निर्भया अब इस दुनिया में तो नहीं है,लेकिन वो जिस तरीके से हैवानियत का शिकार हुई थी,वक़्त-बे-वक़्त उसकी याद आ जाती है।गुगल करेंगे तो आप पाएंगें कि आज भी हमारे समाज में वैसे दरिदें हैं,जिनको कानून का डर नही है।याद कीजिए उस वक़्त के जन-आक्रोश को,जब निर्भया अस्पताल में ख़ामोशी से अपनी ज़िन्दगी से जंग लड़ रही थी,और देशभर में नेता और आम जनता अपने-अपने शहर के कोने-कोने में निर्भया के साथ हुए हैवानियत और महिलाओं की तत्कालिन सुरक्षा-व्यवस्था के ख़िलाफ़ तख़्ती लेकर सड़क पर मार्च कर रहे थें।क़ानून में बदलाव की मांग को लेकर लोग इतने गुस्से में थे,जैसे सिर्फ़ कानून में बदलाव कर देने से निर्भया के साथ जो हुआ,वो किसी बेटी के साथ नही होगा।लेकिन आज हक़ीकत ये है कि जब भी किसी लड़की/महिला के साथ बदसलूकी होती है तो वहां का समाज ख़ामोश तो रहता हीं है,वहां के विधायक और सांसद भी ना जाने क्यों ख़ामोश रह जाते हैं?कई बार तो पुलिस के काम करने का तरीक़ा भी हैरान कर जाता है।कानून में कई बदलाव भी हुए,उसका क़रीब पांच साल बाद कितना असर हुआ है शायद बताने की ज़रुरत नही हैं।मुझे लगता है कि ये कहना कि सिर्फ़ कड़े कानून बना देने से समाज में बदलाव हो जाएगा,ख़ुद को वास्तविकता से मुंह मोड़ने के जैसा है।बदलाव के लिए ज़मीनी स्तर पर लोगों और सरकारी कर्मचारियों को मिलकर काम करना ही पड़ेगा,ताकि निर्भया के साथ जो हुआ था वो किसी और बेटी के साथ ना हो। वरना एसी कमरे में लेदर की कुर्सी पर बैठकर क़ानून बनते रहेंगे और बदलाव सिर्फ़ काग़ज़ पर ही दिखेंगे।
निर्भया के साथ हुए जघन्य अपराध के बाद हो रहें तमाम विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए निर्भया एक्ट बनाया।2013 में बलात्कार पीड़िताओं को आर्थिक रुप से सहायता पहुंचाने और महिला सुरक्षा के लिए उठाये जाने वाले क़दमों पर ख़र्च करने के लिए निर्भया फ़ण्ड भी बनाया गया।पांच साल बाद भी हमारी सरकारें महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कितनी लापरवाह हैं,इसका अंदाज़ा इन बातों से लगाया जा सकता है।निपुण सक्सेना की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 9 जनवरी को आदेश देते हुए सभी राज्य सरकारों से कहा था कि वो बताए कि उन्होनें यौन उत्पीड़न से पीड़ित महिलाओं को निर्भया फ़ण्ड से कितना पैसा दिया गया और किन-किन पीड़ित महिलाओं को दिया गया।आपको जानकर हैरानी होगी कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावज़ूद 24 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों ने हलफ़नामा दाख़िल नहीं किया।
हलफ़नामे के संदर्भ में अब बात करते हैं उन दो राज्यों की,जिसके मुख्यमंत्री महिला सुरक्षा को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं।पहले बात करते हैं मध्य प्रदेश की।भोपाल में एक छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के बाद 9 नवम्बर को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि वो राज्य में सुरक्षा का ऐसा वातावरण चाहते हैं,जिसमें बहन-बेटिया अपनी मर्ज़ी से कहीं भी आ-जा सके।हादसे के बाद थाने में रिपोर्ट लिखवाने के लिए छात्रा को 3 थानों के बीच 24 घंटे भटकना पड़ा था।