गुरुवार, 3 अगस्त 2017

नीतीश जी:दाग अब भी लगे हैं!

दिन 26 जुलाई 2017,शाम का वक्त, राष्ट्रीय मीडिया की नज़र बिहार पर।क्योंकि इस शाम से अगली शाम तक भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय लिखा जा रहा था,एक व्यक्ति की साफ़-सुथरी छवि बनाये रखने के लिए।इस अध्याय में कई ऐसी चीजें लिखीं गई,जो अबतक की राजनीति में एक बानगी है।जैसे नीतीश कुमार छठी बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले अबतक के एकमात्र मुख्यमंत्री बने।सबसे अल्प समय तक मुख्यमंत्री ना रहने वाले मुख्यमंत्री बने।अपने पुरानी साथी से हाथ मिलाने जा रहे थे,जिससे साल 2013 में यह कहते हुए नाता तोड़ दिया था कि 'मिट्टी में मिल जाऊंगा, लेकिन दुबारा कभी नाता नही जोड़ूंगा।'इस शाम नीतीश ने उस गठबंधन से नाता तोड़ दिया,जिसकी बुनियाद सांप्रदायिक ताकतों के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए रखी थी।महज़ 20 महीने में उसी सांप्रदायिक ताकत से हाथ मिला लिए,जिससे लड़ने के लिए ख़ुद के सहयोग से एक गठबंधन का निर्माण किया था।इस गठबंधन से अलग होने के बाद उनके कई उपनाम भी अस्तित्व में आए।जैसे-कुर्सी कुमार,पलटूराम,रणछोड़ इत्यादि।
अपने वर्तमान साथी भाजपा से साल 2013 में नाता तोड़ते वक़्त नीतीश कुमार ने कहा था कि ये निर्णय सिद्धांत के आधार पर लिया गया है।भाजपा एक सांप्रदायिक पार्टी है।आइए एक नज़र डालते हैं दोनों साथियों के साल 2013 से लेकर 2015 तक के उन कुछ वचनों पर ताकि आपको तय करने में आसानी हो जाए की राजनीति में नैतिकता का क्या महत्व होता है।नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार चुने जाने पर नीतीश ने कहा था कि भाजपा एक ऐसे उम्मीदवार को चेहरा बना रही है,जिसका नाम सुनते ही देश के करोड़ों अल्पसंख्यकों में भय उत्पन्न हो जाता है।नीतीश ने नरेंद्र मोदी की तुलना हिटलर से की थी।सुशील मोदी ने नीतीश को धोखेबाज़ कहा था।नरेन्द्र मोदी ने नीतीश को अवसरवादी नेता कहा था।
हाल ही में 26 जुलाई को गठबंधन से अलग होते वक़्त साफ़ -सुथरी छवि के जाने जाने वाले नीतीश ने कहा था कि मैंने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई में ये कदम उठाया है और अगले ही दिन भाजपा के सहयोग से सरकार बना लिए।आइए एडीआर के रिपोर्ट की मदद से जानते हैं कि राजद-कांग्रेस के गठबंधन वाले नीतीश मंत्रिमंडल में कितने दागी मंत्री थे और अब भाजपा के सहयोग से बनी मंत्रिमंडल में कितने दागी हैं।एडीआर ने ये रिपोर्ट नेताओं द्वारा चुनाव आयोग में दाखिल किए गए चुनावी हलफनामे के आधार पर तैयार किया है।
एडीआर(एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म) एक संस्था है,जिसको कह सकते हैं कि ये राजनीतिक प्रणाली को दूरूस्त करने के लिए काम करती है।इसकी स्थापना 1999 में आईआईएम, अहमदाबाद के प्रोफेसरों ने मिलकर की है।
रिपोर्ट की शुरुआत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से ही करते हैं।साल1991 में एक मर्डर केस में उन पर हत्या,हत्या की कोशिश, दंगा भड़काने और आर्म्स एक्ट का मामला दर्ज़ है।
                             उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी पर मानहानि, शान्ति भंग करने और आपराधिक साज़िश के केस दर्ज़ है।ऐसे ही नीतीश के वर्तमान मंत्रिमंडल के कई नेताओं पर चोरी, धर्म, जाति,लिंगभेद के आधार पर सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने ,घर में घुस कर चोरी,रंगदारी, धोखाधड़ी, सम्पत्ति, बेईमानी, आपराधिक धमकी और जालसाजी जैसे  मामले दर्ज़ हैं।नीतीश के वर्तमान 29 सदस्यीय मंत्रिमंडल का हाल-
👉मंत्रिमंडल में 22(76%)मंत्रीयों पर आपराधिक मामले में केस दर्ज़ है।जिनमें से 9 पर जघन्य अपराध के आरोप हैं।जबकि पिछली सरकार में 19(68%) मंत्रियों पर आरोप थे।
👉मंत्रिमंडल में 21(76%) करोड़पति,जबकि पिछली सरकार में22(79%)थें।
इस सरकार में सबसे ज़्यादा और सबसे कम सम्पत्ति वाले मंत्री भाजपा के ही हैं।जिनके पास सबसे ज़्यादा सम्पत्ति है,वो हैं लखीसराय से भाजपा विधायक विजय कुमार सिन्हा।इनके पास 15.64 करोड़ की सम्पत्ति है।इनकी चल सम्पत्ति 9,81,72,626 और अचल सम्पत्ति 5,82,38,000 है।
इसी सरकार में सबसे कम सम्पत्ति वाले हैं मंगल पाण्डेय,जो कि भाजपा से एमएलसी हैं।इनके पास अचल सम्पत्ति है 0 और चल सम्पत्ति है 49,93,582।
👉इस मंत्रिमंडल में एक महिला मंत्री है,जबकि पिछली सरकार में दो महिला मंत्री थी।

