रविवार, 29 दिसंबर 2019

Value system is a part of National prosperity.

Today, A kindergarten near my house organised a cultural program. They had invited grandparents of every student but very few were present. An anchor spoke on mic again and again, saying "Grandparents Should participate in such programs as the participation will enrich your grandchildren's lives"

I heard this and wondered, why is the anchor repeating this again and again? Doesn't he know about urban life? This reminded me what Dr. APJ Abdul kalam had said. During Ramnath Goenka Awards ceremony, he asked the audience, "How many of you live or want to live in a joint family?" Very few people raised hands. Dr. Kalam was talking about value system. According to Dr. Kalam, Value system is very important thing in human life and It is related to National prosperity. National prosperity is equal to A+B+C. A means GDP, B means reduction of people under poverty line and C means Value system. It is just an example. You can also guess if you live in city, How many of the people you know live with their parents? If you will talk to anyone on this topic, they will give many reasons. But I think one thing is very important 'Volition'.

बुधवार, 25 दिसंबर 2019

What will you say?

When I entered in metro rail platform today, suddenly I saw that A Young guy was roaming on the platform and sometimes he was weeping and sometimes whooping his Girlfriend over call through basic mobile phone. When he used to weep, He used to jump. 

I was very shocked, what this guy is doing.But After a few minutes, I got it... he was shouting at his Girlfriend and impeaching her that "you always cheat me but I never told you a single word. You have to come now otherwise I will commit suicide. His GF was continually saying to him, It isn't possible to me come there right now just because I'm in a Mall. The Guy wasn't ready to understand her situation and Suddenly he went near a passenger and told him, Please make a video call. He was requesting repeatedly, But when That passenger denied to make call, He went near another passenger. Second one  also denied then he went to the third one... fourth one...all of them denied to make a  call. It was a very bad situation for him. No one was ready to help him, What may be reason behind it?

बुधवार, 18 दिसंबर 2019

शक और आशंकाओं के आधार पर हिंसा कर आप ख़ुद का नुक़सान रहे हैं।




दो-तीन दिनों पहले बालकनी में कपड़े धो रहा था। कपड़े धोने के बाद जैसे ही मैं खड़ा हुआ, मेरी नज़र तस्वीर में दिख रहे उस इंसान पर पड़ी जो काली टोपी, काले रंग का पजामा, पैरों में चप्पल जो एड़ी और अंगुलियों के नीचे घिस हुई थी और कुर्ता पहने हुए हैं। ये इंसान खैनी मल रहे थें और जैसे ही हमारी नज़र मिली, खैनी मलते हुए इन्होंने मुझे इशारे में सलाम किया, मैं भी तुरन्त ही सलाम का जवाब सलाम-सलाम बोलते हुए दे दिया। फिर हम दोनों अपने-अपने काम में लग गयें। हम एक-दूसरे को नहीं जानते हैं। दिल्ली में एक-दो सालों बाद रहते हुए क़रीब एक दशक हो जाएगा,लेकिन ये सुब्ह सबसे यादगार बन गई है। भाग-दौड़ भरी शहरी ज़िन्दगी जिसमें दुआ-सलाम के हमारे पारम्परिक तौर-तरीक़े को Hi-Hello ने अलग-अलग वज्हों से लगभग समाप्त कर दिया है, ऐसे में किसी शहरी में आज भी हमारे पारम्परिक तौर-तरीक़े बाक़ी हैं, ये इस शहर में रह रहे युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्त्रोत से कम नहीं है। 


कपड़ों को सूखने के लिए डालने के बाद, चाय और अख़बार लेकर मैं बैठ गया। ख़बरों मे ख़बर एक दिन पूर्व हुए जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के सामने से गुज़रे वाली सड़क पर हुई हिंसा थी। ख़बरों को पढ़ने के बाद मेरे दिमाग़ में दो तस्वीरें, पहली तस्वीर पुलिस और उपद्रवियों वाली और दूसरी वो जो सुब्ह में इंसान से मेरी दुआ-सलाम हुई थी। दोनों तस्वीरों की तुलनात्मक अध्यन के बाद मैं जिस निष्कर्ष पर पहुंचा वो ये है कि धर्म की बात, धर्म के नाम पर हिंसात्मक ख़याल तब ही आ सकते हैं जब पेट भरा हो। वरना पेट ख़ाली होगा तो इंसान पहले पेट भरने का इन्तज़ाम में लगेगा। जैसे मैं भी चिन्तन करने के बाद काम पर चला गया और तस्वीर में दिख रहें दोनों इंसान अपने काम में लगे हुए थें।


