गुरुवार, 30 जनवरी 2020

अहिंसा: एक राह, जिस पर चलना ही होगा।

पूरी दुनिया में आज राष्ट्रपिता को याद किया जा रहा है। दुनिया को अहिंसा का मंत्र देने वाले शख़्स को आज ही के दिन यानि 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। अहिंसा के पुजारी की हत्या करनी की सातवीं कोशिश थी। एक तरफ़ बापू की पुण्यतिथि पर उनकी बातों को याद करने की रवायत है, जो हर साल की तरह आज किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ़ बीते वर्षों में बापू के हत्यारे से सहानुभूति रखने वाले गर्व से और ठंके की चोट पर रोज़-रोज़ बापू के अहिंसा वाले विचार पर आघात कर रहे हैं। साल  2019 में अलीगढ़ में अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की राष्ट्रीय सचिव पूजा शकुन पाण्डेय ने गांधी जी के पुतले को गोली मारी, और नाथूराम गोडसे की तुलना भगवान कृष्ण से की थी। गाँधी की मूर्तियों को तोड़ना आम बात हो गया है। राजनीतिक संरक्षण प्राप्त ऐसी हरकत करने वालों के समर्थन में एक झुण्ड तैयार कर दिया जाता है, जो चीख़-चीख़कर कहता है कि इसमें क्या ग़लत है। अगर गाँधी आज ज़िन्दा होते तो देश और भी कई टुकड़ों में बंट गया होता। 

ख़ैर, गांधी अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन गांधी की बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके जीते जी थी। इसलिए मैंने हेडिंग लिखा है ‘अहिंसा: एक राह, जिस पर चलना ही होगा’। यह हेडिंग लिखने की वज्ह ये है कि इन दिनों कई लोग पूछ रहे हैं कि, बताओ यदि तुम्हें कोई अचानक से थप्पड़ मार दे तो क्या करोगे? क्या तुम उसको पलट के नहीं मारोगे? यह सवाल इसलिए लोग पूछ रहे हैं कि अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव की एक जनसभा में देश के वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने देश के ग़द्दारों को...गोली मारने की बात लोगों से कहलवाई, जिसका मैंने पुरज़ोर विरोध किया था। हिंसक और कट्टरवादी सोच का मैं कभी भी समर्थन नहीं कर सकता हूँ। जो लोग मुझसे थप्पड़ मारने को लेकर सवाल पूछ रहे हैं, उनसे कहना चाहता हूँ कि सिरफिरे लोगों से उलझने में सिर्फ़ नुक़सान ही है। जो लोग समस्याओं को सुलझाने के लिए संवाद में यक़ीन नहीं रखते हैं, वैसे लोगों से निबटने के लिए हमारे देश में संविधान और क़ानून नाम की चीज़ है। वक़्त है धर्म और जाति के नाम पर रगों में दौड़ते हुए ख़ून को शान्त करने का और ये तभी हो सकता है जब नफ़रत को ख़त्म कर इंसानियत को आत्मसात किया जाएगा। प्रमोद कपूर ने अपनी किताब  Gandhi: An Illustrated Biography में लिखा है कि जिस दिन गाँधी की हत्या हुई थी उस शाम पंडित जवाहर लाल नेहरू ने ऑल इण्डिया रेडियो पर देश को सम्बोधित करते हुए कहा था कि “The light has gone out of our lives”। हम में से गांधी तो कोई नहीं बन सकता है लेकिन हम गांधी की राह पर तो चलकर मानवता की दीप जला सकते हैं।

बुधवार, 22 जनवरी 2020

फ़िल्म छपाक को सपरिवार क्यों देखने जाना चाहिए?

