गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

बीजेपी शासित राज्य देश के पिछड़ेपन का कारण है!


नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अमिताभ कान्त ने 'चैलेंज अॉफ़ ट्रांसफ़ॉरमिंग इण्डिया' पर बोलते हुए कहा कि सामाजिक संकेतकों के मामले में बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों के कारण भारत पिछड़ा बना हुआ है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया,नई दिल्ली में प्रथम अब्दुल गफ्फार ख़ान स्मारक व्याख्यान के दौरान श्री कान्त ने दक्षिण-पश्चिमी राज्यों की पीठ थपथपाई।कहा कि, दक्षिण-पश्चिम के राज्य बहुत अच्छा कर रहें हैं और तेज़ी से आगे बढ़ रहें हैं।
नीति आयोग को हिंदी में राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान के नाम से जाना जाता है।यह योजना आयोग का परिवर्तित रूप है। इसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता हैं।यह सरकार का थिंक टैंक होता है।इसकी ज़िम्मेदारी देश के समग्र विकास के लिए नीतियां बनाकर, क्रियान्वित करना है।इस संस्थान का निर्माण 2015 में हुआ है।
सतत विकास के महत्व पर ज़ोर देते हुए श्री कान्त ने कहा कि देश में शिक्षा और स्वास्थ्य बदहाल स्थिति में है,जिसकी वज़ह से देश पिछड़ रहा है।हमारे सीखने के परिणाम बहुत दुखद है।एक पांचवीं कक्षा का छात्र दूसरी कक्षा के जोड़-घटाव नहीं कर पाता है। पांचवीं कक्षा का छात्र अपनी मातृभाषा तक नहीं पढ़ पाता है। शिशु-मृत्यु दर बहुत ज़्यादा है।ये वो बिन्दु है जिनपर सुधार किए बिना सतत विकास करना बहुत मुश्किल होगा।
वर्तमान में बिहारउत्तर प्रदेशछत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शासन में है।एमपी और छत्तीसगढ़ में पिछले 15 साल से बीजेपी की सरकार है।इक्कीसवीं सदी के राजस्थान में 2013 से बीजेपी की सरकार है।इससे पहले 2003-2008 में भी बीजेपी की शासन में थी।जंगल राज के बाद से बिहार में काफ़ी लम्बे अरसे से सरकार की सहयोगी है बीजेपी हैं।2005 के बाद से अबतक के बीच में क़रीब 20 महीने के लिए जदयू का साथ छूटा था।यूपी में बीजेपी को शासन करते हुए मात्र एक साल हुए हैं।

सोमवार, 23 अप्रैल 2018

कांग्रेस की मुख्य न्यायाधीश को हटाने की मुहिम फ़्लॉप!


मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ महाभियोग पर संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्पय,लोकसभा के महासचिव,पूर्व विधि सचिव पीके मल्होत्रा,पूर्व विधाई सचिव संजय सिंह और राज्यसभा सचिवालय के अधिकारियों से माथापच्ची के बाद आज उपराष्ट्रपति ने तकनीकी आधार पर ख़ारिज कर दिया। अब कांग्रेस के पास विकल्प है कि वह सुप्रीम कोर्ट जा सकती है। गौरतलब है कि शुक्रवार को कांग्रेस समेत सात विपक्षी दलों ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को हटाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 217 के साथ 124(4) के तहत राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति एम वैंकेया नायडू को नोटिस दिया था। कांग्रेस का आरोप था कि चीफ़ जस्टिस मिश्रा, पद का दुरूपयोग कर रहें है और चीफ़ जस्टिस पद की गरिमा को नुक़सान पहुंचा रहें हैं। महाभियोग पर कपिल सिब्बल ने प्रेस कांफ्रेंस कर कहा था  कि 'भारत के मुख्य न्यायाधीश' पद की गरिमा बनी रही, इसलिए हमने महाभियोग प्रस्ताव लाया है। कांग्रेस की पीसी के बाद सोशल मीडिया पर मोदी सरकार और मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के आलोचना की बाढ़ सी आ गई थी। आलोचकों में ज़्यादातर वो लोग थें, जो कांग्रेस की तरह ही सियासी विरोध में संविधान की मर्यादा का ख़याल रखना भुल गये थे। कांग्रेस का तो इतिहास है कि एक व्यक्ति और सत्ता के लिए लोगों के संवैधानिक अधिकार तक को छिन लिया था। न्यायपालिका को किसी हद तक अपने कब्ज़े में कर लिया था। वर्तमान में दु:ख की बात तो ये है कि कांग्रेस पार्टी तो जज लोया की मौत और चार जजों के सहारे राजनीति कर रही है, लेकिन क्या आम लोगों को भी यही करना चाहिए? क़ानून के तमाम जानकारों ने कांग्रेस के इस कदम को पूर्ण रूप से सियासी बताया था और कहा था कि यदि संसद में इस महाभियोग पर कार्यवाही हुई तो न्यायालय से लोगों का भरोसा समाप्त होने लगेगा।यहां तक की कांग्रेस के ही पेेेशे से वकील कई बड़े नेताओं ने इस कदम को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। इसलिए मैंने सोचा कि सोशल मीडिया से इत्तर संविधान या क़ानून के जानकार, कांग्रेस के इस महाभियोग प्रस्ताव पर क्या सोचते हैं, उसको आप तक पहुंचाऊं, ताकि आप सही ग़लत में फ़र्क समझ सके। क्योंकि सोशल मीडिया के युग में सही-ग़लत में फ़र्क करना बेहद मुश्किल हो गया है। इस युग में एक हीं विषय पर घंटों और सालों तक अध्यन करने वाले ख़ुद को एकान्त में पड़ी किसी वस्तु जैसा महसूस कर रहे होंगे।क्योंकि सोशल मीडिया पर हर कोई हर विषय पर एेसे ज्ञानोत्सर्जन कर रहा है,जैसे उस विषय का वह ज्ञाता है।पहले इस कैटेगरी में राजनीतिक दलों के प्रवक्ता आते थें, लेकिन अब तो ख़ुद को पत्रकार कहने वाले युवा भी इस रेस में शामिल हो गयें। मोदी विरोध में वो कब पत्रकार से पक्षकार बन गए, उन्हें ही पता नहीं चला। इसलिए ज़रुरी है किसी अंतिम सत्य तक पहुंचने से पहले ख़ुद भी मेहनत करें और हक़ीक़त जानने की कोशिश करें।
दरअसल इस मामले की शुरुआत 12 जनवरी को 4 जजों के प्रेस कांन्फ्रेंस के बाद हुई।जजों ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर कई आरोप लगायें, जिसमें से एक है जज लोया की संदिग्ध मौत की सुनवाई का और केस के बंटवारे का। जजों की पीसी के बाद विपक्ष को ये एक मुद्दा मिल गया। बजट सत्र के दौरान भी महाभियोग विपक्ष के एजेंडे में था, लेकिन कुछ क्षेत्रिये पार्टियों ने साथ देने से इंकार कर दिया था। इसलिए अब जब सुप्रीम कोर्ट ने जज लोया की मौत को स्वाभाविक बताया, तो कांग्रेस की अगुवाई में सात विपक्षी दलों ने महाभियोग प्रस्ताव लाया। लेकिन इस बार पार्टी टीएमसी और डीएमके का साथ नहीं मिला। मतलब साफ़ है कि फै़सला पसंद नहीं आया तो महाभियोग ले आये। संविधान के जानकार इसे ख़तरनाक बता रहें। इनका कहना है कि यदि इस प्रक्रिया को बढ़ावा दिया गया तो संसद के दोनों सदनों में बहुमत वाली पार्टी जब चाहे किसी भी न्यायधीश को, उसके मन मुताबिक फ़ैसला ना देने पर हटा सकती है। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद या चाहे कोई भी कहे कि इस महाभियोग का जज लोया कि मौत से लेना-देना नहीं है‌। लेकिन आप महाभियोग की कवायद के समय पर गौर कीजिए, मक़सद पता चल जाएगा।
