बुधवार, 18 दिसंबर 2019

शक और आशंकाओं के आधार पर हिंसा कर आप ख़ुद का नुक़सान रहे हैं।




दो-तीन दिनों पहले बालकनी में कपड़े धो रहा था। कपड़े धोने के बाद जैसे ही मैं खड़ा हुआ, मेरी नज़र तस्वीर में दिख रहे उस इंसान पर पड़ी जो काली टोपी, काले रंग का पजामा, पैरों में चप्पल जो एड़ी और अंगुलियों के नीचे घिस हुई थी और कुर्ता पहने हुए हैं। ये इंसान खैनी मल रहे थें और जैसे ही हमारी नज़र मिली, खैनी मलते हुए इन्होंने मुझे इशारे में सलाम किया, मैं भी तुरन्त ही सलाम का जवाब सलाम-सलाम बोलते हुए दे दिया। फिर हम दोनों अपने-अपने काम में लग गयें। हम एक-दूसरे को नहीं जानते हैं। दिल्ली में एक-दो सालों बाद रहते हुए क़रीब एक दशक हो जाएगा,लेकिन ये सुब्ह सबसे यादगार बन गई है। भाग-दौड़ भरी शहरी ज़िन्दगी जिसमें दुआ-सलाम के हमारे पारम्परिक तौर-तरीक़े को Hi-Hello ने अलग-अलग वज्हों से लगभग समाप्त कर दिया है, ऐसे में किसी शहरी में आज भी हमारे पारम्परिक तौर-तरीक़े बाक़ी हैं, ये इस शहर में रह रहे युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्त्रोत से कम नहीं है। 


कपड़ों को सूखने के लिए डालने के बाद, चाय और अख़बार लेकर मैं बैठ गया। ख़बरों मे ख़बर एक दिन पूर्व हुए जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के सामने से गुज़रे वाली सड़क पर हुई हिंसा थी। ख़बरों को पढ़ने के बाद मेरे दिमाग़ में दो तस्वीरें, पहली तस्वीर पुलिस और उपद्रवियों वाली और दूसरी वो जो सुब्ह में इंसान से मेरी दुआ-सलाम हुई थी। दोनों तस्वीरों की तुलनात्मक अध्यन के बाद मैं जिस निष्कर्ष पर पहुंचा वो ये है कि धर्म की बात, धर्म के नाम पर हिंसात्मक ख़याल तब ही आ सकते हैं जब पेट भरा हो। वरना पेट ख़ाली होगा तो इंसान पहले पेट भरने का इन्तज़ाम में लगेगा। जैसे मैं भी चिन्तन करने के बाद काम पर चला गया और तस्वीर में दिख रहें दोनों इंसान अपने काम में लगे हुए थें।


संसद में जब से नागरिकता संशोधन बिल पास हुआ है,उसके बाद से देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों में ज़बरदस्त हिंसा और आगजनी हुई। इन राज्यों के लोग अपनी संस्कृति,अपनी पहचान,अपनी भाषा के धूमिल होने को लेकर आशंकित हैं। उन लोगों का विरोध धर्म को लेकर नहीं है। लेकिन उन राज्यों से इतर, देश के दीगर हिस्सों में पिछले तीन-चार दिनों से कुछ जगहों पर नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर हिंसक विरोध प्रदर्शन और आगजनी हुई। शक और आशंकाओं के आधार पर उपद्रवियों ने सरकारी सम्पतियों को नुक़सान पहुंचा दिया। शक और आशंकाओं के आधार पर देश के युवा, ख़ासकर मुस्लिम युवकों को गुमराह करने के लिए एक गिरोह सक्रियता से काम कर रहा है और तोड़फोड़ आगजनी जैसे कामों पर लगा रहा है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं कि ज़्यादातर उपद्रवियों को ये तक नहीं पता था कि नागरिकता संशोधन क़ानून क्या है। लेकिन वो बसों और सरकारी सम्पतियों में आग लगा रहे थें और निर्दोषों पर हमला तक किए। कल ही दिल्ली के सीलमपुर में उपद्रवियों ने एक स्कूल बस पर तक हमला कर दिया था।


नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ लिखने और बोलने वालों से बातचीत या उनके लिखे के आधार पर साफ़-साफ़ पता लग जा रहा है कि वो या तो नागरिकता संशोधन क़ानून ठीक से नहीं जानते हैं या फिर सुनी-सुनाई बातों जैसे इस क़ानून में संवैधानिक प्रावधानों का ख़याल नहीं रखा गया है। इस बिल से मुस्लिमों को ख़तरा है उनकी नागरिकता छीन जाएगी वग़ैरह-वगैरह। आज ही सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता संशोधन क़ानून पर दायर 59 याचिकाओं पर सुनवाई करने के बाद कहा है कि वो इस क़ानून को जांच रहे हैं। सरकार को नोटिस जारी कर जनवरी के दूसरे हफ़्ते तक जवाब मांगा है। और फ़िलहाल इस क़ानून के तहत मिलने वाली नागरिकता पर रोक लगाने से इंकार कर दिया है। 


मैंने कई लोगों से जो इस बिल के ख़िलाफ़ हैं, उनसे बातचीत की। मैंने पूछा कि नागरिकता संशोधन क़ानून के उस प्रावधानों को मुझे बताइए, जिससे हिन्दुस्तान के मुसलमानों की नागरिकता छीन जाएगी? ये सवाल सुनते ही ऐसे लोग नागरिकता संशोधन क़ानून को छोड़ एनआरसी यानि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर की बात करने लगते हैं। कहते हैं कि अस्ली खेल तो एनआरसी से है। कहते हैं केन्द्र सरकार मुस्लिम विरोधी है। कल भी गृहमंत्री अमित शाह ने टाइम्स नाउ से बातचीत में साफ़-साफ़ कहा है कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर तैयार किया जाएगा, लेकिन संवैधानिक प्रावधानों को देखते हुए। नाविका कुमार से गृहमंत्री ने कहा कि एनआरसी में यदि हमारी सरकार कुछ ग़लत भी करेगी, तो हमारे ऊपर कोर्ट है ना। इसका मतलब साफ़ है कि यदि एनआरसी आएगा तो संवैधानिक प्रावधानों का ख़याल रखा जाएगा। इसलिए देश के युवाओं को, ख़ासकर  मुस्लिम युवकों को ज़रूरत है अपने आंख-कान खोलने की और गुमराह करने वालों से दूरी बनाने की। हिन्दुस्तान हम सबका है, हम सब हिन्दुस्तानी हैं। कोई भी सरकार होगी, हमारे संविधान का अनदेखा नहीं कर सकती है। किसी भी सरकार को कोई भी क़ानून बनाते समय संविधान से ही गुज़रना पड़ेगा। कोई सरकार मनमानी नहीं कर सकती है। 

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