आज मैं फ़िल्म छपाक देखने गया था। यह जानकारी थी मुझे कि फ़िल्म अच्छी कमाई नहीं कर रही है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ फ़िल्म छपाक रिलीज़ होने के बाद से अबतक क़रीब 40 करोड़ रूपये ही कमा पाई है। जबकि यह चार कांग्रेस शासित राज्य राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पुडुचेरी में टैक्स फ़्री है। इन चारों ने तब इस फ़िल्म को टैक्स फ़्री करने का ऐलान किया,जब दीपिका पादुकोण जेएनयू में फ़ीस विवाद को लेकर आंदोलनरत छात्रों से यकजहती का इज़हार करने पहुंची थीं। बिना पूर्व सूचना के जब दीपिका जेएनयू पहुंची तो, सोशल मीडिया पर बायकॉट छपाक ट्रेंड करने लगा था। दीपिका को गन्दी-गन्दी गालियां तक दी गई। कहा गया कि दीपिका टुकड़े-टुकड़े गैंग की समर्थक हैं। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि कुछ दिनों पहले जब एक RTI के माध्यम से गृह मंत्रालय से कथित टुकड़े-टुकड़े गैंग के सदस्यों का नाम पूछा गया तो गृह मंत्रालय के पास कोई नाम नहीं था। मतलब टुकड़े-टुकड़े गैंग शब्द का इस्तेमाल पीएम Narendra Modi, गृह मंत्री अमित शाह समेत तमामBharatiya Janata Party (BJP) के नेताओं और उनके समर्थकों द्वारा सियासी फ़ाइदे के लिए किया जाता है। जेएनयू में जाने पर दीपिका को समाज के एक वर्ग से शाबाशी भी मिली थी, लेकिन फ़िल्म के लिहाज़ से वहाँ जाना शायद ग़लत साबित हुआ। दीपिका ने अबतक इस बात का खुलासा नहीं किया है कि वो किसके कहने और क्या समझ कर जेएनयू गईं थीं।

अब बात करते हैं कि यह फ़िल्म हर माता-पिता को अपने बच्चों के साथ ख़ासकर बेटों के साथ क्यों देखने जाना चाहिए। मेरे फ़िल्म देखने जाने की वज्ह बिल्कुल साफ़ थी। यह एक सामाजिक फ़िल्म है, इसलिए मैं देखने गया था। कहते हैं ना फ़िल्म समाज का आईना होता है, तो इसी बात को मानते हुए हर इंसान को इस फ़िल्म को देखने जाना चाहिए ताकि पता चल सके कि हमारा समाज कैसा है। 03 बजकर 05 मिनट पर शुरू होने वाले शो के लिए तीन बजने में पांच मिनट कम था तो मैं थियेटर पहुँच गया था। जिस ऑडी में फ़िल्म दिखाया जाना था,जब मैं वहाँ पहुँचा तो बिल्कुल ख़ाली था। मुझे लगा कि मैं कहीं बहुत पहले तो मैं ही नहीं पहुँच गया हूँ। फिर मैं बाहर आ गया। लेकिन फ़िल्म शुरू होने के क़रीब दो-तीन मिनट तक क़रीब 200 लोगों के बैठने की क्षमता वाले ऑडी में मैं अकेला था। फिर एक-एक करके लोग आने शुरू हुए। फ़िल्म समाप्त होने के बाद जब हमलोग निकले,तो हमारी संख्या मुश्किल से दस थी। फ़िल्म की कमाई नहीं हो रही है, लेकिन फ़िल्म सामाजिक होने की वज्ह से मैं देखने गया था। मेरे साथ फ़िल्म देखने वाली एक महिला ने कहा था कि इससे अच्छा तो हमलोग तान्हाजी देख लेते। मुझे थोड़ा अजीब लगा था, लेकिन मैं चुप रहा।

