सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

गुजरात चुनाव पर मेरी कलम!

'समस्या मुक्त' राज्य गुजरात में विधान सभा के चुनाव का बिगुल बज चुका है। राज्य की 4 करोड़ 33 लाख जनता अपने मत का इस्तेमाल कर अपने-अपने रहनुमाओं को चुनेगी। मतदान दो चरणों में होगा।9 दिसम्बर को होने वाले पहले चरण के मतदान में 89 सीटों पर,तो वहीं 14 दिसम्बर को  दूसरे चरण में 94 सीटों पर मतदान होगा।18 दिसम्बर को आधिकारिक रूप से नवनिर्वाचित रहनुमाओं का ऐलान हो जाएगा।इस बार 102 बूथों पर महिला पोलिंग स्टाफ़ तैनात होंगी। मैंने 'समस्या मुक्त' शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया है, क्योंकि आज़ तक मैं गुजरात नहीं गया। लेकिन जिस तरीके से राष्ट्रीय पटल पर सरकारी रूप से या मीडिया रिपोर्ट्स में गुजरात को पेश किया जाता है।मेरे ही जैसे देशभर के वैसे लोग जो कभी गुजरात नहीं गये,शायद यही समझेंगे की गुजरात एक समस्या मुक्त राज्य है। मैंने कई सारे रिपोर्ट्स पढ़े,सम्भव हो तो आप भी पढ़िए।आप पायेंगे की इस बार का गुजरात में सिर्फ़ जाति आधारित है।
चुनाव का आधिकारिक ऐलान तो 25 अक्टूबर को हुआ। लेकिन इसकी तैयारी में करीब एकाध-डेढ महीने पहले से ही नेता जुट गये थे।।पीएम मोदी और राहुल गांधी का ताबड़तोड़ गुजरात दौरा इस बात का प्रतीक है।चुनाव में हाफ़िज़ सईद,आईएस, आतंकवादी, कश्मीर की आज़ादी की एन्ट्री करा दी गई है।क्योंकि यही गुजरात की समस्या है।आप घबराइए नहीं,हम दुनिया से सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हैं,हमारे यहां चुनाव करने का पैमाना सिर्फ़ 'बोलने में विकास दिखना चाहिए' है।समस्याओं पर बात तक करना गुनाह माना जाता है।गुजरात के सत्ताधारी दल भाजपा के नेताओं द्वारा की जा रही विकास-विकास की शोर सुनाई दे रही है, लेकिन जिसकी ज़िम्मेदारी है समस्याओं को लोगों के बीच लेकर जाने की है,वो(विपक्ष)गायब हैं या तो जातिगत वोटों की गोलबंदी में लगें हैं।क्योंकि उनको जातिगत राजनीति ही करीब 20 साल की सत्ताहीनता को दूर करने का एक मात्र उपाय नज़र आ रहा है।तभी तो कांग्रेस अपनी दम पर नहीं,बल्कि हार्दिक,जिग्नेश और अल्पेश भरोसे चुनाव जितने का खाब देख रही।कभी देश की सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस का हाल ये है कि वो राजनीति में पहली बार कदम रख रहे नेताओं के भरोसे है।आखिर ऐसी परिस्थिति क्यों आई? कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने एक नीति चैनल के डिबेट शो में एंकर के सवाल का जवाब देते हुए कहा कि ये तीनों विकास की राजनीति करते हैं।कांग्रेस प्रवक्ता ऐसे बयान देकर किसको मुर्ख बना रहें थे?क्या हिन्दुस्तान की जनता इस बात को नहीं जानती है कि इन तीनों की आरक्षण पर क्या राय है?आख़िर प्रवक्ता ये बात कहने में क्यों हिचक रहे थे कि ये तीनों जाति की ही राजनीति करते हैं? चुनाव में राजनीति का पैमाना तो 'जाति' ही है। खैर इन तीनों से कांग्रेस को कितना फ़ायदा होगा आने वाला वक़्त बताएगा।
