शनिवार, 28 जनवरी 2017

शिक्षा.....बिजली....और उसका भावुक होना।


जिस माध्यम से देश में क्रान्ति आने की बात कही जा रही है,उसी माध्यम पर मेरे एक दोस्त और युवा शिक्षक ने शिक्षा पर बल देते हुए अपने गांव में बिजली की समस्या को लेकर पोस्ट लिखा।पोस्ट पढ़ कर ऐसा लगा कि समस्या को लेकर वो काफ़ी आक्रोशित हैं।स्मार्टफ़ोन ना होने की वज़ह से उसने अपनी व्यथा फेसबुक पर हिंग्लिश में लिखी है,जिसका भावात्मक तर्जुमा इस प्रकार है-
नीतीश कुमार कहते हैं कि बिजली की व्यवस्था नही सुधरी तो मैं वोट मांगने नही आऊंगा।मेरे गांव में मुश्किल से 4-5 घंटे बिजली रह रही है।क्या यही नीतीश निश्चय है?सांसद महोदय जब आते हैं तो बिजली रहती है।क्या सिर्फ़ उन्हें ही बिजली की ज़्यादा ज़रुरत है और लोगों को नही?क्या रात में बिजली का काम चल रहा है कहीँ?
अगर बिहार के ग्रामीण इलाकों में बिजली की व्यवस्था सुधर जाए तो गरीब के बच्चे शाम को ज़रुर पढ़ पाएंगे,जिससे ग्रामीण इलाके के बच्चे भी शिक्षित हो पाएंगे।
दोस्त की बात मुझे सौ फ़ीसदी सही लगी।आपके साथ सिर्फ़ इसलिए साझा कर रहा हूं,ताकि पता चले कि युवाओं के भीतर सत्ताधारीयों से सवाल पुछने की साहस का अभी ह्रास नही हुआ है।आदर्श स्थिती तो ये होता कि वो राष्ट्रीय और राजकीय सत्ता के दोनों शिखर पुरुषों से सवाल पुछता,लेकिन उसने सिर्फ़ राजकीय सत्ता के शिखर पुरुष से ही सवाल पुछा है।ऐसा उसने क्यों किया मुझे नही मालूम। लेकिन हम उम्मीद करेंगे कि उसको उसके सवाल का जवाब मिल जाएगा।
लाइव मिंट वेबसाइट ने 15 अगस्त 2015 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण को छापा,जिसमें उन्होंने लाल किले की प्राचीर से संकल्प लिया था कि 1000 दिन के भीतर राज्य सरकार की मदद से हर गांव में बिजली पहुंचाने का काम करेंगे।साथ ही उन्होंने कहा कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी 18500 गांव ऐसे हैं जहां अब तक बिजली नही पहुंची है।ये तो हुई पीएम की बात।
16 अक्टूबर 2015 को द हिन्दू अख़बार ने साल 2012 में नीतीश कुमार की कही बात यदि मैं पुरे गांव में बिजली नही पहुंचा पाया तो साल 2015 के विधानसभा में वोट मांगने नही आऊंगा को दोहराते हुए कुमार के बयान को छापा जिसमें उन्होंने कहा कि साल 2016 के अन्त में राज्य के सभी गांव में बिजली होगा।फ़िर 28 अक्टूबर 2016 को द टाइम्स ऑफ इण्डिया ने उस ख़बर को छापी,जिसमें कुमार ने कहा कि साल 2017 के अन्त तक सभी गांव में बिजली की सुविधा उपलब्ध हो जाएगी।
मैंने विकास पुरुष के संकल्प और सुशासन बाबू के बदलते बयान को आपके सामने रख दिया।अब आप अंदाजा लगा सकतें हैं कि विकास पुरुष के संकल्प की रफ्तार कितनी तेज़ है और सुशासन बाबू के कथनी और करनी में कितना अंतर है।बहरहाल हम उम्मीद करेंगे कि जल्दी से जल्दी बिजली की सुविधा उपलब्ध हो जाएगा,ताकि जिस युवा के नाम पर राजनीति होती है,का भविष्य सुधर सके।
खैर मुझे उसकी पोस्ट को पढ़कर काफ़ी खुशी हुई कि ऐसे वक्त में उसने समस्याओं ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है,जब ज़्यादातर युवा अपनी बुनियादी समस्याओं के ख़िलाफ़ आवाज़ ना उठाकर,सिर्फ़ राजनीतिक विचारधारा को लेकर सोशल मीडिया पर आपस में भिड़ते रहते हैं।
उसके इस पोस्ट को पढ़ने के बाद मैंने उससे काफ़ी देर तक बात की।वो कई समस्याओं के बारे में बात करते-करते भावुक हो गया और कहने लगा कि मैं अपनी पढ़ाई के साथ-साथ समय निकालकर कुछ ऐसे बच्चों को भी पढ़ाता हूं,जो शिक्षा की दूकान में जाकर पढ़ने में असमर्थ हैं।कई बच्चों के अभिभावक तो ऐसे हैं कि वो दो वक्त तक की रोटी ही जुटा पाते हैं,पढाई का ख़र्च उठाने में अक्षम हैं।विधायक और सांसद की रवैये को दोहराते हुए कहा कि इन दोनों में कोई कभी मिलने नही आता है।इसलिए सरकार कोई ऐसी व्यवस्था कर दे कि कम से कम शाम 6 बजे से रात 10 बजे तक बिजली मिले ताकि बच्चे पढ़ सके।यदि बच्चे पढ़ेंगे नही तो आगे कैसे बढ़ेंगे?इस युवा शिक्षक के छोटे से पोस्ट ने काफ़ी सोचने पर मज़बूर कर दिया और बता दिया कि गांव में बुनियादी सुविधाओं की अभी भी कितनी कमी है।