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

कुदरत और राजनीति की मार झेल रहा है गुजरात।

देश के चार राज्य बारिश और बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित है।उनसे में एक राज्य है गुजरात।इस राज्य के कई ज़िले बारिश और बाढ़ से भयंकर रूप से प्रभावित है।मीडिया रिपोर्ट्स के मुताब़िक बनासकांठा और पाटन ज़िले के गांव ज़्यादा प्रभावित है।केन्द्र और राज्य सरकार के साझा सहयोग से राहत और बचाव कार्य ज़ारी है।SEOC यानि State Emergency operation center के रिपोर्ट के मुताब़िक बाढ़ से अबतक बनासकांठा में 61 और पाटन में सात लोग समेत 218 लोगों प्राकृतिक आपदा की वज़ह से मौत हो गई है।
लगातार हो रही बारिश से उत्पन्न हुई बाढ़ से 4.5 लाख़ लोग प्रभावित है।इसमें से अबतक 39000 लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया गया है।वायुसेना, राष्ट्रीय और राजकीय आपदा मोचन बल के सहयोग से पिछले हफ़्ते 11400 लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया।लगातार हो रही बारिश से बचावकर्मियों को काफ़ी मुश्किलों का सामना कर रहा है।लेकिन मुश्किल हालात के बावजूद अपने कर्तव्य का ईमानदारी से निर्वाह कर रहें हैं।
ऊधर गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी भी बनासकांठा और पाटन ज़िले में डेरा डाले हुए।रूपानी नें बताया की पाटन के 87 छतिग्रस्त सड़कों में से 58 सड़कों का मरम्मत कर दिया गया है और 153 चिकित्सा शिविर लगाये गये हैं।इण्डिया टुडे से बातचीत में रिलीफ़ कमांडर एजे शाह ने कहा कि आपदाग्रस्त इलाकों में राहत एंव बचाव का कार्य अब भी ज़ारी है और उम्मीद है मरने वालों की संख्या में इज़ाफ़ा नही होगा।
आपदा से इतर गुजरात राजनीतिक समस्या से भी जूझ रहा है।8 अगस्त को होने वाले राज्यसभा चुनाव में सिर्फ़ एक व्यक्ति को जिताने के लिए,कांग्रेस ने अपने 42 विधायकों को गुजरात से 1663.7 किमी दूर बैंगलोर के ईगलटोन रिसॉर्ट पहुंचा दिया है।इन 42 विधायकों में वो भी विधायक शामिल हैं,जिनका इलाका जलमग्न है।आपदाग्रस्त इलाके के विधायकों के लिए ये सबसे मुफ़ीद वक़्त था,पीड़ित लोगों की सहायता कर अपने और अपने पार्टी की विश्वसनीयता बहाल करने की।वो भी एक ऐसे वक़्त में जब देश के मात्र 6% आबादी पर कांग्रेस का शासन रह गया है।इन विधायकों को ये भी सोचना चाहिए था कि वो दुबारा वोट आधार पर मांगने जाएंगे?
रिसॉर्ट की वेबसाइट के मुताब़िक एक दिन के खाने और रहने का किराया न्यूनतम 7500 है।मीडिया रिपोर्ट के मुताब़िक इस रिसॉर्ट में एक विधायक ने अपने 12 साल के बेटे के जन्मदिन के अवसर पर 50 किलो का केक मंगवाया,साथ अॉर्केस्टा के साथ कॉकटेल डिनर पार्टी का आयोजन भी आयोजन किया।मगर आठ लोगों ने ही मंदिरापान किया।गुजरात वैसे भी ड्राई स्टेट है।
इन सब के बीच,एक तरफ़ जिस व्यक्ति को राज्यसभा में पहुंचाने के लिए विधायकों को परमानंद की प्राप्ति कराई जा रही है,उस व्यक्ति को ख़ुद बाढ़ प्रभावित इलाकों में जाना पड़ा।सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल(राज्यसभा उम्मीदवार) और अशोक गहलोत ने बनासकांठा इलाके का दौरा किया और पटेल ने अपने दौरे की फ़ोटो ट्वीट करते हुए, राज्य सरकार के राहत एवं बचाव कार्य की आलोचना करते हुए कहा की,इसकी रफ़्तार बहुत ही धीमी है।वहीं दूसरी तरफ़ राज्यभा में गुलाम नबी आज़ाद ने भी इस मुद्दे को उठाया।पटेल और गहलोत के बाद,बाढ़ प्रभावित इलाकों में केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी भी गई।बीजेपी ने कांग्रेसी विधायकों के बैंगलोर जाने को मुद्दा बनाया है।केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके विधायक मौज-मस्ती कर रहे हैं,जबकि भाजपा के विधायक बाढ़ प्रभावित लोगों को राहत मुहैया कराने में व्यस्त हैं।उन्होंने आगे कहा कि गुजरात कांग्रेस के नेता बेंगलुरु में भाजपा पर आरोप लगा रहे हैं।यह उल्टा चोर कोतवाल को डांटे वाली बात हो गई।यदि उनके विधायक ख़ुद उन्हें छोड़कर आकर रहे हैं,तो इसका हमसे कोई लेना देना नही है। 30 जुलाई को कांग्रेस नेता शक्ति सिंह गोहिल ने रिसॉट में अपने सभी विधायकों के साथ प्रेस कॉफ्रेंस कर बताया कि हमारे विधायक यहां मौज-मस्ती करने नही आए हैं,बल्कि लोकतंत्र को बचाने आए हैं।भाजपा उनके विधायकों को धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल का इन्हें ख़रीदने की कोशिश कर रही है। गुजरात में कांग्रेस के कुल 57 विधायक थे, जिनमे से 6 ने पिछले दो दिनों में इस्तीफ़ा दे दिया है।उनमें से 3 ने 28 जुलाई को भाजपा का दामन धाम लिये। 7 अन्य बेंगलुरु में ठहरे विधायकों के समूह में शामिल नही हैं।गोहिल ने उम्मीद जताई की वे अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनेंगे और कांग्रेस के ख़िलाफ़ वोट नही करेंगे। बीजेपी हमारे 22 विधायकों ख़रीदने की कोशिश कर रही है।लेकिन हमारे विधायक एकजुट हैं।कांग्रेस आजकल अपने नेताओं को 'अंतरात्मा की आवाज़' सुनने की बात कर रही है। राष्ट्रपति चुनाव में भी मीरा कुमार ने अंतरात्मा की आवाज़ सुनने की बात कही थी। गोहिल को जब अपने विधायकों पर इतना ही भरोसा है तो विधायकों को बैंगलुरू क्यों पहुंचा दिए?

