पूरी दुनिया में आज राष्ट्रपिता को याद किया जा रहा है। दुनिया को अहिंसा का मंत्र देने वाले शख़्स को आज ही के दिन यानि 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। अहिंसा के पुजारी की हत्या करनी की सातवीं कोशिश थी। एक तरफ़ बापू की पुण्यतिथि पर उनकी बातों को याद करने की रवायत है, जो हर साल की तरह आज किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ़ बीते वर्षों में बापू के हत्यारे से सहानुभूति रखने वाले गर्व से और ठंके की चोट पर रोज़-रोज़ बापू के अहिंसा वाले विचार पर आघात कर रहे हैं। साल 2019 में अलीगढ़ में अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की राष्ट्रीय सचिव पूजा शकुन पाण्डेय ने गांधी जी के पुतले को गोली मारी, और नाथूराम गोडसे की तुलना भगवान कृष्ण से की थी। गाँधी की मूर्तियों को तोड़ना आम बात हो गया है। राजनीतिक संरक्षण प्राप्त ऐसी हरकत करने वालों के समर्थन में एक झुण्ड तैयार कर दिया जाता है, जो चीख़-चीख़कर कहता है कि इसमें क्या ग़लत है। अगर गाँधी आज ज़िन्दा होते तो देश और भी कई टुकड़ों में बंट गया होता।
ख़ैर, गांधी अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन गांधी की बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके जीते जी थी। इसलिए मैंने हेडिंग लिखा है ‘अहिंसा: एक राह, जिस पर चलना ही होगा’। यह हेडिंग लिखने की वज्ह ये है कि इन दिनों कई लोग पूछ रहे हैं कि, बताओ यदि तुम्हें कोई अचानक से थप्पड़ मार दे तो क्या करोगे? क्या तुम उसको पलट के नहीं मारोगे? यह सवाल इसलिए लोग पूछ रहे हैं कि अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव की एक जनसभा में देश के वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने देश के ग़द्दारों को...गोली मारने की बात लोगों से कहलवाई, जिसका मैंने पुरज़ोर विरोध किया था। हिंसक और कट्टरवादी सोच का मैं कभी भी समर्थन नहीं कर सकता हूँ। जो लोग मुझसे थप्पड़ मारने को लेकर सवाल पूछ रहे हैं, उनसे कहना चाहता हूँ कि सिरफिरे लोगों से उलझने में सिर्फ़ नुक़सान ही है। जो लोग समस्याओं को सुलझाने के लिए संवाद में यक़ीन नहीं रखते हैं, वैसे लोगों से निबटने के लिए हमारे देश में संविधान और क़ानून नाम की चीज़ है। वक़्त है धर्म और जाति के नाम पर रगों में दौड़ते हुए ख़ून को शान्त करने का और ये तभी हो सकता है जब नफ़रत को ख़त्म कर इंसानियत को आत्मसात किया जाएगा। प्रमोद कपूर ने अपनी किताब Gandhi: An Illustrated Biography में लिखा है कि जिस दिन गाँधी की हत्या हुई थी उस शाम पंडित जवाहर लाल नेहरू ने ऑल इण्डिया रेडियो पर देश को सम्बोधित करते हुए कहा था कि “The light has gone out of our lives”। हम में से गांधी तो कोई नहीं बन सकता है लेकिन हम गांधी की राह पर तो चलकर मानवता की दीप जला सकते हैं।






