बुधवार, 25 जनवरी 2017

राजनीतिक विज्ञापन:राजनीति का महत्वपुर्ण औज़ार है।


पांच राज्यों में चुनाव का ऐलान हो चुका है।पार्टियां चुनाव प्रचार में जुट चुकी है। राजनीतिक दलों ने मतदाताओं को हैण्डबिल थमाने के साथ-साथ गली-मोहल्लों की दीवारों को अपने लोक-लुभावन वादों वाले पोस्टरों से पाट दिया है। वहीं दूसरी तरफ़ दलों की सोशल मीडिया की टीमों ने अपने-अपने दल के पक्ष में बैटिगं करनी शुरु कर दी है।
क्या आपने कभी सोचा है कि दलों के द्वारा दी जाने वाली हैण्डबिल,पोस्टर,बैज,दलों की छाप वाली टोपी वगैर-वगैर क्या है?दरअसल यह एक तरह का विज्ञापन है,जिसको हम राजनीतिक विज्ञापन(रा. वि.) कहते हैँ।इस विज्ञापन के माध्यम से सभी दल अपने लोकहित कार्यों के वर्तमान,भूत और भविष्य तीनों काल के बारे में बताते हैं।मसलन वर्तमान में वो आपके बेहतरी के लिए किन नीतियों और योजनाओं पर काम कर रहें हैं,बीते समय में किन नीतियों और योजनाओं पर का काम कर चुके हैं और भविष्य में किन नीतियों और योजनाओं पर काम करने वाले हैं। कुल मिलाकर वो आपके अच्छे दिन की बात करते हैं। मगर वास्तविकता क्या है कौन नही जानता है।
भारत में रा. वि. को लेकर कोई ठोस कानून नही है,होता भी तो कितना पालन होता आपको पता ही है।भारत में राजनीतिक विज्ञापन का इतिहास बहुत पुराना है। बदलते समय के साथ भारत में विज्ञापन का भी स्वरुप बदलता चला गया।मुद्रित माध्यम से शुरु हुआ राजनीतिक विज्ञापन,आज डिजिटल माध्यम तक पहुंच गया है।पहले राजनीतिक दल हैण्डबिल,पोस्टर,बैच,दलों की छाप वाली टोपी वगैर-वगैर इस्तेमाल करते थें,लेकिन बदलते समय के साथ टीवी और इंटरनेट ने भारतीय राजनीति को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया है।बदलते दौर में कुछ और बदलाव हुए वो है भाषा का,अपनी बात रखने के तरीके और सत्यता का।चुनाव के वक्त पार्टियां विज्ञापन के माध्यम से अपने किए कार्यों के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बतातें है।बीते कुछ सालों से राजनीति में आरोप'वार शुरु हो गया है,जिसमें नेता एक-दूसरे पर निशाना साधने के लिए अपनी भाषाई मर्यादा का ख़्याल नही रख रहें हैं।
अपने शोध के दौरान मैने गुगल से भी बात की,पाया कि भारत में टीवी और इंटरनेट का रा. वि. के रुप में इस्तेमाल करने का चलन मुद्रित माध्यम के जैसा ज़्यादा पुराना नही है,मगर विश्व में सबसे पहले अमेरिका में 1952 में टीवी का रा. वि.के रुप में  इस्तेमाल होना शुरु हो गया।अमेरिका के 34वें राष्ट्रपति Dwight D.Eisenhower के नाम यह रिकार्ड है।उन्होंने भाषण के रुप में इस्तेमाल किया।लेकिन अमेरिका में हीं 1964 में नकारात्मक राजनीतिक विज्ञापन की भी शुरुआत हो जाती है,जो अब दुनियाभर में हो रही है।इसका श्रेय 36वें राष्ट्रपति Lyndon Baines Johnson को जाता है। उनके इस रा.वि. वाले विडियो जो कि इंटरनेट पर मौज़ूद है, में आप देखेंगे कि एक छोटी बच्ची है जो डेजी फुल की पंखुड़ियों को एक-एक करके तोड़ते हुए गिनती करती है,तभी तेज़ आवाज़ के साथ उलटी गिनती शुरु होती है और नाभिकीय बम धमाका होता है।विज्ञापन के अन्त में Johnson के पक्ष में 3 नवम्बर को वोट करने की अपील की जाती है।मगर ये विज्ञापन एक ही बार प्रसारित हुआ।ऐसा क्यों हुआ पता नही।भारत में इस तरीके से टीवी रा.वि. की शुरुआत नही होती है,लेकिन यहां भी फटने की बात होती है,मगर ‘इंडिया शाइनिंग’ गुब्बारे की। साल 2004 में भाजपा का नारा था ‘इंडिया शाइनिंग’ और भाजपा दूसरे नम्बर की पार्टी बनी थी।इसलिए विरोधी ‘इंडिया शाइनिंग’ गुब्बारे के फुटने की बात करते हैँ।वर्तमान में पार्टियां अब लोगों तक अपना सन्देश पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रही है।इसका भी श्रेय भाजपा को ही जाता है,क्योंकि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में रा. वि. के लिए सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया था।उस वक्त बाकि राजनीतिक पार्टियां सोशल मीडिया के इस्तेमाल में काफी पीछे छुट गई थीं,लेकिन धीरे-धीरे सभी ने सीख लिया है।अब कोई किसी से कम नही है। कम शारीरिक श्रम और खर्चों के,लोगों तक पहुंचने का सबसे आसान माध्यम है सोशल मीडिया। सो.मी के सन्देश में किस तरीके की बात होती है,हम और आप सब जानते हैं।बताने की ज़रुरत नही है।लेकिन एक बात याद रखिएगा कि जिस सोशल मीडिया को समाज में क्रान्ति लाने के रुप में देखा जा रहा है,अब अफ़वाहों का अड्डा बन गया है।