गुरुवार, 27 जुलाई 2017

.....और वो फ़र्श पर बैठ गए।

आज डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम की दूसरी पुण्य तिथि है।आज ही के दिन साल 2015 में,कलाम साहब हमलोग को छोड़ कर चले गए।भारत माता के इस सपूत का अचानक से हम सब को छोड़ के चला जाना अपूर्णीय छति है।अब जब आज वो हमारे बीच नही होते हुए भी हमारे बीच रहते हैं,सिर्फ़ अपने कर्मों की वज़ह से।ऐसे ही लोगों को देखकर कभी-कभी गर्व भी होता है और डर भी लगता है कि ये ना होते तो कैसा होता हमारा देश।कलाम साहब एक किताब थें,जिसका हर पन्ना आपको बेहतर इंसान बनाता है।वो अपनी प्रेरणादायी लेखन और सुवचन के कारण अब भी हमारे बीच हैं।ऐसा ही कुछ वाक्य मैं आपके साथ साझा कर रहा हूं।
कलाम साहब,जब वो राष्ट्रपति थें तो उनके कार्यकाल के अन्तिम दिनों में उनको रामनाथ गोयनका पुरस्कार कार्यक्रम में बुलाया गया ।पुरस्कार वितरण के बाद इस बात पर बहस होने लगी की 'क्या अच्छी पत्रकारिता बुरा व्यवसाय है?बहस का नतीज़ा आज़ तक तो नही निकला,ना निकलेगा।मंच पर उपस्थित राजदीप सरदेसाई ने कलाम साहब को सलाम और बाय-बाय सर कहा।इसी मंच पर ही उपस्थित बरखा दत्त ने कहा-"राष्ट्रपति जी एन राम आपकी ही बातों का जवाब दे रहें हैं,सुनते जाइए।कलाम साहब लौटते हैं और मंच पर पालथी मार कर बैठ जाते हैं।एन राम और उनके बीच बहस होती है कि विकास कैसे हो?बाद में कलाम ये कहकर चलते बने की इस पर बहस ज़रूर कीजिए,लेकिन ध्यान रखिए कि लोगों को ग़रीबी रेखा से कैसे ऊपर लाया जाए।बात क्या हुई ये महत्वपूर्ण नही है,एक राष्ट्रपति का इस तरह फ़र्श पर बैठ जाना सबको हैरान कर गया।
अब आगे उनकी बातों को शब्दसह लिख रहा हूं।जब कलाम साहब बोलने लगे तो सब लोग चुपचाप उन्हें सुनने लगे।उन्होंने ने एन राम से कहा-
"No,mister Ram.I don't want to take any of ur agenda.you got an agenda,ur meeting ok.but the agenda what I have suggest that,you can calibrate what is the National development?That is the 2 hundred and 20 million people on below poverty line.so how do u bring them up?So that is the agenda.there may be many development going on to agriculture to any subject.but agenda is very clear.2 hundred and 20 million people of below poverty line.how do you live them up?What contribution you make?If u want to economic development of the nation is not a end of it.i have define it.National prosperity is that equal to A+B+C।
A-Gdp that the economic development.
B is 2 hundred 20 million people,how year lifting up. every year reduce the below poverty line and third
C is that,no body talked about,that is value system.value system comes from 200 million house are there.how many houses are joint family?How many of u like joint family ?Lift ur hand.so u promote such type of thing."
ये कलाम साहब का कथन था।अन्त के 5 पंक्ति को दुबारा पढ़िये।उन्होंने वहां उपस्थित लोगों से पूछा कि आप लोगों में से कितने लोग सम्मिलित परिवार में रहना चाहते हैं,हाथ उठाये।हाथ उठाने की औसत को देखकर मैं हैरान हो गया।
                                   तो ऐसे थे हमारे कलाम साहब।

