सोमवार, 30 जुलाई 2018

अलग-अलग राग से बन पाएगी विपक्षी एकता?


आगामी लोकसभा चुनाव में अब कुछ हीं महीनें बाकी है। लिहाज़ा सभी दलों ने अपनी तैयारी शुरू कर दी है। मार्च 2019 तक पीएम मोदी क़रीब 50 रैलियां करेंगे, ऐसी सूचना है। एनडीए और यूपीए, दोनों की तरफ़ से जमकर एक-दूसरे की पर मौखिक हमले हो रहें है। इन हमलों में मुख्य भूमिका में भाजपा और कांग्रेस है। कांग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार ने कोई काम नहीं किया, वहीं भाजपा का कहना है कि हमने देश की सत्ता बिल्कुल बदहाल स्थिति में सम्भाली थी, जिसके बावज़ूद भी कई बेहतरीन काम किये हैं। चुनावी साल में काम ना करने और काम करने की शोर के अलावा कई और शोर है, जो इस बात की तरफ़ इशारा कर रही है कि यदि यही स्थिति रही तो आकांक्षाओं में डूबी विपक्षी दलें,  मोदी सरकार को चुनौती देने में नाकामयाब साबित होगी।  कांग्रेस इस वक़्त अपने चुनावी इतिहास में सबसे कमज़ोर स्थिति में है। केन्द्र और राज्य दोनों जगह ऐसी स्थिति में नहीं है जिसके बदौलत अपने दम पर मोदी सरकार को चुनौती दे सके। राजग सरकार को चुनौती देने के लिए केन्द्र में कांग्रेस ख़ुद को बड़ा भाई मानते हुए, क्षेत्रिय दलों से एक जुट होनी की बात कर रही है। लेकिन ख़ुद की सियासी ज़मीन वाली मुख्य क्षेत्रीय दलों के बयानों से पता चल रहा है कि आम चुनाव के नतीज़े से पहले एकजुट होना नहीं चाहते हैं। क्या इसकी वजह कांग्रेस की स्थिति या सबके पीएम बनने की लालसा को माना जा सकता है? सियासत ‘सूत्रों के हवाले’ से तब तक होती है,जबतक उस बात की अधिकारिक पुष्टि या खंडन नहीं होता है। ऐसा हीं कुछ हुआ था, जब राहुल गांधी ने महिला पत्रकारों से मुलाक़ात की थी। ख़बर आई कि राहुल ने उनके अलावा किसी महिला को प्रधानमंत्री बनाने पर हामी भर दी है। लेकिन कांग्रेस की तरफ़ से अभी तक इस बात की पुष्टि नहीं हुई है। कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में बाद मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा था कि “ कांग्रेस का निर्णय सटीक, सपाट और स्पष्ट  है। राहुल गांधी हमारा चेहरा हैं। 2019 के चुनाव में हम उनके हीं नेतृत्व में जनता के बीच जाएंगे।” अब सवाल है कि जब कांग्रेस राहुल गांधी को पीएम का चेहरा बनाकर जनता के बीच जाने की बात कर रही है, तो वो कौन-कौन सी विपक्षी पार्टियां होगी, जो राहुल के नेतृत्व में चुनाव लड़ेंगी? शायद ये आने वाले वक़्त में पता चल पाएगा। फ़िलहाल तीन मुख्य विपक्षी पार्टियों के बयान से साफ़ है कि वो चुनाव से पहले गठबंधन के लिए तैयार नहीं है। 
सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने पहले हीं स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव बाद गठबंधन का नेता तय होगा। सपा के नेता कह रहें हैं कि गठबंधन बनने से पहले कांग्रेस कैसे पीएम उम्मीदवार की दावेदारी कर सकती है? 
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने पार्टी के शहीदी दिवस पर कह दिया है कि 2019 का लोकसभा चुनाव बंगाल में अकेले लड़ेगी। 
बसपा प्रमुख मायावती ने तो कह दिया है कि उनकी पार्टी तब हीं गठबंधन में चुनाव लड़ेगी,जब सम्मानजनक सीटें मिलेंगी। ऐसे में मायावती के लिए सम्मानजनक सीट का मतलब कितना है,ये अभी साफ़ नही है।
एनसीपी ने अभी तक साफ़ नहीं किया है कि आम चुनाव से पहले गठबंधन पर उसकी क्या राय है। लेकिन वो इस बात से सहमत है कि जो सबसे बड़ी पार्टी होगी, उसका नेता पीएम बनेगा। एक नीजि चैनल से बातचीत में तारिक अनवर ने 2004 का हवाला देते हुए कहा है कि लोकतंत्र का तकाज़ा है कि जो सबसे बड़ी पार्टी होगी,नेतृत्व उसी को देना होगा।
जेडीएस और राजद की मिलीजुली राय है। दोनों को कांग्रेस के नेतृत्व में चुनाव लड़ने में कोई समस्या नहीं है। लेकिन तेजस्वी ने एक शर्त रखी है। तेजस्वी का कहना कि जो संविधान बचाएगा,उसका समर्थन करेंगे। तेजस्वी की ये शर्त बताती है कि लोकतंत्र को लेकर उनकी समझ स्पष्ट नहीं है। तेजस्वी को जिस कांग्रेस के नेतृत्व में चुनाव लड़ने में कोई परेशानी नहीं है, वही कांग्रेस ने सत्ता के लिए संविधान को रद्दी किताब का टुकड़ा बना दिया था। ख़ैर संविधान को ख़तरे में बताना ये सियासी हथकंठा हो गया है।