पार्टियां आपके चन्दे के रुप में दिए पैसे को कब और कहां खर्च करती है नही बताती है।इकट्ठे बता देती है कि इतना पैसा खर्च हुआ,कई तो बताती ही नही हैँ।मेरा सवाल है कि आप पार्टियों को चन्दा क्यों देते हैं?क्यों आपको आपके पैसों के गलत इस्तेमाल पर अफ़सोस नही होता है?क्या आप राजनीतिक दलों को चन्दा देके पुण्य का काम करते हैं?मेरी राय में राजनीतिक दलों को चन्दा देना बन्द कर,किसी ज़रुरतमन्द को वो पैसा दे दें,जो आप राजनीतिक दलों को देना चाहते हैं।आपके पैसे से किसी का संतान पढ़ लेगा,तो किसी की ज़िन्दगी सवंर जाएगी।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

नेताओं के बिगड़ते बोल का ज़िम्मेदार कौन?

बदलते युग के साथ हमारे देश की राजनीति में भी काफ़ी बदलाव हो रहा है।इस बात से इनकार किया जा सकता है?हाल के वर्षों को अगर हम गौर से देखें तो पाएंगे कि हमारे देश की राजनीति काफ़ी आक्रामक और हल्की हो गई है।सभी नेता तो नही लेकिन कुछ नेताओं की जमात ने पार्टी और एक-दूसरे को निशाना बनाने के लिए काफ़ी घटिया से घटिया शब्दों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।जिसका हमारे समाज में काफ़ी बुरा प्रभाव पड़ रहा है।हाल ही में हमारे गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू ने जूता मारने तक की बात कह डाली।जिसकी काफ़ी आलोचना भी हुई।लेकिन क्या यह सोचने वाली बात नही है कि रिजीजू के बात में यह तत्व कहां से आया?मेरी स्मरण में पूर्वी भारत से आने वाले नेताओं में रिजीजू पहले ऐसे नेता हैं,जिन्होंने ऐसे शब्द का इस्तेमाल किया है।संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से हम न्यूनतम उम्मीद कर सकते हैं कि उसकी भाषा शालीन हो।
ऐसा माना जाता है कि देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश और बिहार के नेताओं की पकड़ के साथ-साथ ज़्यादा हस्तक्षेप होती है।और इन दोनो राज्यों के कुछ नेताओं की राजनीति में भाषाई स्तर क्या है,उम्मीद है बताने की ज़रूरत नही है।कहावत है 'संगत से गुण होत है,संगत से गुण जात।'वैसे मैं जिन कुछ नेताओं की बात कर रहा हूं,उनमें शायद ही किसी नेता के साथ रिजीजू का उठना-बैठना होगा।फिर वही सवाल कि रिजीजू के बात में यह तत्व कहां से आया?मुझे लगता है कि हमारे देश के नेताओं के बिगड़ते बोल के लिए किसी हद तक कुछ मीडिया संस्थान भी ज़िम्मेदार है।TRP के लिए नेताओं के फ़िजूल की बातों को दिन-रात दिखाने से जाहिर तौर पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।इसी प्रभाव का उदाहरण है किरण रिजीजू का बयान।
वर्तमान में नेताओं को कानून का डर नही,लिहाज नाम की चीज नहीं बच गई है।पहले के नेता तो मीडिया के डर के भागते थें,लेकिन अब तो नेता मीडियाकर्मीयों को डांट कर भगा दे रहें हैं।ताज़ा स्मरण में है कि सपा नेता रामगोपाल यादव ने मुलायम सिंह यादव के बारे में सवाल पूछे जाने पर संवाददाताओं को डांट दिया।अब समय आ गया है कि मीडिया संस्थान द्वारा किसी नेता या दल को ज़्यादा तरजीह ना दिया जाए।
बेंगलुरू में 31 दिसम्बर 2016 की रात हुए बलात्कार के मामले में कर्नाटक के गृहमंत्री का बयान बताने के साथ-साथ संकेत भी है कि नेताओं द्वारा कुछ भी बिना सोचे समझे बोल देने की आदत का शिकार अब सिर्फ उत्तर भारत के नेता ही नही है।यदि इस बात पर रोक नही लगाई गयी तो आने वाले समय में देश की राजनीति और बदतर हो जाएगी।