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

दो भीड़-अन्तर बस कृत्य का।

"I don't think it(hate crime) is new in India.it is feudal in nature.Today they shake the conscience.you can't say lynching or hate crime are something new.I think they are over hyped and over reported."
ये कहना है उस मंत्रालय के सचिव का,जिसकी ज़िम्मेदारी देश में सुरक्षा,शान्ति और सौहार्द बनाए रखने की है।राजीव महर्षि का ये बयान मुझे शोध के दरमयान मिली,जो 25 जून 2017 को India today की वेबसाइट पर छपी है।महर्षि के इस बयान से कई लोग सहमत और असहमत हो सकते हैं।मेरी जो असहमती है,जहां तक मैं उनके बयान को समझ पा रहा हूं।लाचारी और बेबसी से भरा ये बयान बता रहा कि भीड़ के द्वारा की गई हत्या से इनको कोई फ़र्क नही पड़ता है।ये बात सही है कि भीड़ के द्वारा किसी की हत्या कर देना कोई नई बात नही है।लेकिन क्या ये कह कर अपनी ज़िम्मेदारी से किनारा करना कैसे उचित है?मीडिया को दोषी ठहराना फ़ैशन हो गया,जो उन्होंने भी किया।उन्होंने कहा कि भीड़ के द्वारा की गई हत्या को मीडिया ज़्यादा प्रचारित और रिपोर्ट कर रही है।महर्षि साहब को ये बात कहने से पहले सोचना चाहिए कि मीडिया क्यों रिपोर्ट कर रही है? क्या ऐसी घटनाएं नही हो रही है?या फ़िर मीडिया की रिपोर्ट से सरकार की छवि ख़राब होने की चिन्ता है?महर्षि साहब,हत्या के कारण कुछ भी हो सकते हैं लेकिन ये कहना कि मीडिया ज़्यादा रिपोर्ट कर रही है,बिल्कुल अनुचित है।आप अपनी ज़िम्मेदारी निभाइए और मीडिया को अपनी ज़िम्मेदारी निभाने दीजिए।हाल ही में इंण्डिया स्पेण्ड ने न्यूज़ रिपोर्ट के आधार पर बताया कि साल 2017 के पहले 6 महीने में गाय को लेकर 20 हमले हुए,जो साल 2016 से 75% ज़्यादा है।यह आंकड़ा अब तक के सबसे ख़राब साल 2010 से भी ज़्यादा है।
भीड़ के अलग-अलग स्वरूप होते हैं।लेकिन जिस भीड़ की अब चर्चा हो रही है वो है हिंसक भीड़।जो कुछ लोग मिलकर शक और अफ़वाह के आधार पर किसी की हत्या करने के लिए तैयार करते हैं।जुनैद और मोहम्मद अयुब पंडित इसका उदाहरण हैं।राजनीति से प्रेरित इन कुछ लोगों की वज़ह से कोई धर्म या जाति बदनाम हो जाता है।मीडिया को भी ऐसी घटनाओं को रिपोर्ट करते वक्त ख़ास सावधानी बरतनी चाहिए, जिससे की किसी को किसी के प्रति नफ़रत पैदा ना हो।मीडिया के गलत रिपोर्टिंग का ताज़ा मामला जुनैद की हत्या है।मुझे जहां तक याद है कि उसके भाई ने घटना के कुछ ही घंटों बाद कह दिया था कि झगड़ा सीट के लिए हुआ था।लेकिन मीडिया संस्थानों नें ज़बरदस्ती बीफ़ का मामला बताकर अपनी टीआरपी बढ़ाई।दर्शकों को ख़ास कर ऐसी ख़बरों की टीआरपी के खेल से बचना चाहिए और मीडिया के शुरुआती रिपोर्ट से कोई धारणा तैयार नही करना चाहिए।सरकारी रिपोर्ट का इन्तजार करना चाहिए।जब भी कोई घटना घटती है,ख़ासकर गाय को लेकर तो विपक्षी दलों के नेता समेत सरकार विरोधी लोग ये कहते हैं कि ये सब केन्द्र सरकार की सह पर हो रहा है।लेकिन मुझे जहां तक याद है,जब से नरेंद्र मोदी पीएम बने हैं,कई बार राज्य सरकारों से कह चुके हैं कि ऐसी घटनाओं पर सख़्त कर्रवाई करें।कानून-व्यवस्था राज्य का मामला होता है।