संसद में जब से नागरिकता संशोधन बिल पास हुआ है,उसके बाद से देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों में ज़बरदस्त हिंसा और आगजनी हुई। इन राज्यों के लोग अपनी संस्कृति,अपनी पहचान,अपनी भाषा के धूमिल होने को लेकर आशंकित हैं। उन लोगों का विरोध धर्म को लेकर नहीं है। लेकिन उन राज्यों से इतर, देश के दीगर हिस्सों में पिछले तीन-चार दिनों से कुछ जगहों पर नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर हिंसक विरोध प्रदर्शन और आगजनी हुई। शक और आशंकाओं के आधार पर उपद्रवियों ने सरकारी सम्पतियों को नुक़सान पहुंचा दिया। शक और आशंकाओं के आधार पर देश के युवा, ख़ासकर मुस्लिम युवकों को गुमराह करने के लिए एक गिरोह सक्रियता से काम कर रहा है और तोड़फोड़ आगजनी जैसे कामों पर लगा रहा है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं कि ज़्यादातर उपद्रवियों को ये तक नहीं पता था कि नागरिकता संशोधन क़ानून क्या है। लेकिन वो बसों और सरकारी सम्पतियों में आग लगा रहे थें और निर्दोषों पर हमला तक किए। कल ही दिल्ली के सीलमपुर में उपद्रवियों ने एक स्कूल बस पर तक हमला कर दिया था।


नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ लिखने और बोलने वालों से बातचीत या उनके लिखे के आधार पर साफ़-साफ़ पता लग जा रहा है कि वो या तो नागरिकता संशोधन क़ानून ठीक से नहीं जानते हैं या फिर सुनी-सुनाई बातों जैसे इस क़ानून में संवैधानिक प्रावधानों का ख़याल नहीं रखा गया है। इस बिल से मुस्लिमों को ख़तरा है उनकी नागरिकता छीन जाएगी वग़ैरह-वगैरह। आज ही सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता संशोधन क़ानून पर दायर 59 याचिकाओं पर सुनवाई करने के बाद कहा है कि वो इस क़ानून को जांच रहे हैं। सरकार को नोटिस जारी कर जनवरी के दूसरे हफ़्ते तक जवाब मांगा है। और फ़िलहाल इस क़ानून के तहत मिलने वाली नागरिकता पर रोक लगाने से इंकार कर दिया है। 


मैंने कई लोगों से जो इस बिल के ख़िलाफ़ हैं, उनसे बातचीत की। मैंने पूछा कि नागरिकता संशोधन क़ानून के उस प्रावधानों को मुझे बताइए, जिससे हिन्दुस्तान के मुसलमानों की नागरिकता छीन जाएगी? ये सवाल सुनते ही ऐसे लोग नागरिकता संशोधन क़ानून को छोड़ एनआरसी यानि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर की बात करने लगते हैं। कहते हैं कि अस्ली खेल तो एनआरसी से है। कहते हैं केन्द्र सरकार मुस्लिम विरोधी है। कल भी गृहमंत्री अमित शाह ने टाइम्स नाउ से बातचीत में साफ़-साफ़ कहा है कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर तैयार किया जाएगा, लेकिन संवैधानिक प्रावधानों को देखते हुए। नाविका कुमार से गृहमंत्री ने कहा कि एनआरसी में यदि हमारी सरकार कुछ ग़लत भी करेगी, तो हमारे ऊपर कोर्ट है ना। इसका मतलब साफ़ है कि यदि एनआरसी आएगा तो संवैधानिक प्रावधानों का ख़याल रखा जाएगा। इसलिए देश के युवाओं को, ख़ासकर  मुस्लिम युवकों को ज़रूरत है अपने आंख-कान खोलने की और गुमराह करने वालों से दूरी बनाने की। हिन्दुस्तान हम सबका है, हम सब हिन्दुस्तानी हैं। कोई भी सरकार होगी, हमारे संविधान का अनदेखा नहीं कर सकती है। किसी भी सरकार को कोई भी क़ानून बनाते समय संविधान से ही गुज़रना पड़ेगा। कोई सरकार मनमानी नहीं कर सकती है। 