मंगलवार, 24 जुलाई 2018

देश आर्थिक रुप से समृद्ध हुआ,लेकिन देशवासियों का हाल ख़स्ता है।


हाल में World bank (विश्व बैंक) ने बताया है कि फ़्रांस को पछाड़ते हुए भारत दुनिया की छठी बड़ी अर्थव्यस्था बन गई है। वित्त वर्ष- 2017 में भारत का #जीडीपी यानि सकल घरेलू उत्पाद 2.59 लाख करोड़ डॉलर था,जबकि फ़्रांस की जीडीपी 2.58 लाख करोड़ डॉलर था। भारत के आर्थिक रुप से मज़बूत होने की ये ख़बर ऐसे वक़्त की आई है,जब मोदी सरकार नोटबन्दी और जीएसटी जैसे कदमों से विपक्षी दलों और अर्थशास्त्रियों के निशाने पर थी। कहा जा रहा था कि इन कदमों से भारत की अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी। लेकिन हाल में देश के आर्थिक समृद्धि की ख़बर को भारत सरकार (Indian Government) अपनी बड़ी सफ़लता के रुप में पेश रही है। पीएम Narendra.Modi से लेकर तमाम मंत्रीगण मौका-बे-मौका बोलने से नहीं चूक रहें हैं। क्योंकि लोकसभा चुनाव क़रीब आ गया है। बुधवार को पीएम Narendra Modi ने संसद में भी ज़ोर देकर ये बता कही कि हम दुनिया की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए हैं। ये हमारी सरकार की नीतियों की सफ़लता है। इससे पहले वित्तमंत्री Arun Jaitley (अरुण जेटली) ने भी अपने लेख के माध्यम से जीडीपी में वृद्धि को अपनी सरकार की कामयाबी बताया। 
अब यहां सवाल ये है कि फ़्रांस के बनिस्बत यदि देश आर्थिक रुप से सशक्त हुआ है तो देशवासियों की आर्थिक स्थिति पर इसका कैसा प्रभाव पड़ा है? इसको भी तो वित्तमंत्री से लेकर उन तमाम मंत्रियों को,बिल्कुल उसी रुप में बताना चाहिए था,जिस रूप में ये बता रहें हैं कि भारत दुनिया की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है। शायद नहीं बताने के पीछे जो कारण हो सकता है, वो इस प्रकार है- देशवासियों की, सांख्यिकी एंव कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के अनुसार, साल 2014 में भारत की प्रति व्यक्ति आय क़रीब 88’538 रुपये थी,जो 2018 में बढ़कर क़रीब 1’12’835 रुपये होने का अनुमान है,यानि प्रतिदिन एक व्यक्ति की आय क़रीब 309 रुपये। इसी दौर की एक सच ये भी है कि 29 करोड़ लोगों की आय प्रतिदिन 30 रुपये से कम है। वहीं फ़्रांस की प्रति व्यक्ति आय वर्तमान में भारत के प्रति व्यक्ति आय से 20 गुणा बताई जा रही है। प्रति व्यक्ति आय को इस रुप में बताने के पीछे दो मक़सद है। पहला ये है कि डॉलर या ट्रिलियन में उलझना ना पड़े। और दूसरा ये है कि दोनों देशों के प्रति व्यक्ति आय को लेकर मीडिया रिपोर्ट में काफ़ी भिन्नता है। 
प्रति व्यक्ति आय निकालने का फ़ॉर्मूला होता है- देश की कुल आबादी से जीडीपी को भाग देने पर जो संख्या प्राप्त होती है, वही प्रति व्यक्ति आय होता है। दोनों देशों के प्रति व्यक्ति आय में ज़्यादा अन्तर की मुख्य वजह जानकार जनसंख्या को बता रहें है। भारत का क्षेत्रफल फ़्रांस से 5 गुना और आबादी 18 गुना अधिक है यानि राजस्थान के बराबर। भारत की आबादी पूरे यूरोप की आबादी से दो गुना अधिक है।
दुनियाभर में अर्थव्यवस्था के इण्डीकेटर जीडीपी पर अर्थशास्र के जानकार अलग- अलग तरीक़े से सवाल उठा रहें हैं, लेकिन भारत सहित दुनियाभर में सरकारें जीडीपी में बढ़ोतरी को अपनी क़ामयाबी बताती है और जश्न मनाती है। मई 2016 में ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने जीडीपी पर विस्तार से एक लेख छापी, जिसमें लिखा कि ‘GDP Growth became a target for politicians and a scorecard by which they were judge by voters.’
जीडीपी को आलोचकों का कहना है कि यह केवल उपभोग,निवेश,सरकारी ख़र्च और कुल शुद्ध निर्यात के योग के अलावा कुछ नहीं है। जब जीडीपी के आंकड़ों में सामाजिक विकास,मानव पूंजी और जीवनस्तर जैसी प्रमुख बातों को शामिल नहीं किया जाता है तो जीडीपी किसी देश के आर्थिक विकास का पैमाना कैसे हो सकता है? वह भी तब जब पूरी दुनिया समावेशी विकास की बात कर रही है।
आईएमएफ़ यानि इंटरनेशनल मॉनिटरी फ़ण्डInternational Monetary Fund) ने जीडीपी पर सवाल उठाते हुए अपनी रिपोर्ट नियोलिबरेलिज्म: ओवर सोल्ड? में कहा कि यह मॉडल आर्थिक विकास को मापने में पूरी तरह फ़ेल हो चुका है। इसने असमानता में और इज़ाफ़ा किया है। इसलिए इससे लगाव कम किया जाना चाहिए। जीडीपी इस्तेमाल में नहीं रहेगी, तभी असली तस्वीर उभरकर आएगी।
यूएस अर्थशास्त्री एरिक जेंसी ने कहा कि “ हम आर्थिक रूप से क्या कर रहें हैं,यह मापने के लिए जीडीपी एक बेवकूफ़ी भरा इण्डीकेटर है। यह अर्थव्यवस्था में महज मौद्रिक लेन-देन को ही मापता है। धन कहां ख़र्च हो रहा है,इसका उससे कोई लेना-देना नहीं है। जीडीपी हमारी आर्थिक भलाई का भी परवाह नहीं करता है।”इसलिए जेंसी जीडीपी के बजाय जीपीआई यानि जेनुइन प्रोगेस इण्डीकेटर पर ज़ोर देते हैं।
भारत के शीर्ष सांख्यिकी विशेषज्ञ टीसीए अनन्त का भी कहना है कि जीडीपी की जानकारी अधूरी है। इससे बेहतर है कि इसकी कोई सूचना ही ना हो।

