मंगलवार, 25 जुलाई 2017

दो भीड़-अन्तर बस कृत्य का।

"I don't think it(hate crime) is new in India.it is feudal in nature.Today they shake the conscience.you can't say lynching or hate crime are something new.I think they are over hyped and over reported."
ये कहना है उस मंत्रालय के सचिव का,जिसकी ज़िम्मेदारी देश में सुरक्षा,शान्ति और सौहार्द बनाए रखने की है।राजीव महर्षि का ये बयान मुझे शोध के दरमयान मिली,जो 25 जून 2017 को India today की वेबसाइट पर छपी है।महर्षि के इस बयान से कई लोग सहमत और असहमत हो सकते हैं।मेरी जो असहमती है,जहां तक मैं उनके बयान को समझ पा रहा हूं।लाचारी और बेबसी से भरा ये बयान बता रहा कि भीड़ के द्वारा की गई हत्या से इनको कोई फ़र्क नही पड़ता है।ये बात सही है कि भीड़ के द्वारा किसी की हत्या कर देना कोई नई बात नही है।लेकिन क्या ये कह कर अपनी ज़िम्मेदारी से किनारा करना कैसे उचित है?मीडिया को दोषी ठहराना फ़ैशन हो गया,जो उन्होंने भी किया।उन्होंने कहा कि भीड़ के द्वारा की गई हत्या को मीडिया ज़्यादा प्रचारित और रिपोर्ट कर रही है।महर्षि साहब को ये बात कहने से पहले सोचना चाहिए कि मीडिया क्यों रिपोर्ट कर रही है? क्या ऐसी घटनाएं नही हो रही है?या फ़िर मीडिया की रिपोर्ट से सरकार की छवि ख़राब होने की चिन्ता है?महर्षि साहब,हत्या के कारण कुछ भी हो सकते हैं लेकिन ये कहना कि मीडिया ज़्यादा रिपोर्ट कर रही है,बिल्कुल अनुचित है।आप अपनी ज़िम्मेदारी निभाइए और मीडिया को अपनी ज़िम्मेदारी निभाने दीजिए।हाल ही में इंण्डिया स्पेण्ड ने न्यूज़ रिपोर्ट के आधार पर बताया कि साल 2017 के पहले 6 महीने में गाय को लेकर 20 हमले हुए,जो साल 2016 से 75% ज़्यादा है।यह आंकड़ा अब तक के सबसे ख़राब साल 2010 से भी ज़्यादा है।
भीड़ के अलग-अलग स्वरूप होते हैं।लेकिन जिस भीड़ की अब चर्चा हो रही है वो है हिंसक भीड़।जो कुछ लोग मिलकर शक और अफ़वाह के आधार पर किसी की हत्या करने के लिए तैयार करते हैं।जुनैद और मोहम्मद अयुब पंडित इसका उदाहरण हैं।राजनीति से प्रेरित इन कुछ लोगों की वज़ह से कोई धर्म या जाति बदनाम हो जाता है।मीडिया को भी ऐसी घटनाओं को रिपोर्ट करते वक्त ख़ास सावधानी बरतनी चाहिए, जिससे की किसी को किसी के प्रति नफ़रत पैदा ना हो।मीडिया के गलत रिपोर्टिंग का ताज़ा मामला जुनैद की हत्या है।मुझे जहां तक याद है कि उसके भाई ने घटना के कुछ ही घंटों बाद कह दिया था कि झगड़ा सीट के लिए हुआ था।लेकिन मीडिया संस्थानों नें ज़बरदस्ती बीफ़ का मामला बताकर अपनी टीआरपी बढ़ाई।दर्शकों को ख़ास कर ऐसी ख़बरों की टीआरपी के खेल से बचना चाहिए और मीडिया के शुरुआती रिपोर्ट से कोई धारणा तैयार नही करना चाहिए।सरकारी रिपोर्ट का इन्तजार करना चाहिए।जब भी कोई घटना घटती है,ख़ासकर गाय को लेकर तो विपक्षी दलों के नेता समेत सरकार विरोधी लोग ये कहते हैं कि ये सब केन्द्र सरकार की सह पर हो रहा है।लेकिन मुझे जहां तक याद है,जब से नरेंद्र मोदी पीएम बने हैं,कई बार राज्य सरकारों से कह चुके हैं कि ऐसी घटनाओं पर सख़्त कर्रवाई करें।कानून-व्यवस्था राज्य का मामला होता है।ऐसे में ये राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी होती है कि ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगायें और दोषियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करें,ताकि दुबारा किसी की हिम्मत ना हो।अब सवाल ये है कि पीएम के बार-बार कहने पर भी राज्य सरकारें कार्रवाई क्यों नही करती है?सबसे हैरानी की बात ये है कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी हत्या को लेकर कोई अलग से कानून नही है।
अब मैं शोध के आधार पर कुछ उदाहरण दे रहा हूँ,उन लोगों के लिए जिनके दिमाग़ में ये बात साजिश के तहत भरी जा रही है कि सिर्फ़ हिन्दुओं द्वारा मुसलमानों पर अत्याचार किया जा रहा है-
▶देश की राजधानी दिल्ली के विकासपुरी इलाके में 15 लोगों की भीड़ जिसको नासिर लीड कर रहा था,ने डॉक्टर पंकज नारंग को रॉड और हॉकी स्टिक से,उसके पत्नी-बच्चे के सामने तब तक मारा जब तक नारंग ने दम नही तोड़ दिया।
▶कोयम्बटूर के फ़ारूक जिसकी ईश्वर में कोई आस्था नही था,उसी के बचपन के साथी ने उसकी एक फ़ेसबुक पोस्ट की वज़ह से हत्या कर दी।
▶एक हिन्दू रेल पैसेंजर को मुस्लिम युवकों ने सीट विवाद में पीटकर मार डाला।
▶एक दलित युवक को मुस्लिमों की भीड़ ने इसलिए पीटकर मार डाला,क्योंकि वो एक मुस्लिम लड़की से प्यार करता था।
▶झारखंड में भीड़ ने कुछ हिन्दुओं और मुसलमानों को बच्चा चोरी के शक में पीट-पीटकर मार डाला।
▶हाल ही में दिल्ली में 15-20 युवाओं की भीड़ ने एक रिक्शा चालक को पीट -पीटकर मार डाला क्योंकि उसमें किसी एक को चालक ने एक दिन पहले खुले में पेशाब करने से मना किया था।
                                 उपरोक्त उदाहरण से क्या ये साबित हो रहा है कि सिर्फ़ हिन्दु ही मुसलमानों पर हमला कर रहें हैं?ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं,जो इंटरनेट पर मौजूद है।जिसको किसी धर्म के ख़िलाफ़ धारणा तैयार करने से पहले ज़रूर देखिए।किसी भी तरह के हिंसा का कोई समर्थन नही करता है,चाहे वो गाय को लेकर हो या किसी अन्य कारण से।
                                   एक भीड़ जो हत्या करती है,दूसरी भीड़ जो हत्यारे भीड़ के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती।हत्यारे भीड़ के ख़िलाफ़ 28 जून को #Notinmyname अभियान के तहत देशभर के लोग सड़क पर निकले थे।जिनका कहना था कि सरकार भीड़ द्वारा की जा रही हिंसा के ख़िलाफ़ स़ख्त कार्रवाई करे।इस प्रदर्शन में ऐसा नही था कि किसी एक ख़ास धर्म या जाति के थे।
                                   एक बात जो मुझे बहुत दुखी करती है वो ये है कि जब भी कोई घटना घटती है तो फेंक यूनिवर्सिटी के कुछ लोग सक्रिय हो जाते हैं और हिन्दू-मुसलमान करने लगते हैं।एक दूसरे के प्रति नफ़रत फ़ैलाने वाले मैसेजेस भेजने लगते हैं।ऐसे लोगों से मेरी गुज़ारिश है कि आप ऐसा ना करें।आपने जो पढ़ाई के दरमयान'सर्व धर्म सम्भाव, जियो और जिने दो,हमें एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए,मनुष्य एक सामाजिक प्राणि है'जैसे वाक्यों को राजनीति से प्रेरित होकर क्यों महत्वहीन बना रहे हो?

