रविवार, 30 अप्रैल 2017

किसान-सरकार और समाज दोनों से लाचार है!


एक में तीन प्रारुप में जो तस्वीर आपके सामने पेश किया हूं,वो इसलिए की आप इन तस्वीर को थोड़ी देर गौर से देखिए और सोंचिए।उम्मीद है कि इन तीनों तस्वीरों को देखने के बाद आपके मन में कई सवाल पैदा हो रहे होंगे।वैसे ही मेरे भी मन में कई सवाल है,जिसको आपके साथ साझा कर रहा हूं।हर  एक बीतते दिन और तकनीकी युग में किसानों की समस्या काफ़ी गहराता जा रहा है।किसानों की इस पुरानी और व्यापक समस्याओं के लेकर दोषी कौन-कौन हैसरकार की नीतियां,किसानों पर की जानेवाली राजनीति,किसान खुद या इन तीनों के अलावा हम यानि आम जनता की करतूत।
अब बात करते हैं तस्वीरों की।पहली तस्वीर है साल-2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त की।जिसमें लिखा है “बहुत हुआ किसानों पर अत्याचार,अबकी बार मोदी सरकार।मतलब किसानों पर कोई अत्याचार नही होगा।राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के हवाले से 18 जुलाई 2015 को बिजनेस स्टैण्डर्ड ने ख़बर छापी,जिसमें बताया कि साल 2013 के मुकाबले 2014 में ज़्यादा किसानों और कृषि श्रमिकों ने हत्या की है।साल 2013 में 11,772 जबकि 2014 में 12,360।जनवरी 6,2017 को टाइम ऑफ इण्डिया में साल 2015 में किसानी से जुड़े 12,602 लोगों ने आत्महत्या की ख़बर छपी।इससे पहले साल 2004 में 18,241 किसानों ने आत्महत्या की है।यदि आप आकड़ों पर गौर करे तो पाएंगे कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद किसानी से जुड़े लोगों की खुदकुशी की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है।इसके कई कारणों में से एक सबसे महत्वपुर्ण कारण है प्राकृतिक पर बढ़ता मानवीय अत्याचार।मौसम विज्ञान के एक रिसर्च के मुताबिक 1950 से 89 के बीच 10 साल सूखा था।साल 2000 के बाद 2002,2004,2009,2014 और 2015 भी सूखा साल था।20 अप्रैल 2016 को बीबीसी ने एक रिपोर्ट छापी जिसमें बताया कि भारत सरकार के अनुसार भारत के 256 ज़िलों पर सूखे का असर है।हर चौथा आदमी सूखा पीड़ित है।सूखे का यह आंकड़ा समस्या की गंभीरता को तो बता ही रहा है,साथ ही यह भी बता रहा कि भौतिक सुख के लिए हम दिन-प्रतिदिन कितने लापरवाह होते जा रहें। इन आकड़ों में कितना सुधार हुआ है,कितना होगा ,कैसे होगा और कबतक होगा मालूम नही।लेकिन हमें खुद से भी सवाल पूछना होगा कि सिर्फ़ सरकारों की नीतियों की आलोचना से काम चल जाएगा या फ़िर हमें भी,पर्यावरण को लेकर अपने भीतर की लापरवाही के बारे में सोचना होगा?सभी सरकारों ने अपनी क्षमता के अनुसार किसानों के हित में काम किया है और वर्तमान सरकार भी कर रही है।आपकी नज़र में किसानों की समस्या का प्राथमिक कारण क्या है,मुझे नही मालूम।लेकिन मेरी नज़र में वनों की कटाई मुख्य कारण है,जिसको रोकना होगा।यदि पेड़ नही होगा तो बादल को कौन बुलाएगा?
दूसरी तस्वीर भारत के विकसीत राज्यों में से एक तमिलनाडु के किसानों की है।यहां की 40आबादी के जीविकोपार्जन का साधन कृषि है।तस्वीर में आप जिन किसानों को अजीबो-गरीब हरकत करते देख रहें है, वो प्राकृतिक आपदाओं और कावेरी जल समस्या का लगातार सामना करते आ रहें हैं।ख़राब मानसून के कारण 140 साल में इस बार सबसे कम बारिश हुई है।हम उत्तर भारतीयों के लिए तो अब जाके गर्मी शुरु हुई है,लेकिन वहां के मुख्यमंत्री ने जनवरी में ही राज्य को सुखा घोषित कर दिया था।जैसा कि आपने तस्वीर में देखा की किसान अर्द्ध मुंडन करा रहें है,कई नरमुंड पहने या फ़िर उसके सामने बैठे है या कोई मुंह में चुहा दबाये हुए है।