फ़ोटो-टाइम्स अॉफ़ इण्डिया
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद के इस👇 बयान से आप नाराज़ हैं? आख़िर क्यों? आज़ाद ने ऐसा नया क्या कह दिया है कि आप नाराज़ होकर अपना खून जला रहें हैं? पहली बार तो है नहीं कि कांग्रेस के किसी नेता ने कश्मीर और सेना को लेकर ग़लत बयान दिया है। कांग्रेस के नेताओं की लम्बी फ़ेहरिस्त है, या यूं कहें कि इनकी आदत पड़ चुकी है ऐसे बयान देते रहने की। शुक्रवार को ही सैफ़ुद्दिन सोज़ ने पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति मुशर्रफ के बयान को सही ठहराते हुए कश्मीर के आज़ादी की बात कही। 15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित के बेटे ने तो सेनाध्यक्ष को 'सड़क छाप गूंडा कह दिया था। पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम ने तो कहा कि कश्मीर को और स्वायत्तता देने की ज़रूरत है। कांग्रेस नेताओं के ऐसे तमाम बयान गूगल पड़ मिल जाएंगे। आप उनसे मिल लीजिए जो गुलाम जैसे बयान के 'गुलाम' हैं,वो मस्त है। मोदी-विरोध और दूसरे की मानसिकता के इतने गुलाम हो गये हैं कि वो सही-ग़लत में फ़र्क नहीं कर पा रहें हैं। आज़ाद ने एक न्यूज़ चैनल से बातचीत में जो कहा उसका पूरा तो नही,लेकिन उस हिस्से को मैं शब्दस: यहां लिख रहा हूँ,जिसको लेकर विवाद हुआ है।एंकरों की जमात चीखते-चिल्लाते रहें,लेकिन मूल सवाल को किसी ने नहीं पूछा। आज़ाद ने कहा- '' 4 आतंकी के ख़िलाफ़ एक्शन करते हैं और 20 सिविलियन को 'मार देते हैं।' तो ये इनका एक्शन आतंकियों के ख़िलाफ़ कम होता है सिविलियन के ख़िलाफ़ ज़्यादा होता है।''अब आप यहां गौर कीजिए कि गुलाम ने किस शब्द का प्रयोग किया है। उन्होंने 'मार देते हैं' शब्द का प्रयोग किया है। ये सही है कि नागरिकों की मौतें हुई,जो दुखद तो है।लेकिन ये कहना कैसे उचित है कि सेना नागरिकों को मारती है? क्या आज़ाद और उनके बयान से हां में हां मिलाने वाले इस सवाल का जवाब देंगे? यदि आप में कोई भी आज़ाद के बयान से इत्तेफ़ाक रखता है,तो बताएं कि आज़ाद का बयान कैसे अनुचित नहीं है? आज़ाद ने मुताबिक 4 आतंकी के ख़िलाफ़ एक्शन में 20 सिविलियन को 'मार देते हैं।आज़ाद के बयान को यदि विश्लेषित करें तो 1 आतंकी पर एक्शन से 5 नागरिकों की जान जाती है। इण्डियास्पेण्ड के मुताबिक पिछले तीन साल में 471 आतंकवादियों मारे गये हैं। तो आज़ाद के अनुसार 471x5=2355 नागरिक होना चाहिए।इतने नागरिक की जान तो उस वक़्त भी नहीं गई जब साल 1995 में सबसे ज़्यादा आतंकी घटनाएं हुई।साल 1995 में 5938 आतंकी घटनाएं हुई थी, जिसमें 1031 नागरिकों की मौत हुई थी। इण्डियास्पेण्ड का आंकड़ा बताता है कि 3 साल में 72 नागरिकों की जान गई है।आख़िर आज़ाद नागरिको की मौत को बढ़ा-चढ़ाकर क्यों पेश कर रहें है? इससे उनका या कांग्रेस का क्या लाभ होगा? कब तक ऐसी सियासत की वजह से कश्मीर को मुद्दा बनाये रखेंगे? सच में यदि नागरिकों की इतनी चिन्ता है,तो क्यों नही पाकिस्तान के ख़िलाफ़ तमाम राजनीतिक दलों को एकजुट कर कार्रवाई करने की बात करते हैं? नागरिक और जवान शहीद होते रहते हैं और उसी बीच में क्यों पाकिस्तान से बात करने का राग अलापते रहते हैं? इतिहास से लेकर वर्तमान तक,कौन सी सरकार ने पाकिस्तान से बात करने की कोशिश नहीं की, लेकिन नतीजा क्या निकला? रोज़ जवान शहीद हो रहें हैं और आम नागरिकों की जान जा रही