रविवार, 8 दिसंबर 2019

"घड़ी में सुई नहीं थी"

गत शुक्रवार की शाम जब पटना से विमान ने उड़ान भरा तो पहले से तय प्लानिंग के अनुसार मैंने काम किया। विमान चालक और विमान परिचारिका के निर्देशों को सुनने और अमल करने के बाद मैंने रूचिर शर्मा की ये 👇 किताब पढ़नी शुरू कर दी। इस किताब का पहला अध्याय जिसका नाम है ' घड़ी में सुई नहीं थी'। इस अध्याय में रूचिर ने उस काल-खण्ड के ग्रामीण जीवन को याद किया है कि कैसे गांवों में जाति के नाम पर भेद किया जाता था। संसाधनों के बिना ज़िन्दगी की गुज़र-बसर कैसे होती थी। शब्द-विनिमय का लहजा कैसा होता था। पढ़े-लिखे व्यक्ति को समाज कैसे देखता था वग़ैरह-वग़ैरह। 
इस अध्याय को पढ़ने के बाद जो-जो बातें इस किताब में लिखी हुई है, उससे मैंने वर्तमान के और अपने बचपन के ग्रामीण जीवन की तुलना की, तो मैंने पाया कि कितना कुछ बदल गया और कितना कुछ बदलना बाक़ी है। वर्तमान में गांवों का पूर्ण रूपेण शहरीकरण तो नहीं हुआ है,  लेकिन हां, अब गांव पहले वाला गांव नहीं रह गया है। इसकी मुख्य वज्ह है गांव के लोगों में जीवन स्तर को सुधारने को लेकर प्रतिस्पर्धा। जिसकी माली हालत जैसे भी है, उतने में ही लोग अपनी ज़िन्दगी को हर सम्भव सुदृढ़ बनाने में जुटे हुए हैं। गांव की युवा पीढ़ी जो इस सदी में बालिग हो चुकी है, उसने ये नहीं देखा है कि रामायण और महाभारत के प्रसारण के समय लोग पूजा-सामग्री लेकर टेलीविज़न के सामने बैठते थें। इस सीरियल के कालाकारो को लोग भगवान की तरह देखते थें। बदलते वक़्त में इस बालिग पीढ़ी ने आधुनिक जीवन को देखा है। इस पीढ़ी में ख़ुद को शहरी जीवन के रफ़्तार में शामिल करने की लालसा है। आधुनिक जीवन की सारी सुविधाओं को गांव में रहते हुए हर सम्भव पूरा करने के लिए दिन-रात एक किए रहता है। जाति-भेद और शब्द विनिमय का वक़्त उसके पास बचा नहीं है। अपवाद को छोड़ दें।

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