“ग्यारह बजे से लेट नहीं एक बजे भेंट नही” ये आदर्श वाक्य मेरे गांव के हाई स्कूल की
बन गई है। बीते तीन चार-सालों में बद से बदतर हो गई इस स्कूल की शैक्षणिक व्यवस्था
के लिए अकेले कोई ज़िम्मावार नहीं है।
पिछले 3-4 सालों में जब भी गाँव जाता था तो गिनती के लोग स्कूल की शैक्षणिक
व्यवस्था के बारे में बताते हुए दुखी हो जाते थें। समय की कमी होने की वज्ह से
मुझे भी सोचने का समय नहीं मिल पाता था। लोग कहते थें कि स्थानीय पत्रकार भी इस
बदहाल स्थिति के बारे में लिखते-बोलते नहीं है। स्थानीय पत्रकारों को कोई फ़र्क़ नहीं
पड़ता है कि स्कूल की क्या स्थिति हो गई है। गाँव से हज़ार किलोमीटर दूर रहने के
बावजूद लोगों के बातें मुझे दुखी करती थी। कई वज्हों में से एक वज्ह यह भी है कि
मैं इस विद्यालय का छात्र रहा हूँ। इस शिक्षा के मन्दिर में मैंने अनुशासन, विद्यार्थी
और शिक्षक के बीच आदर्श संबंध कैसा होता है, विद्यार्थी और शिक्षक की आँखों में
पढ़ने-पढ़ाने की लालसा को क़रीब से देखा है। इसलिए आज की बदतरीन तसावीरें जब सुनने
और देखने को मिलती है तो सच में बुरा लगता है।
इस बार दिसम्बर में गाँव गया था,तो लोग स्कूल की बदहाली के बारे में बताते थें, उसको काफ़ी क़रीब से देखा और परखा। गाँव के कई लोगों इस पर बात करने की कोशिश भी की,लेकिन ज़्यादातर लोगों ने इस संबंध में बात करना अनुचित समझा, तो कुछ लोगों ने कहा कि उनको विद्यालय की बदहाली के बारे में जानकारी ही नहीं हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी थें जो दुखी मन से इतना कहकर बात बदल देतें कि बात करने से क्या फ़ाइदा। इन सभी लोगों से गुज़ारिश है कि यह विद्यालय आपका है,मतलब पैसा होने की वज्ह से आपका बच्चा तो किसी प्राइवेट या किसी शहर में पढ़ लेगा,लेकिन हो सकता है कि आपके पड़ोस का,आपके दोस्त का जिसके पास अपने बच्चे को इस स्कूल में भेजने के अलावा कोई विकल्प ना हो,तो क्या आप चाहेंगे की ऐसे लोगों का बच्चा अच्छी शिक्षा हासिल ना करे? एक वक़्त था कि हमारे गाँव की पहचान इसी स्कूल से हुआ करती थी। सभी ग्रामीणों से आग्रह तो कर ही सकता हूँ कि अपनी इस पहचान को खोने मत दीजिए। एकजुट होकर स्कूल प्रशासन से बात कीजिए,उन पुराने शिक्षको से आग्रह कीजिए कि सर..उस व्यवस्था को फिर से लौटाने में हमारी मदद कीजिए, जिसमें स्कूल के छात्र शिक्षा के अलावा साइंस, कला, साहित्य और खेल के क्षेत्र में नाम रौशन करते थें।
इस बार दिसम्बर में गाँव गया था,तो लोग स्कूल की बदहाली के बारे में बताते थें, उसको काफ़ी क़रीब से देखा और परखा। गाँव के कई लोगों इस पर बात करने की कोशिश भी की,लेकिन ज़्यादातर लोगों ने इस संबंध में बात करना अनुचित समझा, तो कुछ लोगों ने कहा कि उनको विद्यालय की बदहाली के बारे में जानकारी ही नहीं हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी थें जो दुखी मन से इतना कहकर बात बदल देतें कि बात करने से क्या फ़ाइदा। इन सभी लोगों से गुज़ारिश है कि यह विद्यालय आपका है,मतलब पैसा होने की वज्ह से आपका बच्चा तो किसी प्राइवेट या किसी शहर में पढ़ लेगा,लेकिन हो सकता है कि आपके पड़ोस का,आपके दोस्त का जिसके पास अपने बच्चे को इस स्कूल में भेजने के अलावा कोई विकल्प ना हो,तो क्या आप चाहेंगे की ऐसे लोगों का बच्चा अच्छी शिक्षा हासिल ना करे? एक वक़्त था कि हमारे गाँव की पहचान इसी स्कूल से हुआ करती थी। सभी ग्रामीणों से आग्रह तो कर ही सकता हूँ कि अपनी इस पहचान को खोने मत दीजिए। एकजुट होकर स्कूल प्रशासन से बात कीजिए,उन पुराने शिक्षको से आग्रह कीजिए कि सर..उस व्यवस्था को फिर से लौटाने में हमारी मदद कीजिए, जिसमें स्कूल के छात्र शिक्षा के अलावा साइंस, कला, साहित्य और खेल के क्षेत्र में नाम रौशन करते थें।