मंगलवार, 3 जनवरी 2017

एक साथ चुनाव:जिसके बारे में सिर्फ़ बात ही हो रही है।

एक बात है जिसके बारे में सिर्फ़ बात ही हो रही है।
जिस बात के बारे में सिर्फ़ बात हो रही है,वो बात 48 साल पुरानी बात है इसलिए भारत में ये कोई नई बात नही है। दिक्कत इस बात की है कि बात को अंजाम तक पहुंचाने के लिए कई सर्व दलिय मुलाकात के बाद भी बात अंजाम तक नही पहुंच पा रही है।एक साथ चुनाव प्रक्रिया की शुरुआत आज़ाद भारत में 1951-52 में पहली बार हुई और उसके बाद से साल 1957,1962 और 1967 तक चली। साल 1968-1969 में कुछ विधानसभाओं और 1970 में लोकसभा के स्वतः भंग हो जाने के बाद यह प्रक्रिया जारी नही रह पाई और 1970 में फिर से लोकसभा का चुनाव हुआ।वर्तमान में एक साथ चुनाव कराने को लेकर चुनाव आयोग की अपनी दलील है तो एक साथ चुनाव के ख़िलाफ़ कुछ पार्टियों की अपनी दलील। कानूनी जानकारों की माने तो संविधान के अनुच्छेद 83,85,172 और 174 में संसोधन कर एक साथ चुनाव कराई जा सकती है। चुनाव आयोग के अनुसार देश में यदि एक साथ चुनाव कराई जाती है,तो वोटिंग मशीनें खरीदने में करीब 93 बिलियन का खर्च एक साथ आएगा।केन्द्रीय सुरक्षाबलों की ज़्यादा आवश्यकता होगी।बार-2 होने वाले खर्चों से मुक्ति मिलेगी। पूर्व चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने कहा कि चुनाव आयोग के पास जनप्रतिनिधत्व कानून 1951 की धारा 14 और 15 के अनुसार अधिकार है कि छह महीनें के भीतर लोकसभा और विधानसभा के चुनावों को एक साथ क्लब कर सकता है।यदि इसकी अवधि बढ़ा दी जाए तो किसी हद तक सुधार हो सकता है।साथ ही उन्होंने कहा कि एक साथ चुनाव होने से किसी हद तक साम्प्रदायिक ताकतों पर भी रोक लगाई जा सकती है।

16 वीं लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणापत्र में लिखा कि “भाजपा चुनाव सुधार करने के लिए कटीबद्ध है,जिससे अपराधियों को राजनीति से बाहर किया जा सके।भाजपा दूसरे दलों के साथ विचार विमर्श करके ऐसा तरीका बनाना चाहती है,जिससे विधानसभा और लोकसभा के चुनाव साथ-साथ हो।इससे सरकार और राजनैतिक दलों का खर्चा कम होगा,इससे राज्य सरकार में थोड़ी स्थिरता आएगी।हम चुनावों में खर्च की सीमा में बदलाव लाना चाहते हैं।भाजपा की अपराधियों को राजनीति से बाहर करने वाली बात सुनने में तो काफी अच्छी लग रही है।लेकिन सच्चाई क्या है,कौन नही जानता है।19 मई 2014 को international business times ने एडीआर के हवाले से ख़बर छापी की,बीजेपी के 63 उम्मीदवार पर गंभीर अपराध के आरोप हैँ।क्या बीजेपी ने इन सभी नेताओं को बाहर कर दी?

मेरी राय में सभी दलों का अपराधी नेताओं को लेकर एक सा ही हाल है।एक तरीके से किसी हद तक कहा जा सकता है कि राजनीतिक दल गुंडों और बदमाश नेताओं की शरणस्थली है।

बहरहाल,साल 2014 से लेकर अब तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक साथ चुनाव की वकालत करते आ रहें हैं। हाल ही में उन्होंने 31 दिसम्बर 2016 को भी इस बात को दोहरायी। MyGov.in पर मतदाताओ से राय भी ली है। 28 मई 2010 को outlookindia ने लालकृष्ण आडवाणी के ब्लॉग के कुछ हिस्सों को छापा,जिसमें उन्होंने तत्कालिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी से मुलाकात कर एक साथ चुनाव की वकालत की है। आगे उन्होंने लिखा कि-"In my brief chat with the two senior leaders of Government, I mentioned, that most European democracies have such an arrangement,"

The BJP Parliamentary Party chairman said, "our Constitution makers adopted the British pattern and invested the Executive with the authority to cut short the term of the elected legislature and hold an early election".

