आज सुबह जब आंखें खुली तो पानी के लिए रसोईघर में गया। गिलास में पानी निकालकर पहली हीं घुंट पानी पिया था कि नज़र तस्वीर में दिख रहे प्यासे कौए पर पड़ी। पड़ोसी के पानी की टंकी पर बैठे इस प्यासे कौए का प्यास तो मेैं नहीं बुझा सका, लेकिन इसके पानी के टंकी पर बैठे होने से बचपन में पढ़ी एक कहानी याद आ गयी। कहानी का शीर्षक था 'प्यासा कौआ।' इस कहानी में प्यास बुझाने के लिए कौए के कार्य-कुशलता के साथ उसकी मेहनत को बताया गया था। लगातार उड़ते रहने से और तेज़ गर्मी से प्यासे कौए को शुरुआती कोशिश में सफलता ना मिलने के बाद निराश हो गया। बगीचे में पड़े घड़े में पानी की मात्रा इतनी कम थी कि उसकी चोंच पानी तक नहीं पहुंच पा रहा था। जिसके बाद उसने घड़े मे कंकड़ के टुकड़े डाले, जिससे पानी का स्तर ऊपर हो गया। जिससे कौए की प्यास बुझ गई। इस कहानी के आसरे मैंने भौतिक सुखों के आदि हो चुके शहरी समाज में इस कौए की जगह परिदों को रखकर कुछ देर तक सोचा। जहां रोज़गारी ज़िन्दगीं में लोगों के पास अपने परिवार में समय बिताने का मौका लगभग ना के बराबर मिलता है,ऐसे में शहरों में परिदों का ख्याल किसके जहन आता होगा और उनकी संख्या कितनी होगी? परिंदों को खानें-पीने के लिए कितना भटकना पड़ता होगा इस दिल्ली शहर में, यहां ना तो आसानी से पानी मिलता होगा और ना हीं रहने और खानें के लिए प्रर्याप्त संसाधन।
भौतिक सुखों के आदि हो चुके समाज के लिए जहां पेड़-पौधे बाधक हो जाते हैं,तो घड़ा प्रतिष्ठा का सवाल। इसलिए 'प्यासा कौआ' वाली कहानी दिल्ली के लिए ' कल्पना-एक हक़ीक़त कहानी' के अलावा कुछ भी नहीं रह जाता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ दिल्ली के कुछ इलाकों में पानी की संकट सालभर की समस्या है।और दिल्ली के ज़रूरत के हिसाब से मात्र दस फ़ीसदी हीं पानी है।हाल हीं में नीति आयोग ने वर्ष 2018 के कम्पोजिट वाटर इण्डेक्स जारी तक बताया है कि देश की आधी आबादी को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ेगा। वर्ष 2030 तक भारत के 40% हिस्से में पेयजल उपलब्ध नहीं होगा।आज से सालभर बाद यानी 2020 तक दिल्ली, चेन्नई,बेंगलुरु और हैदराबाद में भूजल ख़त्म हो जाएगा। यानी पानी की विकट समस्या पैदा हो जाएगी।
शहरों में पक्षियों के विलुप्त के कई कारणों में से एक है। लगातार पेड़ का कटना। पिछले पांच साल में दिल्ली में बीस हज़ार पेड़ काटे जा चुके हैं।और हाल हीं में नौकरशाहों के रहने के लिए 16 हज़ार पेड़ काटने की बात हुई हंगामा हुआ।वन विभाग की रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली में वनक्षेत्र मात्र 11% बचा है। ऐसे में ज़हरीली गैसों की चेम्बर बन चुकी दिल्ली के सजीवों का क्या होगा? एक पेड़ सालभर में क़रीब 100किलो शुद्ध गैस देता है।और एक व्यक्ति को सालभर में क़रीब 750 किलो अॉक्सीजन की ज़रूरत होती है।

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