मंगलवार, 13 मार्च 2018

कदाचार और भ्रष्टाचार मुक्त परीक्षा की मांग पर अड़े हैं छात्र।

हाथ में तिरंगा झण्डा,'आखें खोलिए मोदी जी,आपका युवा दर-दर की ठोकर खा रहा है' और 'ना मंदिर चाहिए,ना मस्जिद चाहिए,हमें सिर्फ़ नौकरी चाहिए' जैसे लिखित और मौखिक नारों के साथ देश के भविष्य कहे जाने वाले अपने ही भविष्य की लड़ाई लड़ रहें है।कर्मचारी चयन आयोग से लड़ने वाले इन योद्धाओं को लड़ाई में विजय हासिल हो,उसके लिए मेरी शुभकामनाएं।27 फ़रवरी से लगातार प्रदर्शन कर रहे इन अभ्यर्थियों को सरकार की तरफ़ से भी सार्वजनिक रुप से 'स्पेशल थैंक्स' बोला जाना चाहिए,क्योंकि ये 'एक पंथ दो काज' कर रहें हैं।प्रदर्शन कर ये अभ्यर्थी अपने भविष्य की चिन्ता तो जता हीं रहे हैं,साथ हीं सरकार को निन्द से जगा रहे हैं कि उठिये...देखिए,आज़ादी के 70 साल बाद भी हमारे पास ना तो कदाचार मुक्त परीक्षा व्यवस्था है और ना ही भ्रष्टाचार मुक्त संस्थान।
प्रदर्शन कर रहे इन छात्रों के कथित आरोपों के बाद कर्मचारी चयन आयोग में  पुर्ण रुप से आत्मविश्वास की कमी दिखी।जब छात्रों ने आरोप लगाया कि पेपर लीक में एसएससी के अधिकारी और ऑनलाइन परीक्षा संचालन करने वाली एजेंसी भी शामिल है।तब एसएससी ने आरोपों को ख़ारिज कर,छात्रों पर हीं आरोप लगा दिया।आयोग ने बयान जारी कर कहा कि सभी आरोप बेबुनियाद है।हमने अपने आंतरिक सूत्र से आरोपों की जांच की है और पाया है कि आरोप पूरी तरह से शरारतपूर्ण है।छात्रों द्वारा ये कदम बदनियती से और परीक्षा से ध्यान हटाने के लिए उठाया गया।अब आप ही सोचिए कि,क्या कोई भी छात्र ऐसा चाहेगा कि जिसके लिए वो ना जाने कितने मुश्किलों का सामना कर,सालों से परीक्षा की तैयारी कर रहा है और जब परीक्षा का समय आए तो वो शरारत करने लगे,अपवाद की बात नहीं कर रहा हूं।छात्र जब सीबीआई जांच की मांग पर अड़े रहें तो,क्यों आयोग ने छात्रों से मिलकर गहन जांच की बात कही?आयोग क्यों इस बात पर नहीं अड़ा रहा कि हमने कदाचार मुक्त परीक्षा कराई?शायद इसलिए कि एक छात्र के नाम पर क़रीब 750 प्रवेश-पत्र इसी संस्थान द्वारा किया जा सकता है।बयान में आयोग ख़ुद को जितना गंभीर बता रहा है,तो क्यों हर तरह की जांच को पास करने के बाद भी सालों से अभ्यर्थी अपने नियुक्ति पत्र का इन्तज़ार कर रहें हैं?
अब बात करते है कि हमारी सरकारों ने अबतक छात्रों के आन्दोलन को कितनी गम्भीरता से लिया,क्योंकि चुनाव के वक़्त इन लोगों को युवाओं के बेरोज़गारी की चिन्ता बहुत सता रही थी।मुझे सबसे ज़्यादा प्रधानमंत्री की ख़ामोशी हैरान कर रही है कि ऐसा क्या कर दिया है इन छात्रों ने कि पीएम कुछ बोल नहीं रहें है?वो तो देश की युवा शक्ति पर गर्व करते हैं।पीएम की चुप्पी पर कई लोग ये दलील दे रहें है कि हर चीज़ पर बोले तब तो हो गया।मैं ऐसे लोगों से पूछना चाहता हूं कि क्या ऐसी कोई सूची है जिसमें लिखा हो कि पीएम इस मसले पर बोलेंगे,इसपे नही?चुप्पी के मामले में मुख्यमंत्री भी पीछे नहीं है।देश के अलग-अलग राज्यों से युवाओंं की जमात 'दिल्ली चलों' का पालन कर रहा है,लेकिन अरविन्द केजरीवाल को छोड़कर किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने इस मसले पर बोलना उचित नहीं समझा है,शायद इसलिए की ये धार्मिक नही बल्कि रोज़गार का मसला है।जिस देश में एक फ़िल्म को लेकर मीडिया और सियासत में क़रीब तीन महीने तक चर्चा हो जाए।क़रीब-क़रीब आठ से दस राज्यों के मुख्यमंत्री में से कुछ सर्वोच्च न्यायालय पहुंच जाए और उसी देश मेें कदाचार और भ्रष्टाचार को लेकर प्रदर्शन कर रहे युवाओं को नेताओं का सहयोग ना मिले तो क्या ये समझा जाए कि सरकार की नज़र में धार्मिक मसला महत्वपूर्ण है,रोज़गार नहीं?
दिल्ली स्थित एसएससी मुख्यालय के बाहर 27 फ़रवरी से प्रदर्शन शुरु होती है,उसके 5 दिन बाद यानी 4 मार्च को दिल्ली बीजेपी के अध्यझ मनोज तिवारी और सांसद मीनाक्षी लेखी अभ्यर्थियों से मिलने पहुंचते हैं।इन दोनों को किसी और राज्य के सांसदों का साथ नही मिला,जबकि राज्यों के ज़्यादातर सांसद अपने संसदीय क्षेत्र छोड़कर दिल्ली में ही डेरा जमाए रहते हैं।मनोज तिवारी का कार्य सराहनीय रहा,लेकिन अब तक उनका कोई फ़ायदा नही दिख रहा है।तिवारी ने गृहमंत्री राजनाथ सिह,भाजपा अध्यझ अमित शाह और पीएमओ में मंत्री जितेन्द्र सिंह को मिलकर छात्रों की मांग से अवगत कराया।मीनाक्षी लेखी ने वही कहा,जो आज कल चलन में है।जब कोई अपनी मांग को लेकर प्रदर्शन करता है,तो ये बता दिया जाता है कि इसमें बाहरी लोगों का हाथ है।गृहमंत्री द्वारा सीबीआई जांच के आश्वासन के बाद भी आज तक छात्र प्रदर्शन कर रहें हैं,क्योंकि उनको जिस बात का शक था वही हुआ।सीबीआई जांच शुरू हुआ कि नही?यदि जांच शुरू हो गया है,तो जांच कहां तक पहुंची?ऐसे सवालों का सरकार के तरफ़ से कोई जवाब नही दिया जा रहा है।जिससे छात्र आश्वस्त हो सके।