रविवार, 8 दिसंबर 2019

"घड़ी में सुई नहीं थी"

गत शुक्रवार की शाम जब पटना से विमान ने उड़ान भरा तो पहले से तय प्लानिंग के अनुसार मैंने काम किया। विमान चालक और विमान परिचारिका के निर्देशों को सुनने और अमल करने के बाद मैंने रूचिर शर्मा की ये 👇 किताब पढ़नी शुरू कर दी। इस किताब का पहला अध्याय जिसका नाम है ' घड़ी में सुई नहीं थी'। इस अध्याय में रूचिर ने उस काल-खण्ड के ग्रामीण जीवन को याद किया है कि कैसे गांवों में जाति के नाम पर भेद किया जाता था। संसाधनों के बिना ज़िन्दगी की गुज़र-बसर कैसे होती थी। शब्द-विनिमय का लहजा कैसा होता था। पढ़े-लिखे व्यक्ति को समाज कैसे देखता था वग़ैरह-वग़ैरह। 
इस अध्याय को पढ़ने के बाद जो-जो बातें इस किताब में लिखी हुई है, उससे मैंने वर्तमान के और अपने बचपन के ग्रामीण जीवन की तुलना की, तो मैंने पाया कि कितना कुछ बदल गया और कितना कुछ बदलना बाक़ी है। वर्तमान में गांवों का पूर्ण रूपेण शहरीकरण तो नहीं हुआ है,  लेकिन हां, अब गांव पहले वाला गांव नहीं रह गया है। इसकी मुख्य वज्ह है गांव के लोगों में जीवन स्तर को सुधारने को लेकर प्रतिस्पर्धा। जिसकी माली हालत जैसे भी है, उतने में ही लोग अपनी ज़िन्दगी को हर सम्भव सुदृढ़ बनाने में जुटे हुए हैं। गांव की युवा पीढ़ी जो इस सदी में बालिग हो चुकी है, उसने ये नहीं देखा है कि रामायण और महाभारत के प्रसारण के समय लोग पूजा-सामग्री लेकर टेलीविज़न के सामने बैठते थें। इस सीरियल के कालाकारो को लोग भगवान की तरह देखते थें। बदलते वक़्त में इस बालिग पीढ़ी ने आधुनिक जीवन को देखा है। इस पीढ़ी में ख़ुद को शहरी जीवन के रफ़्तार में शामिल करने की लालसा है। आधुनिक जीवन की सारी सुविधाओं को गांव में रहते हुए हर सम्भव पूरा करने के लिए दिन-रात एक किए रहता है। जाति-भेद और शब्द विनिमय का वक़्त उसके पास बचा नहीं है। अपवाद को छोड़ दें।

शनिवार, 30 नवंबर 2019

इंसानियत अब भी ज़िन्दा है!

अपने गांव आया हूँ। क़रीब सालों बाद इस बार 10 दिनों की छुट्टी मिली है, जिसकी वज्ह से परिवार वालों और अपने गांव वालों से बीच बिल्कुल वैसे ही समय बीत रहा है, जैसे कभी बीतता था। काफ़ी अच्छा लग रहा है, उन लोगों के बीच ख़ुद को पाकर। तस्वीर में मेरे साथ जो भाई दिख रहा है, ये उन्हीं में से एक है जिनको बचपन से देखता आ रहा हूँ। पेशे से ये यदि इंग्लिश में कहे तो ये Assistance stonemanson हैं। शुक्रवार को इनको जितना जानता था उससे और ज़्यादा जानने का मौक़ा मिला। ये तो पहले से ही जानता था कि ये गूंगे हैं, लेकिन इस बार इनकी ज़ातीय ज़िन्दगी के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला। शुक्रवार को जब ये मेरे यहां काम करने आयें, तो मैंने हर सम्भव कोशिश की इनको किसी तरह की समस्या ना हो। खैनी खाते हैं तो इनको एक पुड़िया खैनी ख़रीदकर ला दिया ताकि समय-समय पर खाते रहें और पानी पीते रहे। एक वक़्त ऐसा आया था जब दीवार से ये पुरानी खिड़की निकाल रहे थें, उसी दरम्यान राजमिस्त्री कुछ पल के लिए ग़ायब हो गया था, तो मैंने ख़ुद जाकर इनका सहयोग किया। सीमेंट-बालू को मिलाकर जब भी मसाला बनाते थें तो मैं इनकी हेल्प करता था। 