इस बार गाँव गया था तो मैं स्कूल के भीतर भी
गया था। कुछ तस्वीरें खींच लाया हूँ उस तस्वीर को दिखाने के लिए स्कूल हालत क्या
है। मैंने कई पुराने शिक्षकों को,जिन्होंने मुझे भी पढ़ाया है,वो सिर्फ़ हाज़िरी
लगाने आते थें और समय से पहले स्कूल से निकल जाते थें। ऐसा एक दिन कई दिन मैंने
देखा। मुझे मालूम है कि जब पुराने शिक्षकों की जानकारी में यह बात आएगी,तो बुरा
लगेगा। पुराने शिक्षकों से मेरी विनती है कि साल-दो साल, पांच साल में आप रिटायर
करके यहां से चले जाएंगे, लेकिन मेरे गाँव के बच्चों के लिए यही स्कूल रहेगा। इसलिए आपलोग
फिर से उस व्यवस्था की शुरूआत कीजिए जिसमें पठन-पाठन हो।
नीचे जो तस्वीर है वो स्कूल में प्रार्थना के वक़्त की है। एक दिन मैं जब कुछ सामान लाने के लिए घर से निकला तो देखा कि प्रार्थना हो रही थी। विद्यार्थियों की संख्या देखकर मैं हैरान हो गया। मुझे याद है कि मैं जब पढ़ता था, तो जो तस्वीर में ख़ाली जगह दिख रहा है, प्रार्थना के वक़्त भर जाता था। कहने का मतलब यह है कि तब विद्यार्थी आते थें और विद्यार्थी इसलिए आते थें कि पढ़ाई होती थी। लेकिन वर्तमान की ये तस्वीर बता रही है कि ना तो बच्चे पढ़ने आते हैं और ना ही मास्टर पढ़ाना चाहते हैं। स्कूल में कुल कितने छात्रों का नामांकन होता है इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा तो मेरे पास नहीं है,लेकिन जिनकी नज़र इस विद्यालय पर क़रीब से रहती है उनके मुताबिक़ कक्षा 9 और 10 में कुल बच्चों की संख्या 2500 के क़रीब है और 10+2 में 700 बच्चों का दाख़िला होता है। लेकिन तस्वीर तो कुछ और कह रहा है। मेरे समय में इस स्कूल में क्लास 6,7 और 8 भी हुआ करता था। लेकिन वर्तमान की तस्वीर के आधार पर क्या यह नहीं कहा जा सकता है कि पढ़ाई को लेकर बच्चे, परिजन, शिक्षक और शिक्षा तंत्र, सब के सब लापरवाह हैं?
बताने वालों में से एक ने बताया कि क़रीब 3-4 साल पहले इस स्कूल को मॉडल स्कूल के साथ-साथ इस स्कूल का इंडोर स्टेडियम बनाने की बात हुई थी। वर्तमान सांसद राजीव प्रताप रूडी के नेतृत्व में तब के ज़िलाधिकारी शाम के वक़्त स्कूल का और स्कूल के पीछे जहाँ इंडोर स्टेडियम बनाने की बात हुई, उस जगह का निरीक्षण तक किया गया था, लेकिन अबतक स्कूल ना तो मॉडल बन सका और ना ही इंडोर स्टेडियम। हाँ इन बीते सालों के लिए ये कहा जा सकता था कि जो भी था वो चौपट हो गया।
नीचे जो तस्वीर है वो स्कूल में प्रार्थना के वक़्त की है। एक दिन मैं जब कुछ सामान लाने के लिए घर से निकला तो देखा कि प्रार्थना हो रही थी। विद्यार्थियों की संख्या देखकर मैं हैरान हो गया। मुझे याद है कि मैं जब पढ़ता था, तो जो तस्वीर में ख़ाली जगह दिख रहा है, प्रार्थना के वक़्त भर जाता था। कहने का मतलब यह है कि तब विद्यार्थी आते थें और विद्यार्थी इसलिए आते थें कि पढ़ाई होती थी। लेकिन वर्तमान की ये तस्वीर बता रही है कि ना तो बच्चे पढ़ने आते हैं और ना ही मास्टर पढ़ाना चाहते हैं। स्कूल में कुल कितने छात्रों का नामांकन होता है इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा तो मेरे पास नहीं है,लेकिन जिनकी नज़र इस विद्यालय पर क़रीब से रहती है उनके मुताबिक़ कक्षा 9 और 10 में कुल बच्चों की संख्या 2500 के क़रीब है और 10+2 में 700 बच्चों का दाख़िला होता है। लेकिन तस्वीर तो कुछ और कह रहा है। मेरे समय में इस स्कूल में क्लास 6,7 और 8 भी हुआ करता था। लेकिन वर्तमान की तस्वीर के आधार पर क्या यह नहीं कहा जा सकता है कि पढ़ाई को लेकर बच्चे, परिजन, शिक्षक और शिक्षा तंत्र, सब के सब लापरवाह हैं?
