“नेताओं को अपनी आवाज़ धीमी रखनी चाहिए और एक-दूसरे को
अपमानित करने से बचना चाहिए।“
ये वाक्य
रोमन कैथोलिक चर्च के वर्तमान और 266वें पोप फ़्रांसिस का है।उन्होंने ये बात
भारतीय चुनावी मौसम में चल रही जुबानी जंग के बीच भारत से सुदूर,इटली की राजधानी
रोम में कही है।बीते शुक्रवार को रोम स्थित University Roma Tre में आयोजित कार्यक्रम में अपने 45
मिनट के भाषण में दुनियाभर में राजनीति में गिरती भाषाई स्तरता पर बात की।उन्होंने
उदाहरण सहित राजनीतिज्ञों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे अमर्यादित शब्दों और भाषाओं
पर दुख जताते हुए कारण भी बताया।उन्होंने नेताओं से भाषणों में शालीनता और सहनशीलता
बरतने की अपील भी की।मैं उनके 45 मिनट के भाषण को ना ही पूरा सुन सका और ना ही
पढ़ सका।लेकिन जितना पढ़ और सुन पाया,उसमें से कहीं शाब्दिक तो कही भावनात्मक हिन्दी
अनुवाद पेश कर रहा हूं।अनुवाद पेश करने से पहले आप पाठकों से गुजारिश करुंगा कि आप
पोप की बातों को किसी एक दल और नेता के सन्दर्भ में देखने की ग़लती ना करें,क्योंकि
पूरब से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक के ज़्यादातर नेताओं में अब ये दुर्गुण
पाया जा रहा है।जिसको आप भी अनुभव करते ही होंगे।अब अनुवाद पेश कर रहा हूं-
“नेताओं को अपने विरोधियों को ध्यान में रखते हुए अपनी बात शुरु करनी चाहिए
और बेवज़ह की जुबानी जंग की बीज बोआई से बचना चाहिए।नेताओं को अपनी आवाज़ धीमी
रखनी चाहिए,साथ ही कम बोलना और ज़्यादा सुनना चाहिए।
हम रोज
अख़बारों में पढ़ते ही हैं कि किस तरह से एक दल के नेता दूसरे दल के नेता को
अपमानित करते रहते हैं।टीवी डिबेट में एक को अपनी बात पूरी करने से पहले ही दूसरा
उसको बाधित करते रहता है।
यदि हम एक-दूसरे के सामने खुलकर अपनी बात रखेंगे,किसी
मुद्दे पर आपस में बातचीत करेंगे और एक-दूसरे का सम्मान करेंगे तो ये जुबानी जंग
कैसे होगा?
उन्होंने
अपने भाषण के केन्द्र में राजनीति को रखते हुए,दुनियाभर के समाज में गिरती
राजनीतिक स्तरता पर दुख जताया।आगे उन्होंने कहा कि अमर्यादित भाषणों से हम सामाजिक
जीवन को बेहतर बनाने वाली भावनाओं को भी खोते जा रहें हैं।“
मैंने
पोप फ़्रांसिस की बात इसलिए आपलोगों के सामने रखी है,क्योंकि ये बात भारत,भारत के
राजनीतिज्ञों और उनके बदजुबानी से समाज में पड़ रहे बुरे असर के बारे में भी कही
गई है।अब आप पोप की बातों को अपनी-अपनी भाषाओं में रुपान्तरित करके,सोशल मीडिया पर
लिखने के साथ-साथ सम्भव हो सके तो अपने गली-मोहल्लों की दीवारों और चौपालों पर
चिपका दीजिए ताकि पंचायत स्तरीय नेताओं के साथ-साथ राजनीति में पदार्पण कर रहे
युवा नेता भी सीख लें।साथ ही कहीं आपके विधायक और सांसद की नज़र पर गई तो,उनमें भी
कही बदलाव आ सकता है।
अच्छा
होता कि हाल ही में जिस तरह से भारतीय मीडिया में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड
ट्रम्प और हिलेरी क्लींटन की चुनावी जुबानी जंग को तरजीह दी जा रही थी,वैसे ही पोप
की बातों को एक दिन ही सही मगर तरजीह दी जाती तो सम्भवत: नेताओं में बदलाव आने के
साथ-साथ आप दर्शकों और पाठकों में भी बदलाव आने की उम्मीद की जा सकती थी।क्योंकि
इन दिनों भारत में भी नेताओं से ज़्यादा आम जनता को इस बात को जानने में दिलचस्पी
रहती है कि आज किस दल के नेता ने किस दल के नेता को जुबानी जंग में मात दी है।कई
बार तो पार्टी के समर्थक ही आपस में भीड़ जाते हैं,जो कि लोकतंत्र के लिए ठीक नही
है।एक नागरिक होने के नाते आपको किसी दल या नेता का फैन होने की बजाय,आपको अपने जन
प्रतिनिधियों से शिक्षा से लेकर रोज़गार,भोजन से लेकर आवास और तमाम बुनियादी
सुविधाओं की मांग करनी चाहिए,क्योंकि उनका निर्माण आपकी सेवा करने के लिए ही हुआ
है,ना कि बदजुबानी की बदौलत समाज में मतभेद पैदा करने के लिए।

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