अन्त में मैं युवाओं से अपील करता हूं कि सोशल मीडिया बेहद सरल और आसान माध्यम है अपनी समस्याओं के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द करने का। आप सिर्फ़ राजनीति का मोहरा ना बने रहें,अपनी समस्याओं के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द करें।यदि आप नही बोलेंगे तो कौन बोलेगा?यदि अब आप नही सोचेंगे,तब कब सोचेंगे?

बुधवार, 25 जनवरी 2017

राजनीतिक विज्ञापन:राजनीति का महत्वपुर्ण औज़ार है।


पांच राज्यों में चुनाव का ऐलान हो चुका है।पार्टियां चुनाव प्रचार में जुट चुकी है। राजनीतिक दलों ने मतदाताओं को हैण्डबिल थमाने के साथ-साथ गली-मोहल्लों की दीवारों को अपने लोक-लुभावन वादों वाले पोस्टरों से पाट दिया है। वहीं दूसरी तरफ़ दलों की सोशल मीडिया की टीमों ने अपने-अपने दल के पक्ष में बैटिगं करनी शुरु कर दी है।
क्या आपने कभी सोचा है कि दलों के द्वारा दी जाने वाली हैण्डबिल,पोस्टर,बैज,दलों की छाप वाली टोपी वगैर-वगैर क्या है?दरअसल यह एक तरह का विज्ञापन है,जिसको हम राजनीतिक विज्ञापन(रा. वि.) कहते हैँ।इस विज्ञापन के माध्यम से सभी दल अपने लोकहित कार्यों के वर्तमान,भूत और भविष्य तीनों काल के बारे में बताते हैं।मसलन वर्तमान में वो आपके बेहतरी के लिए किन नीतियों और योजनाओं पर काम कर रहें हैं,बीते समय में किन नीतियों और योजनाओं पर का काम कर चुके हैं और भविष्य में किन नीतियों और योजनाओं पर काम करने वाले हैं। कुल मिलाकर वो आपके अच्छे दिन की बात करते हैं। मगर वास्तविकता क्या है कौन नही जानता है।
भारत में रा. वि. को लेकर कोई ठोस कानून नही है,होता भी तो कितना पालन होता आपको पता ही है।भारत में राजनीतिक विज्ञापन का इतिहास बहुत पुराना है। बदलते समय के साथ भारत में विज्ञापन का भी स्वरुप बदलता चला गया।मुद्रित माध्यम से शुरु हुआ राजनीतिक विज्ञापन,आज डिजिटल माध्यम तक पहुंच गया है।पहले राजनीतिक दल हैण्डबिल,पोस्टर,बैच,दलों की छाप वाली टोपी वगैर-वगैर इस्तेमाल करते थें,लेकिन बदलते समय के साथ टीवी और इंटरनेट ने भारतीय राजनीति को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया है।बदलते दौर में कुछ और बदलाव हुए वो है भाषा का,अपनी बात रखने के तरीके और सत्यता का।चुनाव के वक्त पार्टियां विज्ञापन के माध्यम से अपने किए कार्यों के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बतातें है।बीते कुछ सालों से राजनीति में आरोप'वार शुरु हो गया है,जिसमें नेता एक-दूसरे पर निशाना साधने के लिए अपनी भाषाई मर्यादा का ख़्याल नही रख रहें हैं।
अपने शोध के दौरान मैने गुगल से भी बात की,पाया कि भारत में टीवी और इंटरनेट का रा. वि. के रुप में इस्तेमाल करने का चलन मुद्रित माध्यम के जैसा ज़्यादा पुराना नही है,मगर विश्व में सबसे पहले अमेरिका में 1952 में टीवी का रा. वि.के रुप में  इस्तेमाल होना शुरु हो गया।अमेरिका के 34वें राष्ट्रपति Dwight D.Eisenhower के नाम यह रिकार्ड है।उन्होंने भाषण के रुप में इस्तेमाल किया।लेकिन अमेरिका में हीं 1964 में नकारात्मक राजनीतिक विज्ञापन की भी शुरुआत हो जाती है,जो अब दुनियाभर में हो रही है।इसका श्रेय 36वें राष्ट्रपति Lyndon Baines Johnson को जाता है। उनके इस रा.वि. वाले विडियो जो कि इंटरनेट पर मौज़ूद है, में आप देखेंगे कि एक छोटी बच्ची है जो डेजी फुल की पंखुड़ियों को एक-एक करके तोड़ते हुए गिनती करती है,तभी तेज़ आवाज़ के साथ उलटी गिनती शुरु होती है और नाभिकीय बम धमाका होता है।विज्ञापन के अन्त में Johnson के पक्ष में 3 नवम्बर को वोट करने की अपील की जाती है।मगर ये विज्ञापन एक ही बार प्रसारित हुआ।ऐसा क्यों हुआ पता नही।भारत में इस तरीके से टीवी रा.वि. की शुरुआत नही होती है,लेकिन यहां भी फटने की बात होती है,मगर इंडिया शाइनिंग गुब्बारे की। साल 2004 में भाजपा का नारा था इंडिया शाइनिंग और भाजपा दूसरे नम्बर की पार्टी बनी थी।इसलिए विरोधी इंडिया शाइनिंग गुब्बारे के फुटने की बात करते हैँ।वर्तमान में पार्टियां अब लोगों तक अपना सन्देश पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रही है।इसका भी श्रेय भाजपा को ही जाता है,क्योंकि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में रा. वि. के लिए सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया था।उस वक्त बाकि राजनीतिक पार्टियां सोशल मीडिया के इस्तेमाल में काफी पीछे छुट गई थीं,लेकिन धीरे-धीरे सभी ने सीख लिया है।अब कोई किसी से कम नही है। कम शारीरिक श्रम और खर्चों के,लोगों तक पहुंचने का सबसे आसान माध्यम है सोशल मीडिया। सो.मी के सन्देश में किस तरीके की बात होती है,हम और आप सब जानते हैं।बताने की ज़रुरत नही है।लेकिन एक बात याद रखिएगा कि जिस सोशल मीडिया को समाज में क्रान्ति लाने के रुप में देखा जा रहा है,अब अफ़वाहों का अड्डा बन गया है।

पार्टियां आपके चन्दे के रुप में दिए पैसे को कब और कहां खर्च करती है नही बताती है।इकट्ठे बता देती है कि इतना पैसा खर्च हुआ,कई तो बताती ही नही हैँ।मेरा सवाल है कि आप पार्टियों को चन्दा क्यों देते हैं?क्यों आपको आपके पैसों के गलत इस्तेमाल पर अफ़सोस नही होता है?क्या आप राजनीतिक दलों को चन्दा देके पुण्य का काम करते हैं?मेरी राय में राजनीतिक दलों को चन्दा देना बन्द कर,किसी ज़रुरतमन्द को वो पैसा दे दें,जो आप राजनीतिक दलों को देना चाहते हैं।आपके पैसे से किसी का संतान पढ़ लेगा,तो किसी की ज़िन्दगी सवंर जाएगी।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

नेताओं के बिगड़ते बोल का ज़िम्मेदार कौन?

बदलते युग के साथ हमारे देश की राजनीति में भी काफ़ी बदलाव हो रहा है।इस बात से इनकार किया जा सकता है?हाल के वर्षों को अगर हम गौर से देखें तो पाएंगे कि हमारे देश की राजनीति काफ़ी आक्रामक और हल्की हो गई है।सभी नेता तो नही लेकिन कुछ नेताओं की जमात ने पार्टी और एक-दूसरे को निशाना बनाने के लिए काफ़ी घटिया से घटिया शब्दों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।जिसका हमारे समाज में काफ़ी बुरा प्रभाव पड़ रहा है।हाल ही में हमारे गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू ने जूता मारने तक की बात कह डाली।जिसकी काफ़ी आलोचना भी हुई।लेकिन क्या यह सोचने वाली बात नही है कि रिजीजू के बात में यह तत्व कहां से आया?मेरी स्मरण में पूर्वी भारत से आने वाले नेताओं में रिजीजू पहले ऐसे नेता हैं,जिन्होंने ऐसे शब्द का इस्तेमाल किया है।संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से हम न्यूनतम उम्मीद कर सकते हैं कि उसकी भाषा शालीन हो।
ऐसा माना जाता है कि देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश और बिहार के नेताओं की पकड़ के साथ-साथ ज़्यादा हस्तक्षेप होती है।और इन दोनो राज्यों के कुछ नेताओं की राजनीति में भाषाई स्तर क्या है,उम्मीद है बताने की ज़रूरत नही है।कहावत है 'संगत से गुण होत है,संगत से गुण जात।'वैसे मैं जिन कुछ नेताओं की बात कर रहा हूं,उनमें शायद ही किसी नेता के साथ रिजीजू का उठना-बैठना होगा।फिर वही सवाल कि रिजीजू के बात में यह तत्व कहां से आया?मुझे लगता है कि हमारे देश के नेताओं के बिगड़ते बोल के लिए किसी हद तक कुछ मीडिया संस्थान भी ज़िम्मेदार है।TRP के लिए नेताओं के फ़िजूल की बातों को दिन-रात दिखाने से जाहिर तौर पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।इसी प्रभाव का उदाहरण है किरण रिजीजू का बयान।
वर्तमान में नेताओं को कानून का डर नही,लिहाज नाम की चीज नहीं बच गई है।पहले के नेता तो मीडिया के डर के भागते थें,लेकिन अब तो नेता मीडियाकर्मीयों को डांट कर भगा दे रहें हैं।ताज़ा स्मरण में है कि सपा नेता रामगोपाल यादव ने मुलायम सिंह यादव के बारे में सवाल पूछे जाने पर संवाददाताओं को डांट दिया।अब समय आ गया है कि मीडिया संस्थान द्वारा किसी नेता या दल को ज़्यादा तरजीह ना दिया जाए।
बेंगलुरू में 31 दिसम्बर 2016 की रात हुए बलात्कार के मामले में कर्नाटक के गृहमंत्री का बयान बताने के साथ-साथ संकेत भी है कि नेताओं द्वारा कुछ भी बिना सोचे समझे बोल देने की आदत का शिकार अब सिर्फ उत्तर भारत के नेता ही नही है।यदि इस बात पर रोक नही लगाई गयी तो आने वाले समय में देश की राजनीति और बदतर हो जाएगी।

मंगलवार, 3 जनवरी 2017

एक साथ चुनाव:जिसके बारे में सिर्फ़ बात ही हो रही है।

एक बात है जिसके बारे में सिर्फ़ बात ही हो रही है।
जिस बात के बारे में सिर्फ़ बात हो रही है,वो बात 48 साल पुरानी बात है इसलिए भारत में ये कोई नई बात नही है। दिक्कत इस बात की है कि बात को अंजाम तक पहुंचाने के लिए कई सर्व दलिय मुलाकात के बाद भी बात अंजाम तक नही पहुंच पा रही है।एक साथ चुनाव प्रक्रिया की शुरुआत आज़ाद भारत में 1951-52 में पहली बार हुई और उसके बाद से साल 1957,1962 और 1967 तक चली। साल 1968-1969 में कुछ विधानसभाओं और 1970 में लोकसभा के स्वतः भंग हो जाने के बाद यह प्रक्रिया जारी नही रह पाई और 1970 में फिर से लोकसभा का चुनाव हुआ।वर्तमान में एक साथ चुनाव कराने को लेकर चुनाव आयोग की अपनी दलील है तो एक साथ चुनाव के ख़िलाफ़ कुछ पार्टियों की अपनी दलील। कानूनी जानकारों की माने तो संविधान के अनुच्छेद 83,85,172 और 174 में संसोधन कर एक साथ चुनाव कराई जा सकती है। चुनाव आयोग के अनुसार देश में यदि एक साथ चुनाव कराई जाती है,तो वोटिंग मशीनें खरीदने में करीब 93 बिलियन का खर्च एक साथ आएगा।केन्द्रीय सुरक्षाबलों की ज़्यादा आवश्यकता होगी।बार-2 होने वाले खर्चों से मुक्ति मिलेगी। पूर्व चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने कहा कि चुनाव आयोग के पास जनप्रतिनिधत्व कानून 1951 की धारा 14 और 15 के अनुसार अधिकार है कि छह महीनें के भीतर लोकसभा और विधानसभा के चुनावों को एक साथ क्लब कर सकता है।यदि इसकी अवधि बढ़ा दी जाए तो किसी हद तक सुधार हो सकता है।साथ ही उन्होंने कहा कि एक साथ चुनाव होने से किसी हद तक साम्प्रदायिक ताकतों पर भी रोक लगाई जा सकती है।