शनिवार, 14 जुलाई 2018

इतिहास से लेकर वर्तमान में फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट की हालत!

देश में जब भी कोई बेटी या महिला दरिन्दगी की शिकार होती है तो समाज से एक आवाज़ आती है 'मामले की सुनवाई फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में हो।' समाज के भीतर से आती इस आवाज़ का एक हीं मक़सद होता है, आरोपी को जल्दी से जल्दी फ़ासी की सज़ा हो। इस सुर से सरकारें भी अपना सुर मिला देतीं हैं, क्योंकि मामला बलात्कार का होता है।
'द हिन्दू' के मुताबिक, 11वें वित्त आयोग की सिफ़ारिश पर 1 अप्रैल 2001 में देश के सबसे पहले फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट(एफ़टीसी) की शुरूआत हैदराबाद के सिटी सिविल कोर्ट से हुई थी। इस कोर्ट का उद्घाटन सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीएन किरपाल ने किया था। उद्घाटन भाषण में जस्टिस बीएन किरपाल ने न्यायिक प्रक्रिया में लेट-लतीफ़ी लेकर जो उस वक़्त कहा था वो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस वक़्त था। जस्टिस किरपाल ने कहा था ''We are still in the bullock cart age as far as court procedures are concerned.'' मतलब कहने का आशय है कि जहां तक कोर्ट के कार्यप्रणाली के सम्बन्ध में बात करें तो हमारी स्थिति उसी दौर जैसी है जब बैलगाड़ी हुआ करती थी। आगे उन्होंने कोर्ट को सूचना प्रौद्योगिकी से जोड़ने की भी बात कही थी। जैसे वीडियो कांन्फ्रेंसिग के ज़रिए गवाही वगैरह-वगैरह। एफ़टीसी का गठन ज़िला स्तर पर होता है।
11वें वित्त आयोग की सिफ़ारिश पर 509.90 करोड़ की लागत से 1734 एफ़टीसी बनाए जाने थें। लेकिन 31 मार्च 2005 तक मात्र 1562 एफ़टीसी हीं कार्यरत थें। पांच साल के लिए बनाए गए इस कोर्ट का मक़सद ज़िला न्यायालयों में विचारधीन क़ैदियों और लम्बे समय से लम्बित पडे़ मुक़दमों का निपटारा करना था। उम्मीद जताई गई थी कि महीनेभर में एक कोर्ट 14 मुक़दमों का निपटारा करेगा। मार्च 2005 से मार्च 2010 तक के लिए फिर से इस कोर्ट के कार्यावधि को बढ़ा दिया गया। मार्च 2010 के बाद से फ़िर से एक साल के लिए इस कोर्ट के कार्यावधि को बढ़ा दिया गया। मार्च 2011 आते-आते मात्र 1192 एफ़टीसी कार्यरत रह गए थें। केन्द्र सरकार ने वित्तीय सहायता प्रदान करना बन्द कर दिया। लेकिन कुछ राज्य सरकारों ने अपने ख़र्च से चालू रखा।