ऐसे में ये राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी होती है कि ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगायें और दोषियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करें,ताकि दुबारा किसी की हिम्मत ना हो।अब सवाल ये है कि पीएम के बार-बार कहने पर भी राज्य सरकारें कार्रवाई क्यों नही करती है?सबसे हैरानी की बात ये है कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी हत्या को लेकर कोई अलग से कानून नही है।
अब मैं शोध के आधार पर कुछ उदाहरण दे रहा हूँ,उन लोगों के लिए जिनके दिमाग़ में ये बात साजिश के तहत भरी जा रही है कि सिर्फ़ हिन्दुओं द्वारा मुसलमानों पर अत्याचार किया जा रहा है-
▶देश की राजधानी दिल्ली के विकासपुरी इलाके में 15 लोगों की भीड़ जिसको नासिर लीड कर रहा था,ने डॉक्टर पंकज नारंग को रॉड और हॉकी स्टिक से,उसके पत्नी-बच्चे के सामने तब तक मारा जब तक नारंग ने दम नही तोड़ दिया।
▶कोयम्बटूर के फ़ारूक जिसकी ईश्वर में कोई आस्था नही था,उसी के बचपन के साथी ने उसकी एक फ़ेसबुक पोस्ट की वज़ह से हत्या कर दी।
▶एक हिन्दू रेल पैसेंजर को मुस्लिम युवकों ने सीट विवाद में पीटकर मार डाला।
▶एक दलित युवक को मुस्लिमों की भीड़ ने इसलिए पीटकर मार डाला,क्योंकि वो एक मुस्लिम लड़की से प्यार करता था।
▶झारखंड में भीड़ ने कुछ हिन्दुओं और मुसलमानों को बच्चा चोरी के शक में पीट-पीटकर मार डाला।
▶हाल ही में दिल्ली में 15-20 युवाओं की भीड़ ने एक रिक्शा चालक को पीट -पीटकर मार डाला क्योंकि उसमें किसी एक को चालक ने एक दिन पहले खुले में पेशाब करने से मना किया था।
                                 उपरोक्त उदाहरण से क्या ये साबित हो रहा है कि सिर्फ़ हिन्दु ही मुसलमानों पर हमला कर रहें हैं?ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं,जो इंटरनेट पर मौजूद है।जिसको किसी धर्म के ख़िलाफ़ धारणा तैयार करने से पहले ज़रूर देखिए।किसी भी तरह के हिंसा का कोई समर्थन नही करता है,चाहे वो गाय को लेकर हो या किसी अन्य कारण से।
                                   एक भीड़ जो हत्या करती है,दूसरी भीड़ जो हत्यारे भीड़ के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती।हत्यारे भीड़ के ख़िलाफ़ 28 जून को #Notinmyname अभियान के तहत देशभर के लोग सड़क पर निकले थे।जिनका कहना था कि सरकार भीड़ द्वारा की जा रही हिंसा के ख़िलाफ़ स़ख्त कार्रवाई करे।इस प्रदर्शन में ऐसा नही था कि किसी एक ख़ास धर्म या जाति के थे।
                                   एक बात जो मुझे बहुत दुखी करती है वो ये है कि जब भी कोई घटना घटती है तो फेंक यूनिवर्सिटी के कुछ लोग सक्रिय हो जाते हैं और हिन्दू-मुसलमान करने लगते हैं।एक दूसरे के प्रति नफ़रत फ़ैलाने वाले मैसेजेस भेजने लगते हैं।ऐसे लोगों से मेरी गुज़ारिश है कि आप ऐसा ना करें।आपने जो पढ़ाई के दरमयान'सर्व धर्म सम्भाव, जियो और जिने दो,हमें एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए,मनुष्य एक सामाजिक प्राणि है'जैसे वाक्यों को राजनीति से प्रेरित होकर क्यों महत्वहीन बना रहे हो?