फ़िल्म में कई ऐसी तस्वीरें हैं जो आपको भीतर से झकझोर देती है। हंसती-खेलती बेटियां अपने शैशवास्था में जैसे घरों की रौनक होती हैं, वैसे ही हंसती-खेलती बेटियां समाज के लिए भी रौनक होती हैं। बदलते ज़माने में पुरुषवादी मानसिकता वालों को यह समझना पड़ेगा कि  बेटियां जब बड़ी हो जाती हैं,तो उनके सपनों को पंख लगाने के ज़िम्मावारी माता-पिता के साथ समाज की भी होती है। एक कहावत भी तो है कि बेटियां समाज की होती हैं, मतलब बेटियों की देखभाल की ज़िम्मावारी समाज की भी होती है। सामाजिक बेड़ियों को तोड़कर अपने सपनों को हक़ीक़त में बदलने के लिए दहलीज़ पार करने वाली बेटियों को तंग नज़र की बजाय सहायता के लिए हाथ बढ़ाना पड़ेगा।

बेटे के साथ इस फ़िल्म को देखने जाने से मेरा तात्पर्य यह है कि आपका बेटा इस बात को महसूस कर सकें कि ज़ुल्म की शिकार बेटियों को कैसे-कैसे सामाजिक और मानसिक यातनाओं से गुज़रना पड़ता है। फ़िल्म में मालती के भाई को,जब वह पार्क में खेल रहा होता है,तो उन्हीं में से एक कहता है कि घर जा ना..क्यूं नहीं जा रहा...भूत आ गई है तुम्हारे घर में ना... इसलिए नहीं जा रहा है ना...ऐसा कहते हुए मज़ाक उड़ाते हैं, उनके बाद मालती के भाई को कितना बुरा लगता है। कहीं जाने-अनजाने में आपका बेटा तो ऐसा नहीं करता हैं ना।

दूसरी तस्वीर जिसको देखकर मेरी आँखें भर आईं थीं। मालती को बचपन के सजना-संवरना बहुत अच्छा लगता था, इसलिए वो श्रृंगार की सभी चीज़ें ख़रीदकर रखती थी, लेकिन एक दिन दरिंदगी की शिकार हो जाती है। तेज़ाब की वज्ह से चेहरे के साथ उसके कान भी जल जाते हैं। चेहरे की पहली सर्जरी देखकर फूटकर रोने लगती है। फिर एकाध और सर्जरी के बाद जब वो अपने कान में पहनने वाले गहने को निकालती है और आईने के सामने जब कान के पास हाथ ले जाती है तो एक कान ही नहीं दिखता है। क्या इस बात की कल्पना करना मुश्किल है कि ऐसे वक़्त में बेटियां कितना टूट जाती हैं? 

बेटियां सिर्फ़ उस घर की रौनक नहीं होती हैं, जिसमें वो पैदा होती हैं। वो तो उस घर और समाज के लिए भी रौनक होती हैं जहाँ ब्याही जाती हैं। बेटियों पर होने वाले ज़ुल्मों को रोकने के लिए समाज के लोगों को बिल्कुल वैसे ही उंगलियों का सहारा देना होगा, जैसे बचपन में चलने ‌के वक़्त देते हैं, ताकि वो अपने सपनों को पंख लगा सकें। हफ़्ते दिन पहले दिल्ली में पाँच साल की गुड़िया से पड़ोसियों द्वारा दुष्कर्म पर फ़ैसला सुनाते हुए दिल्ली की अदालत के एक जज ने कहा था कि कई मौक़े पर हम बेटियों को लक्ष्मी की तरह पूजते हैं, लेकिन बाद में भूल जाते हैं। इसलिए समाज को भूलने की नहीं बल्कि याद रखने की ज़रूरत है।

बुधवार, 15 जनवरी 2020

स्कूल तो मॉडल नहीं बन पाया, लेकिन बदतर ज़रूर हो गया है!