"It is gratifying that Britain itself is now considering a change," Advani said, and quoted Britain's Deputy Prime Minister Nick Clegg as saying that he wants "big sweeping changes" on this front.
उपरोक्त बात से साफ़ हो रहा है कि भाजपा चुनाव में सुधार को लेकर गम्भीर है।क्या आप उम्मीद करेंगे कि विपक्षी दल वर्तमान प्रधानमंत्री या वित्तमंत्री से मुलाकात करेंगे? 10 सितम्बर 2016 को the wire ने सुधा पाई की लिखी एक लेख छापी,जिसमें उन्होंने 5 सितम्बर 2016 यानि शिक्षक दिवस के दिन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा कही गई बात ”I supported the idea and urged all parties to consider doing away with constant elections to ensure political stability. These statements by the prime minister and the president have sparked a debate on whether holding elections simultaneously is feasible and would suit the working of our democratic system.” पाई ने आगे लिखा कि आलोचक दलों का कहना है कि प्रधानमंत्री की एक साथ चुनाव की बात राजनीति से प्रेरित है,ना कि बेहतर शाषण-प्रणाली के लिए।बीजेपी के एक साथ चुनाव का मकसद साल 2014 जैसा आक्रामक चुनाव प्रचार कर के केन्द्र और राज्यों में अपना अधिकार जमाना है।यदि ये बात सच है तो विपक्षों की यह मानसिक हार है। क्यों वे लोग भाजपा और मोदी-वेब को लेकर इतने चिंतित है?क्या वे लोग अपना जनाधार खो चुके हैं? कांग्रेस,टीएमसी,एनसीपी और सीपीआई को छोड़कर ज़्यादातर दलों की राय एक साथ चुनाव के पक्ष में है,बशर्ते गहन चर्चा होनी चाहिए। एक साथ चुनाव को लेकर बहुत सारे सवाल है,जिसका जवाब सभी दलों के चर्चा के बाद ही निकल सकती है। एक मतदाता होने के नाते आपका भी कर्तव्य बनता है कि आप भी इस विषय पर सोचे।



गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

....एक नज़ारा ये भी है।

               मेरी सांसों में बसा इस हवा का नशा...।
               मेरा दिल.......मेरा पता.......मेरी शान...।
               दिल्ली है मेरी जान..।

यह गाना दिल्ली का थीम सॉन्ग है।वाकई दिल्ली हमारी शान है और दिल्ली पर अपनी जान लुटा रहें हैं। दिल्ली की ऊंची-ऊंची इमारतें,मेट्रो,सड़कों पर तेज़ रफ्तार से दौड़ती गाड़ियां और तमाम तकनीकों से लैस इस महानगर के विकसित होने का परिचायक है।लेकिन मैं इसी महानगर के उस तस्वीर की बात कर रहा हूं, जो आज़ादी के बाद से लेकर आज तक उदासीन ही है।मेरा सामना रोज़ इन तस्वीरों से आते-जाते होता है।