🗣️मुझे तो संशय है!

नासिक से क़रीब 180 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर तक़रीबन 35000 युवाओं,महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों की झुंड मुम्बई के आज़ाद मैदान पहुंची तो,शायद राज्य सरकार को पता चला कि कोई हमारे दर पर आया है।मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने पीसी कर जो कहा वो बेहद हैरान करने वाला है।मुख्यमंत्री की पीसी में ऐसा लगा कि उनको 'किसान' शब्द से परहेज़ है।किसानी तो एक पेशा है।वो किसी भी जाति या धर्म से हो सकता है।आदिवासी भी तो खेती करते ही हैं।उन्होंने कहा कि लॉन्ग मार्च कर आए लोगों की क़रीब-क़रीब सारी मांगें मान ली गई है।मार्च में 90% लोग आदिवासी हैं।मुख्यमंत्री के पास ऐसी कौन सी तकनीक है,जिससे कुछ हीं घंटों के भीतर उन्हें पता चल गया कि इतने प्रतिशत लोग आदिवासी हैं?इससे पहले जब 'पैदल लॉन्ग मार्च' शुरू हुआ था तब से लेकर आज़ाद मैदान, मुम्बई पहुंचने तक यही पता था कि इसमें ज़्यादातर किसान हैं,जो महाराष्ट्र सरकार पर वादाख़िलाफ़ी का आरोप लगा रहें हैं।इनकी मांग है कि सरकार स्वामीनाथन आयोग कि सिफ़ारिशों को लागू करे।मांग नहीं माने जाने तक वो विधानसभा का घेराव करेंगे।
मुख्यमंत्री की पीसी के बाद से एक सवाल ये है कि उन्होंने 180 किमी की पैदल यात्रा क्यों करवाई,जब उनको आदिवासियों की समस्या पहले से हीं पता था?सीएम ने कहा कि लिखित रूप में आश्वासन दिया गया है कि आदिवासियों की मांग को छह महीने के भीतर पूरा कर दिया जाएगा।लेकिन ये नहीं बताया कि कैसे?जो क़ानून क़रीब बारह साल में लागू नहीं कर पाए,वो छह महीने में कैसे लागू कर देंगे?15 दिसम्बर 2006 को संसद में पास 'अनूसुचित जाति और अन्य परम्परागत वन्य निवासी क़ानून' की महाराष्ट्र की हक़ीक़त ये है कि मात्र दो ज़िले गढ़चिरौली और नन्दूरबार में पुर्ण रूप से तो नहीं लेकिन लागू हो गया है।
किसानों की बात करें तो 20 जून 2017 को किसानों की कर्ज़माफी का एलान किया था लेकिन अभी तक लागू नहीं हो पाया है जिसकी वज़ह से लॉन्ग मार्च करना पड़ा।

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

महिलाओं की सुरक्षा के प्रति कितनी लापरवाह है हमारी सरकारें!


