जिस माध्यम से देश
में क्रान्ति आने की बात कही जा रही है,उसी माध्यम पर मेरे एक दोस्त और युवा
शिक्षक ने शिक्षा पर बल देते हुए अपने गांव में बिजली की समस्या को लेकर पोस्ट
लिखा।पोस्ट पढ़ कर ऐसा लगा कि समस्या को लेकर वो काफ़ी आक्रोशित हैं।स्मार्टफ़ोन
ना होने की वज़ह से उसने अपनी व्यथा फेसबुक पर हिंग्लिश में लिखी है,जिसका
भावात्मक तर्जुमा इस प्रकार है-
‘नीतीश कुमार कहते हैं कि बिजली की व्यवस्था नही
सुधरी तो मैं वोट मांगने नही आऊंगा।मेरे गांव में मुश्किल से 4-5 घंटे बिजली रह
रही है।क्या यही नीतीश निश्चय है?सांसद महोदय जब आते
हैं तो बिजली रहती है।क्या सिर्फ़ उन्हें ही बिजली की ज़्यादा ज़रुरत है और लोगों
को नही?क्या रात में बिजली का काम चल रहा है कहीँ?
अगर बिहार के
ग्रामीण इलाकों में बिजली की व्यवस्था सुधर जाए तो गरीब के बच्चे शाम को ज़रुर पढ़
पाएंगे,जिससे ग्रामीण इलाके के बच्चे भी शिक्षित हो पाएंगे।‘
दोस्त की बात मुझे
सौ फ़ीसदी सही लगी।आपके साथ सिर्फ़ इसलिए साझा कर रहा हूं,ताकि पता चले कि युवाओं
के भीतर सत्ताधारीयों से सवाल पुछने की साहस का अभी ह्रास नही हुआ है।आदर्श स्थिती
तो ये होता कि वो राष्ट्रीय और राजकीय सत्ता के दोनों शिखर पुरुषों से सवाल
पुछता,लेकिन उसने सिर्फ़ राजकीय सत्ता के शिखर पुरुष से ही सवाल पुछा है।ऐसा उसने
क्यों किया मुझे नही मालूम। लेकिन हम उम्मीद करेंगे कि उसको उसके सवाल का जवाब मिल
जाएगा।
‘लाइव मिंट’ वेबसाइट ने 15
अगस्त 2015 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण को छापा,जिसमें उन्होंने लाल
किले की प्राचीर से संकल्प लिया था कि 1000 दिन के भीतर राज्य सरकार की मदद से हर
गांव में बिजली पहुंचाने का काम करेंगे।साथ ही उन्होंने कहा कि आज़ादी के इतने
सालों बाद भी 18500 गांव ऐसे हैं जहां अब तक बिजली नही पहुंची है।ये तो हुई पीएम की
बात।
16 अक्टूबर 2015 को ’द हिन्दू’ अख़बार ने साल 2012
में नीतीश कुमार की कही बात ”यदि मैं पुरे गांव में बिजली नही पहुंचा पाया तो
साल 2015 के विधानसभा में वोट मांगने नही आऊंगा” को
दोहराते हुए कुमार के बयान को छापा जिसमें उन्होंने कहा कि साल 2016 के अन्त में
राज्य के सभी गांव में बिजली होगा।फ़िर 28 अक्टूबर 2016 को ‘द टाइम्स ऑफ इण्डिया’ ने उस ख़बर को छापी,जिसमें कुमार ने कहा कि साल
2017 के अन्त तक सभी गांव में बिजली की सुविधा उपलब्ध हो जाएगी।
मैंने विकास पुरुष
के संकल्प और सुशासन बाबू के बदलते बयान को आपके सामने रख दिया।अब आप अंदाजा लगा
सकतें हैं कि विकास पुरुष के संकल्प की रफ्तार कितनी तेज़ है और सुशासन बाबू के कथनी
और करनी में कितना अंतर है।बहरहाल हम उम्मीद करेंगे कि जल्दी से जल्दी बिजली की
सुविधा उपलब्ध हो जाएगा,ताकि जिस युवा के नाम पर राजनीति होती है,का भविष्य सुधर
सके।
खैर मुझे उसकी पोस्ट
को पढ़कर काफ़ी खुशी हुई कि ऐसे वक्त में उसने समस्याओं ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है,जब
ज़्यादातर युवा अपनी बुनियादी समस्याओं के ख़िलाफ़ आवाज़ ना उठाकर,सिर्फ़ राजनीतिक
विचारधारा को लेकर सोशल मीडिया पर आपस में भिड़ते रहते हैं।
उसके इस पोस्ट को
पढ़ने के बाद मैंने उससे काफ़ी देर तक बात की।वो कई समस्याओं के बारे में बात
करते-करते भावुक हो गया और कहने लगा कि मैं अपनी पढ़ाई के साथ-साथ समय निकालकर कुछ
ऐसे बच्चों को भी पढ़ाता हूं,जो शिक्षा की दूकान में जाकर पढ़ने में असमर्थ हैं।कई
बच्चों के अभिभावक तो ऐसे हैं कि वो दो वक्त तक की रोटी ही जुटा पाते हैं,पढाई का
ख़र्च उठाने में अक्षम हैं।विधायक और सांसद की रवैये को दोहराते हुए कहा कि इन
दोनों में कोई कभी मिलने नही आता है।इसलिए सरकार कोई ऐसी व्यवस्था कर दे कि कम से
कम शाम 6 बजे से रात 10 बजे तक बिजली मिले ताकि बच्चे पढ़ सके।यदि बच्चे पढ़ेंगे
नही तो आगे कैसे बढ़ेंगे?इस युवा शिक्षक के छोटे से पोस्ट ने काफ़ी सोचने
पर मज़बूर कर दिया और बता दिया कि गांव में बुनियादी सुविधाओं की अभी भी कितनी कमी
है।
अन्त में मैं युवाओं
से अपील करता हूं कि सोशल मीडिया बेहद सरल और आसान माध्यम है अपनी समस्याओं के
ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द करने का। आप सिर्फ़ राजनीति का मोहरा ना बने रहें,अपनी
समस्याओं के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द करें।यदि आप नही बोलेंगे तो कौन बोलेगा?यदि अब आप नही सोचेंगे,तब कब सोचेंगे?

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