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

सलीम शेख को मेरा भी सलाम!

दफ़्तर से घर को लौट रहा हूं,मेरे ऊपर उदासी का पहरा है।कुछ लिख़ने का तो मन नही कर रहा है,फ़िर भी लिख़ रहा हूं,वो इस ख़्याल में की आपके साथ अपनी वेदना को साझा कर रहा हूं।
बीती रात तकरीबन 08:30 बजे अमरनाथ यात्रियों पर अन्नतनाग में हुए आतंकी हमले के बारे में तकरीबन हर पहलूओं की ज़ानकारी मिल ही गई होगी।क्योंकि टीवी पर सुबह से ही इस ख़बर के हर एक पहलू पर बात हुई है।बस चालक सलीम शेख की वीरतापूर्ण कर्तव्य निवाह को देखते हुए कई लोग दो समुदायों की सौहार्दता का मिशाल दे रहें हैं,तो कई लोग उनकी वीरता को सलाम कर रहें,लेकिन कुछ लोग इन सब बातों से इनकार कर रहें हैं।इनकार करने वाले तर्क दे रहें हैं कि सलीम ने अपनी जान बचाने के लिए गाड़ी को तेज़ी से भगाई।इन सब बातों से इतर हिन्दुस्तान के लोग सलीम समेत उनके परिवार में और  खुशियां आए,इसकी बात कर रहें हैं। इसी ख़बर से जुड़ी कुछ बातें मैं आपसे साझा कर रहा हूँ,जो इस प्रकार है-
👉अमरनाथ यात्रा को लेकर हमेशा सरकारें कई तरह के सुरक्षा इन्तजामात करती है।जैसे कि सेना के अलावा इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज की भी मदद लेती है।इस बार तो ड्रोन कैमरे से भी निगरानी हो रही थी।फ़िर ये इतना बड़ा हादसा कैसे हो गया?
👉मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक़ आईबी ने कम से कम 50 बार ,जिस गाड़ी पर उसकी सूचना दी गई।और आगे भी आतंकी हमले की आशंका जताई जा रही है।
👉जिस गाड़ी पर हमला हुआ उसके चालक सलीम शेख को वीरता पुरस्कार से नवाज़ने के लिए,गुजरात के सीएम विजय रूपानी केन्द्र सरकार से सिफ़ारिश करने की बात कही।
👉बकौल सलीम,बाबा बर्फ़ानी के दर्शन करने जाते वक़्त कोई तकलीफ़ नही हुई।दर्शन बहुत अच्छे से हुए।लौटते वक्त ऐसा हादसा हो गया।लेकिन बाबा और मालिक ने हिम्मत दी तो निकल गए। हमले से लेकर अस्पताल तक तो मिलट्री वालों ने बहुत सहयोग किया।लेटकर गाड़ी चलाना आसान नही था,लेकिन बाबा की कृपा और  मालिक ने बहुत हिम्मत दिया।पुरस्कार वगैरह की बात तो फ़िलहाल नही कर सकता,क्योंकि मेरे सामने सिर्फ़ अभी वही नज़ारा है।मेरे यात्रियों को मारने वालों को जब सेना मारेगी ना,तब खाना अन्दर जाएगा और दिल को तसल्ली होगी।
👉बकौल सलीम की पत्नी, उनके बेटे के कान की कॉपरेशन हुई है,जिसकी वज़ह से वो सलीम को बार-बार जाने से रोकता रहा।हमलोगों ने भी कई बार रोका ।लेकिन वो(सलीम) ये बात बोले कि 'सवारी लोग ना जाने को बोल रहा है, वो लोग(यात्री) मेरे बिना नही जाएगा।इसलिए मुझे जाना पड़ेगा।' सलीम पिछले 8 साल से उनलोगों को बाबा बर्फ़ानी के दर्शन के लिए ले जाता है।
👉बकौल सलीम की मां,ख़ुदा ने हमें एक साथ बनाया है और एक साथ रहने के लिए बनाया, फ़िर ऐसा क्यों करतें हैं।एक साथ रहो ना मिलजुल कर।
                                 बहरहाल इस हमले को लेकर कई सवाल हैं,जिसका ज़वाब बीतते वक़्त के साथ मिलता रहेगा,तो कुछ सवालों का नही भी मिलेगा।
मेरी पीड़ा ये है कि एक पत्रकार जो अमरनाथ यात्रा की तैयारियों को लेकर कई ख़बरों को लिखता होगा,तमाम तैयारियों के बारे में जैसे श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए फ़लां ज़गह इतने,फ़लां ज़गह इतने जवान तैनात किए गये हैं।फ़लां ज़गह ड्रोन और फ़लां इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज़ से सुरक्षा के कड़े इन्तजामात किए जा रहें हैं।सुरक्षा के इतने इन्तजामात के बारे में सुन-सुनकर एक तरीके वो किसी भी ख़तरे की आशंका से बाहर निकल जाता होगा,और जब वो अचानक इस तरीके की दिल दहलाने वाली घटना के बारे में सुनता होगा,तो उसपे क्या बीतती होगी?