साल 2012 में 16 दिसम्बर की आधी रात को दिल्ली की सड़क पर निर्भया जब दरिन्दों का शिकार बनी तो एक बार फिर से एफ़टीसी की मांग ज़ोर-शोर से उठी। तब से लेकर अब तक बलात्कार के मामले में एफ़टीसी में सुनवाई की मांग होती है, ताकि जल्दी से जल्दी दोषी को फ़ांसी की सज़ा हो जाए। लेकिन भारतीय क़ानून में ऐसा सम्भव नहीं है। यदि एफ़टीसी फ़ांसी की सज़ा सुना भी देता है तो आरोपी के पास हाईकोर्ट, हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी, राष्ट्रपति के पास आरोपी दया याचिका दायर कर सकता है । उदाहरण के लिए निर्भया बलात्कार काण्ड को ले लेते हैं। सभी 6 आरोपियों का मामला एफ़टीसी में चला। सुनवाई के दौरान हीं एक आरोपी ने तिहाड़ जेल में खुदकुशी कर ली। 13 सितम्बर 2013 को चार दोषियों को फ़ासी की सज़ा सुनाई और नाबालिग को तीन साल की अधिकतम सज़ा सुनाकर सुधार केन्द्र में भेज दिया।नाबालिग अपनी सज़ा पूरी करके आज़ाद हो गया। 13 मार्च 2014 को दिल्ली हाईकोर्ट ने भी फ़ासी की सज़ा को बरकरार रखा। 5 मई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुनाते हुए दोषियों की मौत की सज़ा को बरकरार रखा। 9 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने तीन आरोपियों की पुर्नविचार याचिका को ख़ारिज कर दिया। हालांकि अब भी इन दोषियों के पास फ़ासी से पहले राष्ट्रपति के सामने दया याचिका कर सकते हैं। तो देखा आपने! इतने साल बाद भी निर्भया के आरोपी को फ़ासी की सज़ा नहीं मिली है।
इसी केस में एक दूसरा पहलु ये भी है कि कुछ लोग फ़ांसी की सज़ा का विरोध भी कर रहें हैं। उनका कहना है कि 115 देशों ने मौत की सज़ा को ख़त्म कर दिया है।सभ्य समाज में इसका कोई स्थान नहीं है। फ़ांसी देकर अपराधी को ख़त्म किया जा सकता है अपराध को नहीं। मौत की सज़ा जीने के अधिकार को छीन लेती है। ये दुर्लभतम से दुर्लभ अपराध की श्रेणी में नहीं आता।
14वें वित्त आयोग की सिफ़ारिश पर साल 2020 तक के लिए क़रीब 4100 करोड़ की लागत से 1800 एफ़टीसी बनाने का फ़ैसला लिया गया है।  30 जून 2018 की 'द प्रिन्ट' की रिपोर्ट है, जिसमें लिखा है कि अभी भी 60% एफ़टीसी का गठन होना बाकी है।कम से कम 15 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों मे एक भी एफ़टीसी नहीं है।महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराध में जिन 10 शीर्ष राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों का नाम है,वहां बलात्कार जैसे मामलों की सुनावाई के लिए एक भी एफ़टीसी  नहीं है।यहां तक दिल्ली जो महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध में शीर्ष पर है, में मात्र 14 एफ़टीसी है। जबकि साल 2015 में केन्द्र सरकार के एक ज्ञापन के अनुसार 63 एफ़टीसी होना चाहिए। न्याय विभाग के अनुसार आधारभूत संरचना, ज़रूरी सामान और योग्य न्यायाधीश के बिना  देशभर के एफ़टीसी में 6.5 लाख मुक़दमे विचाराधीन है,जिसमें से 1500 सिर्फ़ दिल्ली के हैं।

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

सुप्रीम कोर्ट के दिखाये आईने में सबको अपनी जीत कैसे दिख रही है?