ग्यारह बजे से लेट नहीं एक बजे भेंट नहीये आदर्श वाक्य मेरे गांव के हाई स्कूल की बन गई है। बीते तीन चार-सालों में बद से बदतर हो गई इस स्कूल की शैक्षणिक व्यवस्था के लिए अकेले  कोई ज़िम्मावार नहीं है। पिछले 3-4 सालों में जब भी गाँव जाता था तो गिनती के लोग स्कूल की शैक्षणिक व्यवस्था के बारे में बताते हुए दुखी हो जाते थें। समय की कमी होने की वज्ह से मुझे भी सोचने का समय नहीं मिल पाता था। लोग कहते थें कि स्थानीय पत्रकार भी इस बदहाल स्थिति के बारे में लिखते-बोलते नहीं है। स्थानीय पत्रकारों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है कि स्कूल की क्या स्थिति हो गई है। गाँव से हज़ार किलोमीटर दूर रहने के बावजूद लोगों के बातें मुझे दुखी करती थी। कई वज्हों में से एक वज्ह यह भी है कि मैं इस विद्यालय का छात्र रहा हूँ। इस शिक्षा के मन्दिर में मैंने अनुशासन, विद्यार्थी और शिक्षक के बीच आदर्श संबंध कैसा होता है, विद्यार्थी और शिक्षक की आँखों में पढ़ने-पढ़ाने की लालसा को क़रीब से देखा है। इसलिए आज की बदतरीन तसावीरें जब सुनने और देखने को मिलती है तो सच में बुरा लगता है।

इस बार दिसम्बर में गाँव गया था,तो लोग स्कूल की बदहाली के बारे में बताते थें, उसको काफ़ी क़रीब से देखा और परखा। गाँव के कई लोगों इस पर बात करने की कोशिश भी की,लेकिन ज़्यादातर लोगों ने इस संबंध में बात करना अनुचित समझा, तो कुछ लोगों ने कहा कि उनको विद्यालय की बदहाली के बारे में जानकारी ही नहीं हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी थें जो दुखी मन से इतना कहकर बात बदल देतें कि बात करने से क्या फ़ाइदा। इन सभी लोगों से गुज़ारिश है कि यह विद्यालय आपका है,मतलब पैसा होने की वज्ह से आपका बच्चा तो किसी प्राइवेट या किसी शहर में पढ़ लेगा,लेकिन हो सकता है कि आपके पड़ोस का,आपके दोस्त का जिसके पास अपने बच्चे को इस स्कूल में भेजने के अलावा कोई विकल्प ना हो,तो क्या आप चाहेंगे की ऐसे लोगों का बच्चा अच्छी शिक्षा हासिल ना करे? एक वक़्त था कि हमारे गाँव की पहचान इसी स्कूल से हुआ करती थी। सभी ग्रामीणों से आग्रह तो कर ही सकता हूँ कि अपनी इस पहचान को खोने मत दीजिए। एकजुट होकर स्कूल प्रशासन से बात कीजिए,उन पुराने शिक्षको से आग्रह कीजिए कि सर..उस व्यवस्था को फिर से लौटाने में हमारी मदद कीजिए, जिसमें स्कूल के छात्र शिक्षा के अलावा साइंस, कला, साहित्य और खेल के क्षेत्र में नाम रौशन करते थें।