काम के साथ-साथ जैसे-जैसे वक़्त बीतता जा रहा था, बहुत सारी ऐसी बातें इनसे सीखने को मिली, जो जिन्दगी में काम आएंगे। ये बोल नहीं सकते हैं,जिसकी वज्ह से ये सिर्फ़ इशारा करके अपनी बात बताते हैं। काम समाप्त होने के बाद मैं, राजमिस्त्री और ये,साथ बैठकर चाय पी रहे थें। राजमिस्त्री इनके पड़ोसी ही थे,जिनसे इनकी काफ़ी अच्छी ट्यूनिंग है, वो इनके बारे में बताने लगे। इनके घर की कहानी वैसी ही हैं,जो आमतौर पर हर घर में पाई जाती है। लेकिन कुछ बाते जिसने मुझे बहुत ही मुतासिर किया,उसको आपके साथ साझा कर रहा हूँ। इनकी शादी हो चुकी है। पत्नी को मोतियाबिन्द की बीमारी है जिसका इलाज हो रहा है। इनको एक बेटी-बेटा है। दोनों अभी बिल्कुल छोटे हैं। काम समाप्त होने के बाद जब हम लोग चाय पीते-पीते बातों में व्यस्त हो गये थें, तो इन्होंने इशारे में बताया कि उनको लेट हो रहा है, घर जाना होगा,बच्चे इनका इन्तज़ार कर रहे होंगे। तब राजमिस्त्री ने बताया कि रोज़ काम से लौटने के बाद खाना बनाकर अपनी पत्नी और बच्चों को खिलाते हैं। एक शाम मैंने देखा भी था कि अपने दोनों बच्चों को एक साथ गोद में लेकर उन सबों को कुछ ख़रीदने के लिए दुकान पर आये थें। 
एक और बात जिसने मुझे बहुत मुतासिर किया वो ये है कि कुछ दिनों पहले किसी ने इनके बच्चे को किसी ने धक्का मार दिया था,जिसकी वज्ह से इनका बेटा गम्भीर रूप से घायल हो गया था। आनन-फ़ानन में अपने बच्चे को लेकर हस्पताल गए। ज़ख़्म कमर में था,लेकिन डॉक्टर ने पैर में प्लास्टर कर दिया । कुछ दिनों में जब सुधार नहीं हुआ तो लोगों ने दूसरे डॉक्टर के पास जाने की सलाह दी। दूसरे डॉक्टर के पास जब बच्चे को दिखाया गया तो डॉक्टर ने कहा कि समस्या कमर में है ना कि पैर में। बे-वज्ह प्लास्टर होने से बच्चे का पैर पीला पड़ था। डॉक्टर ने इलाज के लिए जो रक़म बताया था, उतने पैसे इनके पास नहीं थे। फिर गांवभर के लोगों ने रूपये इकट्ठा कर, इनके बेटे का इलाज करवाया। भगवान की कृपा से अब बच्चा बिल्कुल ठीक है।

शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

अस्पताल के कर्मचारियों को अपने भीतर की मानवता को बचाए रखना चाहिए!

