शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

हमारी इंसानियत किसी साजिश का शिकार हो गई है ?

हमारे देश को आज़ाद हुए 70 साल हो गये है।आजादी के बाद से आज तक सभी सरकारों ने भारत के आर्थिक रुप से पिछड़े लोगों को आधुनिक करने,उनके मूलभूत आवश्यकताओं की पुर्ती और उनको विकास की मुख्य धारा में लाने को लेकर बड़ी-बड़ी बाते की है,लेकिन हकीकत क्या है,किस से छिपा है।
हमारे नेताओं ने आर्थिक रुप से पिछड़े लोगों  लिए ज़मीनी रुप से आज तक कितना काम किया है। कागजी विकास की बात मत कीजिएगा।आर्थिक रुप से पिछड़े लोगो के लिए सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि ,वह जितना सरकार की नीतियों और समाज मे चली आ रही परम्पराओं से परेशान है,उससे कही ज्यादा अपने आप में परिवर्तन न लाने की मानसिकता से।उन लोगों ने भी तय कर लिया है कि हम अपनी ज़िंदगी, समय-समय पर सरकार की मन लुभावन योजना के बीच गुजारते रहेंगे।
दो दिन के भीतर उड़ीसा  से जो ख़बरे हमारे बीच आई,वो खबर जितना मानवता को शर्मसार करने वाली है,उतना ही ये बताने के लिए भी काफ़ी है कि हमने अपनी इंसानियत को कहीं गिरवी रख दिया हैं।
उड़ीसा के वैसे इलाके से पहली खबर आई,जिस इलाके के बारे में इतना बार लिखा और बोला गया है कि सिस्टम ने भी सुनना-समझना बन्द कर दिया है।मैं बात कर हूं उड़ीसा के कालाहांडी की।यह इलाका हमेशा से गरीबी और भूखमरी का शिकार रहने के कारण खबरों मे रहा है,लेकिन आज जिस कारण से खबर में है वो सरकार के तमाम सरकारी व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े कर रहा है।खबर यह है कि आदिवासी दाना मांझी को अपने मृत पत्नी को कंधे पर 10 किलोमीटर इसलिए लेके चलना पड़ा कि उसके पास गाड़ी करने के पैसे नही थे और अस्पताल ने कोई इन्तजाम करने से मना कर दिया था। आप कल्पना कीजिए, जब दाना मांझी अपने पत्नी की लाश को इस तरह से लेकर चल रहा होगा,तो वह किस मानसिक स्थिती से गुजर रहा होगा।क्या वो सरकारी व्यवस्था नही कोस रहा होगा?

वहीं दूसरी खबर यह आई कि 80 वर्षीय विधवा सलमानी बेहड़ा की मालगाड़ी के चपेट में आने से मौत हो गई।जिसके बाद उनकी लाश को सोरो कॉम्युनिटी सेंटर ले जाया गया।इस घटना कि जानकारी राजकीय रेलवे पुलिस को दी गई,सूचना मिलने के 12 घंटे बाद शाम को अस्पताल पहुंचे।पोस्टमॉर्टम के लिए लाश को बालासोर जिला ले जाना था। जिसका किराया टेम्पू वाले ने 3500 मांगा,लेकिल जीआरपी के अधिकारी ने कहा कि हम ऐसे कामों के लिए सिर्फ 1000 रुपये दे सकते हैं।मेरे पास सीएचसी के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के द्वारा लाश ले जाने के सिवा दूसरा रास्ता नही है।देरी होने की वज़ह से लाश अकड़ गई थी,जिसकी वजह से कामगारों को लाश बांधने में दिक्कत हो रही थी,इसलिए लाश को कुल्हे के पास से तोड़ दिया। उसके बाद चादर में लपेट कर,बांस से उठाकर ले जाया गया।

उड़ीसा ही नही किसी भी कथित प्रगतिशील राज्य जैसे गुजरात,मध्य प्रदेश,हरियाणा और बिहार के तमाम सरकारी अस्पताल के बारे में बात कर लीजिए,सभी जगहों पर यही कुव्यवस्था मिलेगी।
देशभक्ति जैसे फालतू के विषय के इतर,उड़ीसा की इन दो हृदय विदारक ख़बरों के बहाने क्या आपको केन्द्र और राज्य सरकार से इस भ्रष्ट और लाचार व्यवस्था के बारे में सवाल नही करना चाहिए?

फालतू के विषयों पर सोशल मीडिया पर दिन-रात बकवास करने से अच्छा है कि आप,सरकार से सोशल मीडिया के माध्यम से अपने बुनियादी सुविधाओं को लेकर बात करें। 

शनिवार, 4 जून 2016

तीन पर एक भारी....?



संख्या बल के लिहाज़ से देखें तो तीन भारी है।लेकिन वर्तमान में भारतीय राजनीति में एक मॅाडल ऐसा है जो तीन मॅाडलों पर भारी है।
पहला है, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ।यह देश का सबसे पुराना मॅाडल है। इसकी स्थापना भारतीय जनता पार्टी द्वारा 1998 में की गई।इसमें भाजपा प्रभावशाली भूमिका में होती है और तमाम क्षेत्रीय पार्टियां सहयोगी के रूप में।वर्तमान में यह भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा मॅाडल है।इसमे 44 पार्टियां शामिल है।लोकसभा में इसके सांसदों की संख्या 337 है तो वहीं राज्यसभा में 67 ।यूपीए सरकार से त्रस्त हो चुकी जनता के पास मौका था 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपीए सरकार को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने का।सो वैसा हीं 2014 में जनता ने किया।2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को जिस तरह से देशभर की जनता ने पुर्ण बहुमत देकर देश की सत्ता सौंपी,इससे इस मॅाडल का और भाजपा का कद भारतीय राजनीति में एकाएक बढ़ गया।शायद ही कोई इस बात से इंकार करेगा कि इसकी लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।हाल में पांच राज्यों में हुए विधानसभा के चुनाव इसकी लोकप्रियता के उदारहण है।
दूसरा है,संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन।इसकी स्थापना देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के द्वारा 2004 में की गई।कांग्रेस इसमें प्रभावशील भूमिका में है और बाकि क्षेत्रीय दल सहयोगीकी भूमिका में।पहले इसमें लगभग 13 पार्टियां थी,लेकिन अब 10 रह गई है ।"प्रगतिशील"सिर्फ इसके नाम में ही है,लेकिन दिन-प्रतिदिन मॅाडल का स्तर गिरता चला गया।वर्तमान में क्या हस्र है इसका ,किससे छिपा है।2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार से इस पार्टी ने कुछ नहीं सिखा।2014-लोकसभा के चुनाव के बाद जहां-जहां भी विधानसभा के चुनाव हुए,लगभग सभी जगह विलुप्त होती जा रही है।असम का विधानसभा का चुनाव इसका ताजा उदाहरण है।
तीसरा है,नीतीश कुमार का मॅाडल जिस पर वो जोर दे रहें हैं।इसके तहत गठबंधन क्षेत्रीय स्तर पर किया जाता है और परिस्थिति के अनुसार प्रभावशाली दल अथवा सहयोगी की भूमिका बदलती रहती है।इसी के तहत हालिया बिहार चुनाव में राजद और उसका सहयोगी दल जदयू सीनियर पार्टनर की भूमिका में थे और कांग्रेस स्पस्ट रूप से छोटे सहयोगी के तौर पर थी।नीतीश को यह उम्मीद है कि इस प्रयोग को उत्तर प्रदेश चुनाव में भी आजमाया जा सकता है,जहां सपा सीनियर पार्टनर की भूमिका में होगी।पंजाब में भी यह काम हो सकता है,जहां कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का गठबंधन हो सकता है।
चौथा है,ममता बनर्जी का फेडरल फ्रंट।इस मॅाडल के अनुसार एक ऐसा राष्ट्रीय गठबंधन बनना चाहिए,जिसमे भाजपा,कांग्रेस और वामदल ना हो।इस फ्रंट के उम्मीद का आधार 2014 के आम चुनाव में प०बंगाल,उड़ीसा,तमिलनाडु,आंध्र और तेलंगाना के नतीजे हैं,जहां केवल क्षेत्रीय दलों ने जीत हासिल की।राष्ट्रीय दलों को अपने यहाँ घुसपैठ करने से रोक दिया था।
यूपीए,ममता और नीतीश ,इन तीनों मॅाडल का एक ही उद्देश्य है , राजग को राज्यों में होने वाले चुनाव में पराजित किया जाए,ताकि 2019 के लोकसभा में राजग को हराने के लिए एक बेहतर मंच तैयार किया जा सके। कागज पर राजग को छोड़कर सभी की अपनी चुनावी व्यवहारिकता है।जिस तरह से नीतीश और ममता के मॅाडल में क्षेत्रीय दलों की प्राथमिकता है,उससे एक बात तो साफ हो जाता है कि क्षेत्रीय दल तब ही सफल हो पाएंगे,जब कांग्रेस 2014-लोकसभा के चुनाव में हासिल 45 सीटों तक सिमटी रहे और अपने राष्ट्रीय पुन्रजीवन की आस छोड़ दे।

