बुधवार, 17 जनवरी 2018

हमारा लोकतंत्र ख़तरे में है नहीं,था!

मैं कानून का जानकार नहीं हूं,इसलिए कोई कानूनी बात नही करुंगा। मगर दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क का नागरिक होने के नाते गर्व से कह सकता हूं कि, मेैं स्वस्थ और ख़तरामुक्त लोकतंत्र में निवास कर रहा हूं जहां हर कोई को खुलकर बोलने के लिए स्वतंत्र है। बीते शुक्रवार को मीडिया के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के चार  जज जस्टिस  जे चेलमेश्वर,जस्टिस रंजन गोगोई,जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कूरियन जोसेफ ने प्रेस कांन्फ्रेस कर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के रवैये से अपनी नाराज़गी को देशवासियों के सामने ज़ाहिर की थी।इसके अगले ही दिन शनिवार को जस्टिस रंजन गोगोई ने कोलकत्ता में कहा कि कोई संवैधानिक संकट नहीं है, तो वहीं केरल में जस्टिस कूरियन जोसेफ ने भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट में कोई संवैधानिक संकट नहीं है। चार न्यायाधीशों ने सिर्फ़ प्रकिया से जुड़ा सवाल उठाया है।यह संस्थान का अंदरूनी मुद्दा है और संस्था इसका समाधान करेगी। ये कोई ऐसा मुद्दा नहीं है, जिसमें किसी बाहरी व्यक्ति की मध्यस्थता की ज़रूरत है। दो जजों के इस ह्रदय परिवर्तन से पहले, इन दोनों जजों के साथ दो और जज ने पीसी कर देश-दुनिया को बताया कि,दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का पर ख़तरा है, क्योंकि हिन्दुस्तान की न्यायपालिका स्वतंत्र और निष्पक्ष नही है। एक स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका अच्छे लोकतंत्र की निशानी है। इनकी पीसी के बाद हिन्दुस्तान के जिन लोगों का न्यायालय से भरोसा उठा,उसको फिर से कैसे वापस किया जाएगा, ये एक सवाल है,जिसका अब जवाब तलाश करना होगा।
जैसे ही सुप्रीम कोर्ट के नम्बर दो जस्टिस जे चेलमेश्वर ने कहा था, "हम चारों इस बात पर सहमत हैं कि इस संस्थान को बचाया नही गया तो इस देश में लोकतंत्र ज़िन्दा नही रह पाएगा। स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका अच्छे लोकतंत्र की निशानी है। मेैं नही चाहता कि 20 साल बाद इस देश का कोई बुद्धिमान व्यक्ति ये कहे कि चेलमेश्वर,रंजन गोगोई, मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ ने अपनी आत्मा बेच दी है।" वैसे ही वो ज़मात शक्रिय हो गए, जिनको साल 2014 के बाद से बात-बात पर लोकतंत्र ख़तरे में नज़र आता है। अंगुली पर गिनती के इस ज़मात के लोग इतनी विविधता वाले हिन्दुस्तान को अपने नज़रिए और विचार से देखते हैं, असहमति होने पर तानाशाही,अघोषित आपातकाल और लोकतंत्र ख़तरे में है, जैसी अनाप-शनाप बातें करने लगते हैं। ऐसे लोग एक निरंकुश समाज चाहते हैं, जो कि सम्भव नहीं है। क्या हमारा लोकतंत्र इतना कमज़ोर है कि कभी-भी कोई-भी उठकर अपनी असहमति प्रकट कर दे, तो लोकतंत्र पर ख़तरा आ जाएगा?
शुक्रवार को जो कुछ भी हुआ था, उसको मेैं आज़ाद भारत के न्यायपालिका के इतिहास का काला अध्याय तो नही, लेकिन कभी ना भुलने वाला अध्याय ज़रूर कहूंगा। इस अध्याय की दो ख़ास बात ये रही कि जजों ने अपनी बात को बिना हिचक देश के सामने रखा और मीडिया में जजों के प्रेस कांन्फ्रेंस को तरज़ीह दी गई। ये दोनों बातें इस बात कि तो पुष्टि करती ही है कि हमारा लोकतंत्र स्वस्थ और ख़तरे से मु्क़्त है। वरना न्यायपालिका के
इतिहास का एक अध्याय ये भी है जिसको 'लोकतंत्र का काला अध्याय' के नाम से जाना जाता है। स्वलाभ के लिए इस काले अध्याय की रचयिता पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मीडिया पर नियंत्रण करने के साथ-साथ,न्यायपालिका को पुर्ण रुप से  शक्तिविहीन करने की कोशिश की थी, जिसमें तत्कालिक सफ़लता भी मिली थी। वर्तमान में सत्ताधारी पार्टी के भीतर से हीं विरोध के आवाज़ उठते हैं, आपातकाल में तो उच्च पद और सत्ताधारी लोग ने तो अपनी आत्मा की आवाज़ तक को अनसुना कर दिया था। आपातकाल की घोषणा करते वक़्त श्रीमती गांधी ने अपने मंत्रिमंडल तक की सलाह नहीं ली थी। आपातकाल के पहले हफ़्ते में ही संविधान के अनुच्छेद 14,21 और 22 को निलम्बित कर दिया गया था। ऐसा करके सरकार ने कानून की नज़र में सबकी बराबरी,जीवन और सम्पत्ति की सुरक्षा की गारंटी और गिरफ़्तारी के 24 घंटे के अन्दर अदालत के सामने पेश करने के अधिकारों को रोक दिया गया था। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून में कई बार बदलाव किए गए। 29 जून 1975 को नज़रबन्दी के बाद बंदियों को कारण जानने का अधिकार भी ख़त्म कर दिया गया। नज़रबन्दी को एक साल से अधिक तक बढ़ाने का प्रावधान कर दिया गया। 16 जुलाई 1975 को इसमें बदलाव करके नज़रबन्दियों को कोर्ट में अपील करने के अधिकार से भी वंचित कर दिया गया। 10 अक्टूबर 1975 के संसोधन द्वारा नज़रबन्दी के कारणों की जानकारी कोर्ट या किसी को भी देने को अपराध बना दिया गया। जिन 42 जजों ने नज़रबंदियों के मुकदमों में न्यायसंगत फ़ैसले दिए या देने की कोशिश की, उन सबका तबादला कर दिया गया था।नागरिकों के साथ दुर्व्यहार,अन्याय और अत्याचार को लेकर नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाले वकीलो को भी नही बख़्शा गया था। वकीलों को ख़ासकर बार काउंसिल के अध्यझ राम जेठमलानी को सबक सिखाने के लिए संसद के कानून द्वारा अटॉर्नी जनरल को इसका अध्यझ बना दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने बिना दण्ड के जेल में न रखे जाने के अधिकार को छीनने की सरकार की कोशिश को असफ़ल कर दिया था। संविधान में 42 वां संसोधन कर इसके ज़रिए संविधान के मूल ढांचे को कमज़ोर करने, उसकी संघीय विशेषताओं को नुकसान पहुंचाने और सरकार के तीनों अंगों के संतुलन को बिगाड़ने का प्रयास किया गया।
अब आपके पास आज़ाद हिन्दुस्तान के न्यायालय की दो तस्वीर है।एक वर्तमानकाल की तो दूसरा आपातकाल की। अब आप ख़ुद तय कीजिए कि आप के लोकतंत्र की हालत कैसी है?







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