ये सब उस छात्रा के साथ हुआ,जिसके माता-पिता ख़ुद पुलिस में हैं।हलफ़नामें पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमुर्ती दीपक गुप्ता की पीठ ने बलात्कार पीड़िता को 6000-6500 रुपये देने पर,जमकर प्रदेश सरकार को फ़टकार लगाई।पूछा कि क्या आप खैरात बांट रहें है?आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?आप एक बलात्कार की कीमत 6500 रुपये लगा रहें है?आगे कहा कि वो हतप्रभ हैं निर्भया कोष योजना के तहत केन्द्र से सबसे अधिक पैसा प्राप्त करने वाला राज्य,बलात्कार पीड़िताओं को मात्र 6000-6500 रुपया दे रहा है।एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2017 में देश में 28,947 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना दर्ज़ की गयी।जिसमें सिर्फ़ मध्यप्रदेश में हीं 4882 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना हुई,जो सभी राज्यों में अव्वल है।
अब बात करते हैं हरियाणा की।जनवरी मध्य में 48 घन्टे में मानवता को शर्मासार कर देने वाली बलात्कार की 4 वारदात से अभी हरियाणा उभरा भी नही था कि,सीएम मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि रेप की घटनाओ की सत्यता की पुष्टि होने से पहले सनसनी नही फ़ैलानी चाहिए।रेप के मामलों की संख्या बढ़ती हुई इसलिए नज़र आ रही है,क्योंकि उन में से कई फ़र्ज़ी आरोप होते हैं।क़ायदे मुख्यमंत्री को तो ये बताना चाहिए वो बलात्कार पीड़िता को इंसाफ़ दिलाने के लिए क्या कर रहें हैं?मध्य प्रदेश के बाद हरियाणा सरकार को पीठ ने जमकर फ़टकार लगाई।हरियाणा सरकार के वकील ने जैसे ही कहा कि वे हलफ़नामा दायर कर देंगे तो पीठ ने कहा,'अगर आपने हलफ़नामा दायर नहीं किया है तो इससे साफ़ पता चलता है कि अपने राज्य में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर आपके क्या विचार हैं।अपने राज्य की महिलाओं से कह दीजिए कि आपको उनकी परवाह नही है।'मुझे लगता है कि हरियाणा सरकार के नही कहने के बावज़ूद,आय दिन हो रही घटनाओं से पता तो चलता ही है कि महिलाओं की सुरक्षा को लेकर राज्य सरकार कितना गम्भीर है।
ये तो हुई भाजपा शासित दो राज्यों की बात।अब बात करते हैं केन्द्र सरकार की।27 नवम्बर को राज्यसभा सांसद के रहमान ख़ान ने पूछा कि निर्भया फ़ण्ड के तहत तीन साल में अब तक कितनी रेप पीड़िताओं को सहयोग राशि प्रदान की गई है और कितनो को मिलना बाकी है?जवाब में गृह मंत्रालय ने कहा कि रेप पीड़िताओं को सहयोग राशि का फ़ॉर्म सीधे राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों द्वारा भरा जाता है,इसलिए कितनी रेप पीड़िताओं को सहयोग राशि मिलना अभी बाकी है,इसका आंकड़ा केन्द्र सरकार के पास नहीं है।मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ निर्भया फ़ण्ड से अगस्त 2017 तक 3000 करोड़ में से मात्र 264 करोड़ रुपये ख़र्च किये गए हैं।तो ये है महिलाओं की सुरक्षा के प्रति केन्द्र और राज्य सरकार की तत्परता।इसलिए व्यक्तिगत कर्तव्य समझकर आगे आईये और सुनिश्चित कीजिए कि कोई बेटी दरिन्दगी की शिकार ना हो।वरना जब-जब किसी बेटी के साथ हैवानियत होगी,समाज में बुरे माहौल का निर्माण होगा।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें