शीर्षक में जो 'मुफाजात' शब्द आप देख रहें हैं, इसका इस्तेमाल हमने वाक्य को जटिल बनाने के लिए नहीं, बल्कि इस शब्द के आसरे मनरेगा की हालत बताना चाहता हूँ। मुफाजात का मतलब आशा के विपरीत होता है।साल 2014 में जब देश ने देश की बागडोर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सौंपा तो देश की एक बड़ी आबादी जो गावों में रहती है, में भी उम्मीद जागी, बिल्कुल उसी रूप में जैसे चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में उम्मीद जगाई थी। एक योजना है मनरेगा यानि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार योजना जिसके बारे में आप ने सुना ही होगा। इस योजना को साल 2014 में विश्व बैंक ने ग्रामीण विकास का अनुपम उदारहण करार दिया था। इसी योजना को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 'गढ्ढे ख़ोदने' वाली योजना कह कर मज़ाक उड़ाया था । फ़रवरी 2015 में संसद में पीएम मोदी ने अपनी राजनीति सूझबूझ की तारीफ़ करते हुए कहा कि 'मेरी राजनीतिक सूझबूझ कहती है कि मनरेगा बन्द मत करो। मैं ऐसी ग़लती नहीं कर सकता हूँ, क्योंकि मनरेगा आपकी(कांग्रेस की) विफ़लता का जीता-जागता स्मारक है।आज़ादी के 60 साल बाद आपको लोगों को गढ्ढे ख़ोदने के लिए भेजना पड़ा। मैं गाजे-बाजे के साथ इस स्मारक का दुनिया में ढोल पीटता रहूंगा।' प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नज़र में जब ये गढ्ढे ख़ोदने वाली योजना थी, तो इसको बन्द क्यों नहीं किया? क्यों सुखा प्रभावित इलाकों में 50 अतिरिक्त दिन काम उपलब्ध कराने का फ़ैसला किया?
मनरेगा अपने अस्तित्व से लेकर वर्तमान में भी ये एक मात्र ऐसी रोज़गार योजना है जिसकी क़ानूनी गारंटी के बाद भी कोई गारंटी नहीं है कि साल में 100 दिन काम मिलेगा ही और 15 दिनों के अन्दर भुगतान हो ही जाएगा।मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 2013-14 से 2016-17 तक मज़दूरी भुगतान के लिए बने आधे से कम फ़ण्ड ट्रांसफ़र ऑर्डर(एफटीओ) पर समय से हस्ताक्षर हुए। एफटीओ पर हस्ताक्षर को सरकार मज़दूरों को भुगतान हो जाना मानती है, जबकि हक़ीक़त ये है कि यह प्रक्रिया हो जाने के बाद भी मज़दूरी भुगतान में महीनों लग जाते हैं। 2016-17 में 10 राज्यों में 90 लाख हुए मज़दूरी भुगतान पर स्वतंत्र शोधकर्ताओं ने अध्यन्न में पाया कि केवल 21% मामलों में ही काम करने के 15 दिनों के अन्दर मज़दूर के खाते में मज़दूरी हस्तान्तरित हुई है। दोबारा शोधकर्ताओं ने अप्रैल से सितम्बर 2017 में हुए मज़दूरी भुगतानों में पाया कि केवल 32% मज़दूरों को हीं समय पर मज़दूरी मिली।मज़दूरी में अनियमितता के कई कारण होते हैं।जैसे प्रशासनिक लापरवाही, मज़दूरों के खाते से फर्ज़ी निकासी, आधार सीडिंग और मैनेजमेंट इनफ़ॉर्मेशन सिस्टम के साथ जोड़ने में ग़लतियां वगैरह।
मोदी सरकार के चार साल में मज़दूरों की मज़दूरी समय पर ना मिलने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दो बार सख़्त रूख़ अपनाया। मई 2016 में न्यायमूर्ती एमबी लोकुर और न्यायमूर्ती एनवी रमण के पीठ ने केन्द्र सरकार से राज्यों के मनरेगा के लिए बकाया राशि देने को कहा था। पीठ ने आगे कहा था कि सरकार अपने वित्तीय कमी का रोना रोकर अपनी ज़िम्मेदारी से मुंह नहीं छिपा सकती है। मई 2018 में भी न्यायमूर्ती एमबी लोकुर और न्यायमूर्ती एनवी रमण की ही पीठ ने निर्देश दिया कि राज्य सरकार और केन्द्र शासित प्रदेश मिलकर मज़दूरी और बेरोज़गारी भत्ता समय देने की तिथी निर्धारित करें।
देशभर में मज़दूरों को मज़दूरी और काम मिलने की कहानी बहुत निराश करने वाली हैं, लेकिन फिर आपको कुछ ताज़ा मामला बताना चाहता हूँ। ताकि आपको भी पता चल सके कि मोदी सरकार में कितना बदला मनरेगा की हालत। हिमाचल प्रदेश के बजवाड़ गांव के बुधिया राम को 2017-18 के तहत 138 दिनों की मज़दूरी का डेढ़ साल से इन्तज़ार है।हरियाणा के रोहतक के कारौर गांव में 15 दिन काम करवा कर ठेकेदार ने मज़दूरों को हटा दिया।मज़दूरों का कहना कि ठेकेदार शहर से मज़दूर लाने की बात कर रहा है। छत्तीसगढ़ के बेमेतरा के ग्राम कंतेली में कम मज़दूरी मिलने से मज़दूरों ने पंचायत भवन के सामने प्रदर्शन किया।ऐसी इतनी कहानियां की मैं लिखते-लिखते थक जाऊंगा और आप पढ़ते-पढ़ते।

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