बुधवार, 24 मई 2017

हमले की निन्दा महज औपचारिकता सी लगती है!

कल सुबह जैसे ही दफ़्तर पहुंचा, चैनल में लगे बड़े-बड़े टीवी स्क्रीनों पर,मैनचेस्टर एरीना में हुए आत्मघाती हमले में बेतहाशा इधर-उधर भागते छोटे-2 बच्चे,बड़े-बुजुर्गों की तस्वीरें और आपातकालीन वाहनों की शायरन ने मुझे सकते में डाल दिया।मन ही मन हमले में ज़्यादा क्षति ना हुई हो,को सोचते हुए आगे बढ़ा।बीतते समय के साथ हमले से जुड़ी जानकारियां सामने आने लगी।
टीवी रिपोर्ट के मुताबिक मैनचेस्टर एरीना में एक कनसर्ट में अमेरिकी पॉप सिंगर और धारावाहिक की कलाकार एरीयाना ग्रांडे के कार्यक्रम में हुए 2 आत्मघाती हमले में करीब 22 लोग मारे गये और 59 लोग ज़ख्मी हुए।
हमले को ब्रिटिश पीएम थेरेसा मे ने कायरना हरकत बताते हुए कहा कि गम्भीर ख़तरा बना हुआ है और आतंकवादी हमले की सम्भावना बनी हुई है।
हमले को लेकर हमारे देश के भी पीएम नरेन्द्र मोदी ने ट्वीट कर 'निन्दा और सम्वेदना' वाली रश्म अदा की।वैसे पीएम के इस ट्वीट के बाद,कई लोगों ने पीएम से झारखंड में कथित बच्चा चोरों को पुलिस के सामने पीट-पीटकर मार देने पर सवाल पूछा।
जब से होश सम्भाला हूं,एक ही बात सुनता आ रहा हूं कि आतंकवाद की समस्या से कई देश जूझ रहें हैं।इस समस्या से निपटने के लिए विश्व के शक्तिशाली देशों को एक साथ आने में क्या समस्या है?जिस तरीक़े से अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर एकजुटता की बात करते हैं,वैसे ही आतंकवादीयों को संरक्षण देने वाले देशों को सबक सिखाने में क्यों नही जुट जाते हैं?अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर 'आतंकवाद से निपटने के लिए एक साथ आना होगा' वाली बात औपचारिकता भर रह जाती है और जब भी कही हमला होता है सब ट्वीट के माध्यम से ज़िम्मेदारी निभा देते है।
बीते 21 मई को रियाद में दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने पहले विदेश यात्रा में,पाकिस्तान समेत 40 मुस्लिम देशों के प्रमुख के सामने कहा कि अपनी ज़मीन पर आतंकवाद को बढ़ावा ना दें।हम चाहते हैं कि मुस्लमान भी आपस मिलकर रहें।ट्रम्प का ये बयान उनकी छवि के उलट शान्ति का पैगाम माना चाहिए।

शुक्रवार, 5 मई 2017

भारतीय पत्रकारिता की रैंकिंग अच्छी नही है!