आज कल देश में खुद को मसीहा समझने वाला ज़्यादा लोग पैदा हो रहें हैं।इसके पीछे एकमात्र कारण है, लोगों ने खुद को किसी नेता की सोच के हवाले करना शुरू कर दिया है। मतलब लोगों ने सालों मेहनत कर अर्जित किए गये अपने ज्ञान को नेताओं के पास गिरवी रखना शुरू कर दिया है। गुजरात में हार्दिक पटेल को पाटीदारों का मसीहा माना जाता है। हार्दिक ने अपने उस पटेल समुदाय के लिए आरक्षण की मांग करते हुए सरकारी सम्पत्तियों को नुकसान पहुंचाया जो जहां भी हैं आर्थिक रूप से काफ़ी मज़बूत है।
-22 लाख एनआरआईज़ में 35 % गुजराती हैं जिनमें आधे से ज्यादा पटेल कम्यूनिटी के हैं।
-अमेरिका में मोटल बिजनेस पर एकाधिकार रखने वाले पटेल ही हैं।
-अमेरिकी हाइवे पर बने 70% होटल पटेलों के
ईस्ट अफ्रीका,मिडिल ईस्ट,यूके,आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में पटेलों के बिजनेस एंपायर है।
-अकूत दौलत और बेशुमार जमीनों के स्वामी हैं पटेल समुदाय, खेती और कंस्ट्रक्शन इंड्रस्ट्री और व्यापार पेशे में शामिल हैं।
-राजकोट में फैली 12 हज़ार इंड्रस्ट्रियल यूनिट्स में से 40% पटेलों की है।
-सूरत की 4 हज़ार हीरा कटिंग यूनिट्स में से 70% पटेलों की है।
-मोरबी में स्थित भारत की सबसे बड़ी सेरेमिक इंड्रस्ट्री की 90 % पटेलों की है।
-मौजूदा सरकार में करीब 40 विधायक और 7 मंत्री पटेल समुदाय से हैं।
सुबे में पाटीदारों को किंग मेकर माना जाता है।पाटीदार मतदाता करीब 20 फ़िसदी है जिसका प्रभाव 70 सीटों पर है।
पेशे से वकील और सामाजिक कार्यकर्ता जिग्नेश मेवानी ने 'आजादी कूच आंदोलन' में 20 हजार दलितों को एक साथ मरे जानवर न उठाने और मैला न ढोने की शपथ दिलाई थी।जिग्नेश की अगुवाई वाले दलित आंदोलन ने बहुत ही शांति के साथ सत्ता को करारा झटका दिया है।इस आंदोलन को हर वर्ग का समर्थन मिला था।आंदोलन में दलित मुस्लिम एकता का बेजोड़ नजारा देखा गया था। सूबे में करीब 7 फीसदी दलित मतदाता हैं।
ओबीसी चेहरा बने अल्पेश ठाकोर ने पटेल आरक्षण आंदोलन के विरोध में खड़े हुए थे और गुजरात के ओबीसी के नेता बन गए। अल्पेश ठाकोर गुजरात क्षत्रिय-ठाकोर सेना के अध्यक्ष के साथ-साथ ओबीसी एकता मंच के संयोजक भी हैं। अल्पेश ने अन्य पिछड़ा वर्ग के 146 समुदायों को एकजुट करने का काम किया है।एक रैली के दौरान अल्पेश ने धमकी दी थी कि अगर पटेलों की मांगों के सामने बीजेपी शासित गुजरात सरकार ने घुटने टेके तो सरकार को उखाड़ फेंका जाएगा।
                                       हमने ऊपर गुजरात के नये त्रिमूर्ति के बारे में बताई कि इन्होंने अपनी  पहचान कैसे बनाई है।क्या आपको कहीं नज़र आया कि इन लोगों ने विकास की राजनीति कर अपनी पहचान बनाई है?