अभी कुछ दिन पहले भिवाड़ी,राजस्थान में एक बच्चों के अस्पताल जाना हुआ था। अस्पताल का नाम नहीं लिखूंगा क्योंकि मेरा मक़सद हॉस्पिटल को बदनाम करने का नहीं है। मेरा मक़सद है कि मैंने जो अस्पताल में उपचार की व्यवस्था और मरीज़ के परिजनों से अस्पताल के कर्मचारियों द्वारा किए उस व्यवहार को लिखूं, ताकि अस्पताल में काम करने वाला कोई भी शख़्स पढ़े तो ध्यान रखे कि अस्पताल में वो किसी व्यवसायी नहीं बल्कि जीवन रक्षक के रूप में काम कर रहा है। अस्पताल में काम करने वाले हरेक कर्मचारियों को हर स्तर पर ज़्यादा से ज़्यादा नैतिकता का पालन करने की कोशिश करनी चाहिए। नैतिकतापूर्ण सेवा उनका धर्म है और मरीज़ के परिजनों से हर स्तर पर संवाद करना उनका परम कर्तव्य है। हर परिजन समय-समय पर यह जानना चाहता है कि जिसका इलाज वो करवा रहा है, उसकी स्थिति कैसी है। स्थिर है या सुधार हो रहा है। मरीज़ की हालात को परिजनों को समय-समय पर बताना चाहिए।

मैंने जो देखा उसको लिखने से पहले एक बात साफ़ कर दे रहा हूँ कि बहुत सारे ऐसे हॉस्पिटल भी हैं जो मरीज़ के परिजनों को समय-समय पर मरीज़ की स्थिति बताते हैं। जिस अस्पताल के बारे में मैं यहां ज़िक्र कर रहा हूँ,उस अस्पताल में सबसे ग़लत बात जो है,वो है रिकॉर्ड मेंटेन रखने के नाम पर जांच रिपोर्ट्स को अपने क़ब्ज़े में रखना। किसी भी हस्पताल में ऐसी प्रक्रिया होनी चाहिए कि मरीज़ का परिजन जब भी चाहे, बिना किसी रोक-टोक के जांच रिपोर्ट्स को एक्सेस कर सके। रिपोर्ट को दिखाकर किसी अन्य डॉक्टर से भी सलाह ले सके। 

यहां पर मैं जिस अस्पताल की बात कर रहा हूँ, उससे जुड़ी दो बातें हैं जिसकी वज्ह से मैंने शीर्षक दिया है अस्पताल के कर्मचारियों को अपने भीतर की मानवता को बचाए रखना चाहिए!’
जब मैं अस्पताल गया था तो सुब्ह से लेकर शाम तक वहां रहना हुआ था। इस दौरान वहां मौजूद लोगों से मैंने अलग-अलग बिन्दुओं पर बात की। बात के दरमियान एक व्यक्ति ने जिस घटना का ज़िक्र किया उसने मुझे भीतर से झकझोर दिया। व्यक्ति ने बताया कि 4 दिन से अस्पताल में इलाज करवा रहे बच्चे को एक दिन सुब्ह में ही चार बजे, जब उजाला भी नहीं हुआ था अस्पताल के कर्मचारियों ने ले जाने को कहा दिया। फिर वहां मौजूद मेरे रिश्तेदार और अन्य लोगों ने