा कम होगा,इससे राज्य सरकार में थोड़ी स्थिरता आएगी।हम चुनावों में
खर्च की सीमा में बदलाव लाना चाहते हैं।भाजपा की अपराधियों
को राजनीति से बाहर करने वाली बात सुनने में तो काफी अच्छी लग रही है।लेकिन सच्चाई
क्या है,कौन नही जानता है।19 मई 2014 को international business times ने एडीआर के हवाले से ख़बर छापी की,बीजेपी के 63 उम्मीदवार पर गंभीर अपराध
के आरोप हैँ।क्या बीजेपी ने इन सभी नेताओं को बाहर कर दी?
मेरी राय में सभी दलों का अपराधी नेताओं को लेकर
एक सा ही हाल है।एक तरीके से किसी हद तक कहा जा सकता है कि राजनीतिक दल गुंडों और
बदमाश नेताओं की शरणस्थली है।

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