इस बार गाँव गया था तो मैं स्कूल के भीतर भी गया था। कुछ तस्वीरें खींच लाया हूँ उस तस्वीर को दिखाने के लिए स्कूल हालत क्या है। मैंने कई पुराने शिक्षकों को,जिन्होंने मुझे भी पढ़ाया है,वो सिर्फ़ हाज़िरी लगाने आते थें और समय से पहले स्कूल से निकल जाते थें। ऐसा एक दिन कई दिन मैंने देखा। मुझे मालूम है कि जब पुराने शिक्षकों की जानकारी में यह बात आएगी,तो बुरा लगेगा। पुराने शिक्षकों से मेरी विनती है कि साल-दो साल, पांच साल में आप रिटायर करके यहां से चले जाएंगे, लेकिन मेरे गाँव के बच्चों के लिए यही स्कूल रहेगा। इसलिए आपलोग फिर से उस व्यवस्था की शुरूआत कीजिए जिसमें पठन-पाठन हो। 
नीचे जो तस्वीर है वो स्कूल में प्रार्थना के वक़्त की है। एक दिन मैं जब कुछ सामान लाने के लिए घर से निकला तो देखा कि प्रार्थना हो रही थी। विद्यार्थियों की संख्या देखकर मैं हैरान हो गया। मुझे याद है कि मैं जब पढ़ता था, तो जो तस्वीर में ख़ाली जगह दिख रहा है, प्रार्थना के वक़्त भर जाता था। कहने का मतलब यह है कि तब विद्यार्थी आते थें और विद्यार्थी इसलिए आते थें कि पढ़ाई होती थी। लेकिन वर्तमान की ये तस्वीर बता रही है कि ना तो बच्चे पढ़ने आते हैं और ना ही मास्टर पढ़ाना चाहते हैं। स्कूल में कुल कितने छात्रों का नामांकन होता है इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा तो मेरे पास नहीं है,लेकिन जिनकी नज़र इस विद्यालय पर क़रीब से रहती है उनके मुताबिक़ कक्षा 9 और 10 में कुल बच्चों की संख्या 2500 के क़रीब है और 10+2 में 700 बच्चों का दाख़िला होता है। लेकिन तस्वीर तो कुछ और कह रहा है। मेरे समय में इस स्कूल में क्लास 6,7 और 8 भी हुआ करता था। लेकिन वर्तमान की तस्वीर के आधार पर क्या यह नहीं कहा जा सकता है कि पढ़ाई को लेकर बच्चे, परिजन, शिक्षक और शिक्षा तंत्र, सब के सब लापरवाह हैं?
बताने वालों में से एक ने बताया कि क़रीब 3-4 साल पहले इस स्कूल को मॉडल स्कूल के साथ-साथ इस स्कूल का इंडोर स्टेडियम बनाने की बात हुई थी। वर्तमान सांसद राजीव प्रताप रूडी के नेतृत्व में तब के ज़िलाधिकारी शाम के वक़्त स्कूल का और स्कूल के पीछे जहाँ इंडोर स्टेडियम बनाने की बात हुई, उस जगह का निरीक्षण तक किया गया था, लेकिन अबतक स्कूल ना तो मॉडल बन सका और ना ही इंडोर स्टेडियम। हाँ इन बीते सालों के लिए ये कहा जा सकता था कि जो भी था वो चौपट हो गया। 

नीचे स्कूल के पुस्तकालय की तस्वीर है। तस्वीर में साफ़-साफ़ दिख रहा है कि पुस्तकालय की सीढ़ी और आसपास घुटने से कम ऊँचाई तक घास उगा हुआ है। ये हाल तब है जब स्कूल में एक पुस्तकालय अध्यक्ष भी नियुक्त है। सवाल यह है कि पुस्तकालय अध्यक्ष क्या करते हैं? 
नीचे की तस्वीर स्कूल के प्रयोगशाला की है। दरवाज़ों में लगे तालों की स्थिति देखकर कहा जा सकता है कि पठन-पाठन की के लिए इस प्रयोगशाला खोला जाता होगा। हैरानी की बात ये है कि विज्ञान के छात्रों की प्रायोगिक परीक्षा भी होती है। एक दिलचस्प बात यहां बता देता हूँ कि 30 अंक के प्रायोगिक परीक्षा में 75-80 अंक तक दे दिए गये थें। मैं भी जब पढ़ता तब भी रोज़-रोज़ प्रयोगशाला तो नहीं खुलता था,लेकिन हां...राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस की प्रतियोगिता के समय श्रीराम पाण्डेय सर प्रायोगिक जांच कैसे करते हैं बताने के लिए प्रयोगशाला में ले जाते थें। अब मुझे मालूम नहीं कि राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस में स्कूल हिस्सा लेता है या नहीं?
नीचे की दोनों तस्वीरे विद्यालय के छात्रावास की है, जो खण्डहर में तबदील हो गया है। पहले कुछ छात्रों के साथ कई शिक्षक भी रहा करते थें, लेकिन अब कुछ ही शिक्षक रहते हैं। एक शिक्षक ने बताया कि मरम्मत का काम वही लोग कराते हैं। ये तो हाल है।