जहां भी स्वेच्छाधारी ताकतवर मॉडल की जीत हुई है,वहां मीडिया की आज़ादी घटी है।ऐसी जगहों पर पब्लिक रेडियो और टीवी स्टेशन प्रोपेगेण्डा के औज़ार बने।
यह कथन रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर संस्थान के महासचिव क्रिसटोफ़र डिलॉयर की है।इस संस्थान के एक रिपोर्ट ने हर साल की भांति इस साल भी विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर भारत समेत दुनिया के कई देशों में पत्रकारिता की गिरती साख के बारे में बताया है।रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर180 देशों की अन्तर्राष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन है,जो सूचना और पत्रकारिता के आज़ादी की वकालत करता है और प्रोत्साहित भी करता है।इसकी स्थापना रॉबर्ड मेनार्ड ने 1985 में की।इसका मुख्यालय पेरिस में है।
1993 से हर साल 3 मई को UNESCO द्वारा विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर अलग देशों में कार्यक्रम आयोजित किया जाता है,जिसमें मीडिया की अच्छाई और बुराइयों पर मंथन होता है।इस बार 1-4 मई को इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित किया गया था।इस बार का थीम- “critical minds for critical times:media’s role in advancing peaceful,just and inclusive societies.”था।भारत में अभी तक एक बार भी आयोजित नही किया गया है।
विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर ने शीर्षक मोदी के राष्ट्रवाद से ख़तरा नाम से एक रिपोर्ट ज़ारी कर कहा हैभारत में प्रेस की स्वतंत्रता को मोदी के राष्ट्रवाद से ख़तरा है और मीडिया डर की वज़ह से ख़बरे नही छाप रही है।भारतीय मीडिया में सेल्फ़ सेंसरशिप बढ़ रही है और पत्रकार कट्टर राष्ट्रवादियों द्वारा चलाये जा रहे अभियानों का शिकार बन रहें हैं।यहां ना उन्हे केवल गालियों का सामना करना पड़ता है,बल्कि शारीरिक हिंसा की धमकियां भी मिलती रहती है।कई बार सरकार के प्रति ज़्यादा आलोचनात्मक रवैया रखने वाले पत्रकारों को चुप कराने के लिए आईपीसी की धारा 124ए का भी इस्तेमाल किया जाता है,जिसके तहत राजद्रोह के लिए उम्रकैद की सज़ा तक दी जाती है।हालांकि अब तक किसी भी पत्रकार को राजद्रोह का दोषी नही ठहराया नही गया है,पर इससे सेल्फ़ सेंसरशिप को तो बढ़ावा मिल रहा है।वहीं सरकार ने विदेश से मिलने वाली फ़ंडिग के नियम कड़े किए हैं,ताकि वैश्विक स्तर पर भारतीय मीडिया को कम से कम प्रभावित किया जा सके।कश्मीर जैसे क्षेत्र जिन्हे प्रशासन संवेदनशील समझता है,वहां की कवरेज करना आज भी मुश्किल है।यहां पत्रकारों की सुरक्षा का कोई इन्तज़ाम नही है।जुलाई 2016 में कश्मीर में शुरु हुए विरोध प्रदर्शन के पहले दिन ही सेना द्वारा यहां इंटरनेट सेवा बन्द कर दी गई।यहां अक्सर इंटरनेट पर लगाम लगाया जाता है ताकि प्रर्दशनकारी आपस में बातचीत ना कर सके।ऐसा इसलिए भी किया जाता है ताकि मीडिया,स्थानीय पत्रकारों और सिटीजन जर्नलिस्ट आदि को रिपोर्ट से रोका जा सके।,स्थानीय मीडिया संस्थानों के लिए काम कर रहे पत्रकार अक्सर सैनिकों के शिकार बनते हैं,जिसके लिए उन्हें केन्द्र सरकार की मौन सहमति मिली रहती है। रिपोर्ट के इन सब बातों से आप कितने सहमत-असहमत हैं आप पर छोड़ते हुए आगे बढ़ता हूं। इस बार प्रेस की स्वतंत्रता और निर्भिक पत्रकारिता के हिसाब से 180 देशों में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत का स्थान 136वां है तो वहीं सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका का स्थान 43 वां।प्रथम.द्वतिय और तृतीय स्थान पर क्रमश: नॉर्वे,स्वीडन और फिनलैण्ड है।जहां ना तो मोदी है और ना ही ट्रम्प। पिछले साल के मुकाबले भारत की रैंकिग में 3 पायदान की गिरावट आई है।नरेन्द्र मोदी जब मई 2014 में प्रधानमंत्री बने तो भारत 140वें नम्बर था।उसके बाद 2015 में 136 और 2016 में 133वें नम्बर पर था।2010 में भारत इस सूची में 122वें नम्बर था और तब यूपीए सरकार सत्ता में थी।इसके बाद भारत 2014 तक 140वें नम्बर पर रहा।
16 नवम्बर 2016 को राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस के 50वें सालगिरह पर दिल्ली के विज्ञान भवन में पीएम मोदी ने पत्रकारिता की गिरती साख और चुनौतियों पर अपनी विचार को रखते हुए,पत्रकारिता जगत को एक समाज बताया और कहा कि पत्रकारिता की खामियों को दूर करने के लिए इस परिवार के मुखियाओं को एक साथ बैठ कर विचार करना चाहिए।प्रधानमंत्री की ये बात 100% दुरुस्त लगी।लेकिन आजकल के सनसनी पत्रकारिता और TRP के खेल में ऐसा सम्भव हो पाएगा?ये भी एक बड़ा सवाल है। आगे उन्होंने महात्मा गांधी के कथन अनियंत्रित लेखनी बहुत संकट पैदा कर सकती है,लेकिन लेखनी पर बाहर का नियंत्रण तो तबाह कर देगा का उदाहरण देते हुए कहा कि सरकारों को तो पत्रकारिता में ज़रा भी हस्तक्षेप नही करना चाहिए।ग़लतियों के आधार मीडिया का मूल्यांकन करना उचित नही होगा।पीएम मोदी की ये बात भी सही है।लेकिन सवाल ये है कि पत्रकारिता को लेकर इतना नेक इरादा रखने के बाद भी भारतीय पत्रकारिता की स्थिती इतनी ख़राब क्यों हैं?बहरहाल 3 मई को यानि विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के दिन पीएम मोदी ने ट्वीट किया हम स्वतंत्र और बहुमुखी पत्रकारिता का दृढ़ समर्थन करते हैं।यह लोकतंत्र के लिए ज़रुरी है। सोशल मीडिया के दौर में त्योहारों,जन्मदिन और गाहे-बगाहे ट्वीट करने वाले,केन्द्र से लेकर राज्य के मंत्रियों की ख़ामोशी बता रही है कि ये प्रेस की स्वतंत्रता का कितना समर्थन करते है।ख़ैर पीएम का ही एकमात्र ट्वीट उन पत्रकारों को हमेशा ऊर्जा देती रहेगी,जो सोशल मीडिया पर सत्ताधारी पक्ष के गुण्डों का सामना करते हुए लोगों के हित में सरकार से सवाल करते हैं।ये बात किसी से छिपी नही है कि ये गाली-दस्ता राष्ट्रवाद के नाम पर प्रश्नवाद को बेकार बताते हैं।सरकार से सवाल पुछने वाले पत्रकारों को सोशल मीडिया पर तरह-तरह की गालियां देते हैं।इन गाली-दस्तों को ख़ुद से सवाल पूछना चाहिए कि वो पत्रकारों के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करके क्या हासिल कर पाते हैं?ये बात सही है कि पेशेवेर दौर में पत्रकारिता में बहुत सारी खामिया हैं,लेकिन क्या उसका इलाज़ गाली है?पत्रकार को लोकतंत्र का प्रहरी माना जाता है।सरकार और उनके समर्थकों को ये समझना पड़ेगा कि जो पत्रकार सरकार की ख़ामियों को उज़ागर करता है,इसका मतलब ये नही होता है कि वह सरकार विरोधी होता है बल्किवो तो सरकार कमियों को उज़ागर करके उसे और मज़बूत बनने का मौका देता है।मीडिया और सरकार दोनो की ज़िम्मेदारी होती है कि मिलकर काम करते हुए,देश को विकास के पथ पर अग्रसर करे। ऐसे में क्या आपने कभी ख़ुद से सवाल पूछा है कि अगर आप ऐसे ही पत्रकारों को गाली देंगे तो पत्रकारिता की आनेवाली पीढ़ी पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