कांग्रेस का इतिहास पहले बता दिया हूं। कपिल सिब्बल का भी महाभियोग से जुड़ा एक इतिहास जान लीजिए। महाभियोग के इतिहास में पहली बार किसी मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ महाभियोग लाया गया,तो आरोपी न्यायाधीश वी राधास्वामी के समर्थन में संसद में घंटों बहस किया था। वी राधास्वामी ने बाद में इस्तिफ़ा दे दिया था। राधास्वामी पर 1991 में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे। नियुक्ति में गड़बड़ी की बात संसद भवन तक पहुंच गया था।
महाभियोग पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह  ने हस्ताक्षर नहीं किया है‌। कांग्रेस के तरफ़ ये दलील दी गई है कि वो पूर्व पीएम है इसलिए उनको शामिल नहीं किया गया है। अब संविधान के जानकार,कुछ वरिष्ठ वकीलों और यूपीए के कार्यकाल में क़ानून मंत्री रह चुके लोगों की राय बताता हूं कि वो कांग्रेस के इस महाभियोग प्रस्ताव के बारे में उनका क्या कहना था। थोड़ा वक़्त लगा है पढ़ने में थोड़ा और वक़्त लगा दीजिए,क्योंकि मामला न्यायपालिका का है।यदि आप ग़लत सही में फ़र्क नहीं करेंगे और चुपचाप बैठे रहेंगे तो न्यायपालिका की हालत आपातकाल जैसी हो जाएगी,तो न्याय के लिए कहां जाएंगे?
संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने कहा था कि महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस राजनीतिक कदम है और  न्यायपालिका और सरकार को शर्मिन्दा करने वाला है।आगे कहा था कि संविधान में अक्षमता और दुर्व्यवहार जैसे अपराधों पर किसी जज को हटाने का प्रावधान तो हैं,लेकिन महाभियोग का नहीं,इसलिए राज्यसभा के सभापति विपक्ष की अर्जी को ख़ारिज भी कर सकते हैं।
वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी ने कहा था कि कांग्रेस का प्रस्ताव रद्दी का टुकड़ा है।संविधान के ख़िलाफ़ है।ऐसा लगता है कि कांग्रेस के नेताओं को न तो संविधान की जानकारी है।और ना ही वो संविधान को पढ़ने की कोशिश करते हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज एस एन ढींगरा ने कहा कि ये सियासी चाल है।न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश है।कांग्रेस के पास ना तो नम्बर है।और कांग्रेस के तरफ़ से जो प्रस्ताव दिए गए है, वो महाभियोग के दायरे में नहीं आते हैं। इससे चीफ़ जस्टिस पर आंच नहीं आएंगे। कांग्रेस का प्रस्ताव गिर जाएगा लेकिन न्यायपालिका पर जो दाग लगेगा वो दु:ख की बात है। जिस मक़सद के लिए आलोचना की जा रही है, वो ग़लत है। आलोचना न्यायपालिका को बेहतर करने के लिए हो, तो समझ आती है। यहां तो न्यायिक तंत्र की ही आलोचना की जा रही है।
यूपीए सरकार के दो क़ानून मंत्री की राय-
सलमान खुर्शीद ने कहा कि जो भी निर्णय आता है वो अंतिम निर्णय होता है एससी का। आगे उसको चैलेंज करने के लिए और भी कई प्रावधान है।ईमानदारी और विश्वसनीयता पर सवाल करना सही नहीं है। मुझे लगता है कि जो भी वकील होगा ऐसा नहीं करेगा। महाभियोग एक गंभीर मुद्दा है।इसे कोर्ट के किसी फ़ैसले,राय या फ़िर असहमति की वजह से नही लाना चाहिए।
आश्विनी कुमार ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ महाभियोग लाना ठीक नहीं है।ये ना होता तो अच्छा होता। न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव नहीं होना चाहिए।
                                                                        अभिषेक मनु सिंघवी का बयान बड़ा दिलचस्प था।सिंघवी ने कहा कि ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।हम मैं या मेरी पार्टी खुशी या हर्ष से ये नहीं कर रहें  हैं।मैं ख़ुद इसका विरोध कर रहा था,लेकिन पार्टी के वफ़ादार सैनिक होने की वजह से हस्ताक्षर किए हैं।














मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

अब कर्नाटक के सियासत में महंथों की दस्तक!

अगले महीने होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव में सियासत कर वो रंग अब खुलकर सामने लगा है,जो इससे पहले यहां की सियासत में कभी दिखाई नहीं दिया।विकास के भरोसे राजनीति करने का दम्भ भरने वाली दो बड़ी पार्टियां भगवा के भरोसे अपनी सियासी नैया पार कराने में जुट गई है।भाजपा और कांग्रेस के नेताओं की सियासी दौड़ जारी है। मठ,मन्दिर और दरगाह सियासत का केन्द्र बन गए हैं।क़ानून की दुहाई देने वाले दोनों बड़ी पार्टी के अध्यक्षों की लगातार धार्मिक स्थानों पर दौरे की ख़बरें आ रही हैं,जो संवैधानिक रूप से ग़लत है।आनेवाले समय में लोकतंत्र के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को चुनाव आयोग कितना अक्षुण्ण रख पाएगी ये तो आनेवाला वक़्त ही बताएगा।जनप्रतिनिधित्व क़ानून 1951 की धारा 13(3) साफ़ कहती है कि कोई भी उम्मीदवार या उसका एजेंट धर्म,जाति,समुदाय या भाषा के आधार पर वोट नहीं मांग सकता।
इन नेताओं के दौरे के बीच,भाषाई भिन्नता होने के कारण बोलते वक़्त में होने वाली गड़बड़िया एक-दूसरे पर हमलावर होेने का मौका दे रही हैं,तो वहीं जनता के लिए हास्य का विषय।लेकिन इन सब के बीच अचानक से एक साथ चार महतों की यहां के सियासत में एंट्री,बीजेपी के लिए कम लेकिन कांग्रेस के लिए ज़्यादा परेशानी का सबब बनता दिखाई दे रहा है।उडुपी से लक्ष्मीवारा तीर्था स्वामी,धारवाड़ से बासवानन्दा स्वामी, मेंगलुरू से राजशेखरनन्दा स्वामी और चित्रदुर्ग से मद्रचेन्नया स्वामी बीजेपी के टिकट से चुनाव लड़ना चाहते हैं। दिलचस्प बात ये है कि इन चारों के निशाने पर कांग्रेस हैं।हालांकि मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी ने इन सबको टिकट देने को लेकर कोई वादा नहीं किया।ये लोग हमेशा से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के काम और नीतियों की भी तारीफ़ करते रहे हैं।इन चारों के अलावा कई और साधु-संतों के भी चुनाव लड़ने के संकेत मिल रहे हैं।साधु-संत भी अब इस बात को समझने लगें हैं जब राजनीति 'धर्म' के इर्द-गिर्द घुमने लगी है तो सियासी इस्तेमाल होने से अच्छा है,ख़ुद क्यों ना नेता बन जाए।इसलिए इतनी बड़ी संख्या में साधु-संतों ने दिलचस्पी दिखाई है।
उडुपी के आठ प्राचीन श्रीकृष्ण मठों में एक शिरूर मठ के मठाधीश लक्ष्मीवारा तीर्था स्वामी ने यहां तक कह दिया है कि उन्हें टिकट नहीं मिलता है तो निर्दलीय भी लड़ सकते हैं।स्वामी के ऐलान ने राजनेताओं की नीन्द उड़ा दी  है।भाजपा के पूर्व विधायक रघुपति भट के अलावा कई नेता उनका विरोध भी कर रहें है।स्वामी की राजनीति में आने से भक्त खुश हैं।स्वामीजी का कहना है कि वह हिन्दू के पक्षधर हैं।इसका मतलब ये नहीं है कि वहां के ईसाई और मुसलमान मेरी इज्ज़त नहीं करते।सब मुझे बहुत सम्मान देते हैं.जिसकी वजह से मैं लोगों का सेवा करना चाहता हूं।ख़ास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की जिनके पास विकास की रौशनी तक अभी भी पहुंचना बाकी है।
व्रजदेही मठ के राजशेखरनन्दा स्वामी तो छह बार के विधायक और कर्नाटक सरकार में वन मंत्री रमानाथ के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ना चाहते हैं।राजशेखरनन्दा स्वामी बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हैं।इनको भड़काऊ और विवादस्पद भाषण के लिए जाना जाता है।
बात दक्षिण भारत की राजनीति में महंतों की भूमिका की हो रही है तो दक्षिण भारत के ही एक प्रसिद्ध संत की बड़ी दिलचस्प जानकारीआपके साथ साझा कर रहा हूं,जो मुझे शोध के दौरान मिली।ये जानकारी संत माणिक्कवाचकर और आज के साधु-संतो की सियासी सोच में कितना फ़र्क है ये बतायेगा।नौवीं सदी में द.भारत के प्रसिद्ध संत माणिक्कवाचकर पांड्य राजवंश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे।उनमें जब आध्यात्मिकता जगी,तो उन्होंने सबसे पहले प्रधानमंत्री पद का त्याग किया और लिखा-'कटारैयान वेंडेन करपडम इनियुम।'यानि इससे आगे वो चतुर या राजनीतिज्ञों का साथ नहीं चाहते हैं।उनका मानना था कि राजसत्ता और राजनीति के लिए जिस चतुराई की ज़रुरत होती है,वह अध्यामिकता की दुश्मन होती है।आध्यात्मिक साधक की सेवा-भावना को नष्ट करने के लिए सत्ता से जुड़ा ऐश्वर्य और अहंकार पर्याप्त होता है।इसलिए सच्चे संतों और समाज सेवियों ने स्वयं को सत्ता से दूर रखा है। 