भले हीं समर्थन का आधार किसी दल का विरोध मात्र ही हो, लेकिन दल के लिए समर्थक तो समर्थक होते हैं। शायद इसलिए दिल्ली पर अधिकारों की जंग को लेकर उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को जो फैसला सुनाया है। उसको भाजपा और आम आदमी पार्टी के नेता और समर्थक अपनी-अपनी जीत बताकर खुशी में झूम रहें। लेकिन हक़ीक़त ये है कि कल तक आलोचना के शिकार रहे चीफ़ जस्टिस अॉफ़ इण्डिया दीपक मिश्रा बधाई के पात्र बन गये। सीजेआई सहित चार जजों की बेंच ने दोनों पक्षों को आईना दिखाया है, उनके दायरे को बताया है अधिकार नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा है कि हमारा संविधान काफ़ी उदार है। जब हम संविधान की व्याख्या करते हैं कि किसके क्या अधिकार है, उसकी करता सीमाएं हैं। तब हमें समय और परिस्थितियों को भी देखना पड़ता है। ऐसे में यह लगभग नामुमकिन है कि कहीं पर लिख दिया जाए कि किसकी क्या सीमाएं हैं। जब अलग-अलग पार्टी के लोग दिल्ली जैसे शहर को चलाते हैं तो आपस में सामंजस्य के साथ काम करना 'पड़ेगा'। आगे और भी बहुत सारी बातें आप पढ़ेंगे तो पाए कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फ़ैसले में केन्द्र सरकार, एलजी और दिल्ली सरकार को उनके संवैधानिक अधिकार को बताते हुए ये कहा है कि दिल्ली की जनता के हित में मिलजुलकर काम करें। लेकिन क्या सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद दिल्ली में अधिकार को लेकर झगड़े का 'द एण्ड' हो गया है,आने वाला वक़्त बताएगा। उच्चतम न्यायालय ने अपने फ़ैसले में जो स्पस्ठ रूप में कहा है,वो इस प्रकार है-

अरविन्द केजरीवाल के मांगों में से प्रमुख मांग को ठुकराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली को हम पूर्ण राज्य का दर्ज़ा नहीं दे सकते हैं।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अधिकार की एकतरफ़ा एब्सॉल्यूटिज़्म (पूर्णता) की कोई जगह नहीं है।दूसरी तरफ़ एनार्की यानि अराजकता की कोई जगह नहीं है।अदालत ने एनार्की शब्द का इस्तेमाल करते हुए एक प्रकार से चेताया है कि आए दिन धरना प्रदर्शन शोभा नहीं देता है। अदालत की इस टिप्पणी पर केन्द्र और दिल्ली सरकार को गौर करना चाहिए।

भूमि, पुलिस और क़ानून व्यवस्था तीनों दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।अपने दायरे में दिल्ली सरकार अपने काम करने को स्वतंत्र है।

दिल्ली सरकार अपने कर्मचारियों पर कार्रवाई कर सकती है। लेकिन ये भी साफ़ किया कि एंटी करप्शन ब्यूरो उसके अधीन नहीं है।वह पुलिस का हिस्सा है।

चुनी हुई सरकार को काम करने में दख़लंदाज़ी नहीं होनी चाहिए। फ़ैसले करने वाली उसकी शक्तियों को सीमित नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में वास्तविक शक्ति चुने हुए प्रतिनिधियों में होना चाहिए।

दिल्ली सरकार के अधीन बिषयों में एलजी को उसकी एंड एण्ड एडवाइस मानने को बाध्य है।

दिल्ली की संवैधानिक स्थिति को देखते हुए मंत्रिमंडल को अधिकार है कि वह कार्यकारी फ़ैसले लेने सकता है।अगर एलजी के साथ मतभेद होता है तो एलजी उसे राष्ट्रपति के पास लेकर जा सकते हैं। लेकिन हर मामले में नहीं। वैसे बेहद गंभीर मामले जिसमें असहमति हो उसको राष्ट्रपति के पास ले जा सकते हैं।

एलजी बनाम सीएम विवाद के वो दो मामले जिसपर बुधवार को हीं उच्चतम न्यायालय को स्पस्ठ कर देना चाहिए था,ताकि दिल्ली को तत्काल राहत मिल जाती-

एक तरफ़ उच्चतम न्यायालय ने कहा कि दिल्ली सरकार के अपने बिषयों अपने फ़ैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं।फ़ैसला करने से पहले उसे एलजी की अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं, लेकिन सूचना देनी होगी।तो दूसरी तरफ़ न्यायालय ने ये भी कहा कि दिल्ली सरकार के अधीन बिषयों में एलजी उसकी  एड एण्ड एडवाइस मानने के लिए बाध्य हैं।इन दो बयानों से एलजी की भूमिका स्पष्ठ नहीं हो पा रही है।जब एलजी दिल्ली के बिषयों की एड एण्ड एडवाइस मानने के लिए बाध्य हैं हीं तो फिर फ़ैसले को दिखाने की औपचारिक क्यों?

क़रीब तीन महीने से सीएम केजरीवाल सर्विसेज विभाग के अफ़सरों पर आरोप लगाते आ रहें हैं कि ये लोग केन्द्र सरकार के इशारे पर काम कर रहें हैं।हमारी नहीं सुनते जिसकी वज़ह से दिल्ली में विकास का काम नहीं हो पा रहा है। बुधवार को ही सुप्रीम कोर्ट को इस विवाद का निपटारा कर देना चाहिए था कि सर्विसेज विभाग किसके अधिनस्थ काम करेगा। गुरूवार को सर्विसेज विभाग के अफ़सरों ने कहा बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में आई अधिसूचना के बारे में कोई स्पस्ठ आदेश नहीं दिया है इसलिए वे लोग वह पुराने तरीके से हीं काम करेंगे। 2016 में आई अधिसूचना में अफ़सरों की नियुक्ति और ट्रांसफ़र का हक़ को दिया गया था।

मंगलवार, 3 जुलाई 2018

परिंदों के लिए दिल्ली एक मुश्किल शहर!