इन तस्वीरों को देखने के बाद मन में कई सवाल हैं,कई राय भी हैं और नतीज़े भी हैं,लेकिन मैं जानता चाहता हूं कि इस महानगर के भीतर ये लोग कैसे विकास से वंचित रह जा रहें है? उन तमाम सरकारी नियम और वादों का क्या हुआ,जिसमें ऐसे लोगों के विकास की बात कही गई है?वो तमाम गैर-सरकारी संस्थान क्या कर रही है,जो दिन-रात गरीबों की विकास की बात करती है।मैं बात कर रहा हूं उन लोगों की जो खुले आसमान में बारहों मास इस महानगर के रोड किनारे अपने जीवन का गुज़ारा करते हैं। आप कल्पना कीजिए वो जीवन कैसा होगा,जिसको ना तो ठीक से पेट भरने के लिए भोजन है,ना पीने के लिए पानी और ना तन ढ़कने के लिए कपड़ा,आवास की तो बात ही मत कीजिए। रोज आने-जाने के क्रम में इन लोगों के खाने की चीज़ों पर नज़र पड़ जाती है।कई बार इनके बच्चों को देखता हूं कि बिना सब्ज़ी के रोटी,वो भी मिट्टी लगी हुई खाये जा रहें हैं।एक बार देखा कि उबले हुए मुर्गे की खाल,वो पंख सहित थी,जिसका पंख हटा कर खाने की तैयारी कर रहे थें।सोचिए ये नज़ारा कितना हृदय विदारक है ना।बच्चे इस बात से अंजान तो हैं ही,उनके परिजन भी इस बात से अंजान हैं कि स्वच्छता कितनी ज़रुरी है।क्या ऐसे लोगों को स्वच्छता का महत्व बताये बिना स्वच्छ भारत की निर्माण संभव है?कौन बतायेगा इनको स्वच्छता के बारे में? जब भी मैं इनके करीब से गुज़रता हूं,तो सोंचता हूं कि आज़ादी से लेकर आज तक ये बात सिर्फ कहने जैसी ही क्यों लगती है कि ‘सरकार सबके भले के लिए काम करेगी’। यदि सभी सरकारें सबके भले के लिए काम कर रही होती तो भारत की कुल आबादी का 22% हिस्सा कैसे वैश्विक गरीबी रेखा से नीचे है? आज़ादी से लेकर आज तक भारत के हुक्मरानों की वो चुनौतियां क्यों और कैसे बरकरार है जिसमें देश के नागरिकों का आर्थिक विकास और गरीबी के ख़ात्मे के लिए कारगर नीतियों को तैयार करने की थी?सुरेश तेन्दुलकर और रंगराजन समिति की रिपोर्ट का क्या हुआ?सी रंगराजन समिति ने तो जुलाई 2014 के प्रथम सप्ताह में योजना आयोग (नीति आयोग) को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी।इस रिपोर्ट पर क्यों बात नही हो रही है?ज़ाहिर है सरकार गरीबी और गरीबों को लेकर चिंतित नही है। जब साल 2014 में देश में सत्ता परिवर्तन हुआ,तब से लेकर आज तक ‘सबका साथ-सबका विकास’ की बात कही जा रही है।कैसा विकास हो रहा है कि देश की राजधानी में ही बदतर स्थिति में लोग रह रहें हैं।अब सवाल है कि जो कि सबसे महत्वपुर्ण है कि ‘सबका विकास’ कैसे होगा?सिर्फ दफ़्तर में कर्मचारियों के लेखा-जोखा से,मंत्रियों के भाषण देने से या नेता और संबंधित विभाग की कर्मचारियों के ग्राउंड ज़ीरो पर जाकर लोगों से बात करके?क्या आपने कभी देखा है कि उपरोक्त दोनों में से किसी को जाकर मिलते हुए? खैर देश का यह तबका भी अपने विकास की राह तो देख ही सकता है।साथ में,हम और आप भी वर्तमान और आगे चुने जाने वाली सरकारों से यही उम्मीद करेंगे की,वो ‘ poverty in india is a historical reality and important issue’ को कहीं भी अंकित ना होने दे।

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

......अलविदा अम्मो


4 तारीख़ की शाम से तमिलनाडु की गमगीन फिज़ाओं ने अब तक देश के कोने-कोने अपना पांव जमा लिया है।देश दक्षिण भारत के नेता नही बल्कि एक जन नेता के ज़िन्दगी से हार जाने के शोक में डूबा हुआ है। रविवार की शाम को भौगोलिक और भाषाई विविधता के बाद भी देश के पूरब,पश्चिम और उत्तरी इलाकों से जयललिता के लिए मौत से जंग जितने की दुआओं पर सोमवार की रात करीब ग्यारह बजे विराम लग गया और ‘ भगवान उनके आत्मा को शान्ति दें ’ जैसी आवाज़ें वातावरण में गुंजने लगी।अम्मा मौत से जंग तो हार गईं लेकिन जाते-जाते भारतीय राजनीति में हमेशा के लिए एक जीवन्त उदारहण बन गईं।उम्मीद है भविष्य के नेता जब अम्मा के द्वारा लोकहित में किए गए कार्यों के बारे में पढ़ेंगे, तो उन्हें एक बेहतर जन नेता बनने में सहायता मिलेगी।वो ये बात सोंचने पर जरुर मजबूर होंगे कि आखिर कौन सी ऐसी चीज थी,जिसके वजह से उन्होंने लोगों के दिल पर राज किया।

संचार के अलग-अलग माध्यमों से तमिलनाडु से छाती पीट-पीटकर रोते-बिलखते लोगों की आने वाली तस्वीरें,यह बता रही थी कि अम्मा किस तरह से वहां के लोगों के लिए जरुरी थीं।आप ही सोंचिए अम्मा ने कितनी तपस्या और त्याग के बाद लोगों के दिल पर राज किया था।अम्मा को बस नजर देखने के लिए उमड़ी भीड़ उनकी लोकप्रियता का उदारहण तो था ही,साथ हीं देशभर के नेताओं,ख़ासकर के उत्तर भारत के नेताओं के सीख के लिए भी।मैं उत्तर भारत के नेताओं की कर्तव्य निष्ठा पर कोई सवाल नही खड़ा कर रहा हूं,बस इतनी सी बात कहना चाह रहा हूं कि आप लोग अपने और जयललिता की लोकप्रियता के पैमाने पर विचार करें और सोंचे कि वो आप लोगों से वो क्यों भिन्न थीं? अम्मो के द्वारा जनहित के लिए किया गया काम या फिर आप लोगों की जातिगत राजनीति,जनहित के विकास के लिए सिर्फ शोर के साथ बात करना,प्रचारतंत्र या फिर आपका सोशल मीडिया, आपको कौन एक बेहतर जन नेता बनाने में सहायक होगा।