इसके अलावा भी,यदि आप गूगल करेंगे तो पाएंगे कि महिलाएं अपनी चुड़ियां तोड़ रही हैं, पीएम नरेन्द्र मोदी का मुखौटा पहन कर,उनके सामने किसान फ़ांसी लगा रहा हैं।ये सब सारी तस्वीर आप ज़्यादा अख़बारों में देखा होगा,क्योंकि टीवी अभी योगी काल से गुज़र रहा है।हां इन किसानों की दो तस्वीरें टीवी में कुछ देर की लिए जिसमें पहला था रायसीनाहील के सामने नग्न प्रदर्शन करते हुए,तो दूसरा था मल-मूत्र पीते हुए।इन दोनों तस्वीर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया मेंं भूचाल आ गया।किसानों के ऐसी हरकतों की आलोचना करने लगे,बिना ये जाने की ये ऐसा क्यों कर रहें है।कईयों को मोदी सरकार की बदनामी का डर सताने लगा।कहने लगे कि ये सब प्रायोजित ड्रामा है।जो लोग इसको ड्रामा बता रहेे थें,उनको मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वो ग़लत थें।ड्रामा बताने वाले से मेरा सवाल है कि,क्या आपने सोचा कि ये ऐसी हरकत क्यों कह रहें थे?दरअसल उनके ऐसी हरकत के पीछे एकमात्र कारण था 'भाषा।' ये ना तो हिन्दी बोल सकते थे,ना ही अंग्रेजी।जिसकी वज़ह से ये अपनी बात केन्द्र सरकार के सामने रखने के लिए अलग तरीके से हरकत कर रहें थें।लेकिन इतना करने के बाद भी केन्द्र सरकार का एक भी मंत्री उनलोगों से मिलने क्यों नही गया?शुरुआत से ही बीजेपी का रुख़ साफ़ था कि इन किसानों बातों को नही सुनना है।12 अप्रैल को The new Indian express ने तमिलनाडु बीजेपी के रुख़ को छापा था। तमिलनाडु बीजेपी अध्यझ Tamilisai Sounderrajan ने योगी सरकार का उदारहण  देते हुए कहा था कि यहां किसानों की समस्या का निपटारा करने की ज़िम्मेदारी राज्य सरकार की ।हांलांकि मद्रास हाई कोर्ट भी राज्य सरकार को  फ़टकार लगा चुकी है।
अब बात करतें हैं तीसरे तस्वीर की।यह तस्वीर तमिल किसानों के लगभग 40 दिन के प्रदर्शन के बाद की है।जब ये किसान मुसीबतों से गुज़र रहें थें ,उसी के समय वहां की राजनीति भी मुसीबतों से गुज़र रही थी।पुर्व सीएम ओ. पनीरसेलवम की शासन में राज्य सुखा घोषित हुआ और इन किसानों से मिलने आए सीएम पलनीस्वामी।पीएम नरेन्द्र मोदी,वित्त मंत्री अरुण जेटली और गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात के बाद सीएम पलनीस्वामी  के आश्वासन के बाद,  इन किसानों ने 25 मई तक अपने आन्दोलन को ये कहते हुए समाप्त कर दिया कि यदि हमारी मांगे  पूरी नही हुई,तो हम फ़िर से आन्दोलन करेंगे। 
ये किसान केन्द्र से अपने कर्ज़ माफ़ी की मांग कर रहें हैं।इन किसानों का कहना है कि उनकी फ़सल कई बार आए सुखे और चक्रवात में बर्बाद हो चुकी है।किसानों ने उनलोगों को मिलने वाले राहत पैकेज पर भी पुनर्विचार करने की मांग की है।किसानों की यह भी मांग है कि उनको अगली साल के लिए बीज ख़रीदने दिए जाएं और हुए नुकसान की भरपाई की जाए। मद्रास हाई कोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार ने केन्द्र से 40,000 करोड़ की मांग की है,जिसमें से मात्र 4,000 करोड़ की स्वीकृति मिली है। 
                                   अन्त में मैं ये कहना चाहता हूं कि किसान जितना सरकार की नीतियों से लाचार है,उतना मानवीयकृत्यों से।किसानों की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि उनकी कोई सुनता नही है।सूखा सरकारों की देन नही है,बल्कि इंसानों की देन है।मुआवज़ा और राहत कार्य समस्याओं का समाधान नही है।इंसानो ने जितनी सिद्दत से सूखे की समस्या को कई सालों से मिलकर बुलाया है,इतनी ज़ल्दी नही जाएगा।


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