बुधवार, 23 मार्च 2016

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ

देश में छोटी बच्चियों को सशक्त करने के साथ-साथ समाज में लड़कियों की  गिरती संख्या के अनुपात के मुद्दे को बताने के लिये एक उद्देश्यपूर्णं ढंग से एकराष्ट्रव्यापी योजना की शुरुआत हुई जिसका नाम ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ है। हरियाणा के पानीपत में 22 जनवरी 2015 को भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सफलतापूर्वक इस योजना का आरंभ हुआ। लड़कियों के प्रति लोगों की विचारधारा में सकारात्मक बदलाव लाने के साथ ही ये योजना भारतीय समाज में लड़कियों की महत्ता की ओर भी इंगित करता है। भारतीय समाज में लड़कियों के प्रति लोगों की मानसिकता बहुत क्रूर हो चुकी है। ऐसे लोगों का मानना है कि लड़कियाँ पहले परिवार के लिये बोझ होती है और फिर पति के लिये तथा ये सिर्फ लेने के लिये होती है देने के लिये नहीं।

हालाँकि ये सच नहीं है, दुनिया की आधी जनसंख्या लगभग महिलाओं की है इसलिये वो धरती पर जीवन के अस्तित्व के लिये आधी जिम्मेदार होती है। लड़कियों या महिलाओं को कम महत्ता देने से धरती पर मानव समाज खतरे में पड़ सकता है क्योंकि अगर महिलाएँ नहीं तो जन्म नहीं। लगातार प्रति लड़कों पर गिरते लड़कियों का अनुपात इस मुद्दे की चिंता को साफतौर पर दिखाता है। इसलिये, उन्हें गुणवत्तापूर्णं शिक्षा प्रदान कराने के साथ, छोटी बच्ची की सुरक्षा को पक्का करना ,लड़कियों को बचाना, कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिये इस योजना की शुरुआत की गयी है।

लिंग परिक्षण एक अपराध

प्राचीन समय से ही, महिलाओं को भारतीय समाज में अपने परिवार और समाज के लिये एक अभिशाप के रुप में देखा जाता है। इन कारणों से, तकनीकी उन्नति के समय से ही भारत में बहुत वर्षों से कन्या भ्रूण हत्या की प्रथा चल रही है। 2011 के सेंसस के आंकड़ों के अनुसार, पुरुष और स्त्री अनुपात 1000 से 947 है। कुछ वर्ष पहले, लगभग सभी जोड़े जन्म से पहले शिशु के लिंग को जानने के लिये लिंग निर्धारण जाँच का इस्तेमाल करते थे। और लिंग के लड़की होने पर गर्भपात निश्चित होता था।
1990 के आरंभ में लिंग निर्धारण परीक्षण का केन्द्र अल्ट्रासाउंड तकनीक का विकास था। भारतीय समाज के लोग लड़के से पूर्व सभी बच्चियों को मारने के द्वारा लड़का प्राप्त करने तक लगातार बच्चे पैदा करने के आदी थे। जनसंख्या नियंत्रण और कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिये, कन्या भ्रूण हत्या और लिंग निर्धारण जाँच के बाद गर्भपात की प्रथा के खिलाफ भारतीय सरकार ने विभिन्न नियम और नियमन बनाये। गर्भपात के द्वारा बच्चियों की हत्या पूरे देश में एक अपराध है। चिकित्सों द्वारा यदि लिंग परीक्षण और गर्भपात कराते पाया जाता है, खासतौर से बच्चियों की हत्या की जाती है तो वो अपराधी होंगे साथ ही उनका लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है। कन्या भ्रूण हत्या से निज़ात पाने के लिये समाज में लड़कियों की महत्ता के बारे में जागरुकता फैलाना एक मुख्य हथियार है।