निर्भया अब इस दुनिया में तो नहीं है,लेकिन वो जिस तरीके से हैवानियत का शिकार हुई थी,वक़्त-बे-वक़्त उसकी याद आ जाती है।गुगल करेंगे तो आप पाएंगें कि आज भी हमारे समाज में वैसे दरिदें हैं,जिनको कानून का डर नही है।याद कीजिए उस वक़्त के जन-आक्रोश को,जब निर्भया अस्पताल में ख़ामोशी से अपनी ज़िन्दगी से जंग लड़ रही थी,और देशभर में नेता और आम जनता अपने-अपने शहर के कोने-कोने में निर्भया के साथ हुए हैवानियत और महिलाओं की तत्कालिन सुरक्षा-व्यवस्था के ख़िलाफ़ तख़्ती लेकर सड़क पर मार्च कर रहे थें।क़ानून में बदलाव की मांग को लेकर लोग इतने गुस्से में थे,जैसे सिर्फ़ कानून में बदलाव कर देने से निर्भया के साथ जो हुआ,वो किसी बेटी के साथ नही होगा।लेकिन आज हक़ीकत ये है कि जब भी किसी लड़की/महिला के साथ बदसलूकी होती है तो वहां का समाज ख़ामोश तो रहता हीं है,वहां के विधायक और सांसद भी ना जाने क्यों ख़ामोश रह जाते हैं?कई बार तो पुलिस के काम करने का तरीक़ा भी हैरान कर जाता है।कानून में कई बदलाव भी हुए,उसका क़रीब पांच साल बाद कितना असर हुआ है शायद बताने की ज़रुरत नही हैं।मुझे लगता है कि ये कहना कि सिर्फ़ कड़े कानून बना देने से समाज में बदलाव हो जाएगा,ख़ुद को वास्तविकता से मुंह मोड़ने के जैसा है।बदलाव के लिए ज़मीनी स्तर पर लोगों और सरकारी कर्मचारियों को मिलकर काम करना ही पड़ेगा,ताकि निर्भया के साथ जो हुआ था वो किसी और बेटी के साथ ना हो। वरना एसी कमरे में लेदर की कुर्सी पर बैठकर क़ानून बनते रहेंगे और बदलाव सिर्फ़ काग़ज़ पर ही दिखेंगे।
निर्भया के साथ हुए जघन्य अपराध के बाद हो रहें तमाम विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए निर्भया एक्ट बनाया।2013 में बलात्कार पीड़िताओं को आर्थिक रुप से सहायता पहुंचाने और महिला सुरक्षा के लिए उठाये जाने वाले क़दमों पर ख़र्च करने के लिए निर्भया फ़ण्ड भी बनाया गया।पांच साल बाद भी हमारी सरकारें महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कितनी लापरवाह हैं,इसका अंदाज़ा इन बातों से लगाया जा सकता है।निपुण सक्सेना की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 9 जनवरी को आदेश देते हुए सभी राज्य सरकारों से कहा था कि वो बताए कि उन्होनें यौन उत्पीड़न से पीड़ित महिलाओं को निर्भया फ़ण्ड से कितना पैसा दिया गया और किन-किन पीड़ित महिलाओं को दिया गया।आपको जानकर हैरानी होगी कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावज़ूद 24 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों ने हलफ़नामा दाख़िल नहीं किया।
हलफ़नामे के संदर्भ में अब बात करते हैं उन दो राज्यों की,जिसके मुख्यमंत्री महिला सुरक्षा को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं।पहले बात करते हैं मध्य प्रदेश की।भोपाल में एक छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के बाद 9 नवम्बर को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि वो राज्य में सुरक्षा का ऐसा वातावरण चाहते हैं,जिसमें बहन-बेटिया अपनी मर्ज़ी से कहीं भी आ-जा सके।हादसे के बाद थाने में रिपोर्ट लिखवाने के लिए छात्रा को 3 थानों के बीच 24 घंटे भटकना पड़ा था।ये सब उस छात्रा के साथ हुआ,जिसके माता-पिता ख़ुद पुलिस में हैं।हलफ़नामें पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमुर्ती दीपक गुप्ता की पीठ ने बलात्कार पीड़िता को 6000-6500 रुपये देने पर,जमकर प्रदेश सरकार को फ़टकार लगाई।पूछा कि क्या आप खैरात बांट रहें है?आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?आप एक बलात्कार की कीमत 6500 रुपये लगा रहें है?आगे कहा कि वो हतप्रभ हैं निर्भया कोष योजना के तहत केन्द्र से सबसे अधिक पैसा प्राप्त करने वाला राज्य,बलात्कार पीड़िताओं को मात्र 6000-6500 रुपया दे रहा है।एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2017 में देश में 28,947 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना दर्ज़ की गयी।जिसमें सिर्फ़ मध्यप्रदेश में हीं 4882 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना हुई,जो सभी राज्यों में अव्वल है।
अब बात करते हैं हरियाणा की।जनवरी मध्य में 48 घन्टे में मानवता को शर्मासार कर देने वाली बलात्कार की 4 वारदात से अभी हरियाणा उभरा भी नही था कि,सीएम मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि रेप की घटनाओ की सत्यता की पुष्टि होने से पहले सनसनी नही फ़ैलानी चाहिए।रेप के मामलों की संख्या बढ़ती हुई इसलिए नज़र आ रही है,क्योंकि उन में से कई फ़र्ज़ी आरोप होते हैं।क़ायदे मुख्यमंत्री को तो ये बताना चाहिए वो बलात्कार पीड़िता को इंसाफ़ दिलाने के लिए क्या कर रहें हैं?मध्य प्रदेश के बाद हरियाणा सरकार को पीठ ने जमकर फ़टकार लगाई।हरियाणा सरकार के वकील ने जैसे ही कहा कि वे हलफ़नामा दायर कर देंगे तो पीठ ने कहा,'अगर आपने हलफ़नामा दायर नहीं किया है तो इससे साफ़ पता चलता है कि अपने राज्य में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर आपके क्या विचार हैं।अपने राज्य की महिलाओं से कह दीजिए कि आपको उनकी परवाह नही है।'मुझे लगता है कि हरियाणा सरकार के नही कहने के बावज़ूद,आय दिन हो रही घटनाओं से पता तो चलता ही है कि महिलाओं की सुरक्षा को लेकर राज्य सरकार कितना गम्भीर है।
ये तो हुई भाजपा शासित दो राज्यों की बात।अब बात करते हैं केन्द्र सरकार की।27 नवम्बर को राज्यसभा सांसद के रहमान ख़ान ने पूछा कि निर्भया फ़ण्ड के तहत तीन साल में अब तक कितनी रेप पीड़िताओं को सहयोग राशि प्रदान की गई है और कितनो को मिलना बाकी है?जवाब में गृह मंत्रालय ने कहा कि रेप पीड़िताओं को सहयोग राशि का फ़ॉर्म सीधे राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों द्वारा भरा जाता है,इसलिए कितनी रेप पीड़िताओं को सहयोग राशि मिलना अभी बाकी है,इसका आंकड़ा केन्द्र सरकार के पास नहीं है।मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ निर्भया फ़ण्ड से अगस्त 2017 तक 3000 करोड़ में से मात्र 264 करोड़ रुपये ख़र्च किये गए हैं।तो ये है महिलाओं की सुरक्षा के प्रति केन्द्र और राज्य सरकार की तत्परता।इसलिए व्यक्तिगत कर्तव्य समझकर आगे आईये और सुनिश्चित कीजिए कि कोई बेटी दरिन्दगी की शिकार ना हो।वरना जब-जब किसी बेटी के साथ हैवानियत होगी,समाज में बुरे माहौल का निर्माण होगा।




शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

बात,शिवराज के शासनकाल में संसाधनों से वंचित गांव की!

                 
चारो तरफ़ अंधेरे का साया है,अंधेरे साये के बीच दीये की रौशनी से ही ख़ुद की भविष्य रौशन करने में जुटी छात्राओं की ये तस्वीर भारत के ह्रदय कहे जाने वाले राज्य मध्य प्रदेश के फुटेरा धाने गांव की है।इस राज्य में 2003 से लगातार बीजेपी की सरकार है।पहले उमा भारती,बाद में बाबूलाल गौर और उसके बाद नवम्बर 2005 से लगातार शिवराज सिंह चौहान के हाथों में इस राज्य की बागडोर है।अति न्यूनतम संसाधन में भी भारत की साक्षरता दर बढ़ाने में जुटी भारत की इन होनहार बेटियों की तस्वीर,ये बता रही है कि सरकारों द्वारा विद्युतीकरण को लेकर चलाई चलाई जा रही अनेकों योजनाओं में से किसी एक का भी पहुंचना अभी बाकी है,जिसकी वज़ह से आज भी इस गांव के ज़्यादातर हिस्से में अंधेरा कायम है।बिजली के मामले में सरप्लस वाला राज्य मध्य प्रदेश के एक गांव का ये हाल हैरान करने वाला है।हाल ही में राज्य की बिजली कम्पनियों ने एक दिन में अधिकतम 12 हज़ार मेगावाट से अधिक की मांग को पूरा करने का रिकॉर्ड कायम किया है।राज्य के पावर प्लांटों की कुल बिजली उत्पादन की क्षमता 17.5 हज़ार मेगावट से अधिक है।
फुटेरा धाने गांव एक छोटा सा गांव है,जिसमें मात्र 15 परिवार रहते हैं।इस गांव में ना ही सड़क अच्छी है,ना पानी की उत्तम व्यवस्था है।पढ़ने के लिए बच्चों को रोज़ 8 किलोमीटर जाना पड़ता है।गांव वालों का कहना है कि वो बार-बार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को अपनी समस्याओं के बारे में बताते हैं,लेकिन सरकार हमारी समस्याओं के निदान के लिए कोई कदम नही उठाती है।मैं मध्य प्रदेश कभी नही गया हूं,इसलिए मैं सिर्फ़ राष्ट्रीय मीडिया के माध्यम से ही मध्य प्रदेश को जानता हूं।राष्ट्रीय मीडिया मध्य प्रदेश की समस्याओं को कैसे कवर करती है,इसी ख़बर को गूगल करके देख लीजिए।तेज़ी से विकसीत हो रही शीर्ष के दूसरे राज्य से जब ये ख़बर सामने आई तो मैं चौंक गया।मैंने व्यक्तिगत तौर पर इस गांव की समस्या के बारे में जानने की कोशिश की।मैं चाहता था कि असली वज़ह को आपके सामने लाऊं।मैंने चुनाव आयोग,सीएमओ,सीएम से वहां के विधायक और सांसदों के बारे में जानने की कोशिश की,लेकिन कोई जवाब ना मिलने के कारण रहनुमाओं का पक्ष नहीं जान पाया।
डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम ने अपनी किताब इण्डिया-2020 में लिखा है कि विकसित भारत बनाने के लिए कुछ क्षेत्रों में एकीकृत रुप से अनिवार्य विकास करना होगा,जिसमें ऊर्जा का भी स्थान है।डॉ0 कलाम,देश में लगातार तेज़ी से कम हो रहे ऊर्ज़ा के स्रोतों को लेकर चिन्तित थें।उन्होंने 2012 में काशी विश्वविद्यालय में आयोजित 20 वीं राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस के उद्घाटन समारोह को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए अपने चिन्ता जाहिर भी की थी।दुबई वैश्विक ऊर्ज़ा मंच-2011 में डॉ0 कलाम ने भारत द्वारा राजस्थान में सौर ऊर्जा केन्द्र के लिए शुरु किए गए कार्यक्रम की प्रशंसा की थी।डॉ0 कलाम ने कहा था कि एक सतत ऊर्जा कार्यक्रम की शुरूआत होने से हम बहुत खुश हैं।निरंतरता दो चीजों से आती है।पहली उपलब्धता और दूसरी यह कि भविष्य में हमारे पास स्वच्छ ऊर्ज़ा हो।2011 में ही एशियाई विकास बैंक के निदेशक माइकल बैरो ने कहा था "दुनिया में उच्च स्तर के सौर ऊर्ज़ा की क्षमता वाले देशों में भारत भी है।" ऐसा ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी लगता है।इसलिए उन्होंने बिजली सहज हर घर योजना-सौभाग्य के तहत सौर ऊर्ज़ा पर ज़्यादा बल दिया है।
केन्द्र सरकार बार-बार ये कहती है कि हम देश के कोने-कोने में 24*7 बिजली उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं।सरकार द्वारा जुलाई 2015 से दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना और सितम्बर 2017 से बिजली सहज हर घर योजना-सौभाग्य चलाई जा रही है।सौभाग्य योजना के तहत सुदूर और दुर्गम इलाकों को भी रौशन करने का प्रावधान है।योजना के तहत सुदूर और दुर्गम इलाकों में 200 से 300 डब्लूपी का सोलर पावर पैक देने का प्रावधान है।पैक में 5 एलईडी बल्ब,एक डीसी पंखा और एक डीसी पावर प्लग का प्रावधान होगा।सरकार पांच साल तक बैट्री बैंक के मरम्मत का भी ख़र्च उठाएगी।योजना का उद्घाटन करते हुए पीएम मोदी ने दोहराया था कि सरकारी कर्मचारियों को अपने कार्यशैली में बदलाव करना ताकि योजना का लाभ सभी को मिल सके।पीएम की बात को सरकारी कर्मचारियों ने कितना माना है,आपके सामने है।मध्य प्रदेश के मुरैना से बीजेपी सांसद अनूप मिश्रा ने लोकसभा में कहा कि केन्द्र की मोदी सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन पर निगरानी की कमी है।निगरानी ज़रुरी है तभी जनता को योजनाओं का लाभ मिलेगा।अनूप मिश्रा जैसे कई लोग हैं,जो आवाज़ उठाते हैं,लेकिन उनकी सुनी नही जाती है। 