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

सलीम शेख को मेरा भी सलाम!

दफ़्तर से घर को लौट रहा हूं,मेरे ऊपर उदासी का पहरा है।कुछ लिख़ने का तो मन नही कर रहा है,फ़िर भी लिख़ रहा हूं,वो इस ख़्याल में की आपके साथ अपनी वेदना को साझा कर रहा हूं।
बीती रात तकरीबन 08:30 बजे अमरनाथ यात्रियों पर अन्नतनाग में हुए आतंकी हमले के बारे में तकरीबन हर पहलूओं की ज़ानकारी मिल ही गई होगी।क्योंकि टीवी पर सुबह से ही इस ख़बर के हर एक पहलू पर बात हुई है।बस चालक सलीम शेख की वीरतापूर्ण कर्तव्य निवाह को देखते हुए कई लोग दो समुदायों की सौहार्दता का मिशाल दे रहें हैं,तो कई लोग उनकी वीरता को सलाम कर रहें,लेकिन कुछ लोग इन सब बातों से इनकार कर रहें हैं।इनकार करने वाले तर्क दे रहें हैं कि सलीम ने अपनी जान बचाने के लिए गाड़ी को तेज़ी से भगाई।इन सब बातों से इतर हिन्दुस्तान के लोग सलीम समेत उनके परिवार में और  खुशियां आए,इसकी बात कर रहें हैं। इसी ख़बर से जुड़ी कुछ बातें मैं आपसे साझा कर रहा हूँ,जो इस प्रकार है-
👉अमरनाथ यात्रा को लेकर हमेशा सरकारें कई तरह के सुरक्षा इन्तजामात करती है।जैसे कि सेना के अलावा इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज की भी मदद लेती है।इस बार तो ड्रोन कैमरे से भी निगरानी हो रही थी।फ़िर ये इतना बड़ा हादसा कैसे हो गया?
👉मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक़ आईबी ने कम से कम 50 बार ,जिस गाड़ी पर उसकी सूचना दी गई।और आगे भी आतंकी हमले की आशंका जताई जा रही है।
👉जिस गाड़ी पर हमला हुआ उसके चालक सलीम शेख को वीरता पुरस्कार से नवाज़ने के लिए,गुजरात के सीएम विजय रूपानी केन्द्र सरकार से सिफ़ारिश करने की बात कही।
👉बकौल सलीम,बाबा बर्फ़ानी के दर्शन करने जाते वक़्त कोई तकलीफ़ नही हुई।दर्शन बहुत अच्छे से हुए।लौटते वक्त ऐसा हादसा हो गया।लेकिन बाबा और मालिक ने हिम्मत दी तो निकल गए। हमले से लेकर अस्पताल तक तो मिलट्री वालों ने बहुत सहयोग किया।लेटकर गाड़ी चलाना आसान नही था,लेकिन बाबा की कृपा और  मालिक ने बहुत हिम्मत दिया।पुरस्कार वगैरह की बात तो फ़िलहाल नही कर सकता,क्योंकि मेरे सामने सिर्फ़ अभी वही नज़ारा है।मेरे यात्रियों को मारने वालों को जब सेना मारेगी ना,तब खाना अन्दर जाएगा और दिल को तसल्ली होगी।
👉बकौल सलीम की पत्नी, उनके बेटे के कान की कॉपरेशन हुई है,जिसकी वज़ह से वो सलीम को बार-बार जाने से रोकता रहा।हमलोगों ने भी कई बार रोका ।लेकिन वो(सलीम) ये बात बोले कि 'सवारी लोग ना जाने को बोल रहा है, वो लोग(यात्री) मेरे बिना नही जाएगा।इसलिए मुझे जाना पड़ेगा।' सलीम पिछले 8 साल से उनलोगों को बाबा बर्फ़ानी के दर्शन के लिए ले जाता है।
👉बकौल सलीम की मां,ख़ुदा ने हमें एक साथ बनाया है और एक साथ रहने के लिए बनाया, फ़िर ऐसा क्यों करतें हैं।एक साथ रहो ना मिलजुल कर।
                                 बहरहाल इस हमले को लेकर कई सवाल हैं,जिसका ज़वाब बीतते वक़्त के साथ मिलता रहेगा,तो कुछ सवालों का नही भी मिलेगा।
मेरी पीड़ा ये है कि एक पत्रकार जो अमरनाथ यात्रा की तैयारियों को लेकर कई ख़बरों को लिखता होगा,तमाम तैयारियों के बारे में जैसे श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए फ़लां ज़गह इतने,फ़लां ज़गह इतने जवान तैनात किए गये हैं।फ़लां ज़गह ड्रोन और फ़लां इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज़ से सुरक्षा के कड़े इन्तजामात किए जा रहें हैं।सुरक्षा के इतने इन्तजामात के बारे में सुन-सुनकर एक तरीके वो किसी भी ख़तरे की आशंका से बाहर निकल जाता होगा,और जब वो अचानक इस तरीके की दिल दहलाने वाली घटना के बारे में सुनता होगा,तो उसपे क्या बीतती होगी?

बुधवार, 24 मई 2017

हमले की निन्दा महज औपचारिकता सी लगती है!

कल सुबह जैसे ही दफ़्तर पहुंचा, चैनल में लगे बड़े-बड़े टीवी स्क्रीनों पर,मैनचेस्टर एरीना में हुए आत्मघाती हमले में बेतहाशा इधर-उधर भागते छोटे-2 बच्चे,बड़े-बुजुर्गों की तस्वीरें और आपातकालीन वाहनों की शायरन ने मुझे सकते में डाल दिया।मन ही मन हमले में ज़्यादा क्षति ना हुई हो,को सोचते हुए आगे बढ़ा।बीतते समय के साथ हमले से जुड़ी जानकारियां सामने आने लगी।
टीवी रिपोर्ट के मुताबिक मैनचेस्टर एरीना में एक कनसर्ट में अमेरिकी पॉप सिंगर और धारावाहिक की कलाकार एरीयाना ग्रांडे के कार्यक्रम में हुए 2 आत्मघाती हमले में करीब 22 लोग मारे गये और 59 लोग ज़ख्मी हुए।
हमले को ब्रिटिश पीएम थेरेसा मे ने कायरना हरकत बताते हुए कहा कि गम्भीर ख़तरा बना हुआ है और आतंकवादी हमले की सम्भावना बनी हुई है।
हमले को लेकर हमारे देश के भी पीएम नरेन्द्र मोदी ने ट्वीट कर 'निन्दा और सम्वेदना' वाली रश्म अदा की।वैसे पीएम के इस ट्वीट के बाद,कई लोगों ने पीएम से झारखंड में कथित बच्चा चोरों को पुलिस के सामने पीट-पीटकर मार देने पर सवाल पूछा।
जब से होश सम्भाला हूं,एक ही बात सुनता आ रहा हूं कि आतंकवाद की समस्या से कई देश जूझ रहें हैं।इस समस्या से निपटने के लिए विश्व के शक्तिशाली देशों को एक साथ आने में क्या समस्या है?जिस तरीक़े से अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर एकजुटता की बात करते हैं,वैसे ही आतंकवादीयों को संरक्षण देने वाले देशों को सबक सिखाने में क्यों नही जुट जाते हैं?अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर 'आतंकवाद से निपटने के लिए एक साथ आना होगा' वाली बात औपचारिकता भर रह जाती है और जब भी कही हमला होता है सब ट्वीट के माध्यम से ज़िम्मेदारी निभा देते है।
बीते 21 मई को रियाद में दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने पहले विदेश यात्रा में,पाकिस्तान समेत 40 मुस्लिम देशों के प्रमुख के सामने कहा कि अपनी ज़मीन पर आतंकवाद को बढ़ावा ना दें।हम चाहते हैं कि मुस्लमान भी आपस मिलकर रहें।ट्रम्प का ये बयान उनकी छवि के उलट शान्ति का पैगाम माना चाहिए।