अस्पतालकर्मियों के इस व्यवहार से नाराज़गी ज़ाहिर की। फिर बाद मे क़रीब सुब्ह 6 बजे बच्चे को उसके परिजन दूसरे अस्पताल में लेकर चले गए। बाद में मैंने अपने रिश्तेदार से उस ऑटोचालक का मोबाइल नम्बर लेकर घटना के बारे में विस्तार से बात की। बिहार के भागलपुर के रहने वाले मनु ने मुझसे बताया कि 10 दिन के उनके लड़के की अचानक से तबीयत बिगड़ गई,जिसे बाद उन्होंने इस हस्पताल में अपने बच्चे को भर्ती कराया। भर्ती करने के बाद मनु को बताया गया कि उनके बच्चे का इलाज जिस मशीन से हो रहा है उसके प्रति दिन का चार्ज 3500 रुपये है, दवाई अलग से ख़रीद कर देना होगा। बच्चा 2 दिन में ठीक हो जाएगा। 2 दिन इलाज कराने के बाद मनु ने जब बच्चे की स्थिती के बारे में पूछा तो, अस्पताल के स्टाफ़ ने कहा कि दो दिन तक अभी कुछ नहीं कह सकते हैं और अब बच्चे दो दिन एक दूसरी मशीन पर रखनी पड़ेगी, जिसका चार्ज 5500 रूपये प्रति दिन, दवाई अलग से ख़रीदना पड़ेगा। मनु की आर्थिक स्थिति का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि अब तक हुए इलाज का पैसा, मनु के साले ने दिया था। स्टाफ़ के जवाब से निराश मनु ने निश्चय किया कि वो अपने बच्चे का इलाज अब इस अस्पताल में नहीं करायेंगे। क्योकि दो दिन के इलाज के बाद भी बच्चे की हालत नहीं बता रहे हैं,तो ऐसे में कैसे अपने बच्चे को यहां छोड़ दें। मनु ने बताया कि वो बच्चे को दूसरे अस्पताल ले गयें, जहां दो 2 दिन इलाज होने के बाद उनका बच्चा ठीक हो गया। जिस दूसरे अस्पताल में मनु ले गए थे, वहां मशीन और दवाई का खर्चा 3500 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से लगा। 2 दिन इलाज करने के बाद अस्पताल वालों ने कुछ सावधानी बरतने की बात बताकर बच्चे को घर भेज दिया। मनु ने मुझसे कहा कि अब उनका बच्चा बिल्कुल ठीक है।
दूसरी घटना जिसको मैंने ख़ुद देखा। एक बच्चा जन्म लिया,जिसको सांस की समस्या थी। उसको शीशे में रखे पांच मिनट भी नहीं हुए होंगे, पैसे मांगने लगे। बच्चे के परिजन ने कहा कि अभी तो उनके पास उतने पैसे नहीं है जितने वो मांग रहें हैं। स्टाफ़ ने कहा कि पैसे जमा करने होंगे। परिजन ने किसी भी तरह से 2500 रूपये इकट्ठा कर जमा कर दिए। फिर स्टाफ़ ने कहा कि बाक़ी पैसा भी जल्दी जमा करा दो।
  