अन्त में, विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस इसलिए भी ज़्यादा महत्वपुर्ण है कि इस दिन सरकारों को मीडिया की स्वतंत्रता को याद दिलाता है और साथ उन पत्रकारों की शहादत को याद किया जाता है जो अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए जान गंवा दिए हैं।

रविवार, 30 अप्रैल 2017

किसान-सरकार और समाज दोनों से लाचार है!


एक में तीन प्रारुप में जो तस्वीर आपके सामने पेश किया हूं,वो इसलिए की आप इन तस्वीर को थोड़ी देर गौर से देखिए और सोंचिए।उम्मीद है कि इन तीनों तस्वीरों को देखने के बाद आपके मन में कई सवाल पैदा हो रहे होंगे।वैसे ही मेरे भी मन में कई सवाल है,जिसको आपके साथ साझा कर रहा हूं।हर  एक बीतते दिन और तकनीकी युग में किसानों की समस्या काफ़ी गहराता जा रहा है।किसानों की इस पुरानी और व्यापक समस्याओं के लेकर दोषी कौन-कौन हैसरकार की नीतियां,किसानों पर की जानेवाली राजनीति,किसान खुद या इन तीनों के अलावा हम यानि आम जनता की करतूत।
अब बात करते हैं तस्वीरों की।पहली तस्वीर है साल-2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त की।जिसमें लिखा है “बहुत हुआ किसानों पर अत्याचार,अबकी बार मोदी सरकार।मतलब किसानों पर कोई अत्याचार नही होगा।राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के हवाले से 18 जुलाई 2015 को बिजनेस स्टैण्डर्ड ने ख़बर छापी,जिसमें बताया कि साल 2013 के मुकाबले 2014 में ज़्यादा किसानों और कृषि श्रमिकों ने हत्या की है।साल 2013 में 11,772 जबकि 2014 में 12,360।जनवरी 6,2017 को टाइम ऑफ इण्डिया में साल 2015 में किसानी से जुड़े 12,602 लोगों ने आत्महत्या की ख़बर छपी।इससे पहले साल 2004 में 18,241 किसानों ने आत्महत्या की है।यदि आप आकड़ों पर गौर करे तो पाएंगे कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद किसानी से जुड़े लोगों की खुदकुशी की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है।इसके कई कारणों में से एक सबसे महत्वपुर्ण कारण है प्राकृतिक पर बढ़ता मानवीय अत्याचार।मौसम विज्ञान के एक रिसर्च के मुताबिक 1950 से 89 के बीच 10 साल सूखा था।साल 2000 के बाद 2002,2004,2009,2014 और 2015 भी सूखा साल था।20 अप्रैल 2016 को बीबीसी ने एक रिपोर्ट छापी जिसमें बताया कि भारत सरकार के अनुसार भारत के 256 ज़िलों पर सूखे का असर है।हर चौथा आदमी सूखा पीड़ित है।सूखे का यह आंकड़ा समस्या की गंभीरता को तो बता ही रहा है,साथ ही यह भी बता रहा कि भौतिक सुख के लिए हम दिन-प्रतिदिन कितने लापरवाह होते जा रहें। इन आकड़ों में कितना सुधार हुआ है,कितना होगा ,कैसे होगा और कबतक होगा मालूम नही।लेकिन हमें खुद से भी सवाल पूछना होगा कि सिर्फ़ सरकारों की नीतियों की आलोचना से काम चल जाएगा या फ़िर हमें भी,पर्यावरण को लेकर अपने भीतर की लापरवाही के बारे में सोचना होगा?सभी सरकारों ने अपनी क्षमता के अनुसार किसानों के हित में काम किया है और वर्तमान सरकार भी कर रही है।आपकी नज़र में किसानों की समस्या का प्राथमिक कारण क्या है,मुझे नही मालूम।लेकिन मेरी नज़र में वनों की कटाई मुख्य कारण है,जिसको रोकना होगा।यदि पेड़ नही होगा तो बादल को कौन बुलाएगा?
दूसरी तस्वीर भारत के विकसीत राज्यों में से एक तमिलनाडु के किसानों की है।यहां की 40आबादी के जीविकोपार्जन का साधन कृषि है।तस्वीर में आप जिन किसानों को अजीबो-गरीब हरकत करते देख रहें है, वो प्राकृतिक आपदाओं और कावेरी जल समस्या का लगातार सामना करते आ रहें हैं।ख़राब मानसून के कारण 140 साल में इस बार सबसे कम बारिश हुई है।हम उत्तर भारतीयों के लिए तो अब जाके गर्मी शुरु हुई है,लेकिन वहां के मुख्यमंत्री ने जनवरी में ही राज्य को सुखा घोषित कर दिया था।जैसा कि आपने तस्वीर में देखा की किसान अर्द्ध मुंडन करा रहें है,कई नरमुंड पहने या फ़िर उसके सामने बैठे है या कोई मुंह में चुहा दबाये हुए है।इसके अलावा भी,यदि आप गूगल करेंगे तो पाएंगे कि महिलाएं अपनी चुड़ियां तोड़ रही हैं, पीएम नरेन्द्र मोदी का मुखौटा पहन कर,उनके सामने किसान फ़ांसी लगा रहा हैं।ये सब सारी तस्वीर आप ज़्यादा अख़बारों में देखा होगा,क्योंकि टीवी अभी योगी काल से गुज़र रहा है।हां इन किसानों की दो तस्वीरें टीवी में कुछ देर की लिए जिसमें पहला था रायसीनाहील के सामने नग्न प्रदर्शन करते हुए,तो दूसरा था मल-मूत्र पीते हुए।इन दोनों तस्वीर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया मेंं भूचाल आ गया।किसानों के ऐसी हरकतों की आलोचना करने लगे,बिना ये जाने की ये ऐसा क्यों कर रहें है।कईयों को मोदी सरकार की बदनामी का डर सताने लगा।कहने लगे कि ये सब प्रायोजित ड्रामा है।जो लोग इसको ड्रामा बता रहेे थें,उनको मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वो ग़लत थें।ड्रामा बताने वाले से मेरा सवाल है कि,क्या आपने सोचा कि ये ऐसी हरकत क्यों कह रहें थे?दरअसल उनके ऐसी हरकत के पीछे एकमात्र कारण था 'भाषा।' ये ना तो हिन्दी बोल सकते थे,ना ही अंग्रेजी।जिसकी वज़ह से ये अपनी बात केन्द्र सरकार के सामने रखने के लिए अलग तरीके से हरकत कर रहें थें।लेकिन इतना करने के बाद भी केन्द्र सरकार का एक भी मंत्री उनलोगों से मिलने क्यों नही गया?शुरुआत से ही बीजेपी का रुख़ साफ़ था कि इन किसानों बातों को नही सुनना है।12 अप्रैल को The new Indian express ने तमिलनाडु बीजेपी के रुख़ को छापा था। तमिलनाडु बीजेपी अध्यझ Tamilisai Sounderrajan ने योगी सरकार का उदारहण  देते हुए कहा था कि यहां किसानों की समस्या का निपटारा करने की ज़िम्मेदारी राज्य सरकार की ।हांलांकि मद्रास हाई कोर्ट भी राज्य सरकार को  फ़टकार लगा चुकी है।
अब बात करतें हैं तीसरे तस्वीर की।यह तस्वीर तमिल किसानों के लगभग 40 दिन के प्रदर्शन के बाद की है।जब ये किसान मुसीबतों से गुज़र रहें थें ,उसी के समय वहां की राजनीति भी मुसीबतों से गुज़र रही थी।पुर्व सीएम ओ. पनीरसेलवम की शासन में राज्य सुखा घोषित हुआ और इन किसानों से मिलने आए सीएम पलनीस्वामी।पीएम नरेन्द्र मोदी,वित्त मंत्री अरुण जेटली और गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात के बाद सीएम पलनीस्वामी  के आश्वासन के बाद,  इन किसानों ने 25 मई तक अपने आन्दोलन को ये कहते हुए समाप्त कर दिया कि यदि हमारी मांगे  पूरी नही हुई,तो हम फ़िर से आन्दोलन करेंगे। 
ये किसान केन्द्र से अपने कर्ज़ माफ़ी की मांग कर रहें हैं।इन किसानों का कहना है कि उनकी फ़सल कई बार आए सुखे और चक्रवात में बर्बाद हो चुकी है।किसानों ने उनलोगों को मिलने वाले राहत पैकेज पर भी पुनर्विचार करने की मांग की है।किसानों की यह भी मांग है कि उनको अगली साल के लिए बीज ख़रीदने दिए जाएं और हुए नुकसान की भरपाई की जाए। मद्रास हाई कोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार ने केन्द्र से 40,000 करोड़ की मांग की है,जिसमें से मात्र 4,000 करोड़ की स्वीकृति मिली है। 
                                   अन्त में मैं ये कहना चाहता हूं कि किसान जितना सरकार की नीतियों से लाचार है,उतना मानवीयकृत्यों से।किसानों की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि उनकी कोई सुनता नही है।सूखा सरकारों की देन नही है,बल्कि इंसानों की देन है।मुआवज़ा और राहत कार्य समस्याओं का समाधान नही है।इंसानो ने जितनी सिद्दत से सूखे की समस्या को कई सालों से मिलकर बुलाया है,इतनी ज़ल्दी नही जाएगा।