सोमवार, 13 जनवरी 2020

ग़लत तो ग़लत ही होता है।

सोमवार को घर से निकलकर बैट्री से चलने वाली रिक्शे पर बैठ गया। क़रीब एक किलोमीटर चला ही होगा कि अचानक से रिक्शे में कुछ ख़राबी आ गई। रिक्शाचालक के बगल में मैं ही बैठा,तो चालक ने मुझसे कहा कि, सर..थोड़ा सीट से उठ जाइए..देखना है कि कहीं तार तो छूटा नहीं हैं ना। मैं सीट से उतरकर बगल में खड़ा हो गया। चालक ने जैसे ही सीट को हटाया ,तो देखा कि तारें जैसे-तैसे उलझी हुई हैं। चालक कुछ देर तक तारों को हिलाकर देखता रहा कि कहीं जोड़ पर से छूट गया होगा तो पता चल जाएगा‌। लेकिन पहली कोशिश में कामयाबी नहीं मिली। फिर उसने सीट के नीचे ही चाभी रखा हुआ,उसको निकालकर ऑन-ऑफ़ करने लगा। कई बार ऑन-ऑफ़ करने के बाद रिक्शा चालू नहीं हुआ। दूसरा उसने तारों को हिलाना शुरू किया, अचानक से रिक्शा स्टार्ट हो गया है। हमलोग वहां से आगे बढ़े। 
मैं चालक से कहा कि यार... तुम सिर्फ़ पैसा ही m हो.. कुछ पैसा रिक्शे पर भी ख़र्च किया करना...यह तुम्हारी लिए आमदनी का ज़रिया है। 
चालक ने मुझसे कहा, नहीं... नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, रिक्शे को मेंटेन रखने के लिए ख़र्च करता हूँ।
मैं कहा कि,क्या मेंटेन करते हो.. तारें उलझी हुईं हैं, चाभी लगाने के लिए मीटर के बगल मे जो बॉक्स लगा हुआ वो ढीला ढककर है...चाभी तुम सीट के निचे रखते हो। यही तुम मेंटेन रखते हो?
चालक ने घबराहट में कहा कि, पुलिस की वज्ह से चाभी लगाने है... पुलिस वाला पहले चाभी निकाल लेता है। 
फिर मैंने कहा कि, पुलिस वाले पागल होते हैं क्या कि चाभी निकाल लेते हैं...जब तक तुम ग़लत नहीं करते होगे... ग़लत करो ही मत की पुलिस वाले को चाभी निकालने की ज़रूरत पड़े। मेरी बात सुन चालक मुस्कुराने लगा। मुझे और जगह का तो नहीं मालूम, लेकिन दिल्ली-एनसीआर और बिहार के रिक्शा और टेम्पू वालों के  बारे में कह सकता हूँ कि वो सिर्फ़ पैसा ही कमाते हैं। बहुत कम लोग रिक्शा और टेम्पू को दुरुस्त रखने के लिए पैसे ख़र्च करते हैं।