शुक्रवार, 5 मई 2017

भारतीय पत्रकारिता की रैंकिंग अच्छी नही है!

जहां भी स्वेच्छाधारी ताकतवर मॉडल की जीत हुई है,वहां मीडिया की आज़ादी घटी है।ऐसी जगहों पर पब्लिक रेडियो और टीवी स्टेशन प्रोपेगेण्डा के औज़ार बने।
यह कथन रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर संस्थान के महासचिव क्रिसटोफ़र डिलॉयर की है।इस संस्थान के एक रिपोर्ट ने हर साल की भांति इस साल भी विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर भारत समेत दुनिया के कई देशों में पत्रकारिता की गिरती साख के बारे में बताया है।रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर180 देशों की अन्तर्राष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन है,जो सूचना और पत्रकारिता के आज़ादी की वकालत करता है और प्रोत्साहित भी करता है।इसकी स्थापना रॉबर्ड मेनार्ड ने 1985 में की।इसका मुख्यालय पेरिस में है।
1993 से हर साल 3 मई को UNESCO द्वारा विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर अलग देशों में कार्यक्रम आयोजित किया जाता है,जिसमें मीडिया की अच्छाई और बुराइयों पर मंथन होता है।इस बार 1-4 मई को इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित किया गया था।इस बार का थीम- “critical minds for critical times:media’s role in advancing peaceful,just and inclusive societies.”था।भारत में अभी तक एक बार भी आयोजित नही किया गया है।
विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर ने शीर्षक मोदी के राष्ट्रवाद से ख़तरा नाम से एक रिपोर्ट ज़ारी कर कहा हैभारत में प्रेस की स्वतंत्रता को मोदी के राष्ट्रवाद से ख़तरा है और मीडिया डर की वज़ह से ख़बरे नही छाप रही है।भारतीय मीडिया में सेल्फ़ सेंसरशिप बढ़ रही है और पत्रकार कट्टर राष्ट्रवादियों द्वारा चलाये जा रहे अभियानों का शिकार बन रहें हैं।यहां ना उन्हे केवल गालियों का सामना करना पड़ता है,बल्कि शारीरिक हिंसा की धमकियां भी मिलती रहती है।कई बार सरकार के प्रति ज़्यादा आलोचनात्मक रवैया रखने वाले पत्रकारों को चुप कराने के लिए आईपीसी की धारा 124ए का भी इस्तेमाल किया जाता है,जिसके तहत राजद्रोह के लिए उम्रकैद की सज़ा तक दी जाती है।हालांकि अब तक किसी भी पत्रकार को राजद्रोह का दोषी नही ठहराया नही गया है,पर इससे सेल्फ़ सेंसरशिप को तो बढ़ावा मिल रहा है।वहीं सरकार ने विदेश से मिलने वाली फ़ंडिग के नियम कड़े किए हैं,ताकि वैश्विक स्तर पर भारतीय मीडिया को कम से कम प्रभावित किया जा सके।कश्मीर जैसे क्षेत्र जिन्हे प्रशासन संवेदनशील समझता है,वहां की कवरेज करना आज भी मुश्किल है।यहां पत्रकारों की सुरक्षा का कोई इन्तज़ाम नही है।जुलाई 2016 में कश्मीर में शुरु हुए विरोध प्रदर्शन के पहले दिन ही सेना द्वारा यहां इंटरनेट सेवा बन्द कर दी गई।यहां अक्सर इंटरनेट पर लगाम लगाया जाता है ताकि प्रर्दशनकारी आपस में बातचीत ना कर सके।ऐसा इसलिए भी किया जाता है ताकि मीडिया,स्थानीय पत्रकारों और सिटीजन जर्नलिस्ट आदि को रिपोर्ट से रोका जा सके।,स्थानीय मीडिया संस्थानों के लिए काम कर रहे पत्रकार अक्सर सैनिकों के शिकार बनते हैं,जिसके लिए उन्हें केन्द्र सरकार की मौन सहमति मिली रहती है। रिपोर्ट के इन सब बातों से आप कितने सहमत-असहमत हैं आप पर छोड़ते हुए आगे बढ़ता हूं। इस बार प्रेस की स्वतंत्रता और निर्भिक पत्रकारिता के हिसाब से 180 देशों में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत का स्थान 136वां है तो वहीं सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका का स्थान 43 वां।प्रथम.द्वतिय और तृतीय स्थान पर क्रमश: नॉर्वे,स्वीडन और फिनलैण्ड है।जहां ना तो मोदी है और ना ही ट्रम्प। पिछले साल के मुकाबले भारत की रैंकिग में 3 पायदान की गिरावट आई है।नरेन्द्र मोदी जब मई 2014 में प्रधानमंत्री बने तो भारत 140वें नम्बर था।उसके बाद 2015 में 136 और 2016 में 133वें नम्बर पर था।2010 में भारत इस सूची में 122वें नम्बर था और तब यूपीए सरकार सत्ता में थी।इसके बाद भारत 2014 तक 140वें नम्बर पर रहा।