मंगलवार, 13 मार्च 2018

कदाचार और भ्रष्टाचार मुक्त परीक्षा की मांग पर अड़े हैं छात्र।

हाथ में तिरंगा झण्डा,'आखें खोलिए मोदी जी,आपका युवा दर-दर की ठोकर खा रहा है' और 'ना मंदिर चाहिए,ना मस्जिद चाहिए,हमें सिर्फ़ नौकरी चाहिए' जैसे लिखित और मौखिक नारों के साथ देश के भविष्य कहे जाने वाले अपने ही भविष्य की लड़ाई लड़ रहें है।कर्मचारी चयन आयोग से लड़ने वाले इन योद्धाओं को लड़ाई में विजय हासिल हो,उसके लिए मेरी शुभकामनाएं।27 फ़रवरी से लगातार प्रदर्शन कर रहे इन अभ्यर्थियों को सरकार की तरफ़ से भी सार्वजनिक रुप से 'स्पेशल थैंक्स' बोला जाना चाहिए,क्योंकि ये 'एक पंथ दो काज' कर रहें हैं।प्रदर्शन कर ये अभ्यर्थी अपने भविष्य की चिन्ता तो जता हीं रहे हैं,साथ हीं सरकार को निन्द से जगा रहे हैं कि उठिये...देखिए,आज़ादी के 70 साल बाद भी हमारे पास ना तो कदाचार मुक्त परीक्षा व्यवस्था है और ना ही भ्रष्टाचार मुक्त संस्थान।
प्रदर्शन कर रहे इन छात्रों के कथित आरोपों के बाद कर्मचारी चयन आयोग में  पुर्ण रुप से आत्मविश्वास की कमी दिखी।जब छात्रों ने आरोप लगाया कि पेपर लीक में एसएससी के अधिकारी और ऑनलाइन परीक्षा संचालन करने वाली एजेंसी भी शामिल है।तब एसएससी ने आरोपों को ख़ारिज कर,छात्रों पर हीं आरोप लगा दिया।आयोग ने बयान जारी कर कहा कि सभी आरोप बेबुनियाद है।हमने अपने आंतरिक सूत्र से आरोपों की जांच की है और पाया है कि आरोप पूरी तरह से शरारतपूर्ण है।छात्रों द्वारा ये कदम बदनियती से और परीक्षा से ध्यान हटाने के लिए उठाया गया।अब आप ही सोचिए कि,क्या कोई भी छात्र ऐसा चाहेगा कि जिसके लिए वो ना जाने कितने मुश्किलों का सामना कर,सालों से परीक्षा की तैयारी कर रहा है और जब परीक्षा का समय आए तो वो शरारत करने लगे,अपवाद की बात नहीं कर रहा हूं।छात्र जब सीबीआई जांच की मांग पर अड़े रहें तो,क्यों आयोग ने छात्रों से मिलकर गहन जांच की बात कही?आयोग क्यों इस बात पर नहीं अड़ा रहा कि हमने कदाचार मुक्त परीक्षा कराई?शायद इसलिए कि एक छात्र के नाम पर क़रीब 750 प्रवेश-पत्र इसी संस्थान द्वारा किया जा सकता है।बयान में आयोग ख़ुद को जितना गंभीर बता रहा है,तो क्यों हर तरह की जांच को पास करने के बाद भी सालों से अभ्यर्थी अपने नियुक्ति पत्र का इन्तज़ार कर रहें हैं?
अब बात करते है कि हमारी सरकारों ने अबतक छात्रों के आन्दोलन को कितनी गम्भीरता से लिया,क्योंकि चुनाव के वक़्त इन लोगों को युवाओं के बेरोज़गारी की चिन्ता बहुत सता रही थी।मुझे सबसे ज़्यादा प्रधानमंत्री की ख़ामोशी हैरान कर रही है कि ऐसा क्या कर दिया है इन छात्रों ने कि पीएम कुछ बोल नहीं रहें है?वो तो देश की युवा शक्ति पर गर्व करते हैं।पीएम की चुप्पी पर कई लोग ये दलील दे रहें है कि हर चीज़ पर बोले तब तो हो गया।मैं ऐसे लोगों से पूछना चाहता हूं कि क्या ऐसी कोई सूची है जिसमें लिखा हो कि पीएम इस मसले पर बोलेंगे,इसपे नही?चुप्पी के मामले में मुख्यमंत्री भी पीछे नहीं है।देश के अलग-अलग राज्यों से युवाओंं की जमात 'दिल्ली चलों' का पालन कर रहा है,लेकिन अरविन्द केजरीवाल को छोड़कर किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने इस मसले पर बोलना उचित नहीं समझा है,शायद इसलिए की ये धार्मिक नही बल्कि रोज़गार का मसला है।जिस देश में एक फ़िल्म को लेकर मीडिया और सियासत में क़रीब तीन महीने तक चर्चा हो जाए।क़रीब-क़रीब आठ से दस राज्यों के मुख्यमंत्री में से कुछ सर्वोच्च न्यायालय पहुंच जाए और उसी देश मेें कदाचार और भ्रष्टाचार को लेकर प्रदर्शन कर रहे युवाओं को नेताओं का सहयोग ना मिले तो क्या ये समझा जाए कि सरकार की नज़र में धार्मिक मसला महत्वपूर्ण है,रोज़गार नहीं?
दिल्ली स्थित एसएससी मुख्यालय के बाहर 27 फ़रवरी से प्रदर्शन शुरु होती है,उसके 5 दिन बाद यानी 4 मार्च को दिल्ली बीजेपी के अध्यझ मनोज तिवारी और सांसद मीनाक्षी लेखी अभ्यर्थियों से मिलने पहुंचते हैं।इन दोनों को किसी और राज्य के सांसदों का साथ नही मिला,जबकि राज्यों के ज़्यादातर सांसद अपने संसदीय क्षेत्र छोड़कर दिल्ली में ही डेरा जमाए रहते हैं।मनोज तिवारी का कार्य सराहनीय रहा,लेकिन अब तक उनका कोई फ़ायदा नही दिख रहा है।तिवारी ने गृहमंत्री राजनाथ सिह,भाजपा अध्यझ अमित शाह और पीएमओ में मंत्री जितेन्द्र सिंह को मिलकर छात्रों की मांग से अवगत कराया।मीनाक्षी लेखी ने वही कहा,जो आज कल चलन में है।जब कोई अपनी मांग को लेकर प्रदर्शन करता है,तो ये बता दिया जाता है कि इसमें बाहरी लोगों का हाथ है।गृहमंत्री द्वारा सीबीआई जांच के आश्वासन के बाद भी आज तक छात्र प्रदर्शन कर रहें हैं,क्योंकि उनको जिस बात का शक था वही हुआ।सीबीआई जांच शुरू हुआ कि नही?यदि जांच शुरू हो गया है,तो जांच कहां तक पहुंची?ऐसे सवालों का सरकार के तरफ़ से कोई जवाब नही दिया जा रहा है।जिससे छात्र आश्वस्त हो सके।







🗣️मुझे तो संशय है!