महिला सशक्तिकरण की जरुरत क्यों पड़ी ?

 भारत एक पुरुष प्रधान समाज है, जहाँ पुरुष का हर क्षेत्र में दखल है और महिलाएँ सिर्फ घर-परिवार की जिम्मेदारी उठाती है साथ ही उनपर कई पाबंदीयाँ भी होती है। भारत की लगभग 50 प्रतिशत आबादी केवल महिलाओं की है मतलब, पूरे देश के विकास के लिये इस आधी आबाधी की जरुरत है जो कि अभी भी सशक्त नहीं है और कई सामाजिक प्रतिबंधों से बंधी हुई है। ऐसी स्थिति में हम नहीं कह सकते कि भविष्य में बिना हमारी आधी आबादी को मजबूत किये हमारा देश विकसित हो पायेगा। अगर हमें अपने देश को विकसित बनाना है तो ये जरुरी है कि सरकार, पुरुष और खुद महिलाओं द्वारा महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया जाये।
महिला सशक्तिकरण की जरुरत इसलिये पड़ी क्योंकि प्राचीन समय से भारत में लैंगिक असमानता थी और पुरुषप्रधान समाज  था। महिलाओं को उनके अपने परिवार और समाज द्वार कई कारणों से दबाया गया तथा उनके साथ कई प्रकार की हिंसा हुई और परिवार और समाज में भेदभाव भी किया गया ऐसा केवल भारत में ही नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी दिखाई पड़ता है। महिलाओं के लिये प्राचीन काल से समाज में चले आ रहे गलत और पुराने चलन को नये रिती-रिवाजों और परंपरा में ढ़ाल दिया गया था। भारतीय समाज में महिलाओं को सम्मान देने के लिये माँ, बहन, पुत्री, पत्नी के रुप में महिला देवियो को पूजने की परंपरा है लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं कि केवल महिलाओं को पूजने भर से देश के विकास की जरुरत पूरी हो जायेगी। आज जरुरत है कि देश की आधी आबादी यानि महिलाओं का हर क्षेत्र में सशक्तिकरण किया जाए जो देश के विकास का आधार बनेंगी।
भारत एक प्रसिद्ध देश है जिसने ‘विविधता में एकता’ के मुहावरे को साबित किया है, जहाँ भारतीय समाज में विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग रहते है। महिलाओं को हर धर्म में एक अलग स्थान दिया गया है जो लोगों की आँखों को ढ़के हुए बड़े पर्दे के रुप में और कई वर्षों से आदर्श के रुप में महिलाओं के खिलाफ कई सारे गलत कार्यों (शारीरिक और मानसिक) को जारी रखने में मदद कर रहा है। प्राचीन भारतीय समाज दूसरी भेदभावपूर्ण दस्तूरों के साथ सती प्रथा, नगर वधु व्यवस्था, दहेज प्रथा, यौन हिंसा, घरेलू हिंसा, गर्भ में बच्चियों की हत्या, पर्दा प्रथा, कार्य स्थल पर यौन शोषण, बाल मजदूरी, बाल विवाह तथा देवदासी प्रथा आदि परंपरा थी। इस तरह की कुप्रथा का कारण पितृसत्तामक समाज और पुरुष श्रेष्ठता मनोग्रन्थि है।