सोमवार, 21 नवंबर 2016

ट्रेन हादसा ।

रविवार की आधी रात दफ़्तर से कई सवालों के साथ घर लौटा।सारे सवाल रविवार की तड़के करीब 3.50 बजे कानपुर से 100 किलोमीटर दूर पुखरायां गांव में हुए ट्रेन हादसे से संबंधित है।इंदौर-पटना एक्सप्रेस के दुर्घटनागस्त होने से जुड़ी हर ख़बरें,समय-समय पर अलग-अलग माध्यमों से आ रही थी।जैसे-जैसे दिन बीत रहा था,तस्वीरें भयावह होती जा रही थी। बिखरे सामान,छोटे-छोटे बच्चों के रोने की आवाज़,किसी के अपने माता-पिता को,किसी के अपने भाई-बहन,तो किसी के अपने बच्चों से बिछड़ने की बो बातें और रोने की आवाज मुझे लगातार परेशान कर रही थी। सुबह में 70 मौतों के साथ शुरु हुई ख़बर, देर रात तक करीब 130 तक पहुंच गई।इस हादसे में करीब 200 लोग भी ज़ख्मी हुए।यह अनुमानित आंकड़ा है,वास्तविक नही।
यह ख़बर सामने आते ही लगभग नेताओं और जनता के सोशल मीडिया सक्रिय हो गये।‘मारे गये व्यक्ति के परिवार वालों के प्रति संवेदना,मृतक के आत्मा को भगवान शान्ति दें,दोषियों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।‘ जैसे तमाम सन्देशों के साथ-साथ रेलवे और भारत सरकार को विपक्षियों और आम जनता के आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा।सबसे हैरानी कि बात है कि आलोचक नेताओं की जमात में से एक भी नेता घटनास्थल पर नही पहुंचे।आखिर क्यों? क्या उनलोगों की जिम्मेदारी ट्वीटर और लम्बे चौड़े भाषणों तक ही है?हमेशा की तरह ही इस दुर्घटना के बहाने कई लोगों ने केन्द्र सरकार के बुलेट ट्रेन वाली परियोजना पर भी हमला बोल दिया। वैसे मुझे आजतक समझ नही आया कि बुलेट ट्रेन विरोधी लोग भारतीय रेलवे के साथ जोड़कर क्यों देखते हैं?
माकपा के पोलित ब्युरो ने कहा कि ‘बुलेट ट्रेन’ की अधिक चिंता करने वाले प्रधानमंत्री और रेल मंत्री इस घटना की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं हैं।वहीं गरीबों की स्व-घोषित हितैषी मायावती ने यहां तक कह दिया कि जब देशभर की गरीब जनता दुखी है,वहीं नरेन्द्र मोदी सबसे खुश है।आगे उन्होंने कहा कि बुलेट ट्रेन परियोजना में पैसा निवेश करने के बजाय रेलवे ट्रैकों के दुरुस्त बनाए रखने में पैसा खर्च किए होते तो शायद ये हादसा ना होता।आमतौर पर जब भी कोई रेल दुर्घटनाग्रस्त होती है,तो रेलमंत्री को ही दोषी ठहराया जाता है।लेकिन मेरे जानने में ममता बैनर्जी ही अकेले ऐसी नेता हैं,जिन्होंने रेलमंत्री सुरेश प्रभु को दोषी नही ठहराया है और दुर्घटना के लिए नरेन्द्र मोदी की विचारधाराओं और नीतियों को जिम्मेदार ठहराया।
इस दुर्घटना में वही सब कुछ हुआ जो पहले से होता चला आ रहा है। घटनास्थल पर रेलवे बचाव दल के सदस्य और राष्ट्रीय आपदा मोचन बल के सदस्य दिन-रात एक करके बचाव कार्य को पूरा किया। जल्द ही रेल राज्यमंत्री और संबंधित अधिकारी भी घटनास्थल पर पहुंच गये थें। केन्द्रीय रेलमंत्री शाम तक दुर्घटनास्थल और अस्पताल में जाकर पीड़ितों के हाल का जायजा लिया।रेलवे,मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकार ने मुआवजा देने की घोषणा की।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आगरा की रैली में स्वागत के वक्त ‘फूलों के माला’ से स्वागत वाले रश्म के लिए मना कर दिया।पीड़ितों के प्रति संवेदना व्यक्त की और उच्च स्तरीय जांच जांच करवानें की बात कही।इस पुरी प्रक्रिया में कुछ भी नया नही था।सवाल यह है कि आखिर इस चली आ रही परम्परा से कब तक और कैसे निजात मिलेगा?