नासिक से क़रीब 180 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर तक़रीबन 35000 युवाओं,महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों की झुंड मुम्बई के आज़ाद मैदान पहुंची तो,शायद राज्य सरकार को पता चला कि कोई हमारे दर पर आया है।मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने पीसी कर जो कहा वो बेहद हैरान करने वाला है।मुख्यमंत्री की पीसी में ऐसा लगा कि उनको 'किसान' शब्द से परहेज़ है।किसानी तो एक पेशा है।वो किसी भी जाति या धर्म से हो सकता है।आदिवासी भी तो खेती करते ही हैं।उन्होंने कहा कि लॉन्ग मार्च कर आए लोगों की क़रीब-क़रीब सारी मांगें मान ली गई है।मार्च में 90% लोग आदिवासी हैं।मुख्यमंत्री के पास ऐसी कौन सी तकनीक है,जिससे कुछ हीं घंटों के भीतर उन्हें पता चल गया कि इतने प्रतिशत लोग आदिवासी हैं?इससे पहले जब 'पैदल लॉन्ग मार्च' शुरू हुआ था तब से लेकर आज़ाद मैदान, मुम्बई पहुंचने तक यही पता था कि इसमें ज़्यादातर किसान हैं,जो महाराष्ट्र सरकार पर वादाख़िलाफ़ी का आरोप लगा रहें हैं।इनकी मांग है कि सरकार स्वामीनाथन आयोग कि सिफ़ारिशों को लागू करे।मांग नहीं माने जाने तक वो विधानसभा का घेराव करेंगे।
मुख्यमंत्री की पीसी के बाद से एक सवाल ये है कि उन्होंने 180 किमी की पैदल यात्रा क्यों करवाई,जब उनको आदिवासियों की समस्या पहले से हीं पता था?सीएम ने कहा कि लिखित रूप में आश्वासन दिया गया है कि आदिवासियों की मांग को छह महीने के भीतर पूरा कर दिया जाएगा।लेकिन ये नहीं बताया कि कैसे?जो क़ानून क़रीब बारह साल में लागू नहीं कर पाए,वो छह महीने में कैसे लागू कर देंगे?15 दिसम्बर 2006 को संसद में पास 'अनूसुचित जाति और अन्य परम्परागत वन्य निवासी क़ानून' की महाराष्ट्र की हक़ीक़त ये है कि मात्र दो ज़िले गढ़चिरौली और नन्दूरबार में पुर्ण रूप से तो नहीं लेकिन लागू हो गया है।
किसानों की बात करें तो 20 जून 2017 को किसानों की कर्ज़माफी का एलान किया था लेकिन अभी तक लागू नहीं हो पाया है जिसकी वज़ह से लॉन्ग मार्च करना पड़ा।

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

महिलाओं की सुरक्षा के प्रति कितनी लापरवाह है हमारी सरकारें!