रविवार, 19 मार्च 2017

वादाख़िलाफ़ी ना करना सेवकों

5 राज्यों में लोकतंत्र का महापर्व शनिवार(11 मार्च)को समाप्त हो गया।पीएम नरेन्द्र मोदी के शब्दों में,इस महापर्व में मणिपुर,उत्तराखंड,गोवा,पंजाब और यूपी ने अपना राजकीय सेवक चुन लिया है।बीते दो शनिवार के बीच में गोवा को मनोहर पर्रिकर,उत्तराखण्ड को त्रिवेन्द्र सिंह रावत,पंजाब को कैप्टन अमरिन्दर सिंह,मणिपुर को एन बीरेन सिंह और यूपी को योगी आदित्यनाथ के रुप में सीएम रुपी सेवक मिल गया है।ये सभी राज्य इनके कार्यकाल में कितना विकास कर पाएंगे,ये आने वाला वक्त बताएगा।लेकिन जनता ने इस चुनाव में सत्ता गवां चुकी पार्टीयों को सबक तो सिखा ही दिया,साथ ही सत्ता हासिल कर चुकी पार्टीयों को भी संकेत दे दिया है कि सत्ता का गुरुर आप ना करेंगे।यूपी में सपा,पंजाब में अकाली+बीजेपी और उत्तराखण्ड में कांग्रेस की भारी पराजय ने बता दिया कि यहां कि जनता उनके शासन से खुश नही थें,साथ ही गोवा में बीजेपी और मणिपुर में कांग्रेस की सरकार होते हुए भी स्पस्ठ बहुमत ना मिलना भी ये बता रहा है कि वहां के लोग भी अपनी सरकार से खुश नही थें।भाषाई और भौगोलिक दूरी से लेकर तमाम संसाधनों के कारण दिल्ली से चलने वाली स्थानीय किन्तु राष्ट्रीय कहलाने वाले चैनलों की दुनिया में हमेशा की तरह मणिपुर को लोकतंत्र के महापर्व में भी प्रमुखता से जगह नही मिली,जिसके कारण वहां हो रही राजनीति हलचल की स्पस्ठ और पुर्ण जानकारी नही मिल पाई,जिससे पता चल सके की वहां के नेताओं की भाषाई स्तरता क्या है और जनता उनको कैसे देखती है।उम्मीद है बाकि 4 राज्यों में हुए चुनाव के बारे में तो बताने की ज़रुरत ही नही है।पीएम से लेकर सीएम और स्टार प्रचारक से लेकर फ़ायर ब्राण्ड नेताओं की बयानबाज़ी और बदजुबानी ही न्यूज़ चैनलों की टीआरपी में सहयोगी बनी।यह दौर अख़बारों और वेब पत्रकारिता करने वालों के लिए भी स्वर्णिम दौर रहा। खैर अब मैं चुनावी मोड से निकलकर घोषणा-पत्र में किए गए वादों पर,आपसे बतिया रहा हूं।इस लम्बे लेख का मकसद है,इन 5 राज्यों के सत्ताधारियों के वादों में से मुख्य वादों को सामने लाना।
पाचों राज्य में सत्ता हासिल कर चुकी पार्टीयों के घोषणा-पत्र को जब पढ़ रहा था तो एक बड़ी दिलचस्प जानकारी हासिल हुई वो ये कि जिस राज्य का घोषणा-पत्र था,उसका प्रमुख जारीकर्ता का संबंध उस राज्य के राजनीति से प्रत्यझ रुप से था ही नही बल्कि आयातित व्यक्ति था।जैसे- यूपी बीजेपी के घोषणा-पत्र के प्रमुख जारीकर्ता अमित शाह, वैसे ही पंजाब कांग्रेस के मनमोहन सिंह,उत्तराखण्ड बीजेपी के वित्तमंत्री अरुण जेटली और गोवा बीजेपी के महाराष्ट्र के सीएम देवेन्द्र फडनवीस और मणिपुर के विज़न डॉक्यूमेंट के जारीकर्ता थें गृहमंत्री राजनाथ सिंह।अब पांचों राज्यों में सत्ता पर काबिज़ हो चुकी पार्टियों द्वारा चुनावी दौर में किए गये वादों को भुलते हुए, सिर्फ़ घोषणा-पत्र में किए गए वादों में से प्रमुख वादों के बारे में बात कर रहा हूं। शुरुआत करने से पहले याद दिला दूं कि किसानों की समस्याएं,ग़रीबी और रोज़गार का मुद्दा समस्या कम,राजनीतिक विषय ज़्यादा हैं।यूपी,उत्तराखण्ड और पंजाब के घोषणा-पत्र में लैपटॉप, इंटरनेट डाटा और मोबाइल फ़ोन का जलवा रहा।
आइए शुरुआत करते हैं उत्तर प्रदेश से-
यहां के चुनाव में विकास की बातों को छोड़कर गदहा,श्मशान,बिजली,होली,दिवाली ईद,बाथरुम,कुत्ता,हिजड़ा वगैरह-वगैरह से संबंधित वाक्यों का बोलबाला रहा है। खैर हम बात करते हैं घोषणा-पत्र की।