बताने वालों में से एक ने बताया कि क़रीब 3-4 साल पहले इस स्कूल को मॉडल स्कूल के साथ-साथ इस स्कूल का इंडोर स्टेडियम बनाने की बात हुई थी। वर्तमान सांसद राजीव प्रताप रूडी के नेतृत्व में तब के ज़िलाधिकारी शाम के वक़्त स्कूल का और स्कूल के पीछे जहाँ इंडोर स्टेडियम बनाने की बात हुई, उस जगह का निरीक्षण तक किया गया था, लेकिन अबतक स्कूल ना तो मॉडल बन सका और ना ही इंडोर स्टेडियम। हाँ इन बीते सालों के लिए ये कहा जा सकता था कि जो भी था वो चौपट हो गया।
नीचे स्कूल के पुस्तकालय की तस्वीर है। तस्वीर में
साफ़-साफ़ दिख रहा है कि पुस्तकालय की सीढ़ी और आसपास घुटने से कम ऊँचाई तक घास
उगा हुआ है। ये हाल तब है जब स्कूल में एक पुस्तकालय अध्यक्ष भी नियुक्त है। सवाल
यह है कि पुस्तकालय अध्यक्ष क्या करते हैं?
नीचे की तस्वीर स्कूल के प्रयोगशाला की है। दरवाज़ों में लगे तालों की स्थिति देखकर कहा जा सकता है कि पठन-पाठन की के लिए इस प्रयोगशाला खोला जाता होगा। हैरानी की बात ये है कि विज्ञान के छात्रों की प्रायोगिक परीक्षा भी होती है। एक दिलचस्प बात यहां बता देता हूँ कि 30 अंक के प्रायोगिक परीक्षा में 75-80 अंक तक दे दिए गये थें। मैं भी जब पढ़ता तब भी रोज़-रोज़ प्रयोगशाला तो नहीं खुलता था,लेकिन हां...राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस की प्रतियोगिता के समय श्रीराम पाण्डेय सर प्रायोगिक जांच कैसे करते हैं बताने के लिए प्रयोगशाला में ले जाते थें। अब मुझे मालूम नहीं कि राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस में स्कूल हिस्सा लेता है या नहीं?
नीचे की तस्वीर स्कूल के प्रयोगशाला की है। दरवाज़ों में लगे तालों की स्थिति देखकर कहा जा सकता है कि पठन-पाठन की के लिए इस प्रयोगशाला खोला जाता होगा। हैरानी की बात ये है कि विज्ञान के छात्रों की प्रायोगिक परीक्षा भी होती है। एक दिलचस्प बात यहां बता देता हूँ कि 30 अंक के प्रायोगिक परीक्षा में 75-80 अंक तक दे दिए गये थें। मैं भी जब पढ़ता तब भी रोज़-रोज़ प्रयोगशाला तो नहीं खुलता था,लेकिन हां...राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस की प्रतियोगिता के समय श्रीराम पाण्डेय सर प्रायोगिक जांच कैसे करते हैं बताने के लिए प्रयोगशाला में ले जाते थें। अब मुझे मालूम नहीं कि राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस में स्कूल हिस्सा लेता है या नहीं?
नीचे की दोनों तस्वीरे विद्यालय के छात्रावास की है, जो खण्डहर में
तबदील हो गया है। पहले कुछ छात्रों के साथ कई शिक्षक भी रहा करते थें, लेकिन अब कुछ
ही शिक्षक रहते हैं। एक शिक्षक ने बताया कि मरम्मत का काम वही लोग कराते हैं। ये
तो हाल है।







बहुत सुंदर सवाल उठाए हो। सबसे अहम बात मंथन करने का है कि ऐसी स्थिति क्यों पैदा हुई। केवल बात करने या उठाने से न होगा। हमे तह में जाना होगा। संसाधन भी देखो। नामांकित छात्र छात्राओं की संख्या लगभग 4 हजार। बैठने की जगह 5 सौ। उपस्थिति 2 सौ। बाहर सड़क पर मनचले की जमात। समाज की बच्ची आती हैं। यदि 80 % छात्र उपस्थित हो जाए तो क्या होगा। शिक्षक उदासीन है। शासन प्रशासन अभिभावक और शिक्षक चार कोने पर हैं और बीच में छात्र। जब तक कुछ सुलझे हुए नागरिक का साथ और मदद नहीं मिलेगा स्थिति नहीं सुधार सकते। बच्चें को साइकिल और पैसा से मतलब है। इंटर में विज्ञान शिक्षक नहीं है।
जवाब देंहटाएंएक बार मुझसे डिस्कस करो।
😭😭
जवाब देंहटाएंIf you're trying hard to lose weight then you need to try this totally brand new custom keto plan.
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