सोमवार, 17 जून 2019

बिहार की फ़िज़ा में डॉ. हर्षवर्धन की बातें गूंजने की क्या वजह है?

#2019 में #2014 की बात हो रही है। वैसे इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है और ना होनी चाहिए,क्योंकि एक नागरिक के रूप में हम इस रवायत के वाहक हैं। रविवार को मुज़फ़्फ़रपुर,बिहार के #SKMCH में केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री Dr. Harshvardhan बीमार बच्चों का हाल जानने के बाद मीडिया से गुफ़्तगू में जो बात कही, वही बात विपक्षी दलों और आम लोगों के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है। बात ये है कि 2014 में इसी हस्पताल में 20-22 जून के अपने दौरे के बाद डॉक्टर हर्षवर्धन ने एक ब्लॉग लिखा था। वो आज भी मौजूद है। चाहे तो पढ़ भी सकते हैं।
डॉक्टर हर्षवर्धन ने ब्लॉग के माध्यम से जो कहा था उसकी कुछ ज़रूरी बातें इस प्रकार है-
- #SKMCH में बच्चों के लिए 100 बिस्तर की व्यवस्था की जाएगी।
- मुज़फ़्फ़रपुर और दरभंगा में उच्चस्तरीय रिसर्च सेंटर क़ायम किया जाएगा।
- गया, भागलपुर, बेतिया, पावापुरी और नालन्दा में वायरोलॉजी लैब स्थापित किए जाएंगे।
- सौ फ़ीसद बच्चों का टीकाकरण होना चाहिए,एक भी नहीं छुटना चाहिए।
- मेडिकल कॉलेजों में सीटों की संख्या बढ़ेगी।
                                   क्या आप जानते हैं कि मंत्री जी ने जो-जो बातें कही थी, वो इन पांच सालों में पूरे हो गये? शायद नहीं। मेरे ख़याल में इसकी एक मात्र वजह है कि लोगों का सियासत का शिकार हो जाना। ये बात मैं इसलिए कह रहा हूँ कि रिसर्च के दौरान मैंने कहीं नहीं पाया कि मंत्री जी ने जो वादे किए थे,उसको लेकर सालभर,दो साल या तीन बाद भी इब्तिदा ना होने की वजह से लोग एहतेजाज के लिए अपने घरों से बाहर आए थे। हमारे मुल्क में ऐसी रवायत है कि एक मंत्रालय में शायद ही कोई मंत्री पांच साल बिताता होगा और अपने दृष्टिकोण के आधार पर काम कर पाता होगा, अपवाद को छोड़ दीजिएगा। यहां एक बात जोड़ना चाहता हूं कि पीएम Narendra Modi ने 2014 लोकसभा चुनाव प्रचार के दरमियान कहा था कि यदि हमारी सरकार बनेगी तो हमारे काम करने का तरीक़ा अलग होगा। वज़ारत तब्दीली की व्यवस्था केन्द्र और राज्य दोनों में है। इसके कारण क्या हैं,ये अलग चर्चा का विषय है। तो इसी व्यवस्था का शिकार हुए थे डॉक्टर हर्षवर्धन। दौरे के बाद उनका मंत्रालय बदल गया था और जेपी नड्डा को हमारे मुल्क के स्वास्थ्य विभाग की ज़िम्मावारी सौंपी गई थी। नड्डा जी ने एक स्वास्थय मंत्री होने के नाते, डॉक्टर हर्षवर्धन के वादों का कहीं ज़िक्र किया ऐसा कहीं पढ़ने को नहीं मिला। आप भी 2014 से अबतक #NEWINDIA की बातों में खोये रहें और #NEWINDIA का सपना दिखाने वाली हमारी सरकार भी। नतीजा ये हुआ कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ 'चमकी' बुखार से अबतक सौ से ज़्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। 2014 में 139 बच्चों की मौत हुई थी। अब मैं यहां ये कहना चाहता हूँ कि एक ज़िम्मावार नागरिक बनिए, सियासत को किनारे रखिए। वरना बुनियादी सुविधाओं के अभाव में बच्चे मरते रहेंगे,और नेताओं के भी रस्मी दौरे चलते रहेंगे। इसलिए रस्मी दौरों और बातों के चक्कर में अब से भी ना पड़िए, अपने विधायक, सांसद और मंत्रियों से अपनी बुनियादी ज़रूरतों की पूरा करने की मांग पर अड़े रहिए।

शनिवार, 15 जून 2019

‘फूट डालो और शासन करो’




पैट्रिक फ़ैंच  की किताब – आज़ादी या मौत

 

- वायसराय लॉर्ड रीडिंग को इस बात का एहसास था कि अगर फूट डालो और शासन करो वाली नीति अपनाई गई तो भविष्य में इसके दुष्परिणाम भुगतने होंगे। 1924 में उसने भारत के राज्य सचिव से कहा था कि हिन्दू-मुसलमान विवाद देश की शान्ति के लिए बड़ा ख़तरा है,लेकिन कुछ अंग्रेज़ो का मानना था कि हम इस बात का फ़ायदा उठा सकते हैं, लेकिन उन्हें यह एहसास नहीं हुआ कि अगर दोनों समुदायों में विरोधाभास लगातार बढ़ता रहा और वे इस झगड़े का निबटारा करने में नाकामयाब रहे, तो ऐसी परिस्थिति कितनी घातक हो सकती है।
                                                                                                                    (पेज- 51)

जलियावाला बाग़ से सम्बन्धित


पैट्रिक फ़ैंच  की किताब – आज़ादी या मौत
 


1919 में जलियावाला बाग़ में हुए नरसंहार के बाद बापू ने कहा था कि वहां मरने वाले को  किसी भी रूप में शहीद नहीं कहे जा सकते। शहीद वे तब अगर ( जवाब में ) उन्होंने ने अपनी तलवारें म्यान से निकालकर मुक़ाबला किया होता या कम-से-कम लाठी ही चलाई होती या जब डायर पूरी धृष्टता से वहां घूस आया था तो उसके सामने छाती तान कर खड़े हो जाते। उन्हें  जान बचाकर नहीं भागना चाहिए था।                                                                                          ( पेज- 24)

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...