रेलमंत्री के 2016-17 बजट भाषण में ‘ दुर्घटना रहित भारतीय रेल ‘ विजन पर कहां तक अमल हुआ? साल 2014 में नई सरकार के सत्ता में आने से लेकर अब तक,सबसे ज्यादा रेलवे के समृद्ध होने की बात कही जा रही है।सोशल मीडिया से लेकर तमाम रिपोर्ट रेलवे के समृद्ध होनी की बात कह रही है।हम समय-समय पर सुनते रहते हैं कि सफ़र के दौरान किसी भी तरह की परेशानी से जूझ रहे यात्री,अगर ट्वीट कर देता है तो रेलवे उसको सहायता पहुंचाती है।यह एक नया तरीका है समृद्धों के लिए हो सकता है,लेकिन उनका क्या जो ट्वीटर पर नही है।
यह हादसा इतना भयावह था कि इसकी गिनती रेलवे के बड़े हादसों में होनी लगी। रविवार को बीबीसी ने 6 जून 1981 से लेकर 20 मार्च 2015 तक की बड़े रेल हादसों की एक रिपोर्ट छापी। जिसको मैने फेसबुक पर किया है,चाहे तो पढ़ सकते हैं।भारत में रेल हादसों का इतिहास कोई नया नही है।भारतीय रेल अपने उद्भव काल से ही समय-समय पर अलग-अलग कमियों के कारण हादसे का शिकार होती रही है। 6 जून 1981 को बिहार में तूफान के कारण एक ट्रेन नदी में जा गिरी,जिसमें 800 लोगों की मौत हुई और 1000 से ज्यादा लोग घायल हो गये।अगर रविवार को हुए हादसे के कारण के बारे में हम बात करें तो रेलवे ने सोमवार को 16.30 बजे तक वास्तविक कारण का पता नही लगा पाई है।आखिर क्यों? दोषियों को कड़ी सज़ा की मांग करने वालों से मेरा एक सवाल है कि सजा देकर आखिर आप क्या हासिल करना चाहते है?इतने सारे हादसे हुए,जिसमें दोषियों को सजा मिली।उससे क्या हासिल हो गया?दुर्घटनाएं कम हो गई?
आज ही रेलवे बोर्ड के पूर्व सदस्य रह चुके आदित्य प्रकाश मिश्रा ने बीबीसी को बताया कि भारतीय रेल के बुनियादी ढांचे को ठीक करने की ज़रूरत है। साथ ट्रेन के पटरी से उतरने की वजहों और इससे जुड़े दूसरे तकनीकी पक्षों के बारे में बताया।उन्होंने कहा कि "भारत में पटरी से उतरने की वजह से होने वाले रेल हादसों का इतिहास कोई नया नहीं है।ट्रेन के पटरी पर से उतरने के चार मुख्य कारण हो सकते हैं.
पहला- सामने किसी अवरोध के आने के कारण ट्रेन पटरी पर से उतर सकती है।कई बार ऐसा होता है कि कोई मवेशी या बड़ा जानवर अचानक से पटरी पर आ जाता है तो ट्रेन पटरी पर से उतर जाती है।
दूसरा- इंजन का कोई हिस्सा या पार्ट अगर गिर जाए और उस पर ट्रेन चढ़ जाए तो ऐसी स्थिति में भी पटरी पर से ट्रेन उतर सकती है।
तीसरा- पटरी के टूटे होने की स्थिति में भी ट्रेन पटरी पर से उतर सकती है।लेकिन ऐसी स्थिति में इंजन के साथ ट्रेन उतरती है।कानपुर के पास जो हादसा हुआ है उसमें इंजन पटरी पर से नहीं उतरा है।कभी-कभी यह भी हो सकता है कि इंजन के निकलने के बाद पटरी के बीच का गैप बढ़े और तब पीछे के डिब्बे पटरी पर से उतर जाएं.
चौथा- कई बार किसी-किसी इलाके में उपद्रवी और ग़ैर सामाजिक तत्वों के तोड़-फोड़ करने के कारण भी ट्रेन पटरी पर से उतर जाती है।