                                                          

सोमवार, 22 जनवरी 2018

मेघालय के मातृसत्तात्मक समाज में महिलाओं की सियासी शून्यता!



3 मार्च 2018 को ये तय हो जाएगा कि मेघालय की सत्ता किसके हाथों में होगी।वर्तमान में मेघालय की कमान कांग्रेस के मुकुल एम.संगमा के हाथों में है।चुनाव आयोग के मुताबिक 18 फ़रवरी को मेघालय की जनता अपने मताधिकार का उपयोग कर 12वें मुख्यमंत्री का चयन करेगी।60 विधानसभा सीट वाले इस राज्य की राजनीति में पुरुषों का दबदबा है।महिला विधायकों की संख्या मात्र 5 है,यानि विधानसभा में मात्र 8.33% महिलायें प्रतिनिधित्व करती हैं।ये स्थिती तब है,जब मेघालय एक महिला प्रधान राज्य है।मेघालय एक महिला प्रधान राज्य है,ये सुनकर आप आश्चर्यचकित हो गए ना,लेकिन हक़ीकत यही है कि यहां की आधे से भी अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व महिलाएं करतीं है।आने वाले दिनों में यहां की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कितनी बढ़ती है,ये आगामी चुनाव में पता चल जाएगा।राजनीति में भले हीं महिलाओ की भागीदारी है,इससे इतर इस राज्य में महिलाओ की एक हक़ीकत साझा करने से पहले,ये कहना चाहता हूं मेघालय की राजनीति में हीं महिलाओं की स्थिति ऐसी हैं,ऐसा बिल्कुल नही है।दरअसल भारतीय राजनीति में अभी भी पुरूषवादी सोच के साथ और भी कई कारण है,जो राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में बाधक हैं।और ये एक अलग चर्चा का विषय है।
ख़ैर अब आते हैं उस हक़ीकत पर,जो पुरूषवादी सोच और पितृसत्तात्मक समाज से बिल्कुल उलट है।मैं रिसर्च तो मेघालय की राजनीति में युवा पीढ़ी की महिलाओं की भागीदारी पर कर रहा था,लेकिन मेरे हाथ ये हक़ीक़त लगी। इस हक़ीक़त के बारे में जब मैं पढ़ा,तो मेरे 'और जानने की लालसा' ने कई घटों तक रिसर्च करने के लिए प्रेरित किया।मगर अफ़सोस की कई घटों तक रिसर्च करने के बाद मेघालय की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी और खासी समुदाय के बारे में हिन्दी या अंग्रेज़ी में मुझे कोई ताज़ा जानकारी हासिल नही हो पाई।शायद इसके पीछे भौगोलिक दुरी और भाषाई विषमता भी हो सकती है। एक रिपोर्ट 2013 की हाथ लगी जिसमें वर्षों पुरानी 'मातृसत्तात्मक' प्रथा को लेकर जानकारी मिली।
मेघालय को 'बादलों का निवास स्थान ' भी कहा जाता है और इसी निवास स्थान से जुड़ी यहां की हक़ीक़त ये है कि यहां की खासी समुदाय में विवाह के पश्चात पुरूषों का निवास स्थान पत्नी का घर होता है।राज्यभर में इस समुदाय की आबादी लगभग 50% है और भारत के पूरब का स्कॉटलैण्ड यानि मेघालय की राजधानी शिलांग में ज़्यादातर खासीयों की हीं जनसंख्या है।इस समुदाय की विशेषता ये है कि ये मातृसत्तात्मक परिवार होते हैं अर्थात महिला घर की मुखिया होती है।वंशावली नारी से ही चलती है,और बच्चों को उनकी मांओं का उपनाम दिया जाता है।आमतौर पर महिलाओं को समानता के साथ अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते सुना होगा,लेकिन यहां पुरुषों ने अपने अधिकारों के लिए 1960 के आस-पास जंग शुरु की थी,लेकिन उसी वक़्त खासी जाति की महिलाओं ने एक विशाल सशस्त्र प्रदर्शन किया,जिसके बाद पुरूषों का विरोध ठंडा पर गया।इसी वक़्त रिम्पाई थिम्पाई नामक एक संस्था का गठन होता है,जो वर्तमान में भी पुरूषों की अधिकार की लड़ाई लड़ रही है।भारतीय संविधान के अनुसार भारत की जनजातियां अपने पारंपरिक नियम ख़ुद बना सकती है।यहां हमेशा जाति के नियम और संविधान का टकराव होता है।जब लैंगिग मतभेद बहुत ज़्यादा बढ़ता है,तो न्यायालय को दख़ल देना पड़ता है।ऐसा सुनने में आता है कि पहले सिर्फ़ महिला अधिकारों की बात  होती थी,पुरूषों की नही।लेकिन महिलाएं इस बात को ख़ारिज करती हैं।
रिम्पाई थिम्पाई संगठन के एक कार्यकर्ता पारियात सिंगखोंग इस परम्परा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहें हैं। शिलांग के 60 साल के कारोबारी पारियात का मानना है कि खासी जाति के पुरूषों के लिए यह तरीक़ा बिल्कुल ग़लत है।मर्दों पर किसी तरह की ज़िम्मेदारी नहीं होती है,तो वे जीवन को आसानी से लेते हैं।इसकी वज़ह से वह ड्रग्स और शराब में फ़स जाते हैं और उनका जीवन व्यर्थ हो जाता है।अगर किसी पुरूष को अपनी सास के घर पर रहना पड़े,तो चुपचाप रहना पड़ता है।अाप सिर्फ़ बच्चा पैदा करने के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं।कोई भी आपकी आवाज़ को सुनने को तैयार नही होता है।किसी भी फ़ैसले में पुरूषों का कोई दख़ल नही होता है।पारियात की इन बातों में किसी हद तक सच्चाई तो है ही। इसी संगठन से जुड़े 41 साल के टीबोर लंगखोंगजी का कहना है कि खासी जाति के पुरूषों के पास सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं है।उनके पास ज़मीन नहीं है,वे परिवार का बिजनेस नहीं चला सकते और वे किसी काम के नहीं हैं।
खासी परम्परा के मुताबिक़ परिवार की सबसे छोटी बेटी सभी सम्पत्ति की वारिस होती है।इसकी वज़ह ये है कि माता-पिता को लगता है कि बेटी मरते दम तक उनकी देखभाल कर सकती है और वे अपनी बेटी पर आश्रित रह सकते हैं।महिलाओं का कहना है कि दिल्ली की घटना निर्भया गैंगरेप की दुखद घटना पूरी दुनिया में सुर्खियों में रही,इससे मातृसत्तात्मक समाज की प्रासंगिकता बढ़ गई है,और ये एक अच्छी परम्परा है।इसकी वज़ह से अधिकार महिलाओं के साथ रहता है और कई बुराइयां दूर रहती है।