है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद के इस👇 बयान से आप नाराज़ हैं? आख़िर क्यों? आज़ाद ने ऐसा नया क्या कह दिया है कि आप नाराज़ होकर अपना खून जला रहें हैं? पहली बार तो है नहीं कि कांग्रेस के किसी नेता ने कश्मीर और सेना को लेकर ग़लत बयान दिया है। कांग्रेस के नेताओं की लम्बी फ़ेहरिस्त है, या यूं कहें कि इनकी आदत पड़ चुकी है ऐसे बयान देते रहने की। शुक्रवार को ही सैफ़ुद्दिन सोज़ ने पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति मुशर्रफ के बयान को सही ठहराते हुए कश्मीर के आज़ादी की बात कही। 15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित के बेटे ने तो सेनाध्यक्ष को 'सड़क छाप गूंडा कह दिया था। पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम ने तो कहा कि कश्मीर को और स्वायत्तता देने की ज़रूरत है। कांग्रेस नेताओं के ऐसे तमाम बयान गूगल पड़ मिल जाएंगे। आप उनसे मिल लीजिए जो गुलाम जैसे बयान के 'गुलाम' हैं,वो मस्त है। मोदी-विरोध और दूसरे की मानसिकता के इतने गुलाम हो गये हैं कि वो सही-ग़लत में फ़र्क नहीं कर पा रहें हैं। आज़ाद ने एक न्यूज़ चैनल से बातचीत में जो कहा उसका पूरा तो नही,लेकिन उस हिस्से को मैं शब्दस: यहां लिख रहा हूँ,जिसको लेकर विवाद हुआ है।एंकरों की जमात चीखते-चिल्लाते रहें,लेकिन मूल सवाल को किसी ने नहीं पूछा। आज़ाद ने कहा- '' 4 आतंकी के ख़िलाफ़ एक्शन करते हैं और 20 सिविलियन को 'मार देते हैं।' तो ये इनका एक्शन आतंकियों के ख़िलाफ़ कम होता है सिविलियन के ख़िलाफ़ ज़्यादा होता है।''अब आप यहां गौर कीजिए कि गुलाम ने किस शब्द का प्रयोग किया है। उन्होंने 'मार देते हैं' शब्द का प्रयोग किया है। ये सही है कि नागरिकों की मौतें हुई,जो दुखद तो है।लेकिन ये कहना कैसे उचित है कि सेना नागरिकों को मारती है? क्या आज़ाद और उनके बयान से हां में हां मिलाने वाले इस सवाल का जवाब देंगे? यदि आप में कोई भी आज़ाद के बयान से इत्तेफ़ाक रखता है,तो बताएं कि आज़ाद का बयान कैसे अनुचित नहीं है? आज़ाद ने मुताबिक 4 आतंकी के ख़िलाफ़ एक्शन में 20 सिविलियन को 'मार देते हैं।आज़ाद के बयान को यदि विश्लेषित करें तो 1 आतंकी पर एक्शन से 5 नागरिकों की जान जाती है। इण्डियास्पेण्ड के मुताबिक पिछले तीन साल में 471 आतंकवादियों मारे गये हैं। तो आज़ाद के अनुसार 471x5=2355 नागरिक होना चाहिए।इतने नागरिक की जान तो उस वक़्त भी नहीं गई जब साल 1995 में सबसे ज़्यादा आतंकी घटनाएं हुई।साल 1995 में 5938 आतंकी घटनाएं हुई थी, जिसमें 1031 नागरिकों की मौत हुई थी। इण्डियास्पेण्ड का आंकड़ा बताता है कि 3 साल में 72 नागरिकों की जान गई है।आख़िर आज़ाद नागरिको की मौत को बढ़ा-चढ़ाकर क्यों पेश कर रहें है? इससे उनका या कांग्रेस का क्या लाभ होगा? कब तक ऐसी सियासत की वजह से कश्मीर को मुद्दा बनाये रखेंगे? सच में यदि नागरिकों की इतनी चिन्ता है,तो क्यों नही पाकिस्तान के ख़िलाफ़ तमाम राजनीतिक दलों को एकजुट कर कार्रवाई करने की बात करते हैं? नागरिक और जवान शहीद होते रहते हैं और उसी बीच में क्यों पाकिस्तान से बात करने का राग अलापते रहते हैं? इतिहास से लेकर वर्तमान तक,कौन सी सरकार ने पाकिस्तान से बात करने की कोशिश नहीं की, लेकिन नतीजा क्या निकला? रोज़ जवान शहीद हो रहें हैं और आम नागरिकों की जान जा रही है।

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