रविवार, 12 जनवरी 2020

बिहार में बेरोज़गारी के स्तर का नमूना।

"National Youth Day" स्वामी विवेकानन्द के जन्मदिवस के दिन मनाया जाता है। 12 जनवरी यानि बीते दिन जब देशभर के मुख़्तलिफ़ शहरों में स्वामी जी के नाम पर कार्यक्रम हो रहे थे, तब बिहार के नौजवान अपने भविष्य को बेहतर बनाने के लिए धक्के खा रहे थें। पूरे सूबे की तस्वीरें यहां दिखा पाना सम्भव नहीं था, लेकिन इन्हीं दोनों तस्वीरों के आधार पर अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि बिहार में बेरोज़गारी का स्तर कितना हो‌ सकता है। रविवार को Biharpolice में सिपाही के 11880 पदों की भर्ती के लिए पहले दिन की परीक्षा हुई। 20 तारीख़ को दूसरे दिन की परीक्षा होगी। 11880 सीटों के लिए क़रीब 13 लाख़ अभ्यर्थियों के शामिल होने का अनुमान है। इन आंकड़ों से बेरोज़गार युवाओं का अनुमान लगा पाना क्या अब भी मुश्किल है? हाजीपुर स्टेशन पर अभ्यर्थियों ने नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी भी की। सूबे भर के रेलवे स्टेशन का सूरत-ए-हाल यह था कि ट्रेन की पटरियों पर अभ्यर्थियों खड़े रहते थें। प्लेटफ़ॉर्म पर सभी का खड़ा हो पाना सम्भव नहीं था। जैसे ही ट्रेन स्टेशन पर पहुंचती थी, छत्ते पर जैसे मधुमक्खी इकट्ठा हो जाती थीं, वैसे ही अभ्यर्थियों इंजन से लेकर बोगी के दरवाज़े पर तक लट जाते थे। जान जोख़िम में डालकर परीक्षा देने आए और गये।

बुधवार, 8 जनवरी 2020

फ़िल्म छपाक में एसिड अटैकर का क्या नाम है?

बुधवार की शाम अचानक से ख़बर आती है कि  Deepika Padukone जेएनयू में वामपंथियों के कार्यक्रम में शामिल हुईं है। यह कार्यक्रम जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष और कथित रूप से दक्षिणपंथियों के हमले में जिस्मानी रूप से घायल आईशी घोष की ज़ेर-ए-सदारत में आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में Kanhaiya Kumar भी शामिल हुए थें। बकौल दीपिका,वो जेएनयू में हुई हिंसा के ख़िलाफ़ और घायलों का हौसला बढ़ाने के लिए गईं थीं। लेकिन कल से लेकर अबतक दीपिका की बातों से इतर बहुत सारी बातें हो रही हैं। वामपंथी विचारधारा के समर्थकों में खुशी की लहरें उफ़ान मार रही है,क्योंकि उनकी नज़र में दीपिका Narendra Modi , Bharatiya Janata Party (BJP) की सरकार और एबीवीपी के ख़िलाफ़ खड़ी हुईं थीं, तो वहीं दूसरी तरफ़ दक्षिणपंथी हाय-तौबा मचाया हुए हैं। दीपिका को वामपंथी, टुकड़े-टुकड़े गैंग समर्थक और पता नहीं क्या-क्या कर रहे हैं। यहां तक कि इतनी गन्दी-गन्दी गालियां दे रहे हैं कि कल्पना से परे है। फ़िल्म छपाक का बहिष्कार करने की बात कर रहे हैं। मैंने तो ऐलान कर दिया है कि फ़िल्म छपाक को ज़रूर देखने जाऊंगा। यह फ़िल्म समाजिक बुराई पर आधारित है। साल 2005 में देश की राजधानी दिल्ली की लक्ष्मी अग्रवाल, नदीम ख़ान से शादी करने से इंकार कर देती है, जिसके बाद नदीम ख़ान लक्ष्मी पर चेहरे पर एसिड फेंक देता है।

एक और वबाल यह खड़ा कर दिया है कि फ़िल्म में नदीम ख़ान का जो रोल निभा रहा है,उसका नाम राजेश क्यों रखा गया है? कहा जा रहा है कि हिन्दू धर्म को बदनाम करने के साज़िश है। बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने ट्वीट यह कह दिया है कि फ़िल्म में राजेश नाम होगा तो कोई इश्करण,जो कि पेशे से वकील हैं, दीपिका और फ़िल्म निर्माता पर केस करेंगे। इस वबाल पर मैंने अपनी दोस्त उषा श्रीवास्तव से बात की। उषा ने बताया फ़िल्म मे एसिड फेंकने वाले का नाम राजेश, नहीं बल्कि बशीर ख़ान उर्फ़ बब्बू है।