16 नवम्बर 2016 को राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस के 50वें सालगिरह पर दिल्ली के विज्ञान भवन में पीएम मोदी ने पत्रकारिता की गिरती साख और चुनौतियों पर अपनी विचार को रखते हुए,पत्रकारिता जगत को एक समाज बताया और कहा कि पत्रकारिता की खामियों को दूर करने के लिए इस परिवार के मुखियाओं को एक साथ बैठ कर विचार करना चाहिए।प्रधानमंत्री की ये बात 100% दुरुस्त लगी।लेकिन आजकल के सनसनी पत्रकारिता और TRP के खेल में ऐसा सम्भव हो पाएगा?ये भी एक बड़ा सवाल है। आगे उन्होंने महात्मा गांधी के कथन अनियंत्रित लेखनी बहुत संकट पैदा कर सकती है,लेकिन लेखनी पर बाहर का नियंत्रण तो तबाह कर देगा का उदाहरण देते हुए कहा कि सरकारों को तो पत्रकारिता में ज़रा भी हस्तक्षेप नही करना चाहिए।ग़लतियों के आधार मीडिया का मूल्यांकन करना उचित नही होगा।पीएम मोदी की ये बात भी सही है।लेकिन सवाल ये है कि पत्रकारिता को लेकर इतना नेक इरादा रखने के बाद भी भारतीय पत्रकारिता की स्थिती इतनी ख़राब क्यों हैं?बहरहाल 3 मई को यानि विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के दिन पीएम मोदी ने ट्वीट किया हम स्वतंत्र और बहुमुखी पत्रकारिता का दृढ़ समर्थन करते हैं।यह लोकतंत्र के लिए ज़रुरी है। सोशल मीडिया के दौर में त्योहारों,जन्मदिन और गाहे-बगाहे ट्वीट करने वाले,केन्द्र से लेकर राज्य के मंत्रियों की ख़ामोशी बता रही है कि ये प्रेस की स्वतंत्रता का कितना समर्थन करते है।ख़ैर पीएम का ही एकमात्र ट्वीट उन पत्रकारों को हमेशा ऊर्जा देती रहेगी,जो सोशल मीडिया पर सत्ताधारी पक्ष के गुण्डों का सामना करते हुए लोगों के हित में सरकार से सवाल करते हैं।ये बात किसी से छिपी नही है कि ये गाली-दस्ता राष्ट्रवाद के नाम पर प्रश्नवाद को बेकार बताते हैं।सरकार से सवाल पुछने वाले पत्रकारों को सोशल मीडिया पर तरह-तरह की गालियां देते हैं।इन गाली-दस्तों को ख़ुद से सवाल पूछना चाहिए कि वो पत्रकारों के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करके क्या हासिल कर पाते हैं?ये बात सही है कि पेशेवेर दौर में पत्रकारिता में बहुत सारी खामिया हैं,लेकिन क्या उसका इलाज़ गाली है?पत्रकार को लोकतंत्र का प्रहरी माना जाता है।सरकार और उनके समर्थकों को ये समझना पड़ेगा कि जो पत्रकार सरकार की ख़ामियों को उज़ागर करता है,इसका मतलब ये नही होता है कि वह सरकार विरोधी होता है बल्किवो तो सरकार कमियों को उज़ागर करके उसे और मज़बूत बनने का मौका देता है।मीडिया और सरकार दोनो की ज़िम्मेदारी होती है कि मिलकर काम करते हुए,देश को विकास के पथ पर अग्रसर करे। ऐसे में क्या आपने कभी ख़ुद से सवाल पूछा है कि अगर आप ऐसे ही पत्रकारों को गाली देंगे तो पत्रकारिता की आनेवाली पीढ़ी पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

अन्त में, विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस इसलिए भी ज़्यादा महत्वपुर्ण है कि इस दिन सरकारों को मीडिया की स्वतंत्रता को याद दिलाता है और साथ उन पत्रकारों की शहादत को याद किया जाता है जो अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए जान गंवा दिए हैं।

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...