निर्भया अब इस दुनिया में तो नहीं है,लेकिन वो जिस तरीके से हैवानियत का शिकार हुई थी,वक़्त-बे-वक़्त उसकी याद आ जाती है।गुगल करेंगे तो आप पाएंगें कि आज भी हमारे समाज में वैसे दरिदें हैं,जिनको कानून का डर नही है।याद कीजिए उस वक़्त के जन-आक्रोश को,जब निर्भया अस्पताल में ख़ामोशी से अपनी ज़िन्दगी से जंग लड़ रही थी,और देशभर में नेता और आम जनता अपने-अपने शहर के कोने-कोने में निर्भया के साथ हुए हैवानियत और महिलाओं की तत्कालिन सुरक्षा-व्यवस्था के ख़िलाफ़ तख़्ती लेकर सड़क पर मार्च कर रहे थें।क़ानून में बदलाव की मांग को लेकर लोग इतने गुस्से में थे,जैसे सिर्फ़ कानून में बदलाव कर देने से निर्भया के साथ जो हुआ,वो किसी बेटी के साथ नही होगा।लेकिन आज हक़ीकत ये है कि जब भी किसी लड़की/महिला के साथ बदसलूकी होती है तो वहां का समाज ख़ामोश तो रहता हीं है,वहां के विधायक और सांसद भी ना जाने क्यों ख़ामोश रह जाते हैं?कई बार तो पुलिस के काम करने का तरीक़ा भी हैरान कर जाता है।कानून में कई बदलाव भी हुए,उसका क़रीब पांच साल बाद कितना असर हुआ है शायद बताने की ज़रुरत नही हैं।मुझे लगता है कि ये कहना कि सिर्फ़ कड़े कानून बना देने से समाज में बदलाव हो जाएगा,ख़ुद को वास्तविकता से मुंह मोड़ने के जैसा है।बदलाव के लिए ज़मीनी स्तर पर लोगों और सरकारी कर्मचारियों को मिलकर काम करना ही पड़ेगा,ताकि निर्भया के साथ जो हुआ था वो किसी और बेटी के साथ ना हो। वरना एसी कमरे में लेदर की कुर्सी पर बैठकर क़ानून बनते रहेंगे और बदलाव सिर्फ़ काग़ज़ पर ही दिखेंगे।
निर्भया के साथ हुए जघन्य अपराध के बाद हो रहें तमाम विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए निर्भया एक्ट बनाया।2013 में बलात्कार पीड़िताओं को आर्थिक रुप से सहायता पहुंचाने और महिला सुरक्षा के लिए उठाये जाने वाले क़दमों पर ख़र्च करने के लिए निर्भया फ़ण्ड भी बनाया गया।पांच साल बाद भी हमारी सरकारें महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कितनी लापरवाह हैं,इसका अंदाज़ा इन बातों से लगाया जा सकता है।निपुण सक्सेना की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 9 जनवरी को आदेश देते हुए सभी राज्य सरकारों से कहा था कि वो बताए कि उन्होनें यौन उत्पीड़न से पीड़ित महिलाओं को निर्भया फ़ण्ड से कितना पैसा दिया गया और किन-किन पीड़ित महिलाओं को दिया गया।आपको जानकर हैरानी होगी कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावज़ूद 24 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों ने हलफ़नामा दाख़िल नहीं किया।
हलफ़नामे के संदर्भ में अब बात करते हैं उन दो राज्यों की,जिसके मुख्यमंत्री महिला सुरक्षा को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं।पहले बात करते हैं मध्य प्रदेश की।भोपाल में एक छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के बाद 9 नवम्बर को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि वो राज्य में सुरक्षा का ऐसा वातावरण चाहते हैं,जिसमें बहन-बेटिया अपनी मर्ज़ी से कहीं भी आ-जा सके।हादसे के बाद थाने में रिपोर्ट लिखवाने के लिए छात्रा को 3 थानों के बीच 24 घंटे भटकना पड़ा था।ये सब उस छात्रा के साथ हुआ,जिसके माता-पिता ख़ुद पुलिस में हैं।हलफ़नामें पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमुर्ती दीपक गुप्ता की पीठ ने बलात्कार पीड़िता को 6000-6500 रुपये देने पर,जमकर प्रदेश सरकार को फ़टकार लगाई।पूछा कि क्या आप खैरात बांट रहें है?आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?आप एक बलात्कार की कीमत 6500 रुपये लगा रहें है?आगे कहा कि वो हतप्रभ हैं निर्भया कोष योजना के तहत केन्द्र से सबसे अधिक पैसा प्राप्त करने वाला राज्य,बलात्कार पीड़िताओं को मात्र 6000-6500 रुपया दे रहा है।एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2017 में देश में 28,947 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना दर्ज़ की गयी।जिसमें सिर्फ़ मध्यप्रदेश में हीं 4882 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना हुई,जो सभी राज्यों में अव्वल है।
अब बात करते हैं हरियाणा की।जनवरी मध्य में 48 घन्टे में मानवता को शर्मासार कर देने वाली बलात्कार की 4 वारदात से अभी हरियाणा उभरा भी नही था कि,सीएम मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि रेप की घटनाओ की सत्यता की पुष्टि होने से पहले सनसनी नही फ़ैलानी चाहिए।रेप के मामलों की संख्या बढ़ती हुई इसलिए नज़र आ रही है,क्योंकि उन में से कई फ़र्ज़ी आरोप होते हैं।क़ायदे मुख्यमंत्री को तो ये बताना चाहिए वो बलात्कार पीड़िता को इंसाफ़ दिलाने के लिए क्या कर रहें हैं?मध्य प्रदेश के बाद हरियाणा सरकार को पीठ ने जमकर फ़टकार लगाई।हरियाणा सरकार के वकील ने जैसे ही कहा कि वे हलफ़नामा दायर कर देंगे तो पीठ ने कहा,'अगर आपने हलफ़नामा दायर नहीं किया है तो इससे साफ़ पता चलता है कि अपने राज्य में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर आपके क्या विचार हैं।अपने राज्य की महिलाओं से कह दीजिए कि आपको उनकी परवाह नही है।'मुझे लगता है कि हरियाणा सरकार के नही कहने के बावज़ूद,आय दिन हो रही घटनाओं से पता तो चलता ही है कि महिलाओं की सुरक्षा को लेकर राज्य सरकार कितना गम्भीर है।
ये तो हुई भाजपा शासित दो राज्यों की बात।अब बात करते हैं केन्द्र सरकार की।27 नवम्बर को राज्यसभा सांसद के रहमान ख़ान ने पूछा कि निर्भया फ़ण्ड के तहत तीन साल में अब तक कितनी रेप पीड़िताओं को सहयोग राशि प्रदान की गई है और कितनो को मिलना बाकी है?जवाब में गृह मंत्रालय ने कहा कि रेप पीड़िताओं को सहयोग राशि का फ़ॉर्म सीधे राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों द्वारा भरा जाता है,इसलिए कितनी रेप पीड़िताओं को सहयोग राशि मिलना अभी बाकी है,इसका आंकड़ा केन्द्र सरकार के पास नहीं है।मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ निर्भया फ़ण्ड से अगस्त 2017 तक 3000 करोड़ में से मात्र 264 करोड़ रुपये ख़र्च किये गए हैं।तो ये है महिलाओं की सुरक्षा के प्रति केन्द्र और राज्य सरकार की तत्परता।इसलिए व्यक्तिगत कर्तव्य समझकर आगे आईये और सुनिश्चित कीजिए कि कोई बेटी दरिन्दगी की शिकार ना हो।वरना जब-जब किसी बेटी के साथ हैवानियत होगी,समाज में बुरे माहौल का निर्माण होगा।




शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

बात,शिवराज के शासनकाल में संसाधनों से वंचित गांव की!