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

आपका दीया जलाना,किसी की ज़िन्दगी में उजाला लाएगा!



कल एक रिश्तेदार के यहां जाना हुआ।अपने कमरे से मेट्रो स्टेशन और मेट्रो स्टेशन से रिश्तेदार के घर तक पैदल चला। रास्ते में कई बाज़ारों सेे गुजरते हुए मेरी निगाहें कुम्हारों की दुकान तलाश रही थी।मैं चाइनीज़ बल्ब,झालर वगैरह-वगैरह और कुम्हारों की दुकान का अनुपात जानना चाहता था। मैं कुम्हारों की दुकान इसलिए तलाश रहा था,क्योंकि दीपावली में तो दीया की ही प्रधानता होती है।बड़ी मुश्किल से दो दुकान दिखा। मैं दोनों दुकान पर गया।थोड़ी-थोड़ी देर दोनों दुकान पर सिर्फ़ ये जानने के लिए खड़ा रहा कि शहरों में दीया का स्थान चाइनीज़ बल्बों ने कैसे ले लिया है?दुकान पर मौजूद ग्राहकों की बात सुनकर मैं हैरान रह गया। कुछ देर के लिए मैं गांव में मनाएं दीपावली के समय को याद करने लगा।कुम्हार जिस दिन दीया दे जाता था,उसी दिन से सब भाई-बहन मिल के इस बात की तैयारी करते थें कि इस बार दीया से अपने घर को कैसे सज़ाना है और देर रात तक इस बात का ख़्याल रखते थे कि एक भी दीया बुझने ना पाए।दादी एक बार दीया जलाकर दे देती थीं और देर रात तक हमलोग जागकर दीया को बुझने नहीं देते थे।
मैं रिश्तेदार के यहां देर रात तक छत पर बैठा था। दूर-दूर तक ऊंची-ऊंची इमारतें चाइनीज़ बल्बों की रौशनी से सराबोर थी। ग्राहकों की बात से दीपावली में 'चाइनीज़ बल्ब इन और दीया आउट' होने का कारण पता चला। लोगों का कहना था कि कौन इतनी मेहनत करेगा- पहले एक-एक करके दीया जलाओ और फिर देखते रहो कि बुझे ना।बल्ब ही लटकाना सही रहता है। कोई टेंशन नहीं रहता है।दीया तो सिर्फ़ इसलिए वे रहें हैं कि पूजा में इसकी ज़रूरत होती है।
मैं आप सबसे गुजारिश कर रहा हूं।जैसा कि आप सब जानते ही हैं कि दीया के जलने से अंधियारा दूर होता है। इसलिए मैंने पहली लाइन 'आपका दीया जलाना,किसी के ज़िन्दगी में उजाला लाएगा!' लिखा है।आपके दीया ख़रीदने से मुख्य फ़ायदा ये होगा कि आप 'रचनात्मकता' को ज़िन्दा रखने में सहयोग करेंगे।यदि आपको कभी कुम्हार के दिनचर्या को करीब से देखने का मिला होगा,तो आपके पता ही होगा की कितनी मेहनत वाला काम है। सिर्फ़ कुम्हार का ही नहीं, कुम्हार के परिवार के कई सदस्य, यहां तक की छोटे-छोटे बच्चों के सहयोग से मिलकर दीया और मिट्टी का सामान तैयार होता है।जब आप ये सामान उचित मूल्य देकर ख़रीदेंगे,तभी तो कुम्हारों का भरण-पोषण होगा।उनके बच्चों की उचित परवरिश हो पाएगी।पढ़-लिखकर अलग-अलग रूप में देश की सेवा करेंगे।

शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017

अंतिम विकल्प है 'दिशा'!