आज सुबह जब आंखें खुली तो पानी के लिए रसोईघर में गया। गिलास में पानी निकालकर पहली हीं घुंट पानी पिया था कि नज़र तस्वीर में दिख रहे प्यासे कौए पर पड़ी। पड़ोसी के पानी की टंकी पर बैठे इस प्यासे कौए का प्यास तो मेैं नहीं बुझा सका, लेकिन इसके पानी के टंकी पर बैठे होने से बचपन में पढ़ी एक कहानी याद आ गयी। कहानी का शीर्षक था 'प्यासा कौआ।' इस कहानी में प्यास बुझाने के लिए कौए के कार्य-कुशलता के साथ उसकी मेहनत को बताया गया था। लगातार उड़ते रहने से और तेज़ गर्मी से प्यासे कौए को शुरुआती कोशिश में सफलता ना मिलने के बाद निराश हो गया। बगीचे में पड़े घड़े में पानी की मात्रा इतनी कम थी कि उसकी चोंच पानी तक नहीं पहुंच पा रहा था। जिसके बाद उसने घड़े मे कंकड़ के टुकड़े डाले, जिससे पानी का स्तर ऊपर हो गया। जिससे कौए की प्यास बुझ गई। इस कहानी के आसरे मैंने भौतिक सुखों के आदि हो चुके शहरी समाज में इस कौए की जगह परिदों को रखकर कुछ देर तक सोचा। जहां रोज़गारी ज़िन्दगीं में लोगों के पास अपने परिवार में समय बिताने का मौका लगभग ना के बराबर मिलता है,ऐसे में शहरों में परिदों का ख्याल किसके जहन आता होगा और उनकी संख्या कितनी होगी? परिंदों को खानें-पीने के लिए कितना भटकना पड़ता होगा इस दिल्ली शहर में, यहां ना तो आसानी से पानी मिलता होगा और ना हीं रहने और खानें के लिए प्रर्याप्त संसाधन।
भौतिक सुखों के आदि हो चुके समाज के लिए जहां पेड़-पौधे बाधक हो जाते हैं,तो घड़ा प्रतिष्ठा का सवाल। इसलिए 'प्यासा कौआ' वाली कहानी दिल्ली के लिए ' कल्पना-एक हक़ीक़त कहानी' के अलावा कुछ भी नहीं रह जाता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ दिल्ली के कुछ इलाकों में पानी की संकट सालभर की समस्या है।और दिल्ली के ज़रूरत के हिसाब से मात्र दस फ़ीसदी हीं पानी है।हाल हीं में नीति आयोग ने वर्ष 2018 के कम्पोजिट वाटर इण्डेक्स जारी तक बताया है कि देश की आधी आबादी को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ेगा। वर्ष 2030 तक भारत के 40% हिस्से में पेयजल उपलब्ध नहीं होगा।आज से सालभर बाद यानी 2020 तक दिल्ली, चेन्नई,बेंगलुरु और हैदराबाद में भूजल ख़त्म हो जाएगा। यानी पानी की विकट समस्या पैदा हो जाएगी।
शहरों में पक्षियों के विलुप्त के कई कारणों में से एक है। लगातार पेड़ का कटना। पिछले पांच साल में दिल्ली में बीस हज़ार पेड़ काटे जा चुके हैं।और हाल हीं में नौकरशाहों के रहने के लिए 16 हज़ार पेड़ काटने की बात हुई हंगामा हुआ।वन विभाग की रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली में वनक्षेत्र मात्र 11% बचा है। ऐसे में ज़हरीली गैसों की चेम्बर बन चुकी दिल्ली के सजीवों का क्या होगा? एक पेड़ सालभर में क़रीब 100किलो शुद्ध गैस देता है।और एक व्यक्ति को सालभर में क़रीब 750 किलो अॉक्सीजन की ज़रूरत होती है।

रविवार, 24 जून 2018

नाराज़ मत होइए, सियासत में सब कुछ जायज़ मानते हैं नेता!