                 
चारो तरफ़ अंधेरे का साया है,अंधेरे साये के बीच दीये की रौशनी से ही ख़ुद की भविष्य रौशन करने में जुटी छात्राओं की ये तस्वीर भारत के ह्रदय कहे जाने वाले राज्य मध्य प्रदेश के फुटेरा धाने गांव की है।इस राज्य में 2003 से लगातार बीजेपी की सरकार है।पहले उमा भारती,बाद में बाबूलाल गौर और उसके बाद नवम्बर 2005 से लगातार शिवराज सिंह चौहान के हाथों में इस राज्य की बागडोर है।अति न्यूनतम संसाधन में भी भारत की साक्षरता दर बढ़ाने में जुटी भारत की इन होनहार बेटियों की तस्वीर,ये बता रही है कि सरकारों द्वारा विद्युतीकरण को लेकर चलाई चलाई जा रही अनेकों योजनाओं में से किसी एक का भी पहुंचना अभी बाकी है,जिसकी वज़ह से आज भी इस गांव के ज़्यादातर हिस्से में अंधेरा कायम है।बिजली के मामले में सरप्लस वाला राज्य मध्य प्रदेश के एक गांव का ये हाल हैरान करने वाला है।हाल ही में राज्य की बिजली कम्पनियों ने एक दिन में अधिकतम 12 हज़ार मेगावाट से अधिक की मांग को पूरा करने का रिकॉर्ड कायम किया है।राज्य के पावर प्लांटों की कुल बिजली उत्पादन की क्षमता 17.5 हज़ार मेगावट से अधिक है।
फुटेरा धाने गांव एक छोटा सा गांव है,जिसमें मात्र 15 परिवार रहते हैं।इस गांव में ना ही सड़क अच्छी है,ना पानी की उत्तम व्यवस्था है।पढ़ने के लिए बच्चों को रोज़ 8 किलोमीटर जाना पड़ता है।गांव वालों का कहना है कि वो बार-बार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को अपनी समस्याओं के बारे में बताते हैं,लेकिन सरकार हमारी समस्याओं के निदान के लिए कोई कदम नही उठाती है।मैं मध्य प्रदेश कभी नही गया हूं,इसलिए मैं सिर्फ़ राष्ट्रीय मीडिया के माध्यम से ही मध्य प्रदेश को जानता हूं।राष्ट्रीय मीडिया मध्य प्रदेश की समस्याओं को कैसे कवर करती है,इसी ख़बर को गूगल करके देख लीजिए।तेज़ी से विकसीत हो रही शीर्ष के दूसरे राज्य से जब ये ख़बर सामने आई तो मैं चौंक गया।मैंने व्यक्तिगत तौर पर इस गांव की समस्या के बारे में जानने की कोशिश की।मैं चाहता था कि असली वज़ह को आपके सामने लाऊं।मैंने चुनाव आयोग,सीएमओ,सीएम से वहां के विधायक और सांसदों के बारे में जानने की कोशिश की,लेकिन कोई जवाब ना मिलने के कारण रहनुमाओं का पक्ष नहीं जान पाया।
डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम ने अपनी किताब इण्डिया-2020 में लिखा है कि विकसित भारत बनाने के लिए कुछ क्षेत्रों में एकीकृत रुप से अनिवार्य विकास करना होगा,जिसमें ऊर्जा का भी स्थान है।डॉ0 कलाम,देश में लगातार तेज़ी से कम हो रहे ऊर्ज़ा के स्रोतों को लेकर चिन्तित थें।उन्होंने 2012 में काशी विश्वविद्यालय में आयोजित 20 वीं राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस के उद्घाटन समारोह को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए अपने चिन्ता जाहिर भी की थी।दुबई वैश्विक ऊर्ज़ा मंच-2011 में डॉ0 कलाम ने भारत द्वारा राजस्थान में सौर ऊर्जा केन्द्र के लिए शुरु किए गए कार्यक्रम की प्रशंसा की थी।डॉ0 कलाम ने कहा था कि एक सतत ऊर्जा कार्यक्रम की शुरूआत होने से हम बहुत खुश हैं।निरंतरता दो चीजों से आती है।पहली उपलब्धता और दूसरी यह कि भविष्य में हमारे पास स्वच्छ ऊर्ज़ा हो।2011 में ही एशियाई विकास बैंक के निदेशक माइकल बैरो ने कहा था "दुनिया में उच्च स्तर के सौर ऊर्ज़ा की क्षमता वाले देशों में भारत भी है।" ऐसा ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी लगता है।इसलिए उन्होंने बिजली सहज हर घर योजना-सौभाग्य के तहत सौर ऊर्ज़ा पर ज़्यादा बल दिया है।
केन्द्र सरकार बार-बार ये कहती है कि हम देश के कोने-कोने में 24*7 बिजली उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं।सरकार द्वारा जुलाई 2015 से दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना और सितम्बर 2017 से बिजली सहज हर घर योजना-सौभाग्य चलाई जा रही है।सौभाग्य योजना के तहत सुदूर और दुर्गम इलाकों को भी रौशन करने का प्रावधान है।योजना के तहत सुदूर और दुर्गम इलाकों में 200 से 300 डब्लूपी का सोलर पावर पैक देने का प्रावधान है।पैक में 5 एलईडी बल्ब,एक डीसी पंखा और एक डीसी पावर प्लग का प्रावधान होगा।सरकार पांच साल तक बैट्री बैंक के मरम्मत का भी ख़र्च उठाएगी।योजना का उद्घाटन करते हुए पीएम मोदी ने दोहराया था कि सरकारी कर्मचारियों को अपने कार्यशैली में बदलाव करना ताकि योजना का लाभ सभी को मिल सके।पीएम की बात को सरकारी कर्मचारियों ने कितना माना है,आपके सामने है।मध्य प्रदेश के मुरैना से बीजेपी सांसद अनूप मिश्रा ने लोकसभा में कहा कि केन्द्र की मोदी सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन पर निगरानी की कमी है।निगरानी ज़रुरी है तभी जनता को योजनाओं का लाभ मिलेगा।अनूप मिश्रा जैसे कई लोग हैं,जो आवाज़ उठाते हैं,लेकिन उनकी सुनी नही जाती है। 


                                                          

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...