बीजेपी अध्यझ अमित शाह ने घोषणा-पत्र लोक कल्याण संकल्प पत्र जारी करते अपने उद्देश्य ना गुंडा राज ना भ्रष्टाचार के तहत 45 दिनों के अंदर सभी गुण्डों और भू-माफ़ियाओं को जेल में बन्द करने,100% नौकरी में से युवाओं को 90%,लैपटॉप के हर माह 1जीबी मुफ़्त इंटरनेट डाटा,50% से ज़्यादा अंक हासिल करने वाले सभी विद्याधियों को स्नातक तक मुफ़्त शिक्षा,गरीब परिवार में हर बच्ची के जन्म पर 5000 रुपया,बिना उम्र सीमा के विधवाओं को 1000 रुपया पेंशन,आगामी पांच साल में हर घर में गैस और शौचालय की सुविधा के साथ 150 करोड़ रुपया कृषि के विकास में ख़र्च करने का वादा किया है।
अब बात करते हैं पंजाब की-
पंजाब का घोषणा-पत्र विज़नरी डॉक्यूमेंट दिल्ली से जारी करते हुए पुर्व पीएम मनमोहन सिंह ने कहा कि अकाली-बीजेपी के लूट,बुट और शुट की नीति के तहत 10 साल के कार्यकाल में बर्बाद हो चुकी राज्य को कैप्टन अमरिन्दर सिंह बचायेंगे।कैप्टन द 9 नुक्ते के तरह नशे की समस्या से जुझ रही पंजाब को 4 हफ़्ते के भीतर नशा मुक्त पंजाब के निर्माण का,यदि किसी को विश्वास नही हो तो स्टाम्प पेपर पर मुहर लगाकर देने का वादा किया था।सरकार गठन हो चुकी है,आने वाले 4 हफ़्ते में अमरिन्दर के इस फौलादी वादे का पता लग जाएगा।आगे उन्होंने अपने सहित अपनी विरादरी का ख़्याल ना रखते हुए वीआईपी कल्चर को समाप्त करने,आगामी 5 साल में 25-26 लाख़ युवाओं को रोज़गार देने और रोज़गार ना मिलने तक 2500 रुपये हर युवाओं को देने,बेघर दलितों और पिछड़ों को मुफ़्त में गृह उपलब्ध कराने का वादा किया है।
अब बात करते हैं उत्तराखण्ड की-
बीजेपी के स्टार प्रचारक और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने केन्द्र में भी अपनी सरकार होने का हवाला देते हुए कहा कि यदि उत्तराखण्ड में भी हमारी सरकार बनेगी तो यहां के लोगों को ज़्यादा फ़ायदा होगा।आगे उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य राज्य के अंतिम व्यक्ति का सम्पुर्ण विकास करना है।भ्रष्टाचार मुक्त सरकार,बेहतर शिक्षा और रोज़गार उपलब्ध कराने का वादा किया है।
अब बात करते हैं गोवा की-
यहां के घोषणा-पत्र को पढ़ते हुए बाकि राज्यों से बिल्कुल अलग लगा।  शिक्षा,रोज़गार और विकास तो मुख्य मुद्दा है ही,यहां का कैसिनो भी राजनीति का मुद्दा है।तमाम पार्टियों के उल्ट तत्कालीन सीएम लक्ष्मीकान्त पारसेकर ने कहा कि यदि कैसिनो वाले सभी कानूनी प्रक्रिया को पूरा करते हैं,तो उन्हें हम हटा नही सकते हैं।यदि ऐसा करेंगे तो वे न्यायालय में चैलेज करेंगे,जो सरकार के चेहरे पर जोरदार तमाचा होगा।महाराष्ट्र के सीएम देवेन्द्र फ़डनवीस ने घोषणा-पत्र ज़ारी करते हुए कहा कि पर्यटन के अलावा निवेश योग्य कारखानों, सुचना तकनीक और कृषि आधारित कार्य क्षेत्र का निर्माण करेंगे।
और अब बात करते हैं मणिपुर की-
यहां पर केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के साथ बीजेपी महासचिव राममाधव ने विज़न डॉक्यूमेंट-2017 जारी करते हुए यहां के लोगों को भाजपा को एकमात्र सहारा बताया।सभी को पेयजल,स्नातक तक महिलाओं को मुफ़्त शिक्षा,सभी बेघरों को घर देने का वादा किया है।साथ ही कहा कि क्षेत्रीय अखण्डता,संस्कृति और लोगों की सुरक्षा का वादा किया है।आगे उन्होंने राजमार्ग सुरक्षा बल के गठन पर जोर दिया।