                                                     फ़ोटो-टाइम्स अॉफ़ इण्डिया
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद के इस👇 बयान से आप नाराज़ हैं? आख़िर क्यों? आज़ाद ने ऐसा नया क्या कह दिया है कि आप नाराज़ होकर अपना खून जला रहें हैं? पहली बार तो है नहीं कि कांग्रेस के किसी नेता ने कश्मीर और सेना को लेकर ग़लत बयान दिया है। कांग्रेस के नेताओं की लम्बी फ़ेहरिस्त है, या यूं कहें कि इनकी आदत पड़ चुकी है ऐसे बयान देते रहने की। शुक्रवार को ही सैफ़ुद्दिन सोज़ ने पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति मुशर्रफ के बयान को सही ठहराते हुए कश्मीर के आज़ादी की बात कही। 15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित के बेटे ने तो सेनाध्यक्ष को 'सड़क छाप गूंडा कह दिया था। पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम ने तो कहा कि कश्मीर को और स्वायत्तता देने की ज़रूरत है। कांग्रेस नेताओं के ऐसे तमाम बयान गूगल पड़ मिल जाएंगे। आप उनसे मिल लीजिए जो गुलाम जैसे बयान के 'गुलाम' हैं,वो मस्त है। मोदी-विरोध और दूसरे की मानसिकता के इतने गुलाम हो गये हैं कि वो सही-ग़लत में फ़र्क नहीं कर पा रहें हैं। आज़ाद ने एक न्यूज़ चैनल से बातचीत में जो कहा उसका पूरा तो नही,लेकिन उस हिस्से को मैं शब्दस: यहां लिख रहा हूँ,जिसको लेकर विवाद हुआ है।एंकरों की जमात चीखते-चिल्लाते रहें,लेकिन मूल सवाल को किसी ने नहीं पूछा। आज़ाद ने कहा- '' 4 आतंकी के ख़िलाफ़ एक्शन करते हैं और 20 सिविलियन को 'मार देते हैं।' तो ये इनका एक्शन आतंकियों के ख़िलाफ़ कम होता है सिविलियन के ख़िलाफ़ ज़्यादा होता है।''अब आप यहां गौर कीजिए कि गुलाम ने किस शब्द का प्रयोग किया है। उन्होंने 'मार देते हैं' शब्द का प्रयोग किया है। ये सही है कि नागरिकों की मौतें हुई,जो दुखद तो है।लेकिन ये कहना कैसे उचित है कि सेना नागरिकों को मारती है? क्या आज़ाद और उनके बयान से हां में हां मिलाने वाले इस सवाल का जवाब देंगे? यदि आप में कोई भी आज़ाद के बयान से इत्तेफ़ाक रखता है,तो बताएं कि आज़ाद का बयान कैसे अनुचित नहीं है? आज़ाद ने मुताबिक 4 आतंकी के ख़िलाफ़ एक्शन में 20 सिविलियन को 'मार देते हैं।आज़ाद के बयान को यदि विश्लेषित करें तो 1 आतंकी पर एक्शन से 5 नागरिकों की जान जाती है। इण्डियास्पेण्ड के मुताबिक पिछले तीन साल में 471 आतंकवादियों मारे गये हैं। तो आज़ाद के अनुसार 471x5=2355  नागरिक होना चाहिए।इतने नागरिक की जान तो उस वक़्त भी नहीं गई जब साल 1995 में सबसे ज़्यादा आतंकी घटनाएं हुई।साल 1995 में 5938 आतंकी घटनाएं हुई थी, जिसमें 1031 नागरिकों की मौत हुई थी। इण्डियास्पेण्ड का आंकड़ा बताता है कि 3 साल में 72 नागरिकों की जान गई है।आख़िर आज़ाद नागरिको की मौत को  बढ़ा-चढ़ाकर क्यों पेश कर रहें है? इससे उनका या कांग्रेस का क्या लाभ होगा? कब तक ऐसी सियासत की वजह से कश्मीर को मुद्दा बनाये रखेंगे? सच में यदि नागरिकों की इतनी चिन्ता है,तो क्यों नही पाकिस्तान के ख़िलाफ़ तमाम राजनीतिक दलों को एकजुट कर कार्रवाई करने की बात करते हैं? नागरिक और जवान शहीद होते रहते हैं और उसी बीच में क्यों पाकिस्तान से बात करने का राग अलापते रहते हैं? इतिहास से लेकर वर्तमान तक,कौन सी सरकार ने पाकिस्तान से बात करने की कोशिश नहीं की, लेकिन नतीजा क्या निकला? रोज़ जवान शहीद हो रहें हैं और आम नागरिकों की जान जा रही है।

शनिवार, 9 जून 2018

मनरेगा: मुफाजात के चार साल!