16 वीं लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणापत्र में लिखा कि भाजपा चुनाव सुधार करने के लिए कटीबद्ध है,जिससे अपराधियों को राजनीति से बाहर किया जा सके।भाजपा दूसरे दलों के साथ विचार विमर्श करके ऐसा तरीका बनाना चाहती है,जिससे विधानसभा और लोकसभा के चुनाव साथ-साथ हो।इससे सरकार और राजनैतिक दलों का खर्चा कम होगा,इससे राज्य सरकार में थोड़ी स्थिरता आएगी।हम चुनावों में खर्च की सीमा में बदलाव लाना चाहते हैं।भाजपा की अपराधियों को राजनीति से बाहर करने वाली बात सुनने में तो काफी अच्छी लग रही है।लेकिन सच्चाई क्या है,कौन नही जानता है।19 मई 2014 को international business times ने एडीआर के हवाले से ख़बर छापी की,बीजेपी के 63 उम्मीदवार पर गंभीर अपराध के आरोप हैँ।क्या बीजेपी ने इन सभी नेताओं को बाहर कर दी?

मेरी राय में सभी दलों का अपराधी नेताओं को लेकर एक सा ही हाल है।एक तरीके से किसी हद तक कहा जा सकता है कि राजनीतिक दल गुंडों और बदमाश नेताओं की शरणस्थली है।

बहरहाल,साल 2014 से लेकर अब तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक साथ चुनाव की वकालत करते आ रहें हैं। हाल ही में उन्होंने 31 दिसम्बर 2016 को भी इस बात को दोहरायी। MyGov.in पर मतदाताओ से राय भी ली है। 28 मई 2010 को outlookindia ने लालकृष्ण आडवाणी के ब्लॉग के कुछ हिस्सों को छापा,जिसमें उन्होंने तत्कालिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी से मुलाकात कर एक साथ चुनाव की वकालत की है। आगे उन्होंने लिखा कि-"In my brief chat with the two senior leaders of Government, I mentioned, that most European democracies have such an arrangement,"

The BJP Parliamentary Party chairman said, "our Constitution makers adopted the British pattern and invested the Executive with the authority to cut short the term of the elected legislature and hold an early election".

"It is gratifying that Britain itself is now considering a change," Advani said, and quoted Britain's Deputy Prime Minister Nick Clegg as saying that he wants "big sweeping changes" on this front.
उपरोक्त बात से साफ़ हो रहा है कि भाजपा चुनाव में सुधार को लेकर गम्भीर है।क्या आप उम्मीद करेंगे कि विपक्षी दल वर्तमान प्रधानमंत्री या वित्तमंत्री से मुलाकात करेंगे? 10 सितम्बर 2016 को the wire ने सुधा पाई की लिखी एक लेख छापी,जिसमें उन्होंने 5 सितम्बर 2016 यानि शिक्षक दिवस के दिन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा कही गई बात ”I supported the idea and urged all parties to consider doing away with constant elections to ensure political stability. These statements by the prime minister and the president have sparked a debate on whether holding elections simultaneously is feasible and would suit the working of our democratic system.” पाई ने आगे लिखा कि आलोचक दलों का कहना है कि प्रधानमंत्री की एक साथ चुनाव की बात राजनीति से प्रेरित है,ना कि बेहतर शाषण-प्रणाली के लिए।बीजेपी के एक साथ चुनाव का मकसद साल 2014 जैसा आक्रामक चुनाव प्रचार कर के केन्द्र और राज्यों में अपना अधिकार जमाना है।यदि ये बात सच है तो विपक्षों की यह मानसिक हार है। क्यों वे लोग भाजपा और मोदी-वेब को लेकर इतने चिंतित है?क्या वे लोग अपना जनाधार खो चुके हैं? कांग्रेस,टीएमसी,एनसीपी और सीपीआई को छोड़कर ज़्यादातर दलों की राय एक साथ चुनाव के पक्ष में है,बशर्ते गहन चर्चा होनी चाहिए। एक साथ चुनाव को लेकर बहुत सारे सवाल है,जिसका जवाब सभी दलों के चर्चा के बाद ही निकल सकती है। एक मतदाता होने के नाते आपका भी कर्तव्य बनता है कि आप भी इस विषय पर सोचे।



भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...