बुधवार, 17 जनवरी 2018

हमारा लोकतंत्र ख़तरे में है नहीं,था!

मैं कानून का जानकार नहीं हूं,इसलिए कोई कानूनी बात नही करुंगा। मगर दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क का नागरिक होने के नाते गर्व से कह सकता हूं कि, मेैं स्वस्थ और ख़तरामुक्त लोकतंत्र में निवास कर रहा हूं जहां हर कोई को खुलकर बोलने के लिए स्वतंत्र है। बीते शुक्रवार को मीडिया के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के चार  जज जस्टिस  जे चेलमेश्वर,जस्टिस रंजन गोगोई,जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कूरियन जोसेफ ने प्रेस कांन्फ्रेस कर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के रवैये से अपनी नाराज़गी को देशवासियों के सामने ज़ाहिर की थी।इसके अगले ही दिन शनिवार को जस्टिस रंजन गोगोई ने कोलकत्ता में कहा कि कोई संवैधानिक संकट नहीं है, तो वहीं केरल में जस्टिस कूरियन जोसेफ ने भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट में कोई संवैधानिक संकट नहीं है। चार न्यायाधीशों ने सिर्फ़ प्रकिया से जुड़ा सवाल उठाया है।यह संस्थान का अंदरूनी मुद्दा है और संस्था इसका समाधान करेगी। ये कोई ऐसा मुद्दा नहीं है, जिसमें किसी बाहरी व्यक्ति की मध्यस्थता की ज़रूरत है। दो जजों के इस ह्रदय परिवर्तन से पहले, इन दोनों जजों के साथ दो और जज ने पीसी कर देश-दुनिया को बताया कि,दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का पर ख़तरा है, क्योंकि हिन्दुस्तान की न्यायपालिका स्वतंत्र और निष्पक्ष नही है। एक स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका अच्छे लोकतंत्र की निशानी है। इनकी पीसी के बाद हिन्दुस्तान के जिन लोगों का न्यायालय से भरोसा उठा,उसको फिर से कैसे वापस किया जाएगा, ये एक सवाल है,जिसका अब जवाब तलाश करना होगा।
जैसे ही सुप्रीम कोर्ट के नम्बर दो जस्टिस जे चेलमेश्वर ने कहा था, "हम चारों इस बात पर सहमत हैं कि इस संस्थान को बचाया नही गया तो इस देश में लोकतंत्र ज़िन्दा नही रह पाएगा। स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका अच्छे लोकतंत्र की निशानी है। मेैं नही चाहता कि 20 साल बाद इस देश का कोई बुद्धिमान व्यक्ति ये कहे कि चेलमेश्वर,रंजन गोगोई, मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ ने अपनी आत्मा बेच दी है।" वैसे ही वो ज़मात शक्रिय हो गए, जिनको साल 2014 के बाद से बात-बात पर लोकतंत्र ख़तरे में नज़र आता है। अंगुली पर गिनती के इस ज़मात के लोग इतनी विविधता वाले हिन्दुस्तान को अपने नज़रिए और विचार से देखते हैं, असहमति होने पर तानाशाही,अघोषित आपातकाल और लोकतंत्र ख़तरे में है, जैसी अनाप-शनाप बातें करने लगते हैं। ऐसे लोग एक निरंकुश समाज चाहते हैं, जो कि सम्भव नहीं है। क्या हमारा लोकतंत्र इतना कमज़ोर है कि कभी-भी कोई-भी उठकर अपनी असहमति प्रकट कर दे, तो लोकतंत्र पर ख़तरा आ जाएगा?
शुक्रवार को जो कुछ भी हुआ था, उसको मेैं आज़ाद भारत के न्यायपालिका के इतिहास का काला अध्याय तो नही, लेकिन कभी ना भुलने वाला अध्याय ज़रूर कहूंगा। इस अध्याय की दो ख़ास बात ये रही कि जजों ने अपनी बात को बिना हिचक देश के सामने रखा और मीडिया में जजों के प्रेस कांन्फ्रेंस को तरज़ीह दी गई। ये दोनों बातें इस बात कि तो पुष्टि करती ही है कि हमारा लोकतंत्र स्वस्थ और ख़तरे से मु्क़्त है। वरना न्यायपालिका के
इतिहास का एक अध्याय ये भी है जिसको 'लोकतंत्र का काला अध्याय' के नाम से जाना जाता है। स्वलाभ के लिए इस काले अध्याय की रचयिता पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मीडिया पर नियंत्रण करने के साथ-साथ,न्यायपालिका को पुर्ण रुप से  शक्तिविहीन करने की कोशिश की थी, जिसमें तत्कालिक सफ़लता भी मिली थी। वर्तमान में सत्ताधारी पार्टी के भीतर से हीं विरोध के आवाज़ उठते हैं, आपातकाल में तो उच्च पद और सत्ताधारी लोग ने तो अपनी आत्मा की आवाज़ तक को अनसुना कर दिया था। आपातकाल की घोषणा करते वक़्त श्रीमती गांधी ने अपने मंत्रिमंडल तक की सलाह नहीं ली थी। आपातकाल के पहले हफ़्ते में ही संविधान के अनुच्छेद 14,21 और 22 को निलम्बित कर दिया गया था। ऐसा करके सरकार ने कानून की नज़र में सबकी बराबरी,जीवन और सम्पत्ति की सुरक्षा की गारंटी और गिरफ़्तारी के 24 घंटे के अन्दर अदालत के सामने पेश करने के अधिकारों को रोक दिया गया था। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून में कई बार बदलाव किए गए। 29 जून 1975 को नज़रबन्दी के बाद बंदियों को कारण जानने का अधिकार भी ख़त्म कर दिया गया। नज़रबन्दी को एक साल से अधिक तक बढ़ाने का प्रावधान कर दिया गया। 16 जुलाई 1975 को इसमें बदलाव करके नज़रबन्दियों को कोर्ट में अपील करने के अधिकार से भी वंचित कर दिया गया। 10 अक्टूबर 1975 के संसोधन द्वारा नज़रबन्दी के कारणों की जानकारी कोर्ट या किसी को भी देने को अपराध बना दिया गया। जिन 42 जजों ने नज़रबंदियों के मुकदमों में न्यायसंगत फ़ैसले दिए या देने की कोशिश की, उन सबका तबादला कर दिया गया था।नागरिकों के साथ दुर्व्यहार,अन्याय और अत्याचार को लेकर नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाले वकीलो को भी नही बख़्शा गया था। वकीलों को ख़ासकर बार काउंसिल के अध्यझ राम जेठमलानी को सबक सिखाने के लिए संसद के कानून द्वारा अटॉर्नी जनरल को इसका अध्यझ बना दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने बिना दण्ड के जेल में न रखे जाने के अधिकार को छीनने की सरकार की कोशिश को असफ़ल कर दिया था। संविधान में 42 वां संसोधन कर इसके ज़रिए संविधान के मूल ढांचे को कमज़ोर करने, उसकी संघीय विशेषताओं को नुकसान पहुंचाने और सरकार के तीनों अंगों के संतुलन को बिगाड़ने का प्रयास किया गया।
अब आपके पास आज़ाद हिन्दुस्तान के न्यायालय की दो तस्वीर है।एक वर्तमानकाल की तो दूसरा आपातकाल की। अब आप ख़ुद तय कीजिए कि आप के लोकतंत्र की हालत कैसी है?







शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

जेपी की नज़र से हार्दिक की राजनीति को जानिए!