शीर्षक में जो 'मुफाजात' शब्द आप देख रहें हैं, इसका इस्तेमाल हमने वाक्य को जटिल बनाने के लिए नहीं, बल्कि इस शब्द के आसरे मनरेगा की हालत बताना चाहता हूँ। मुफाजात का मतलब आशा के विपरीत होता है।साल 2014 में जब देश ने देश की बागडोर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सौंपा तो देश की एक बड़ी आबादी जो गावों में रहती है, में भी उम्मीद जागी, बिल्कुल उसी रूप में जैसे चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में उम्मीद जगाई थी। एक योजना है मनरेगा यानि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार योजना जिसके बारे में आप ने सुना ही होगा। इस योजना को साल 2014 में विश्व बैंक ने ग्रामीण विकास का अनुपम उदारहण करार दिया था। इसी योजना को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 'गढ्ढे ख़ोदने' वाली योजना कह कर मज़ाक उड़ाया था ।  फ़रवरी 2015 में संसद में पीएम मोदी ने अपनी राजनीति सूझबूझ की तारीफ़ करते हुए कहा कि 'मेरी राजनीतिक सूझबूझ कहती है कि मनरेगा बन्द मत करो। मैं ऐसी ग़लती नहीं कर सकता हूँ, क्योंकि मनरेगा आपकी(कांग्रेस की) विफ़लता का जीता-जागता स्मारक है।आज़ादी के 60 साल बाद आपको लोगों को गढ्ढे ख़ोदने के लिए भेजना पड़ा। मैं गाजे-बाजे के साथ इस स्मारक का दुनिया में ढोल पीटता रहूंगा।' प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नज़र में जब ये गढ्ढे ख़ोदने वाली योजना थी, तो इसको बन्द क्यों नहीं किया? क्यों सुखा प्रभावित इलाकों में 50 अतिरिक्त दिन काम उपलब्ध कराने का फ़ैसला किया?
मनरेगा अपने अस्तित्व से लेकर वर्तमान में भी ये एक मात्र ऐसी रोज़गार योजना है जिसकी क़ानूनी गारंटी के बाद भी कोई गारंटी नहीं है कि साल में 100 दिन काम मिलेगा ही और 15 दिनों के अन्दर भुगतान हो ही जाएगा।मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 2013-14 से 2016-17 तक मज़दूरी भुगतान के लिए बने आधे से कम फ़ण्ड ट्रांसफ़र ऑर्डर(एफटीओ) पर समय से हस्ताक्षर हुए। एफटीओ पर हस्ताक्षर को सरकार मज़दूरों को भुगतान हो जाना मानती है, जबकि हक़ीक़त ये है कि यह प्रक्रिया हो जाने के बाद भी मज़दूरी भुगतान में महीनों लग जाते हैं। 2016-17  में 10 राज्यों में 90 लाख हुए मज़दूरी भुगतान पर स्वतंत्र शोधकर्ताओं ने अध्यन्न में पाया कि केवल 21% मामलों में ही काम करने के 15 दिनों के अन्दर मज़दूर के खाते में मज़दूरी हस्तान्तरित हुई है। दोबारा शोधकर्ताओं ने अप्रैल से सितम्बर 2017 में हुए मज़दूरी भुगतानों में पाया कि केवल 32% मज़दूरों को हीं समय पर मज़दूरी मिली।मज़दूरी में अनियमितता के कई कारण होते हैं।जैसे प्रशासनिक लापरवाही, मज़दूरों के खाते से फर्ज़ी निकासी, आधार सीडिंग और मैनेजमेंट इनफ़ॉर्मेशन सिस्टम के साथ जोड़ने में ग़लतियां वगैरह।
मोदी सरकार के चार साल में मज़दूरों की मज़दूरी समय पर ना मिलने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दो बार सख़्त रूख़ अपनाया। मई 2016 में न्यायमूर्ती एमबी लोकुर और न्यायमूर्ती एनवी रमण के पीठ ने केन्द्र सरकार से राज्यों के मनरेगा के लिए बकाया राशि देने को कहा था। पीठ ने आगे कहा था कि सरकार अपने वित्तीय कमी का रोना रोकर अपनी ज़िम्मेदारी से मुंह नहीं छिपा सकती है। मई 2018 में भी न्यायमूर्ती एमबी लोकुर और न्यायमूर्ती एनवी रमण की ही पीठ ने निर्देश दिया कि राज्य सरकार और केन्द्र शासित प्रदेश मिलकर मज़दूरी और बेरोज़गारी भत्ता समय देने की तिथी निर्धारित करें। 
देशभर में मज़दूरों को मज़दूरी और काम मिलने की कहानी बहुत निराश करने वाली हैं, लेकिन फिर आपको कुछ ताज़ा मामला बताना चाहता हूँ। ताकि आपको भी पता चल सके कि मोदी सरकार में कितना बदला मनरेगा की हालत। हिमाचल प्रदेश के बजवाड़ गांव के बुधिया राम को 2017-18 के तहत 138 दिनों की मज़दूरी का डेढ़ साल से इन्तज़ार है।हरियाणा के रोहतक के कारौर गांव में 15 दिन काम करवा कर ठेकेदार ने मज़दूरों को हटा दिया।मज़दूरों का कहना कि ठेकेदार शहर से मज़दूर लाने की बात कर रहा है। छत्तीसगढ़ के बेमेतरा के ग्राम कंतेली में कम मज़दूरी मिलने से मज़दूरों ने पंचायत भवन के सामने प्रदर्शन किया।ऐसी इतनी कहानियां की मैं लिखते-लिखते थक जाऊंगा और आप पढ़ते-पढ़ते।

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...