पीएम नरेन्द्र मोदी ने बुधवार को 'दिशा' ऐप लॉन्च किया है।क्या आप इस ऐप के बारे में जानते हैं? यदि नहीं जानते हैं तो मैं आपको पीएम मोदी के शब्दों में बता रहा हूं।पीएम ने कहा कि सरकार की इस मोबाइल ऐप की मदद से हर व्यक्ति अपनी बात ऊपर तक पहुंचा सकता है।गुड गवर्नेंस को फ़ायदा मिलेगा। ग्रामीण भारत में चल रही योजनाओं के बारे मे सारी जानकारी मिलेगी।दिशा के माध्यम से जनप्रतिनिधी लोगों के साथ जुड़ जायेंगे।
डिजिटल की ओर अग्रसर इण्डिया में उपरोक्त बातों में से एक को छोड़कर सारी बातें तो ठीक है।वो एक अविश्वसनीय बात है जनप्रतिनिधी लोगों से जुड़ जाएंगे। सोचिए कितने व्यस्त है हमारे प्रतिनिधि कि अब ऐप के माध्यम से संबंध स्थापित किया जा रहा है।क्या आपको लगता है कि ऐप में उपलब्ध ये सुविधा कारगर हो पाएगा?साल 2014 में देश में सत्ता परिवर्तन हुआ।तब से लेकर आज तक सरकार के मुखिया कई बार कह चुके हैं कि सभी सांसद और विधायक अपने-अपने क्षेत्र में हीं रहे। बेवजह सांसद और विधायक राजधानी में ना रहें। ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त लोगों के बीच रहकर समस्याओं का निपटारा करें।क्या आपको अब तक अपने सांसद और विधायक के रवैए में कोई बदलाव नज़र आ रहा है?आपकी समस्याओं को लेकर गंभीर हुए हैं?अपवाद को छोड़कर।सवाल ये है कि जनप्रतिनिधियों का लोगों के साथ,सिर्फ़ ऐप से जुड़ जाने से ही समस्या का समाधान हो जाएगा?वो भी ऐसे वक़्त में जब वोट के लिए नेता सिर्फ़ हिंदू-मुसलमान कर रहें हैं।
लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होता है, लेकिन दुर्भाग्य की बात है हमारे देश में जनप्रतिनिधी ही अपने आप को सर्वोपरि मानने लगा है।इसके कारणों में सर्वश्रेष्ठ कारण है 'अंधभक्त' हो जाना है।पहले एक ख़ास रणनीति के तहत दल या नेता,आपके सही-ग़लत में फ़र्क करने की क्षमता को समाप्त कर देते हैं।वर्षों से अर्जित किए गए आपके ज्ञान को अपना भोंपू बना कर इस्तेमाल कर रहें हैं। साम्प्रदायिक बातों में फंसा कर,आपकी समस्याओं से भटका रहें हैं ताकि आपके पास समस्याओं को लेकर उनसे सवाल ही ना पूछ सके। इसमें सिर्फ़ हमारा(जनता) नुक़सान ही हो रहा है। इसलिए भक्ति छोड़, लोकतंत्र में एक ज़िम्मेदार नागरिक बनिए और अपने प्रतिनिधि से ज़्यादा से ज़्यादा सवाल पुछिए।उसको इस बात का एहसास कराइए कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होता हैं ना कि जनता का प्रतिनिधित्व करने वाला।

शनिवार, 7 अक्टूबर 2017

श्वेत स्वर्ण को नहीं काटना चाहिए था!


आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गुजरात दौरे का दूसरा दिन हैं।पीएम मोदी  आज अपने गृहनगर वडनगर में हैं।वडनगर से करीब 232 किलोमीटर दूर भरुच जिले के एक एग्रीकल्चरल कॉलेज में हैलीपैड बना है।5 अक्टूबर को ‘द इण्डियन एक्सप्रेस’ ने एक ख़बर छापी।ख़बर में बताया कि एग्रीकल्चरल कॉलेज में करीब 40 हेक्टेयर में शोध के लिए उगाये गए कपास में से हैलीपैड के लिए करीब 10 हेक्टेयर कपास के फ़सलों को काटा जा रहा है।छात्र इस फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं। छात्रों का कहना है कि कपास की फसलों के काटे जाने से उन्हें काफी नुकसान होगा और उनके शोध में बाधा आएगी।सुत्रों के मुताबिक 28 किस्म के कपास,शोध के लिए उगाये गये थे।यह दूसरी बार है जब फसलों को काटा जा रहा है।इससे पहले मार्च में भी 'नव कृषि विश्वविद्यालय' (एनएयू) से मान्यता प्राप्त इस एग्रीकल्चरल कॉलेज के परिसर में लगी फसलों को एक हेलीपैड बनाने के लिए काटा गया था।छात्रों ने इस बात की लिखित शिकायत भरुच के कलेक्टर से की है। पहले उन्होंने कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ कांतिलाल पटेल से इस मामले पर बात की थी,लेकिन उन्होंने छात्रों की बातों को अनसुना कर दिया।जब छात्रों के विरोध के बारे में कांतिलाल पटेल से पूछा गया, तो उन्होंने कहा, 'ज़िला कलेक्टर ने हमसे कहा था कि वे हमारे परिसर का इस्तेमाल प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के लिए हेलिपैड बनाने में करना चाहते है। इसलिए हमने अपनी ज़मीन दे दी। मैं इस विषय पर अधिक नहीं बोलना चाहता।'एनएयू के उप-कुलपति डॉ सीजे डोंगरिया का कहना है, 'हमे बताया गया कि 8 अक्टूबर को भरुच में प्रधानमंत्री की एक सार्वजनिक बैठक होगी। हमने उनसे कहा कि खेतों में कपास की फसल लगी है। तो हमें कहा गया कि सुरक्षा कारणों से उन्हें काटना पड़ेगा।
प्रधानमंत्री के दौरे के लिए फ़सलों को काटने के कई उदाहरण मिल जाएंगे। किसान जब फ़सल काटने का विरोध करते हैं तो मुआवज़ा देकर उनका मुंह बंद करा दिया जाता है। छात्रों का काम मुआवज़ा से तो नहीं चलेगा ना?उपरोक्त घटना पर गौर करेंगे तो सब आपको आदेश का पालन करते नज़र आयेंगे।किसी ने छात्रों के मेहनत की परवाह नहीं की। मैंने गुगल पर कपास की खेती के बारे में रिसर्च किया।रिसर्च में पाया कि बुआई के समय लाईन से लाईन की दूरी कम से कम 70सीएम होनी चाहिए और पौधों से पौधों की दूरी 30सीएम होनी चाहिए।एक जगह पर केवल तीन-चार बीज़ को बोना चाहिए।कपास के फ़सल को तैयार होने में कम से 150-160 या ज़्यादा दिन लग जातें हैं।इसकी निराई हर दस में की जाती है।बताइए इतनी मेहनत के बाद छात्रोंं ने फ़सल उगाये थे।और सिर्फ़ सुरक्षा कारणों से उसको काट दिया गया। जबकि प्रधानमंत्री तो कहीं और भी रैली कर सकते है।
भारत में कपास को 'सफ़ेद सोना' भी कहा जाता है। कपास भारत की आदि फ़सल है, जिसकी खेती बहुत ही बड़ी मात्रा में की जाती है। यहाँ आर्यावर्त में ऋग्वैदिक काल से ही इसकी खेती की जाती रही है। भारत में इसका इतिहास काफ़ी पुराना है। हड़प्पा निवासी कपास के उत्पादन में संसार भर में प्रथम माने जाते थे। कपास उनके प्रमुख उत्पादनों में से एक था। भारत से ही 327 ई.प के लगभग यूनान में इस पौधे का प्रचार हुआ। यह भी उल्लेखनीय है कि भारत से ही यह पौधा चीन और विश्व के अन्य देशों को ले जाया गया। व्यापारिक दृष्टिकोण से भारत में मुख्यतः 14 क़िस्मों की कपास पैदा की जाती है। कपास उत्पादन के क्षेत्र में गु़जरात का देश में पहला स्थान है।
17 मार्च 2017 को 'गांव कनेक्शन' वेबसाइट ने  केन्द्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, नागपुर की एक ख़बर छापी।जिसमें संस्थान द्वारा एक नई किस्म विकसित की है,जो मात्र 200 दिन में तैयार हो जाती है और इसमें बीमारियां भी नहीं लगती हैं।''युगांक'' नामक कपास की इस नई किस्म के बार में जानकारी देते हुए केन्द्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, नागपुर के निदेशक डा. केशव राज क्रांति ने बताया '' हमारे संस्थान के वैज्ञानिकों ने 9 साल की मेहनत के बाद कपास की ऐसी वेराइटी को डेवलप किया है जो मात्र 100 दिन में तैयार हो जाएगी।केशव ने बताया कि संस्थान के क्राप इंप्रूवमेंट डिपार्टमेंट के वैज्ञानिक संतोष और धारवाड़ के प्रसिद्ध् कपास वैज्ञानिक एस.एस.पाटिल ने कपास की इस नई किस्म को विकसित करने में लगे थे। इसमें कपास किसानों के साथ नेटवर्क बनाकर काम किया गया। जिसका नतीजा है कि कपास की यह किस्म विकसित हो पाई है।बताइए कितना मेहनत और इंतज़ार वाला काम है,कपास की नई किस्म को तैयार करना।और सिर्फ रैली के फ़सलों को काट दिया गया।

इंटरनेशनल कॉटन एडवाइजरी कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर, टेक्स्टाइल मंत्रालय ने 9 मार्च को प्रेस रिलीज जारी कर बताया कि दुनियाभर में कपास उत्पादन में भारत का स्थान पहला और निर्यात में दूसरा।भारतीय कपास का सबसेे ज़्यादा निर्यात बांग्लादेश, पाकिस्तान, वियतनाम, इंडोनेशिया,टर्की और थाईलैंड इत्यादि है।

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...