                           
गुजरात में लगातार छठी बार जीत दर्ज़ कर बीजेपी ने विपक्षियों को ये संन्देश दे दिया कि है कि उनके लिए गुजरात की सत्ता अभी दूर की कौड़ी है। यूपी में दो लड़कों की तर्ज़ पर, गुजरात में चार लड़कों ने मिलकर भाजपा के विजयी रथ को रोकने की हर सम्भव कोशिश की,लेकिन कोशिश नाकाम रही। गुजरात विधानसभा में कांग्रेस ब्रिगेड,जीत हासिल करने के लिए नये अवतार में दिखी। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने दलित नेता जिग्नेश मेवाणी,ओबीसी एकता मंच के नेता अल्पेश ठाकोर और पाटीदार नेता हार्दिक पटेल के सहयोग से भाजपा को घेरने की कोशिश करते रहें,लेकिन सफ़लता हाथ नही लगी।
इन तीन लड़कों में से एक ने यानि हार्दिक पटेल ने विधानसभा चुनाव से करीब दो साल(2015) पहले से ही पटेल राजनीति की शुरुआत कर दी थी। 25 अगस्त 2015 को अहमदाबाद की रेैली में मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक क़रीब 5 लाख़ से ज़्यादा पाटीदार शामिल हुए थे। हार्दिक ने इस दिन को पाटीदार क्रान्ति दिवस घोषित किया। तब से लेकर अब तक हार्दिक की छवि एक युवा क्रान्तिकारी के रुप में बनी हुई है। ऐसे में इस युवा क्रान्तिकारी  की सियासत को समझने की ज़रुरत हैं। क्या आप इतिहास में ऐसे किसी क्रान्तिकारी के बारे में जानते हैं,जो तमाम मुश्किल हालात के बावज़ूद सिर्फ़ अपनी जाति और धर्म के समृद्धि के बारे में बात किया हो? हार्दिक ने अपने आन्दोलन की शुरुआत ही पाटीदारों के आरक्षण के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग(ओबीसी) में शामिल करने की मांग से की थी। 25 अगस्त 2015 की रैली के शाम अहमदाबाद पुलिस ने हार्दिक को गिरफ़्तार कर,आईपीसी की धारा 151 लगाई। हार्दिक की गिरफ़्तारी के बाद हिंसक प्रदर्शन शुरु हो गये थे, जिसके बाद गुजरात सरकार को कर्फ़्यू लगाना पड़ा और सेना बुलानी पड़ी थी। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस हिंसा में 44 करोड़ की सरकारी सम्पत्ति का नुकसान हुआ था। सम्पूर्ण क्रान्ति के महानायक जयप्रकाश नारायण,जिनका आज के स्वघोषित क्रान्तिकारी बार-बार ज़िक्र करते हैं,ने कहा था "हिंसक क्रान्ति हमेशा किसी न किसी रुप में तानाशाही को जन्म देती है।"
शुरुआती दिनों में तो हार्दिक सिर्फ़ पाटीदारों के हक की लड़ाई गुजरात सरकार से लड़ते रहें। कहते रहें कि मुझे कुर्सी की कोई चाहत नहीं है,जो हमारे समुदाय को आरक्षण देगा,उसका समर्थन करेंगे। यही राग उन्होंने विधानसभा चुनाव में भी जारी रखा। साथ ही सियासतदां बनने की भी ख़्वाहिश ज़ाहिर कर दिया। कहा,इस बार मेरी चुनाव लड़ने की उम्र नही हुई है,लेकिन उम्र जब हो जाएगी तो चुनाव ज़रुर लड़ूंगा। सम्पूर्ण क्रान्ति के समय जेपी ने कहा था कि ''मेरी रुचि सत्ता पर कब्ज़े में नही है,मगर सत्ता पर जनता के नियंत्रण में है।''
जेपी की दो बातों को हमने आप के सामने रखा है।अब आप ख़ुद सोचिए कि क्रान्ति के नाम पर हार्दिक क्या कर रहें हैं?
गुजरात में पटेल समाज को समृद्ध और व्यापारी वर्ग का चेहरा माना जाता है। इनकी संख्या 12-15% तक है।जानकार बताते हैं कि इनका दुनिया की दो तिहाई डायमंड इंडस्ट्री पर कब्ज़ा माना जाता है। जिस वक़्त आन्दोलन की शुरूआत की उस समय विधानसभा में 50% विधायक समेत मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री भी पटेल समुदाय से हीं आते थें। पाटीदार समाज गुजरात का सबसे बड़ा लैंड होल्डिंग समाज है। 60 के दशक में भू-सुधार आन्दोलन हुआ था,इसमें पटेलों को सबसे ज़्यादा क्षत्रियों की ज़मीन मिली थी। गुजरात में जो नक़दी फ़सलें होती हैं,वे भी इसी समाज के पास है और हर साल इससे यह समाज लाख़ों रुपये कमाते हैं। गुजरात में ज़्यादातर स्कूल,कॉलेज और युनिवर्सिटी में पटेलों का स्वामित्व है। 
इन सब के इतर हार्दिक की अपनी दलील है। हार्दिक कहते हैं कि हाल के वर्षों में पटेलों में बेराज़गारी और अशिक्षा बढ़ी है,हम 12-15% लोग हैं हमारे घरों में चुल्हा नही जलता है,किसानों को फ़सल का उचित दाम नही मिल रहा है वगैरह-वगैरह। अब सवाल ये है कि ऐसी समस्याओं से देश का कौन सा राज्य या समुदाय मुक्त है?क्या गुजरात में पटेलों को छोड़ बाकि समुदाय मेंं ख़ुशहाली है? यदि आपका जवाब नहीं है तो आख़िर क्यों हार्दिक सिर्फ़ पटेलों की बात कर रहें हैं। उनको तो सारे समुदाय के बारे में बात करना चाहिए था। क्या हार्दिक ये चाह रहें हैं कि गुजरात ऐसा राज्य बन जाए,जहां सारे समुदाय के लोग अपनी मांग को लेकर आन्दोलन करें? जिस कांग्रेस ने 1980 में खाम समीकरण (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुसलमान) के तहत आरक्षण से पटेलों को बाहर का रास्ता दिखाया,उसी कांग्रेस से 2017 में आरक्षण की आस में विधानसभा चुनाव में हार्दिक ने पटेलों से सहयोग करवाया। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद,दूसरी अन्य पिछड़ी जातियां भी कोटे में आ गई। 









भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...