बेटी बचाआे अभियान

आज पूरे देश में लड़कियों को बचाने के सन्दर्भ में बेटी बचाओ विषय बहुत महत्वपूर्ण सामाजिक जागरुकता का विषय है। लड़कियों को बचाने के लिये बहुत से प्रभावशाली उपायों को अपनाया गया है, जिससे इन्हें बहुत हद तक बचाया जा सकता है। समाज में बड़े स्तर पर गरीबी का प्रसार है जो भारतीय समाज में अशिक्षा और लिंग असमानता का बहुत बड़ा कारण है। शिक्षा, गरीबी और लिंग भेदभाव को कम करने के साथ ही भारतीय समाज मे बालिकाओं और औरत की स्थिति मे सुधार के लिए महत्वपूर्ण तत्व है। आकड़ों के अनुसार, ये पाया गया है कि उड़ीसा में महिला साक्षरता लगातार गिर रही है जहाँ लड़कियाँ शिक्षा और अन्य गतिविधियों मे समान पहुँच नहीं रखती है।

शिक्षा गहराई के साथ रोजगार से जुड़ी हुई है। कम शिक्षा का अर्थ है कम रोजगार जो समाज में गरीबी और लिंग असमानता का नेतृत्व करता है। महिलाओं की स्थिति में सुधार करने के लिये शिक्षा बहुत प्रभावी कदम है क्योंकि ये इन्हें वित्तीय रुप से आत्मनिर्भर बनाता है। समाज में महिलाओं के समान अधिकार और अवसरों को सुनिश्चित करने के लिये सरकार ने कन्या बचाओं कदम उठाया है। बॉलीवुड अभिनेत्री (परिणीति चौपड़ा) को प्रधानमंत्री की हाल की योजना बेटी बचाओ (बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ) की एक आधिकारिक तौर पर ब्रांड एंबेसडर बनाया गया है।

भारत में लौंगिक असमानता

लैंगिक असमानता भारत में मुख्य सामाजिक मुद्दा है जिसमें महिलाएँ पुरुषवादी प्रभुत्व देश में पिछड़ती जा रही है। पुरुष और महिला को बराबरी पर लाने के लिये महिला सशक्तिकरण में तेजी लाने की जरुरत है। सभी क्षेत्रों में महिलाओं का उत्थान राष्ट्र की प्राथमिकता में शामिल  होना चाहिये। महिला और पुरुष के बीच की असमानता कई समस्याओं को जन्म देती है जो राष्ट्र के विकास में बड़ी बाधा के रुप में सामने आ सकती है। ये महिलाओं का जन्मसिद्ध अधिकार है कि उन्हें समाज में पुरुषों के बराबर महत्व मिले। वास्तव में सशक्तिकरण को लाने के लिये महिलाओं को अपने अधिकारों से अवगत होना चाहिये। न केवल घरेलू और पारिवारिक जिम्मेदारियों बल्कि महिलाओं को हर क्षेत्रों में सक्रिय और सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिये। उन्हें अपने आस-पास और देश में होने वाली घटनाओं को भी जानना चाहिये।
महिला सशक्तिकरण में ये ताकत है कि वो समाज और देश में बहुत कुछ बदल सकें। वो समाज में किसी समस्या को पुरुषों से बेहतर ढ़ंग से निपट सकती है। वो देश और परिवार के लिये अधिक जनसंख्या के नुकसान को अच्छी तरह से समझ सकती है। अच्छे पारिवारिक योजना से वो देश और परिवार की आर्थिक स्थिति का प्रबंधन करने में पूरी तरह से सक्षम है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ किसी भी प्रभावकारी हिंसा को संभालने में सक्षम है चाहे वो पारिवारिक हो या सामाजिक।

महिला सशक्तिकरण के द्वारा ये संभव है कि एक मजबूत अर्थव्यवस्था के महिला-पुरुष समानता  वाले देश को पुरुषवादी प्रभाव वाले देश से बदला जा सकता है। महिला सशक्तिकरण की मदद से बिना अधिक प्रयास किये परिवार के हर सदस्य का विकास आसानी से हो सकता है। एक महिला परिवार में सभी चीजों के लिये बेहद जिम्मेदार मानी जाती है अत: वो सभी समस्याओं का समाधान अच्छी तरह से कर सकती है। महिलाओं के सशक्त होने से पूरा समाज अपने आप सशक्त हो जायेगा।

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...