साथ ही उन्होंने कहा कि कानपुर के पास जो हादसा हुआ है उसमें मानवीय चूक होने की संभावना नहीं लगती है।मैंने अभी जो चार तकनीकी वजहें बताई है इनकी संभावना ही ज्यादा लगती है।"



शनिवार, 12 नवंबर 2016

अफवाहों से नफा-नुकसान किसका ?

Image result for अफवाह
अफवाहों से नफा-नुकसान किसका ?
"always remember...remours are carried by haters ,spread by fools and accepted by iditos."
Ziad k. Abdelnour ने भी क्या खुब कहा है।इनका यह कथन थोड़ा कड़वा है,लेकिन सच है।मैं इस कथन से पुर्ण सहमत हूं,उम्मीद करता हूं आप भी सहमत होंगे।
अफ़वाह एक ऐसी चीज है,जो हमारे सभी ज्ञानइन्द्रियों को निष्क्रिय कर देता है और अपना गुलाम बना लेता है।वैसे तो सबसे बुद्धिजीवी प्राणी इंसान है,लेकिन अफवाहों के वक्त मन:स्थिति क्या होती है,बताने की ज़रूरत नही है।
अफ़वाह कोई नई चीज नही है।इससे समय-समय पर हमारा और आपका सामना होते रहता है।अफ़वाहों से मनुष्यों का जन्म-जन्मान्तर का संबंध है।समय-समय पर कुछ लोगों द्वारा अफ़वाहें उड़ाई जाती रहती है।कुछ ऐसा ही बीती रात को भी हुअा।नमक और चीनी का अफवाह कोई नया नही है।बचपन में भी सुना,अब भी सुन लिया और आगे नही सुनुंगा,इस बात से इनकार नही कर सकता।
शुक्रवार की आधी रात को जब देश के आधे से ज़्यादातर लोग सो रहे होंगे, तब असमाजिक तत्वों के द्वारा देश के छह राज्यों में बिजली की तरह अफवाह फैलाई गई कि नमक और चीनी की भारी किल्लत होने वाली है।लोग ₹400/कि०ग्रा० तक नमक खरीदने लगे। यह अफ़वाह यूपी से उड़ी।सबसे मजे की बात यह है कि जिन-जिन जगहों पर अफ़वाह फैली,वो सभी देश के विकसित इलाके है। जैसे-पटना,दिल्ली,लखनऊ,बम्बई और म०प्र० के आसपास के इलाके।ज्यादातर पढ़े-लिखे और विकसित लोग हीं यहां निवास करते हैं।इस बात से इनकार नही किया जा सकता कि अफ़वाह फैलाने में इन लोगों का हाथ नही होगा।इन लोगों ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल भरपुर रूप से किया और अफ़वाह फैलाने में ज़बरदस्त सफलता पाई।जब तक केन्द्रीय खाद्य एवम् आपुर्ती मंत्री रामविलास पासवान,यूपी और दिल्ली के मुख्यमंत्री यह बात बोले कि नमक और चीनी की कोई कमी नही है।कृप्या अफवाहों पर ध्यान ना दें,तब तक यह अफ़वाह हिंसक रूप धारण कर चुकी थी।
दिल्ली के 4 सरकारी बसों को उपद्रवियों ने क्षतिग्रस्त कर दिया और मामले को शान्त करने आई पुलिस से झड़प करने लगे।उपद्रवियों को यह सोचना चाहिए कि बसों के क्षतिग्रस्त होने से नुकसान किसको होगा और किसको परेशानियों का सामना करना पड़ेगा?क्या बस में नेता या उसके परिवार के लोग सफर करते हैं?जिन बसों को क्षतिग्रस्त किया गया है,वो किसके पैसे से खरीदा गया था?हमारे टैक्स के पैसे से या फिर नेताओं के अपने धन से?क्या यह सवाल पुछना उचित नही होगा कि पुलिस हमारी सहायता के लिए क्यों आएगी? पुलिसकर्मी तो हमारी ही सहायता के लिए होते है ना।अगर हम उनको व्यवस्था बनाये रखने में सहयोग नही करेंगे,तो कौन करेगा?
क्या सिर्फ सरकार और प्रशासन को दोषी ठहराने से हमारा काम चल जाएगा?एक नागरिक होने के नाते हमारी कुछ जिम्मेदारी है कि?
एक ख़बर आई कि म०प्र० के एक दुकान में आधी रात को तकरीबन 100 लोगों ने एक दुकान को लुट लिया।क्या इस बात से इनकार किया जा सकता है कि लुटेरे आसपास के नही होंगे ? लुटेरे दूर-दराज के इलाके से तो नही आए होंगे।क्यों वहां के स्थानीय लोगों ने दुकान को लुटने से बचाने की कोशिश नही की।क्या यही मानवता है? या ये बुद्धिजिवी होने का परिचायक है। कम से कम लुटेरों को इस बात का ख्याल तो रखना चाहिए था कि दुकानदार अपने कितनें वर्षों की खून-पसीने की कमाई और मेहनत से सींच कर,अपनी दुकानदारी से जनता की सेवा कर रहा होगा।क्या लूटा दुकानदार इतनी जल्दी अपने दुकान को पहले की तरह तैयार कर पाएगा?और दुकान नही होने से किसको परेशानियों का सामना करना पड़ेगा?
जब यह सब घटित हो रहा था,उस समय देश का बहुत बड़ा हिस्सा,जो सोशल मीडिया पर नही है,या सोशल मीडिया का निरन्तर उपयोगकर्ता नही होगा वो इस ख़बर से बेख़बर चैन की नीन्द में सोया था।और सुबह जब जगा होगा तो इस ख़बर को क्या सोंच रहा होगा?आप भी कल्पना कर सकते हैं।
अन्त में यहीं कहना चाहता हूँ कि अफ़वाह के वक्त अपने ज्ञानइन्द्रियों को खुला रखें,बाकि आपकी मर्जी।

भारत की राज-व्यवस्था

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