                           अन्त में इन 5 राज्यों के जनता से यही कहना चाहता हूं कि सरकारी सेवाओं का लाभ उठाने के लिए अपनी तरफ़ से कोशिश कीजिए।

गुरुवार, 9 मार्च 2017

एग्जिट पोल:काल्पनिक खुशी और गम का !

'एग्जिट पोल:कही किसी के लिए खुशी तो कही किसी के लिए गम',वाले शो की झलक विभिन्न न्यूज़ चैनलों के माध्यम से आज आप सब ने देखा। करीब-करीब 5 घंटे तक चले ये शो,राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों को मतगणना से पहले काल्पनिक खुशी और गम प्रदान करने वाला था।आज जिन लोगों को खुशियां हाथ लगी है वो कम से कम 10 तारीख़ तक तो आन्नदित रह सकते है और जिनको गम हाथ लगी है,उनको बिल्कुल भी उदास रहने की ज़रुरत नही है।क्योंकि वास्तविक खुशी और गम का तो 11 तारीख़ को होने वाले मतगणना के बाद ही पता चलेगा।
एग्जिट पोल में ज़्यादातर बार देखा गया है कि मतगणना से उलट इसका फ़ैसला होता है।अपवाद की बात नही कर रहा हूं।एग्जिट पोल क्या है,कैसे काम करता है और क्यों किया जाता है?उम्मीद है बताने की ज़रुरत नही,क्योंकि ऐसा माना जाता है कि जिन 5 राज्यों में चुनाव हुए हैं वहां के ज़्यादातर मतदाता राजनीति में दक्षता हासिल होने का दावा करते हैं।फ़िर भी जिनको जानकारी नही है,उनकी जानकारी के लिए बता दूं कि यू-ट्यूब पर एग्जिट पोल के तमाम स्टिंग के विडियो पड़े हैं,उसको देख जानकारियां हासिल कर लें।मैंने भी इन्ही विडियोस और वरिष्ठों के बतकही से थोड़ी बहुत जानकारी हासिल किया है।
अब एग्जिट पोल के दिलचस्प बातों के बारे में आपसे बात करता हूं।यदि आपने पूरे एग्जिट पोल को गौर से देखा होगा तो पाया होगा कि कोई दल तो इसको सिरे से हीं खारिज़ कर देता,तो कोई दल जहां उसको कम या बहुमत हासिल नही होता है उसको मानने से इनकार कर देता और यदि इसी दल को कहीं बहुमत हासिल होता है तो उसको स्वीकारते हुए और अधिक मत हासिल करने की बात करता है।राजनीतिक पंडित भी इस बात को कहते हुए अनुमान लगाते हैं कि मतगणना के दिन ही वास्तविकता का पता चलता है।लगभग हर चुनाव में एग्जिट पोल करने वाली कई कम्पनियां आस्तित्व में आती है।

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...