
गुजरात में लगातार छठी बार जीत दर्ज़ कर बीजेपी ने विपक्षियों को ये संन्देश दे दिया कि है कि उनके लिए गुजरात की सत्ता अभी दूर की कौड़ी है। यूपी में दो लड़कों की तर्ज़ पर, गुजरात में चार लड़कों ने मिलकर भाजपा के विजयी रथ को रोकने की हर सम्भव कोशिश की,लेकिन कोशिश नाकाम रही। गुजरात विधानसभा में कांग्रेस ब्रिगेड,जीत हासिल करने के लिए नये अवतार में दिखी। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने दलित नेता जिग्नेश मेवाणी,ओबीसी एकता मंच के नेता अल्पेश ठाकोर और पाटीदार नेता हार्दिक पटेल के सहयोग से भाजपा को घेरने की कोशिश करते रहें,लेकिन सफ़लता हाथ नही लगी।
इन तीन लड़कों में से एक ने यानि हार्दिक पटेल ने विधानसभा चुनाव से करीब दो साल(2015) पहले से ही पटेल राजनीति की शुरुआत कर दी थी। 25 अगस्त 2015 को अहमदाबाद की रेैली में मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक क़रीब 5 लाख़ से ज़्यादा पाटीदार शामिल हुए थे। हार्दिक ने इस दिन को पाटीदार क्रान्ति दिवस घोषित किया। तब से लेकर अब तक हार्दिक की छवि एक युवा क्रान्तिकारी के रुप में बनी हुई है। ऐसे में इस युवा क्रान्तिकारी की सियासत को समझने की ज़रुरत हैं। क्या आप इतिहास में ऐसे किसी क्रान्तिकारी के बारे में जानते हैं,जो तमाम मुश्किल हालात के बावज़ूद सिर्फ़ अपनी जाति और धर्म के समृद्धि के बारे में बात किया हो? हार्दिक ने अपने आन्दोलन की शुरुआत ही पाटीदारों के आरक्षण के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग(ओबीसी) में शामिल करने की मांग से की थी। 25 अगस्त 2015 की रैली के शाम अहमदाबाद पुलिस ने हार्दिक को गिरफ़्तार कर,आईपीसी की धारा 151 लगाई। हार्दिक की गिरफ़्तारी के बाद हिंसक प्रदर्शन शुरु हो गये थे, जिसके बाद गुजरात सरकार को कर्फ़्यू लगाना पड़ा और सेना बुलानी पड़ी थी। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस हिंसा में 44 करोड़ की सरकारी सम्पत्ति का नुकसान हुआ था। सम्पूर्ण क्रान्ति के महानायक जयप्रकाश नारायण,जिनका आज के स्वघोषित क्रान्तिकारी बार-बार ज़िक्र करते हैं,ने कहा था "हिंसक क्रान्ति हमेशा किसी न किसी रुप में तानाशाही को जन्म देती है।"
शुरुआती दिनों में तो हार्दिक सिर्फ़ पाटीदारों के हक की लड़ाई गुजरात सरकार से लड़ते रहें। कहते रहें कि मुझे कुर्सी की कोई चाहत नहीं है,जो हमारे समुदाय को आरक्षण देगा,उसका समर्थन करेंगे। यही राग उन्होंने विधानसभा चुनाव में भी जारी रखा। साथ ही सियासतदां बनने की भी ख़्वाहिश ज़ाहिर कर दिया। कहा,इस बार मेरी चुनाव लड़ने की उम्र नही हुई है,लेकिन उम्र जब हो जाएगी तो चुनाव ज़रुर लड़ूंगा। सम्पूर्ण क्रान्ति के समय जेपी ने कहा था कि ''मेरी रुचि सत्ता पर कब्ज़े में नही है,मगर सत्ता पर जनता के नियंत्रण में है।''
जेपी की दो बातों को हमने आप के सामने रखा है।अब आप ख़ुद सोचिए कि क्रान्ति के नाम पर हार्दिक क्या कर रहें हैं?
गुजरात में पटेल समाज को समृद्ध और व्यापारी वर्ग का चेहरा माना जाता है। इनकी संख्या 12-15% तक है।जानकार बताते हैं कि इनका दुनिया की दो तिहाई डायमंड इंडस्ट्री पर कब्ज़ा माना जाता है। जिस वक़्त आन्दोलन की शुरूआत की उस समय विधानसभा में 50% विधायक समेत मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री भी पटेल समुदाय से हीं आते थें। पाटीदार समाज गुजरात का सबसे बड़ा लैंड होल्डिंग समाज है। 60 के दशक में भू-सुधार आन्दोलन हुआ था,इसमें पटेलों को सबसे ज़्यादा क्षत्रियों की ज़मीन मिली थी। गुजरात में जो नक़दी फ़सलें होती हैं,वे भी इसी समाज के पास है और हर साल इससे यह समाज लाख़ों रुपये कमाते हैं। गुजरात में ज़्यादातर स्कूल,कॉलेज और युनिवर्सिटी में पटेलों का स्वामित्व है।
इन सब के इतर हार्दिक की अपनी दलील है। हार्दिक कहते हैं कि हाल के वर्षों में पटेलों में बेराज़गारी और अशिक्षा बढ़ी है,हम 12-15% लोग हैं हमारे घरों में चुल्हा नही जलता है,किसानों को फ़सल का उचित दाम नही मिल रहा है वगैरह-वगैरह। अब सवाल ये है कि ऐसी समस्याओं से देश का कौन सा राज्य या समुदाय मुक्त है?क्या गुजरात में पटेलों को छोड़ बाकि समुदाय मेंं ख़ुशहाली है? यदि आपका जवाब नहीं है तो आख़िर क्यों हार्दिक सिर्फ़ पटेलों की बात कर रहें हैं। उनको तो सारे समुदाय के बारे में बात करना चाहिए था। क्या हार्दिक ये चाह रहें हैं कि गुजरात ऐसा राज्य बन जाए,जहां सारे समुदाय के लोग अपनी मांग को लेकर आन्दोलन करें? जिस कांग्रेस ने 1980 में खाम समीकरण (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुसलमान) के तहत आरक्षण से पटेलों को बाहर का रास्ता दिखाया,उसी कांग्रेस से 2017 में आरक्षण की आस में विधानसभा चुनाव में हार्दिक ने पटेलों से सहयोग करवाया। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद,दूसरी अन्य पिछड़ी जातियां भी कोटे में आ गई।
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