सोमवार, 6 जनवरी 2020

जेएनयू में हिंसा की वज्ह।

इन दिनों फ़ासिस्ट, कट्टरपंथी, नाज़ी और हिटलर जैसे शब्द एक वर्ग की ज़ुबान पर गाहे-बगाहे आ जाता है। आज़ाद हिन्दुस्तान में इन दिनों जितना संविधान संविधान जपा जा रहा है,शायद ही पहले कभी जपा गया होगा। क्या इसके पीछे यह कारण हो सकता है कि एक विचारधारा जो कभी सत्ताहीन होने की सोच भी नहीं सकता था,उसको उस विचारधारा ने सत्ताहीन कर दिया है, जिससे वो राजनीति करते थें? आपका जवाब क्या होगा, हाँ या ना? 

कल रात जेएनयू में जो हुआ वो किसी भी रूप में जायज़ नहीं कहा जा सकता है। हिंसा सिर्फ़ एक देह(शरीर) को ही नष्ट नहीं करता है, बल्कि इंसानियत को भी मारता है, इसलिए ज़रूरी है कि हिंसा को संवाद से ख़त्म करें। जेएनयू में मैं पढ़ तो नहीं सका, लेकिन जेएनयू को जितना जानता हूँ,उस आधार पर कह सकता हूँ कि तर्कशील बनाने वाले इस धरोहर को हर स्तर पर सुरक्षित रखा जाना चाहिए। इससे समाज को फ़ाइदा तो होगा कि सत्ता को भी किसी विषय पर अलग परिपेक्ष्य में सोचने का मौक़ा मिलेगा। यह बिल्कुल ग़लत बात है कि यदि कोई जो भी और जितना सोचता और चीज़ों को जितना देखता हैं उतना काफ़ी है। 

कल रात जब जेएनयू से हिंसा की ख़बरें आनी शुरू हुई,तब से अब तक उस विषय को ग़ायब ही कर दिया गया है कि हिंसा की शुरूआत कैसे हुई? लिखा और कहा जाने लगा कि फ़ासिस्ट, कट्टरपंथी, नाज़ी और हिटलर के ग़ुण्डों ने हिंसा की है, अलग विचारधारा वाले लोग तो सिर्फ़ शिकार हुए हैं। दरअस्ल हिंसा की वज्ह इतना आसान नहीं हैं। हिंसा के लिए सिर्फ़ अकेले कोई ज़िम्मावार हो सकता है? कल शाम से पहले की घटना को भी जानना पड़ेगा। यहां मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ, मैं एक हिंसा से दूसरे हिंसा को जायज़ नहीं ठहरा रहा हूँ। लोग कह रहे ये कि Bharatiya Janata Party (BJP) या केन्द्र सरकार प्रगतिशील लोगों और विचार पर हमले करवा रही है। तो ऐसे लोगों से सवाल है कि क्या ऐसी सोच जो जेएनयू विवि के कम्यूनिकेशन विभाग में जाकर वहां की मशीनों को नुक़सान पहुंचा देता है,सर्बर में छेड़छाड़ कर देता है ताकि छात्र रजिस्ट्रेशन ना करवा सके, बिजली की आपूर्ति बन्द करवा देता है,जो छात्र पढ़ना चाहते हैं उनसे मारपीट करता है,उसको भी प्रगतिशील सोच के खांचे में रखेंगे क्या? यह सब सिर्फ़ इसलिए कर रहे हैं कि उनकी अपनी मांग को अबतक नहीं मांगा गया। अपनी मांग की वज्ह से दूसरे को भी ना पढ़ने देना,क्या प्रगतिशील सोच और संविधानिक रूप से जायज़ है? सरकार और मांग कर रहे छात्रों के बीच कई दफ़ा बातचीत हो चुकी है, लेकिन अबतक नतीज़ा नहीं निकला है। क्या जब तक नतीज़ा नहीं निकलता है,तक विवि में पठन-पाठन का कार्य नहीं होना चाहिए? पठन-पाठन कार्य में व्यवधान उत्पन्न करने वालों कैसे प्रगतिशील सोच मान लिया जाए?

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...